कुछ ना कहो, कुछ भी ना कहो

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2008

फिल्म समीक्षा

फिल्म » घनचक्कर
निर्देशक»  राज कुमार गुप्ता
लेखक » परवेज शेख, राज कुमार गुप्ता
कलाकार » विद्या बालन, इमरान हाशमी, राजेश शर्मा,
नमित दास

हमारी दुनिया की प्रॉब्लम है कि इसमें हंसी इतने स्वाभाविक ढंग से दाखिल नहीं होती, जैसे जीवन का हिस्सा हो. यही प्रॉब्लम घनचक्कर की भी है. यह कई जगह हंसाती है लेकिन उससे कहीं ज्यादा जगहों पर यह किसी खराब टीवी सीरियल के  ढंग से हंसाने की कोशिश में लगी रहती है. और इसीलिए घनचक्कर के ज्यादातर सीन अपनी जरूरत से लंबे हैं और खिंचते-खिंचते खिसियाने लगते हैं.

शुरू में एक बैंक लूटने का लंबा सीन है जिसमें तीनों चोर फिल्म अभिनेताओं के मुखौटे लगाकर अंदर घुसते हैं. ठीक है, यह मजेदार है. पर आप इसके भरोसे दस मिनट नहीं खींच सकते. घनचक्कर खींचती है. कभी-कभी तो वह बहुत सतही तरीके से अपने कमाल के अभिनेता राजेश शर्मा तक को बेवजह हंसने के लिए कहती है, और उन्हें हंसना पड़ता है. उसका कोई अर्थ नहीं. नमित और राजेश शर्मा की वे ज्यादातर समय खीझ पैदा करती हैं.

ऐक्टरों का काम ज्यादातर जगह अच्छा है. विद्या बालन अपने साथ एक अलग जान लेकर आती हैं अपने किरदारों में, जिसके निशान भी उनकी समकालीन मुख्यधारा की अभिनेत्रियों के हाथ नहीं लगे हैं. उन्हें कोई फिक्र नहीं कि वे तथाकथित सुंदरता की परिभाषाओं में कहां फिट हैं और कैमरा उन्हें किस एंगल से देख रहा है. फिल्म में ज्यादा ऊपर पहुंचने की गुंजाइश है ही नहीं पर आधा-पौन इंच ऊपर वे अकेली करती हैं.

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