अप्रत्याशित प्रत्याशी

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PMवी बालाकृष्णन अगर चुनाव नहीं लड़ रहे होते तो शायद इंफोसिस के अगले मुखिया होते. सॉफ्टवेयर इंजीनियर रवि कृष्ण रेड्डी अमेरिका में अपनी शानदार नौकरी छोड़कर इसलिए भारत चले आए कि अपने समाज में कोई सकारात्मक बदलाव ला सकें. बैंकिंग क्षेत्र में शीर्ष पदों पर रहीं मीरा सान्याल ने राजनीति में शून्य से शुरुआत की है तो चर्चित मलयाली लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता सारा जोजफ को लगता है कि चुनाव लड़ना उनके जैसे लोगों के लिए अनिवार्य हो गया है.

कुछ समय पहले तक सोचना भी मुश्किल था कि ऐसे लोग भी राजनीति में आएंगे और चुनावी मैदान में ताल ठोकेंगे. आज उनकी सूची बहुत लंबी है. कोई सॉफ्टवेयर इंजीनियर है तो कोई वकील, सामाजिक कार्यकर्ता, पूर्व सरकारी अधिकारी, लेखक या फिर पत्रकार. सबका यही मानना है कि देश को जो व्यवस्था चला रही है उसमें बहुत सी खामियां हैं और सिर्फ ड्राइंग रूम बैठकर इसकी आलोचना करने से बेहतर है कि इस व्यवस्था में दाखिल होकर इसे सुधारा जाए.

अपने-अपने क्षेत्रों में ये सभी अपनी उपलब्धियों के लिए चर्चित रहे हैं. लेकिन क्या राजनीति में भी वे ऐसा ही प्रदर्शन कर पाएंगे? या उनका नौसिखियापन उन्हें ले डूबेगा? क्या वे इतने ही पारदर्शी और ईमानदार बने रह पाएंगे और इसके बावजूद उस व्यवस्था में बचे रह पाएंगे जो बड़ी हद तक पैसे और बाहुबल पर ही निर्भर हो चली है? इन सवालों का जवाब तो समय ही दे सकता है. तब तक ऐसे 10 उम्मीदवारों के बारे में उनकी ही जुबानी कि क्यों इन दिनों वे सड़कों और गलियों की धूल छानते फिर रहे हैं.


hardev singh


‘ जब मैं सरकारी नौकरी करते हुए नहीं झुका तो चुनाव जीतने पर तो और भी बेहतर काम करूंगा’

बाबा हरदेव सिंह।  66 ।

पूर्व आईएएस अधिकारी। मैनपुरी, उत्तर प्रदेश


habang pang
‘ हम एक राजनीतिक क्रांति ला रहे हैं और लोग इसकी अहमियत समझते हैं’

हाबंग पेंग ।  56 ।

पूर्व सूचना आयुक्त। अरुणाचल पश्चिम


Dayamani
‘हम जैसे लोगों को लोकसभा जाकर कानून बदलने होंगे’

दयामणि बरला ।  44 ।

सामाजिक कार्यकर्ता। खूंटी, झारखंड


K Arkesh
‘ मैं पांच और 10 रु के टिकट बेचकर अपने चुनाव प्रचार के लिए खर्च जुटा रहा हूं’

के अर्केश। 60 ।

पूर्व डीआईजी, सीआरपीएफ। चिक्कबल्लापुर, कर्नाटक


HS fulka
‘ नेताओं ने प्रशासन को पंगु बना दिया है’

एचएस फुल्का ।  58 ।

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