चमक में छिपा अंधेरा | Tehelka Hindi

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चमक में छिपा अंधेरा

ताजमहल के बारे में कहा जाता है कि इसे बनवाने वाले मुख्य कारीगर के हाथ कटवा दिए गए थे ताकि वह फिर कोई ऐसी सुंदर इमारत न बना सके. ताजमहल से लेकर चीन की दीवार तक हुए बेहतरीन निर्माणों की जब भी बात होती है तो इन्हें बनाने वाले शिल्पियों के साथ हुए अन्याय के बहुत-से किस्से मिलते हैं. यह अन्याय 21वीं सदी तक भी जारी है. राजधानी दिल्ली की तस्वीर बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली दिल्ली मेट्रो के कामगारों की एक बड़ी संख्या भी अन्याय का शिकार है. मेट्रो की अहम सेवाओं का जिम्मा अपने कंधों पर ढोने वाले ये लोग अपने तमाम वाजिब हकों से वंचित हैं.

करीब दशक पहले तक दिल्ली की सूरत ऐसी नहीं थी जैसी आज दिखती है. रोजगार से लेकर दूसरे कामों के लिए देश भर से लोगों का हुजूम यहां जिस चक्रवृद्धि रफ्तार से उमड़ा उसके चलते दमघोंटू परिस्थितियां बनने लगीं. साल 2000 तक आते-आते दिल्ली में वाहनों की संख्या इस कदर बढ़ गई कि इन्हें समेटने के लिए दिल्ली की खासी चौड़ी सड़कें कम पड़ने लगीं. तब नए फ्लाइओवरों और अंडरपासों पर काम शुरू हुआ और ठीक इसी वक्त मेट्रो रेल सेवा भी इस शहर के लिए एक वरदान बन कर आई. इसने जैसे वेंटिलेटर पर पड़ी दिल्ली को उसकी सांसें लौटा दीं. मेट्रो ने अपनी बेहतरीन सेवा की बदौलत दिल्ली की लुंजपुंज पड़ चुकी यातायात व्यवस्था का नक्शा ही बदल दिया. इस सेवा को संचालित करने वाले डीएमआरसी का दावा है कि उसने प्रति दिन 90 हजार से अधिक गाड़ियों को दिल्ली की सड़कों से हटाकर उन्हें दबावमुक्त कर दिया है. उसका यह भी दावा है कि औसतन 20 लाख लोग रोजाना मेट्रो से ही आना-जाना करते हैं.

इन दो दावों में दर्ज आंकड़ों को लेकर भले ही कुछ ऊंच-नीच हो सकती है, फिर भी इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता कि मेट्रो ने दिल्ली के परिवहन की सूरत बदली है. स्टेशन के अंदर दाखिल होते ही वातानुकूलित हवाएं यात्रियों का स्वागत करती हैं और स्वचालित सीढियां उन्हें सामान सहित गाड़ी के डिब्बे तक पहुंचा जाती हैं. यात्रियों को बेहतरीन सेवा देने के चलते आज मेट्रो के मायने ये हैं कि इसे दिल्ली की लाइफलाइन भी कहा जाने लगा है. कई पुरस्कार और प्रशंसापत्र भी मेट्रो के चेहरे को लगातार उजला बनाते जा रहे हैं.

लेकिन दिल्ली मेट्रो के इस चमकीले चेहरे के पीछे एक ऐसी हकीकत भी है जिसका अंधेरा इसकी भूमिगत सुरंगों से भी घना है. यह हकीकत है मेट्रो में काम करने वाले उन ठेका कामगारों की जिनके जिम्मे इस सेवा को सफलतापूर्वक चलाने का अहम दारोमदार है. आठ घंटे के कागजी नियम से कहीं ज्यादा देर तक काम करने और करते रहने को मजबूर इन लोगों को इसके लिए न तो उचित मेहनताना मिलता है और न ही दूसरे वे अधिकार जिनकी बुनियाद पर श्रम कानूनों का ताना- बाना टिका है. तहलका ने दिल्ली मेट्रो में कांट्रैक्ट के जरिए नौकरी करने वाले तमाम कामगारों से मुलाकात की और पाया कि भले ही इनकी मेहनत से मेट्रो के डिब्बे दिल्ली के एक छोर से दूसरे छोर तक बेरोकटोक दनदना रहे हों लेकिन इनकी अपनी जीवनगाड़ी हिचकोले खा-खा कर घिसट भर पा रही है.

