अनेक हैं टाइगर

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दुनिया भर में मीडिया के लिए वह साल का सबसे बड़ा आयोजन था. यह जुलाई, 2001 की  बात है. पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ और भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के बीच आगरा में शिखरवार्ता चल रही थी. माहौल उम्मीद से भरा हुआ था. ठीक इसी समय आगरा के पश्चिम-उत्तर में तकरीबन एक हजार किमी दूर पाकिस्तान की मियांवली जेल की एक बैरक का भी माहौल कुछ-कुछ ऐसा ही था. पिछली शाम को ही जेल सुपरिंटेंडेंट ने वहां कैद एक भारतीय जासूस को खबर दी थी कि वह रिहा होने वाला है. यह भारतीय जासूस अपने साथियों के साथ उन सब सपनों को साझा कर रहा था जो उसे जेल से रिहा होने के बाद पूरे करने थे. वह जासूसी की जिंदगी हमेशा के लिए छोड़कर श्रीगंगानगर (राजस्थान) लौट जाना चाहता था. अपनी पाकिस्तानी पत्नी और बेटे के साथ उसे एक नई जिंदगी शुरू करनी थी.

शाम को बीबीसी रेडियो के उर्दू बुलेटिन की खबरें शुरू हुईं तो पहली बड़ी खबर थी कि मुशर्रफ-बाजपेयी वार्ता असफल हो गई है. खबर पूरी भी नहीं हो पाई थी कि जेल सुपरिंटेंडेंट ने भारतीय जासूस को सूचना दी कि उसकी रिहाई का आदेश रद्द कर दिया गया है. अब बैरक का माहौल पूरी तरह बदल चुका था. खबर सुनकर वह भारतीय जासूस खामोश हो गया. उसे इतना गहरा सदमा लगा कि उसकी तबीयत खराब रहने लगी और कुछ महीनों के बाद उसकी मौत हो गई. वह जासूस था रवींद्र कौशिक उर्फ नबी अहमद. देश की खुफिया एजेंसियां उसके बड़े-बड़े कारनामों के चलते उसे ब्लैक टाइगर के नाम से पहचानती थीं. रवींद्र की मौत के बाद भी बदकिस्मती ने उसका साथ नहीं छोड़ा. रवींद्र का शव कभी भारत वापस नहीं आ पाया. उस बैरक में रवींद्र के साथ रहे एक और भारतीय जासूस गोपालदास बताते हैं, ‘कौशिक की मौत के बाद जेल सुपरिंटेंडेंट ने हमें बताया था कि उसने भारतीय उच्चायोग से लाश रवींद्र के घर (भारत) पहुंचाने के लिए कहा था. लेकिन उच्चायोग का जवाब था कि उसे वहीं दफना दिया जाए.’

रवींद्र कौशिक का नाम हाल ही में एक बार फिर चर्चा में आ गया जब सलमान खान अभिनीत फिल्म ’एक था टाइगर’ रिलीज होने वाली थी. रवींद्र के परिवार का आरोप है कि फिल्म निर्माताओं को फिल्म बनाने से पहले उनसे अनुमति लेनी चाहिए थी क्योंकि इसकी कहानी रवींद्र के जीवन पर आधारित है. मगर इस सारे विवाद के बीच भारतीय जासूसों के प्रति भारत सरकार और खुफिया एजेंसियों के उस उपेक्षापूर्ण और कहीं-कहीं बर्बर रवैये की ओर किसी का ध्यान नहीं गया जिसके चलते रवींद्र कौशिक जैसे कई जासूस गुमनामी की मौत मर गए. और जो किसी तरह अपने देश वापस आ पाए वे आज तक उस दिन को कोस रहे हैं जब उन्होंने इन एजेंसियों के लिए जासूस बनना स्वीकार किया था.

पंजाब सहित पाकिस्तान की सीमा से सटे राज्यों में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जिन्होंने भारतीय खुफिया एजेंसियों के लिए पाकिस्तान में जासूसी की है. इनमें से ऐसे जासूसों की संख्या कम नहीं जो जासूसी करते हुए पाकिस्तान में पकड़े गए और उन्हें 25 से 30 साल तक की सजा हुई. कुछ को फांसी भी हुई, कुछ सजा काटने के बाद भी दशकों तक पाकिस्तानी जेल में सड़ते रहे. इनमें से कुछ अब भी वहीं हैं. हाल ही में पाकिस्तान से 30 साल की सजा काट कर आए सुरजीत की तरह ही कई ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपनी पूरी जवानी जेल में ही बिता दी. कइयों की पाकिस्तानी जेल में ही मौत हो गई. परिवारवालों को उनका शव तक नहीं मिला क्योंकि हमारी सरकार ने उनका शव लेने से ही इनकार कर दिया.

