इतने भी मासूम न बनो कि भोंदू लगो | Tehelka Hindi

फिल्में, समाज और संस्कृति A- A+

इतने भी मासूम न बनो कि भोंदू लगो

शुभम उपाध्याय 2014-06-30 , Issue 12 Volume 6
fugly

िफल्म » फगली
निर्देशक» कबीर सदानंदे
लेखक » राहुल हांडा
कलाकार » जिमी शेरगिल, विजेंदर, कियारा आडवाणी, मोहित मारवाह, अरफी लांबा

कहानी फगली को समर्पित एक अप्रकाशित उपन्यास. (अंश नहीं, पूरा का पूरा उपन्यास.)

प्रथम अध्याय.
क्या यह एक फिल्म है. नहीं. अधूरी फिल्म. नहीं. इस सृष्टि की अदृश्य रचना. नहीं. आषाढ़ का एक दिन. नहीं. सूरज का जनरेटर. नहीं. जीवन. नहीं.  मौत. नहीं. कष्ट. पीड़ा. जहर का कटोरा. नहीं. नहीं. नहीं. तो आखिर ये फगली फगली क्या है, ये फगली फगली. कैसे समझाऊं मैं ये आपको, उसके लिए आपको फगली के तल में रहना होगा, पेट में पानी भरना होगा, दो घंटे बाद जब उबरेंगे तब भी समझेंगे, कह नहीं सकता. तब तक ये दुनिया फगली के आगे के रिक्त स्थान को कैसे भरेगी मान्यवर. फगली का चरित्र अमीबा जैसा है, उसका आकार निरंतर बदलता रहता है, उसे परिभाषित करना इतना आसान नहीं है, कुछ वर्षों का समय दीजिए और सब्र रखिए.

प्रथम और अंतिम के बीच के अध्याय.
फिल्म को शुरू होकर खत्म होने का ही चस्का है, उसका रस्ता सस्ता है, हाथों में उसके एक किताब का बस्ता है, जिसके सारे पन्ने खाली हैं, फिर भी पहले पन्ने पर स्क्रिप्ट लिख रखा है.

Pages: 1 2 Single Page

(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 6 Issue 12, Dated 30 June 2014)

1 Comment

  • क्या लिखा है भाईसाहब? कुछ पल्ले नहीं पड़ा। तहलका कब से कम्युनिस्ट बुद्धीजीवियों की पत्रका हो गई?