2011-12 का वित्तीय लेखा-जोखा जो बताता है कि डीएमआरसी की माली हालत काफी मजबूत है

कुल राजस्व- 2,247.77 करोड़ रु

विज्ञापनों पर खर्च- 391.92 लाख रु

पर्यावरणीय बचाव पर खर्च- 638.19 लाख रु

जनजागरण पर खर्च- 401.86 लाख रु

सुरक्षा पर खर्च- 422.14 लाख रु

छपाई तथा स्टेशनरी- 726.22 लाख रु

कानूनी खर्च- 81.69 लाख रु

अन्य खर्च- 646.34 लाख रु

सबसे पहले मेट्रो के तान-बाने को मोटे तौर पर समझ लेते हैं. मेट्रो के तहत अलग-अलग कामों के लिए कई विभाग होते हैं. इन कामों को निपटाने के लिए नीति नियोजन के संदर्भ में डीएमआरसी ने भारी-भरकम मेहनताने पर अधिकारियों और कर्मचारियों को रखा है जबकि मेट्रो ट्रैक बनवाने, यात्रियों को टिकट देने, उन्हें गाड़ियों में चढ़वाने और स्टेशन परिसर की सफाई करने जैसे तमाम कामों के लिए उसने अलग-अलग प्राइवेट कंपनियों के साथ कांट्रैक्ट किया है. कांट्रैक्ट पाने वाली कंपनियां इन कामों के लिए लोगों को ठेके पर रखती हैं. यहीं से शोषण की कहानी शुरू होती है .

डीएमआरसी से कांट्रैक्ट मिलते ही प्राइवेट कंपनियां सीधी भर्ती के अलावा ठेकेदारों की मार्फत भी कामगारों की नियुक्ति करती हंै. ये ठेकेदार उपठेकेदारों से संपर्क करते हैं जिन्हें जॉबर (नौकरी दिलाने वाला) भी कहा जाता है. इनकी भूमिका मुख्यत: कंपनी और कामगारों के बीच बिचौलिये की होती है जिसके लिए ये कंपनी और कामगार दोनों तरफ से पैसे पाते हैं. इस तरह कामगार को नौकरी पाने से पहले ही तीन चार लोगों से होकर गुजरना पड़ता है. इस तरह की स्थितियां निर्माण और सफाई का काम करने वाले कामगारों के मामलों में ज्यादा सामने आती हैं. हालांकि अब टॉम आपरेटर (टिकट काउंटर पर बैठने वाला कर्मचारी) के पद पर नियुक्ति देने वाली कंपनियां भी खुले तौर पर 25,000 रुपये बतौर सिक्योरिटी मांगने लगी हैं. झंडेवालान मेट्रो स्टेशन पर टिकट देने का काम करने वाले मयंक बताते हैं, ’25,000 रु जमा कराने और फिर बिचौलियों की जेब गरम करने के बाद भी नौकरी जाने का खतरा बना रहता है. अगर नौकरी चली जाए तो सिक्योरिटी के रूप में जमा 25,000 रुपये वापस पाने को लेकर बहुत बड़ी महाभारत लड़नी पड़ती है.’

दिल्ली के नांगलोई इलाके में रहने वाली अनीता इस महाभारत की भुक्तभोगी रह चुकी हैं और लंबी जद्दोजहद के बाद हाल ही में इसके चक्रव्यूह से बाहर निकल पाई हैं. इसी साल मई में टॉम ऑपरेटर की नौकरी पाने वाली अनीता को लगभग तीन महीने बाद ही बिना अग्रिम नोटिस दिए नौकरी से हटा दिया गया. जब उन्होंने सिक्योरिटी के रूप में जमा अपने 25,000 रु वापस मांगे तो कंपनी की तरफ से उन्हें 10 दिन बाद पैसा लौटाने की बात कही गई. लेकिन दो महीने से भी ज्यादा लम्बे समय तक माथापच्ची करने के बाद उनका यह काम पिछले महीने किसी तरह पूरा हो पाया. अनीता की अगस्त माह की तनख्वाह भी अभी तक नहीं मिली है जिसके लिए उन्हें इंतजार करने को कहा गया है.