सूत्र बताते हैं कि खुफिया एजेंसियों की सबसे ज्यादा नजर भारत की सीमा से जुड़े गांवों पर ही होती है.

वजह यह है कि यहां के लोगों का रहन-सहन, बातचीत, खान-पान, पहनावा-ओढ़ावा या यह कहें कि लगभग पूरी जीवन संस्कृति उस पार (पाकिस्तान) रहने वालों से काफी मिलती-जुलती है. इन गांवों में खुफिया विभाग का अपना एक व्यापक नेटवर्क है, जो लगातार ऐसे लोगों पर नजर बनाए रखता है जिनसे जासूसी करवाई जा सके. ऐसे लोगों को मनाने के लिए एजेंसियां हर तरह के हथकंडे इस्तेमाल करती हैं. पहले उन्हें अच्छे पैसे और सुनहरे भविष्य का लालच दिखाया जाता है. उनसे कहा जाता है कि अगर वे एजेंसी के लिए काम करते रहे तो उन्हें बहुत जल्दी विभाग में स्थायी कर दिया जाएगा. उन्हें तमाम तरह की सुविधाएं देने का वादा एजेंसियों द्वारा किया जाता है. कहा जाता है कि अगर वे पाकिस्तान में गिरफ्तार हो गए तो उनके घरवालों का पूरी तरह से ख्याल रखा जाएगा. अगर वे गिरफ्तार हो भी गए तो परेशान होने की जरूरत नहीं है क्योंकि सरकार उन्हें दो से तीन महीने के अंदर आराम से छुड़वा लेगी.

इसके बाद भी अगर सामने वाला तैयार नहीं होता तो अंत में एजेंसियां आखिरी के पहले वाला दांव खेलती हैं. इसके बाद सामने वाला गर्व से सीना फुलाए पाकिस्तान जाने का प्रस्ताव मान लेता है. सामने वाले से अधिकारी कहते हैं कि उन्हें वे जो देश-सेवा का मौका दे रहे हैं वह बहुत कम भारतीयों को नसीब होता है. यह दांव 95 फीसदी से अधिक लोगों को चित कर देता है और वे बिना ज्यादा सवाल-जवाब किए जासूस बनने को राजी हो जाते हैं. बाकी जो पांच फीसदी बचते हैं उनका भी इलाज है एजेंसियों के पास. वह इलाज ऐसा है जिसे सुनकर आपके पैरों तले जमीन खिसक जाएगी (देखें व्यथा कथा – 3).

जीवन संस्कृति में समानता होने के अलावा और भी कई वजहों से एजेंसियों की नजर सीमा पर बसे गांवों के लोगों पर होती है. सबसे पहली बात यह कि बॉर्डर के इन गांवों में प्रायः गरीबी अपनी सभी कलाओं के साथ मौजूद रहती है. न तो इन गांवों में शिक्षा की व्यवस्था है, न स्वास्थ्य की. और न ही यहां कोई रोजगार है. लोग बमुश्किल दो जून की रोटी जुटा पाते हैं. जिन लोगों के पास थोड़ी-बहुत खेती लायक जमीन है, वे अलग परेशान रहते हैं. सीमा पर कंटीले तारों, बारूदी सुरंगों और बाकी अन्य सुरक्षा एहतियातों के कारण खेती करने में कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है. ऐसे में इन लोगों के पास जीवनयापन का कोई विकल्प नहीं बचता.

अशिक्षा और गरीबी का संयोग अन्य जगहों पर घातक हो सकता है लेकिन जासूसी के लिए यह सबसे मुफीद होता है. ऐसे में लोगों को जासूसी के लिए तैयार करना आसान हो जाता है. भर्ती करने के बाद शुरू होती है ट्रेनिंग की प्रक्रिया. इन जासूसों को शुरू में दो से तीन महीने की ट्रेनिंग दी जाती है. जब ये काम करना शुरू कर देते हैं तो बीच-बीच में विशेष प्रशिक्षण भी दिया जाता है. प्रशिक्षण में इन्हें विभिन्न हथियारों की पहचान कराई जाती है. पाकिस्तान के बारे में बताया जाता है, वहां की सेना के बारे में बताया जाता है और नक्शा देखना और पढ़ना सिखाया जाता है. इन भावी जासूसों को उर्दू बोलना और इस्लाम धर्म की तमाम बारीकियां भी सिखाई जाती हैं. यहां तक कि कुछ मामलों में इनका खतना तक किया जाता है. फिर उन्हें एक मुसलिम नाम और पाकिस्तानी पहचान दी जाती है.

