‘इन नतीजों का अर्थ यह नहीं कि हम असफल हुए’

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विजय पांडे
विजय पांडे
विजय पांडे

क्या दिल्ली में मिली जीत के बाद ‘आप’ अति आत्मविश्वास से भर गई थी जिसके चलते पार्टी ने लोकसभा चुनाव में 434 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया? क्या आज आपको लगता है कि यदि पार्टी ने कुछ चुनिंदा सीटों पर चुनाव लड़कर उन्हीं पर ध्यान दिया होता तो प्रदर्शन और बेहतर हो सकता था?
‘आप’ को उसके पहले आम चुनाव में प्रदर्शन के आधार पर असफल करार दिए जाने की बात पर सवाल खड़े किए जाने चाहिए. यदि आप भारत के चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो पता चलेगा कि तमाम पार्टियों की शुरुआत ठीक ऐसे ही हुई है. भाजपा को 1984 के अपने पहले चुनाव में दो से ज्यादा सीटें नहीं मिली थीं. जब बसपा ने अपना पहला चुनाव लड़ा तब उन्हें दो प्रतिशत वोटों के साथ तीन सीटें मिली थीं. चुनावों में किसी पार्टी की सफल शुरुआत ऐसे ही होती है. आप की उपस्थिति पूरे देश में होती है, आपको ठीक-ठाक वोट मिलते हैं, पार्टी को स्थानीय नेता मिलते हैं और पूरे देश में आपकी पार्टी के कार्यकर्ता होते हैं. इस चुनाव में हमें ये सब मिला. इस लिहाज से मुझे नहीं लगता कि हमारी बुरी शुरुआत थी.

हालांकि सबकुछ बढ़िया हो ऐसा नहीं कहा जा सकता. जैसे दिल्ली में हमें पिछले चुनाव की तुलना में ज्यादा वोट तो मिले लेकिन भाजपा और हमारे बीच वोटों का अंतर अब बढ़ गया है. बनारस से चुनाव हारना भी एक झटका रहा. हरियाणा में सीट मिलने की उम्मीद थी लेकिन हम कोई सीट नहीं जीत पाए. फिर भी पंजाब में चार लोकसभा सीटों पर मिली सफलता हमारे लिए खासी महत्वपूर्ण रही क्योंकि किसी नई पार्टी के लिए दो प्रदेशों में संभावित विकल्प के रूप में उभरना छोटी शुरुआत नहीं है.

लोकसभा चुनाव के नतीजों से आपकी पार्टी को क्या सकारात्मक संदेश मिले और आप उनके आधार पर आगे की तैयारी कैसे कर रहे हैं?
पार्टी को अब देश के कोने-कोने में पहचाना जाने लगा है. 100 सीटों पर हमने कोई उम्मीदवार खड़ा नहीं किया था लेकिन शुरुआत करने के लिए 434 का आंकड़ा भी बुरा नहीं है. अब हमारी पार्टी को ज्यादा लोग जानने लगे हैं, अरविंद केजरीवाल और ‘आप’ का चुनाव चिह्न दूर-दूर तक पहुंच चुका है. ज्यादातर पार्टियों के लिए ये उपलब्धियां हासिल करने में भी एक दशक लग जाता है. आज देश में कितनी पार्टियां होंगी जो हमारे बराबर कार्यकर्ता होने का दावा कर सकें. हमने चुनाव में वे सवाल उठाए जिनपर पहले कभी बात नहीं होती थी.  ‘आप’ ने पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर भाई-भतीजावाद, स्वराज और राजनीतिक विकेंद्रीकरण को एक मुद्दा बना दिया. हमने पार्टी डोनेशन के लिए एक पारदर्शी व्यवस्था विकसित की. हालांकि पार्टी को पर्याप्त फंड नहीं मिला लेकिन हमने जो राजनीति की उसमें कालेधन की कोई भूमिका नहीं रही. वोट बैंक की अपेक्षा हमने अपने समर्थकों की संख्या बढ़ाई है. हर एक वोट जो हमें मिला उसके पीछे चार लोग ऐसे भी  थे जिन्होंने हमें वोट देने के बारे में सोचा, कहा कि हम अच्छे लोग हैं. हो सकता है अगली बार वे हमें वोट दें. इसके साथ ही हम एक अन्य राज्य, पंजाब में एक विकल्प की तरह उभरे. ये कुछ बातें हमारे लिए चुनाव के सकारात्मक संदेश हैं. इनके आधार पर ही पार्टी को आगे बढ़ना है.

अब हमें धैर्य रखने की जरूरत है. हमारा संगठन अब एक स्तर तक पहुंच चुका है. इसे बनाए रखने और इससे आगे बढ़ने की जरूरत है. हमें छोटे-छोटे कदमों से आगे बढ़ना है.

पिछले काफी समय से ‘आप’ लगातार चुनाव में व्यस्त रही. फिलहाल कुछ खाली समय आपके पास है तो क्या आपकी योजना इसका उपयोग पार्टी संगठन को मजबूत करने या कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देने के लिए करने की है?
अब हमारी यही चुनौती है. अभी कुछ और राज्य हैं जहां आने वाले दिनों में चुनाव होंगे. हमें वहां ध्यान देना होगा. लेकिन देश में बाकी जगहों पर हम संगठन मजबूत करने के लिए ध्यान दे सकते हैं जिससे कि नीतिगत विषयों पर हमारी और स्पष्ट समझ बन सके. कार्यकर्ताओं के लिए प्रशिक्षण और  स्थानीय स्तर से लेकर ऊपर तक संगठन को मजबूत करने के लिए काम करना होगा. आप कह सकते हैं कि यह समय हमारे लिए चुनौती भी है और और एक अवसर भी.

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