वे कहती हैं कि, ‘इस तरह के मामलों को समझने के लिए मैनें कुछ दूसरी प्राइवेट कंपनियों के अधिकारियों से भी बात की तो उनका कहना था कि इतना वक्त लगना मामूली बात है.’ उधर, मेट्रो मजदूरों के हितों को लेकर काम करने वाले स्वयंसेवी सुनील कुमार इसे कंपनियों का मुनाफा कमाने का उपक्रम बताते हैं. वे कहते हैं कि सिक्योरिटी मनी रखने के सवाल पर कंपनियों का तर्क होता है कि यात्रियों को टिकट देने वाले टॉम ऑपरेटरों का कामकाज सीधे-सीधे रुपये-पैसों से जुड़ा होता है, जिसमें हेराफेरी होने पर सिक्योरिटी मनी से रिकवरी की जा सकती है. लेकिन हकीकत यह है कि इन पैसों से ये कंपनियां भारी-भरकम ब्याज कमाती हैं. सुनील कुमार सवाल करते हैं, ‘रेलवे, परिवहन और तमाम दूसरे सरकारी विभागों में भी कई कर्मचारी इसी प्रकृति के काम से जुड़े होते हैं तो फिर उन सबसे सिक्योरिटी मनी क्यों नहीं ली जाती?’ यह तर्क ठीक भी लगता है क्योंकि सवाल अगर वाकई में पैसों की हेराफेरी होने की सूरत में रिकवरी का है तो कामगारों के वेतन से भी यह राशि काटी जा सकती है.

यहां भी है अंधियारा

डीएमआरसी के लिए ठेके पर काम करने वाले कामगारों की एक बहुत बड़ी जमात निर्माणस्थल यानी कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करने वाले मजदूरों की भी है. पहचान के नाम पर हेलमेट और जैकेट पहने ये मजदूर हर रोज आठ से दस घंटे तक हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद मामूली पगार पाते हैं. अंधेरे गड्ढों को और गहरा करने या फिर ऊंचे-ऊंचे खंभों पर लटके रहने वाले इन कामगारों के लिए आजादी के यही मायने हैं कि अगर जिंदा रहे तो पगार मिल जाएगी. मरने के बाद इनके परिजनों का क्या होगा यह सब सोचने तक का इनके पास न ही वक्त है और न ही परिस्थितियां इसकी इजाजत इन्हें देती हैं क्योंकि इनमें से अधिकतर मजदूर वे हैं जिनके पास इस काम के अलावा और कुछ करने का विकल्प ही नहीं है. तीन महीने पहले मेट्रो की रोहिणी साइट पर काम पाने वाले बलिया जिले के संतोष कुमार पिछले साल फेज टू के निर्माण के दौरान भी डेढ़ साल तक अलग-अलग निर्माणस्थलों पर मजदूरी कर चुके हैं. वे बताते हैं कि रोजगार का कोई और साधन न होने की बेबसी उन्हें और उनके जैसे बहुत लोगों को इस शहर में खींच लाई है.

मामूली वेतन पाने वाले इन मजदूरों के लिए काम करने की परिस्थितियां बेहद असुरक्षित हैं जिनमें हादसे होते रहते हैं. 2010 तक मेट्रो की कंस्ट्रक्शन साइटों पर जान गंवाने वाले मजदूरों की संख्या 100 का आंकड़ा पार कर चुकी थी. यह बात डीएमआरसी ने हाईकोर्ट में दायर किये गए एक हलफनामे में मानी थी. तब से लेकर अब तक कई हादसे और भी हो चुके हैं. इन्होंने मजदूरों की जान तो ली ही है, घायल मजदूरों को हमेशा के लिए अपंग भी बना दिया है. भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में भी डीएमआरसी की कई लापरवाहियां उजागर हो चुकी हैं. कैग ने अपनी रिपोर्ट में मेट्रो रेल परियोजना के निर्माणाधीन स्थलों पर गुणवत्ता नियंत्रण में खामियां भी पाई थीं. निर्माण से जुड़े  मजदूरों के लिए काम की नारकीय परिस्थितियों का मुद्दा कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान भी सामने आया था. उस वक्त भीषण गर्मी के बीच दिन-रात काम करने वाले बहुत सारे मजदूर पूरी तरह से जॉबरों के रहमो करम पर रहने को मजबूर थे. आलम यह था कि इनके रहने के लिए टीन की चादरों वाले शेड बना दिए गये थे जिनमें रहना लगभग असंभव था.

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