‘कुछ नहीं हुआ तो ‘आप’ ने एफआईआर दर्ज करवा दी’

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दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के वोट में 15 फीसदी की गिरावट आई. आपको इसकी क्या वजह लगती है? दिल्ली मेट्रो से पहले तक घर से दफ्तर आने-जाने में जूझते रहे वर्ग ने कांग्रेस के बजाय आम आदमी पार्टी को वोट देने का फैसला क्यों किया?
मुझे लगता है कि इसकी सिर्फ एक वजह नहीं थी. कई कारण थे. शायद पूरे देश में भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ गुस्सा था और इसलिए वह गुस्सा खासकर दिल्ली में निकला क्योंकि केंद्र सरकार यहां से चलती है और मीडिया का जमावड़ा भी यहीं रहता है.  घोटाले की खबर लोग देश के किसी भी कोने में सुन सकते हैं, लेकिन उसका असर सबसे ज्यादा दिल्ली में ही महसूस किया जाता है.

दूसरा मुझे लगता है कि हमारी पार्टी को और ज्यादा मिलजुलकर काम करना चाहिए था. हो सकता है कि ऐसा इसलिए भी हुआ हो कि जनता हमसे ऊब चुकी थी. हम 15 साल सत्ता में रहे हैं. लोगों ने सोचा हो कि एक बार बदलाव करके देखते हैं. यह भी याद रखिए कि दिल्ली में त्रिकोणीय मुकाबला था. आम आदमी पार्टी ने ऐसे कई वादे किए जो पॉश इलाकों में रह रहे एक बड़े वर्ग को काफी भाए–बिजली की कीमतों में 50 फीसदी की कमी, 700 लीटर मुफ्त पानी, सबको नौकरियां, दो लैपटॉप, ठेकेदारी पर काम कर रहे लोगों को स्थायी नौकरी आदि. अब ये वादे आकर्षक तो हैं, लेकिन व्यावहारिक नहीं. अगर ऐसा संभव होता तो मैं बिजली की कीमतें 70 फीसदी घटा देती. हमारे यहां वैसे भी बिजली की दरें देश में सबसे कम हैं. दिल्ली में पांच हजार मेगावॉट बिजली की खपत होती है, लेकिन यहां पैदा होती है सिर्फ 300-400 मेगावॉट. बाकी हम एनटीपीसी और दूसरी कंपनियों से खरीदते हैं. हमने बवाना में 1, 500 मेगावॉट का एक प्लांट लगाया था, लेकिन हमें उतनी गैस ही नहीं मिल सकी इसलिए यह सिर्फ 100-150 वॉट बिजली बना रहा है. कहने का मतलब यह है कि दिल्ली में बिजली नहीं बनती. हमारे पास जमीन नहीं है. यहां तक कि हमारा पानी भी हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश से आता है. इसके पास कोई प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं न ही यहां खेती होती है. तो यहां और जगहों की तुलना में एक अलग आर्थिक परिदृश्य में काम करना पड़ता है.

अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों ने आप पर दो मुद्दों को लेकर हमला किया है. उनका दावा है कि राष्ट्रमंडल खेल गांव के निर्माण में भ्रष्टाचार हुआ. दूसरा आरोप 1, 200 कॉलोनियों के नियमितीकरण को लेकर है.
केजरीवाल शुंगलू कमेटी और कैग रिपोर्ट के बारे में बात कर रहे हैं. लेकिन सीबीआई मुझे सारे आरोपों से क्लीनचिट कर चुकी है. मेरे खिलाफ अकेला आरोप यह है कि मैंने कुछ लाइटों का चयन अपने आवास पर किया. हां, मैंने ऐसा किया था. आप जरा जाइए और दिल्ली सेक्रेटेरिएट को देखिए. यह देश की सबसे खूबसूरत जगहों में से एक है. वहां की हर चीज मैंने ही चुनी है. केजरीवाल और उनके साथियों को पता होना चाहिए कि कोई मंत्री मनमाना फैसला नहीं लेता. मंत्री (कार्यपालिका) एक निर्णय पर पहुंचते हैं और किसी चीज के लिए बजट का आवंटन कर देते हैं. राष्ट्रमंडल खेलों के लिए बने बजट पर जैसे भारत सरकार या डीडीए या अन्य संस्थाओं का हक था, वैसे ही हमारा हक भी था. बजट आवंटन के बाद इंजीनयर और अफसर यह तय करते हैं कि कितना पैसा किस मद में जाएगा. यह पैसा कभी किसी मंत्री तक नहीं आता, मुख्यमंत्री की बात तो छोड़िए. तो यह पूरी तरह से गलत आरोप है. आप लोगों को बरगलाने की कोशिश कर रही है. उनसे कुछ नहीं हो रहा था तो उन्होंने एक एफआईआर दर्ज करवा दी.

शुंगलू कमेटी की रिपोर्ट में एक इतना-सा वाक्य और भी है कि मुख्यमंत्री ने स्ट्रीट लाइटों के चयन में कुछ दिलचस्पी दिखाई थी. स्ट्रीट लाइटें कैसी होंगी, इसका चयन संबंधित विभागों ने किया था यानी पीडब्ल्यूडी और एमसीडी ने. हमने इस आरोप के बाद न सिर्फ मेरे बल्कि पूरी सरकार के संदर्भ में एक बिंदुवार जवाब लिखा था. यह जवाब शुंगलू कमेटी और प्रधानमंत्री कार्यालय के पास गया था. वह फाइल बिना किसी टिप्पणी के हमारे पास वापस लौट आई जिसका मतलब है कि इसमें कुछ नहीं था. सीबीआई ने भी यह फाइल बिना किसी टिप्पणी के वापस भेज दी थी.