प्रशिक्षण की पूरी प्रक्रिया से गुजरने के बाद इन लोगों को तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है. पहले वर्ग में वे लोग होते हैं जिन्हें लंबे समय तक प्रशिक्षित किए जाने के बाद पाकिस्तानी नागरिक बनकर वहीं पाकिस्तान में रहना होता है. इन्हें ‘रेजीडेंट एजेंट’ कहा जाता है. रवींद्र कौशिक ऐसा ही एजेंट था. कौशिक को रॉ ने1973 में एजेंट बनाया था और कुछ सालों के बाद ही वह पाकिस्तान में रेजीडेंट एजेंट बन गया था. वहीं उसने एक कॉलेज में एडमिशन लिया और एलएलबी की डिग्री पूरी की जिसके बाद वह पाकिस्तानी सेना में क्लर्क बन गया. 1983 में अपनी गिरफ्तारी तक उसने रॉ को कई खुफिया सूचनाएं भेजीं थीं. रेजीडेंट एजेंटों में से कई अविवाहित होते हैं और किसी पाकिस्तानी लड़की से शादी करके स्थायी नागरिकों की तरह रहने लगते हैं. रवींद्र ने भी पाकिस्तानी सेना के एक अधिकारी की लड़की से शादी की थी.

जासूसों के दूसरे वर्ग में वे लोग आते हैं जिनका काम पहले वर्ग के लोगों तक पैसे आदि पहुंचाना और उनके द्वारा दी गई खुफिया जानकारी को पाकिस्तान जाकर वहां से लाने का होता है. ये लोग सीमा पार करके थोड़े-थोड़े अंतराल पर वहां जाते-आते रहते हैं.

तीसरे वर्ग में वे लोग आते हैं जो ‘गाइड’ कहलाते हैं. इन लोगों का काम दूसरे वर्ग के लोगों को इस पार से उस पार लाना-ले जाना होता है. ये जासूसों को पाकिस्तान बॉर्डर क्रॉस कराते हैं. जासूसों को पाकिस्तान की सीमा में ‘लॉन्च’ कराके ये लोग उन्हें आगे का रास्ता समझाकर वापस आ जाते हैं. लॉन्च शब्द जासूसी की भाषा में सीमा पार कराने के लिए प्रयोग किया जाता है.

लंबे समय तक रॉ के लिए जासूसी कर चुके गोपालदास बताते हैं, ‘हमें पाकिस्तानी फौजी ठिकाने, फौजी हवाई अड्डे, सेना के मूवमेंट्स की डिटेल, तोप, हथियारों और गोला-बारूद की जानकारी, पुलों की फोटो और नक्शे आदि अपनी खुफिया एजेंसियों को देने होते थे.’  इसके साथ ही जो सबसे बड़ा काम इन लोगों को करना होता है वह है ऐसे पाकिस्तानी नागरिकों की तलाश जो भारत के लिए जासूसी कर सकें. इनमें से सबसे ज्यादा डिमांड सेना और विभिन्न सुरक्षा बलों और सत्ता प्रतिष्ठानों से जुड़े लोगों की है. गोपालदास 1978 में रॉ के एजेंट बने थे. उनका काम था सीमापार जाकर पाकिस्तान में तैनात एजेंटों से जानकारी लाना और एजेंसी को सौंपना. 1984 में वे पाकिस्तान में गिरफ्तार हो गए. उन्हें 25 साल की सजा सुनाई गई. पिछले साल ही वे पाकिस्तान की जेल से रिहा होकर भारत आए हैं. (देखें व्यथा कथा -1)

पाकिस्तान में भारत के जासूस रहे करामत राही बताते हैं, ‘मेरे काम का बड़ा हिस्सा यह था कि मैं पाकिस्तानी सेना के उन सैनिकों और अधिकारियों को भारत लेकर आऊं जो भारत सरकार के लिए काम करते हैं.’ करामत के मुताबिक ये लोग रॉ के अधिकारियों से बातचीत करते थे और बाद में भारतीय जासूस ही उन्हें सकुशल सीमा पार करवा देते थे.

जासूसों को मिलने वाला पारिश्रमिक भी उनके काम की तरह ही जटिल है. कुछ जासूस ऐसे हैं जिन्हें हर महीने की एक निश्चित रकम दी जाती है, कुछ को सरहद पार की हर ‘ट्रिप’ के हिसाब से पैसा दिया जाता है. लेकिन बाकी जगहों की तरह यहां भी हफ्ता वसूली और भ्रष्टाचार है. कई ऐसे मामले हैं जहां वरिष्ठ अधिकारी जासूस को मिले पैसों में से एक हिस्से की मांग करते हैं. चूंकि मामले को लेकर न कोई पारदर्शिता है और न ही जासूसों को रखने के लिए कोई लिखा -पढ़ी होती है. पूरी नौकरी जबान पर ही चलती है, ऐसे में जासूसों को भी पता नहीं चलता कि आखिर उन्हें देने के लिए ऊपर से कितना पैसा आता है. कई साल तक देश के लिए जासूसी करते रहे एक शख्स हमें बताते हैं कि कई जासूस स्थायी नौकरी की चाहत में वरिष्ठ अधिकारियों को खुश करने में लगे रहते हैं. वे सोचते हैं, साहब खुश रहेंगे तो जल्द ही वे उसे परमानेंट कर देंगे.

