‘आलोचक बेपेंदी के लोटे की तरह होते हैं’ | Tehelka Hindi

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‘आलोचक बेपेंदी के लोटे की तरह होते हैं’

June 17, 2013

इन दिनों क्या लिखना-पढ़ना चल रहा है?
संस्मरण लिख रहा हूं. इसके पहले अपनी ही कहानी मृगतृष्णा की स्क्रिप्ट लिखने में व्यस्त था. उस पर टेलीफिल्म बनाई जा रही है.

आपकी रचनाओं का दूसरी भाषाओं में अनुवाद भी हो रहा है और अब आप हिंदी के चंद महंगे लेखकों में शामिल होने वाले हैं!
मेरी रचनाओं का अनुवाद तो पहले भी होता रहा है, अभी भी हो रहा है लेकिन मैं क्या महंगे लेखकों में शामिल होऊंगा. जर्मनी में जर्मन एकेडमी के जस्ट फिक्शन सीरिज में मेरे उपन्यास ‘नदी’ का अनुवाद ‘रिवर’ नाम से हुआ है. उसके एवज में करीब 25 हजार डॉलर की रॉयल्टी शायद मुझे मिलेगी. यह इतनी बड़ी राशि तो नहीं हुई कि मैं सबसे महंगा लेखक माना जाऊं.

कहानी और उपन्यास आपकी पहचान रहे हैं. संस्मरण लिखना अनायास शुरू किया आपने या यह ज्यादा महत्वपूर्ण विधा लगी?
सच कहूं तो इसकी प्रेरणा अपने युवा साहित्यकार मित्र अरुण नारायण से मिली. वैसे मुझे भी लगता रहा है कि किसी फनकार के जीवन में आवारापन बना रहना चाहिए. संस्मरण लिखना एक तरीके से आवारापन ही है. इससे आप यथास्थिति के खिलाफ खड़े होने की कोशिश करते हैं. अगर आप लेखन में ईमानदार हैं तो संस्मरण लिखने के लिए साहस चाहिए. लेखक को अपना आकलन करना चाहिए और संस्मरण लेखन एक तरीके से अपना आकलन करना भी है. इस विधा में आपको सब कुछ स्वीकार करना पड़ता है.

आप इंजीनियर रहे. बाद में कथाकार बने, उपन्यासकार हुए, ज्योतिष केंद्र भी चलाते रहे हैं और एक बड़ी पहचान एक साथ अनेक प्रेम करने वाले की भी रही. कौन-सी पहचान ज्यादा पसंद है?
पूरी दुनिया में सब कुछ खंडित हो रहा है तो एक पहचान के साथ क्यों रहा जाए? पहले कहानीकारों पर एक सामाजिक दायित्व व दबाव होता था, वह टूट गया. सबसे पहले गरीबी को अभिशाप माना गया, उसे हटाने का नारा चला, वह बीच में ही खंडित हो गया. समाजवाद का सपना दिखाया गया, वह सपना ही चोरी हो गया. धर्मनिरपेक्षता का सपना दिखाया जाता है, वह भी टूट चुका है. रही बात इंजीनियर और कथाकार बनने की तो मैं आपको एक बात बताता हूं. जब दस साल का था तो मेरी पहली कहानी अखबार में प्रकाशित हुई. इंजीनियरिंग की डिग्री मैंने ली तो इंजीनियर की नौकरी मैंने की और मुख्य अभियंता के पद तक पहुंचा लेकिन मैं ईमानदारी से कह रहा हूं, मैं कभी इंजीनियर था ही नहीं.

आपकी रचनाओं में सेक्सुअल फैंटेसी ज्यादा होती है, इसलिए कुछ लोग आपको सेक्स का लेखक भी कहते हैं.
अब लोगों का क्या? लोगों ने तो अपने स्तर से हरसंभव कोशिश की कि सेक्स को जहर देकर मार दिया जाए. सेक्स मरा तो नहीं लेकिन और जहरीला जरूर हो गया. इसलिए मैं अब ज्यादा लोगों की बातों पर ध्यान ही नहीं देता. हाल में मुझे फरोग-ए-उर्दू सम्मान मिला. नसीरुद्दीन शाह भी साथ में थे. मैं पटना लौटा तो फेसबुक पर मेरे खिलाफ एक अभियान चला. किसी ने ‘नगमा बानो’ नाम से फेक आईडी बनाकर लिखा कि शमोएल अहमद बेहद ही कमीना इंसान है, उसे कैसे इतना बड़ा सम्मान मिल गया. उस फेक आईडी ने लिखा कि उसके पति दुबई में रहते हैं, वह मेरे घर आया-जाया करता था. उसने मेरे साथ बदसलूकी की है, मेरा यौन शोषण किया है. इसके बाद तो मुझे गालियां ही गालियां दी जाती रहीं. मैं हैरत में था, मेरा ऐसी घटनाओं से कभी कोई वास्ता नहीं रहा लेकिन मैं बचाव की मुद्रा में नहीं आया. मैंने जवाब दिया- मोहतरमा, जो कह रही हैं, वह बिल्कुल सही है. सिर्फ हमारा संबंध ही नहीं बना है बल्कि उनके जो दो बच्चे हैं, उसमें एक मेरा है, यकीन न हो तो उस बच्चे का डीएनए टेस्ट करवा लिया जाए. इसके बाद वह अभियान बंद हुआ.

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