तो जब आप आरोप लगाने के बाद कुछ नहीं ढूंढ़ पाए तो आपने एक ऐसी चीज शुरू कर दी जो स्पष्ट ही नहीं है. लेकिन आम आदमी को लगता है कि एफआईआर दर्ज हो गई तो कुछ गड़बड़ तो रही ही होगी. बस यही बात है. अब वे सलीमगढ़ फोर्ट फ्लाइओवर का मुद्दा उठा रहे हैं जिसका निर्माण रिकॉर्ड समय में हो गया था. वे चाहते हैं कि किसी भी तरह मेरे खिलाफ कुछ मिल जाए. लेकिन जब भी संसद या लोक लेखा समिति, कैग या शुंगलू कमेटी ने कोई सवाल उठाया है हमने उसका जवाब दिया है. मैं आपको वे जवाब दिखा सकती हूं.

‘आप’ यह भी आरोप लगा रही है कि आपने सिर्फ वोट बटोरने या अमीर व मध्य वर्ग के लोगों की मदद करने के लिए अधिकृत कॉलोनियों को नियमित कर दिया.
नहीं, ऐसा नहीं है. अभी भी 1,400 से ज्यादा अनधिकृत कॉलोनियां हैं.

इनको वैध करने की अनुमति शहरी विकास मंत्रालय को देनी थी और केंद्र सरकार ने इसमें कुछ समय लिया. चुनाव के पहले (2008 में) हमने इन कॉलोनियों को प्रॉविजनल सर्टिफिकेट (अस्थायी नियमन प्रमाणपत्र) दिए थे. जो कॉलोनियां लाखों लोगों का घर हैं क्या आप उन्हें ढहा सकते हैं? और वे अमीरों की कॉलोनियां नहीं हैं. वहां मध्य वर्ग और निम्न मध्य वर्ग के लोग रहते हैं. हमने एक प्रक्रिया शुरू की थी जहां वे एक तयशुदा रकम देकर अपने घर का मालिकाना हक ले सकते थे. लेकिन यह भी आसान नहीं था क्योंकि कुछ कॉलोनियां आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग) के तहत चिह्नित इलाकों में आती हैं या वन्य क्षेत्र में. उन्हें नियमित नहीं किया जा सकता था.

नगर निगम, जिनमें भाजपा सत्ता में है, को भी यह प्रमाणपत्र देना था कि ये कॉलोनियां किसी नियम का उल्लंघन नहीं कर रही हैं. वहां भी इस प्रक्रिया को धीमा करने की कोशिश की गई. यदि ‘आप’ को लगता है कि वह इन कॉलोनियों को नियमित करने जा रही है तो यह प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है और मेरे हिसाब से 895 कॉलोनियों को नियमित किया जा चुका है. इंदिरा गांधी के समय कई झुग्गी-झोपड़ी वालों को इन कॉलोनियों में बसाया गया था, उनको हाल तक मालिकाना हक नहीं मिला था. हमने इन 40 लाख लोगों को उनके आवास का मालिकाना हक दिया है.

तो फिर दिल्ली में कांग्रेस को इतने कम वोट क्यों मिले? क्या देश की आर्थिक मंदी को इसके लिए किसी हद तक जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?
मैं नहीं जानती कि वास्तव में आर्थिक मंदी से दिल्ली की आबादी कितनी प्रभावित हुई है. हां, लेकिन हमारी पार्टी इस मोर्चे पर जरूर नाकाम रही कि हम अपनी उपलब्धियों के बारे में जनता को नहीं बता पाए.

तो क्या यह कहना सही होगा कि सरकार जनता से कटी हुई थी?
नहीं, हम जनता से कटे हुए नहीं थे. यदि ऐसा होता तो हम वे काम नहीं कर पाते जो हमने सरकार में रहते हुए किए.

हां, लेकिन वह अलग तरह के जुड़ाव की बात है. आप लोगों की कोई जरूरत महसूस करते हैं और उसे पूरा कर देते हैं. लेकिन एक अन्य तरह का जुड़ाव भी होता है जहां आप जनता से कहते हैं कि देखिए यह काम हमने किया है, आप यह कर सकते हैं, फलाना काम आपके लिए इस वजह से जरूरी था. मेरा मतलब जनता से जुड़कर लगातार उसकी प्रतिक्रिया लेने से है.
हां, इसकी कमी रही क्योंकि हमारी पार्टी उतनी सक्रिय नहीं थी. विधायक अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों में काम कर रहे थे. फिर ये ‘आप’ वाले आए जो एक कल्पनालोक बनाना चाहते थे चाहे वह कितना भी बेसिरपैर का या अव्यावहारिक हो. बिना यह समझे कि उनकी बात का क्या मतलब है वे दावा कर रहे थे कि भ्रष्टाचार का नामोनिशान मिटा दिया जाएगा. मेरे ख्याल से लोग इसकी वजह से भावनाओं में बह गए. जैसा मैंने कहा कि यह त्रिकोणीय मुकाबला था और लोग थक भी चुके थे कि हो गया, 15 साल हो गए. तो चलो एक बदलाव करके देखते हैं.

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