पाकिस्तान में जासूसी के लिए 10 साल की सजा काट चुके 60 वर्षीय बलविंदर सिंह कहते हैं, ‘एजेंसियां जासूसों को एके-दूसरे के पास थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद भेजती रहती हैं. जैसे कि आज आप रॉ के लिए काम कर रहे हैं, तो कुछ महीनों बाद आपको मिलेट्री इंटेलीजेंस के पास भेज दिया जाएगा. फिर आईबी वालों के यहां. ये लोग ऐसा इसलिए करते हैं ताकि जासूस लंबे समय तक काम करने के बाद स्थाई नौकरी की मांग ना करने लगे. इसलिए वे तीन साल की सर्विस एक साथ पूरी नहीं होने देते, उसके पूरा होने के पहले जासूसों को दूसरी एजेंसी को सौंप दिया जाता है.’ गंभीर रूप से बीमार बलविंदर सिंह इस समय अमृतसर के नजदीक गौंसाबाद में रहते हैं.

स्थायी नौकरी के लालच में ये जासूस अधिकारियों के हर जायज-नाजायज आदेशों का पालन करते रहते हैं.

लेकिन उन्हें पता नहीं होता कि ये लोग एजेंसियों के लिए तभी तक उनके आदमी हैं जब तक वे पकड़े नहीं जाते. पकड़े जाने के बाद उन्हें एजेंसियां अपने काम के लिए खतरा ही मानती हैं और वे उन्हें पहचानने तक से इनकार कर देती हैं.

अगर ये लोग सजा पूरी करके भारत आ भी गए तो एजेंसियां इन पर नजर रखती हैं. दरअसल पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियां भी ऐसे जासूसों की ताक में रहती हैं जो भारत के लिए पाक में काम कर रहे हों. जासूस गोपालदास बताते हैं, ‘पाकिस्तानी अधिकारी कहते हैं कि हम तुम्हें यहां इतना प्रताड़ित करेंगे कि तुम ऐसे ही मर जाओगे. अगर बच गए तो शारीरिक और मानसिक किसी लायक नहीं छोड़ेंगे. इतना डराने-धमकाने के बाद हमें कहा जाता है कि यदि हम उनके लिए काम करना स्वीकार कर लें तो वे हमें छोड़ सकते हैं. जासूसी की भाषा में ऐसे लोगों को डबल एजेंट कहा जाता है.’

डबल एजेंट बनाने की भी प्रकिया बेहद फिल्मी है. भारतीय खुफिया एजेंसियों के लिए लंबे समय तक पाकिस्तान में जासूसी करने वाले तथा जासूसी के जुर्म में ही पाकिस्तान की विभिन्न जेलों में 18 साल तक कैद रहे मोहनलाल भास्कर अपनी आत्मकथा ‘मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था’ में इसका जिक्र करते हैं, ‘वह बोला, ‘देखो, बेवकूफी की बात मत करो. हम तुम्हें एक मौका दे रहे हैं अपनी जिंदगी बनाने का. हिंदुस्तानवालों ने तो तुम्हारी जिंदगी खराब कर दी. अब अगर तुम लौट भी जाओ, जिसकी अभी 10-15 साल तक कोई उम्मीद नहीं, तो वे ही तुम्हें शक की निगाह से देखेंगे, दूसरे वे तुम्हें कौड़ी के मोल नहीं पूछेंगे. वे अफसर जिन्होंने तुम्हें भेजा है, तुम्हें पहचानने से इनकार कर देंगे. तुम तो यहां आराम से बैठे जेल की रोटियां तोड़ रहे हो, उधर तुम्हारी बेबस मां लोगों के बर्तन मांजकर गुजारा चलाती है और तुम्हारी बीवी नौकरानियों जैसी जिंदगी गुजार रही है. अपने बेटे की तरफ सोचो, जिसका अभी मुंह तुमने नहीं देखा. हम जेल से तुम्हारे फरार होने का नाटक रचेंगे. तुम्हारी फरारी की खबर अखबारों और रेडियो में देंगे. … तुम्हें सिर्फ इतना करना है कि या तो किसी तरह खत लिखकर अपने मां-बाप को यहां बुला लो या अपनी बीवी या बहन को. वह जमानत के तौर पर हमारे पास रहेंगे. हम उन्हें मेहमानों की तरह रखेंगे. जब तुम पांच साल तक हमारे लिए काम कर चुके होगे, तो हम उन्हें वापस भेज देंगे.’

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