‘अन्ना भाजपा और कांग्रेस समर्थित लोगों से घिरे हुए हैं’

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अन्ना हजारे के साथ आप लोगों के रिश्ते इतने तल्ख क्यों हो गए हैं?

अन्ना को जाने कौन-कौन से लोग सलाह दे रहे हैं. कैसे-कैसे लोगों से घिरे हुए हैं. संतोष भारतीय हैं, वीके सिंह हैं, किरण बेदी के अलावा और जाने कौन-कौन से लोग उनके साथ लगे हुए हैं. भाजपा व कांग्रेस के लोग भी पीछे से उन्हें शह दे रहे हैं. यही लोग उन्हें समझा रहे हैं. जिन चीजों की मांग अन्ना हजारे ने 2011 में रामलीला मैदान से की थी, उन सभी को मौजूदा लोकपाल में जगह नहीं मिली है.

जन लोकपाल की कौन-कौन सी चीजें मौजूदा बिल में नहीं हैं?

तमाम चीजें थीं. लोकपाल को स्वतंत्र जांच एजेंसी देने की बात थी वो इस लोकपाल में कहीं नहीं है. इसके अलावा जून, 2011 में सिविल सोसाइटी ने जिस जन लोकपाल का मसौदा तैयार किया था उसमें तीन बातें प्रमुख थीं. सारे सरकारी कर्मचारी ऊपर से लेकर नीचे तक लोकपाल के दायरे में होने चाहिए. दूसरा बिंदु था कि सिटिजन चार्टर की निगरानी का अधिकार लोकपाल को दिया जाए. तीसरा मुद्दा था राज्यों में लोकायुक्तों की नियुक्ति का जिम्मा भी लोकपाल के हाथ में हो. ये सारी चीजें इस बिल से गायब हैं. तो ऐसे लोकपाल से क्या होगा. इसके अलावा लोकपाल को आर्थिक आजादी भी नहीं दी गई है. यही गड़बड़ी जांच एजेंसी को स्वतंत्रता देने के मामले में की गई है. इसी तरह से एक समस्या लोकपाल के चयन की भी है. चयन के सारे अधिकार सरकार और नेता विपक्ष के हाथ में हैं.

ऐसा लग रहा है कि जिस मुद्दे को लेकर आप और अन्ना साथ आए थे अब उसी मुद्दे को लेकर आप लोगों के बीच में दुश्मनी पैदा हो गई है.

अन्ना के साथ हमारी दुश्मनी जैसा कुछ नहीं है लेकिन लगता है कि अन्ना को कुछ ऐसे लोगों ने घेर रखा है जिनके भाजपा और कांग्रेस के साथ रिश्ते हैं. आजकल अन्ना उन्हीं लोगों के असर में हैं. वे अन्ना से कुछ भी कहलवाते रहते हैं.

तो आप कह रहे हैं कि अन्ना ऐसे लोगों के चंगुल में हैं जिनके हित कहीं और हैं और अन्ना उन्हीं की भाषा बोल रहे हैं.

अब आप ये देखिए कि उन्हें जबरदस्ती उपवास पर बैठा दिया गया जबकि सबको पता था कि इस सत्र में लोकपाल बिल पेश करना सरकार के एजेंडे में ही नहीं था. हमारा पुराना अनुभव भी यही था कि यह सरकार लोकपाल बिल नहीं लाने वाली है, इसीलिए तो हमें राजनीतिक पार्टी बनानी पड़ी थी. अब उन्हें इस आधे-अधूरे बिल को दिखाकर कहा जा रहा है कि आप उपवास तोड़ दीजिए. अन्ना इसके लिए तैयार भी हो गए हैं. यह साजिश है. अन्ना को यह बात समझ लेनी चाहिए थी. पर उनके अगल-बगल मौजूद लोगों ने उन्हें उपवास पर बैठा दिया. अन्ना को यह उपवास करना ही नहीं चाहिए था. पर वे बैठ गए तो सरकार ने तुरत-फुरत में दिखावे का बिल पास कर दिया.

शुरुआत में आपने कहा कि अन्ना, वीके सिंह, संतोष भारतीय और किरण बेदी के कहने पर बोल रहे हैं. वीके सिंह ने अन्ना के मंच से आप लोगों पर निशाना साधते हुए कहा कि आप लोगों ने अन्ना का फायदा उठाकर अपने राजनीतिक हित पूरे कर लिए. यह भी तो एक पक्ष है. आप कह रहे हैं कि उन लोगों के राजनीतिक रिश्ते हैं.

देखिए, वीके सिंह और किरण बेदी तो भाजपा के साथ हो गए हैं. यह खुली हुई बात है. तो इनका क्या विश्वास किया जाए.

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