हरियाणाः दलितों की कब्रगाह

दिल्ली, जिसे प्रगति, विकास और आधुनिकता का गढ़ माना जाता है, वहां से भगाना गांव तक की दूरी तीन घंटे में तय की जा सकती है. हालांकि ग्रामीण हरियाणा की जातिगत हिंसा का यह किस्सा दिल्ली के सामान्य नागरिक को पिछड़े हुए समुदायों का बर्बर व्यवहार लगेगा. लेकिन हरियाणा में होने वाली यह एकमात्र घटना हो, ऐसा नहीं है. इस तरह की खबरें इफरात में सामने आ रही हैं. हाल ही में फरीदाबाद के सुनपेड गांव में दलित जाति के दो बच्चों को ऊंची जाति के लोगों द्वारा जिंदा जला दिया गया. इसी तरह हिसार के बाठला गांव में ऊंची जाति के लोगों ने एक दलित व्यक्ति को पेड़ से लटका कर मार दिया. दिल्ली से महज दो घंटे की दूरी पर सोनीपत के गोहाना गांव में 14 वर्ष का दलित लड़का रहस्यमय परिस्थितियों में मृत पाया गया. पुलिस ने उसे कबूतर चोरी के आरोप में गिरफ्तार किया था. इस तरह की घटनाओं की सूची लंबी होती जा रही है.

जाति आधारित हिंसा की खबरें हर रोज आती हैं. कुछ सुर्खियां बनती हैं तो कुछ खो जाती हैं. हिसार से 20 किमी. दूर बाठला की घटना सुनपेड की घटना की तरह राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित नहीं हो पाई

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले एक वर्ष में हरियाणा में जाति आधारित हिंसा तेजी से बढ़ी है. दो दलित बच्चों को जिंदा जलाए जाने की हाल की घटना हमें मिर्चपुर की दिल दहलाने वाली घटना की याद दिला देती है. 21 अप्रैल, 2010 को दलितों की पूरी बस्ती को ऊंची जाति के लोगों द्वारा आग के हवाले कर दिया गया था. इस घटना के बाद मिर्चपुर के दलित पलायन करके हिसार में आ गए. अधिकांश दलित परिवार दबंग जाट जाति के खेतों में काम करते थे. इस पलायन के परिणामस्वरूप इन दलित परिवारों का पूरा आर्थिक आधार ही चरमरा गया. अपनी जड़ें छोड़कर हिसार आ बसने पर इन्हें लंबे समय तक कोई काम नहीं मिला और इन्हें दूसरों से मिलने वाली आर्थिक मदद पर निर्भर रहना पड़ा. दूसरी ओर जाटों को उत्तर प्रदेश और बिहार से आए सस्ते मजदूर मिल गए. मिर्चपुर में भी भगाना की तरह दलित परिवार की महिलाओं के साथ ऊंची जाति के लोगों द्वारा बदसलूकी की जा रही थी. जब दलित समुदाय ने इसके खिलाफ आवाज उठाई तो उनकी बस्ती को जला कर राख कर दी गई. मिर्चपुर के दलित अब एकदम जीर्ण-शीर्ण अस्थायी कैंप में रह रहे हैं. टेंटों में जगह-जगह पानी जमा हो जाने से बीमारियों का खतरा बना रहता है. हालांकि, इस बस्ती को पुलिस सुरक्षा दी गई है, क्योंकि हिसार के कामरी रोड पर बसी इस बस्ती में मिर्चपुर कांड के बहुत से चश्मदीद गवाह भी रहते हैं. 55 वर्ष के सत्यवान कहते हैं, ‘सवाल केवल यही नहीं है कि हम कभी अपने घरों को नहीं लौटेंगे, बल्कि मुद्दा यह है कि व्यवस्था से हमारा भरोसा उठ चुका है. हमने कितनी ही बार पुलिस से सहायता मांगी है, लेकिन कोई फायदा नहीं.’ अपने आंसू रोकते हुए वे कहते हैं, ‘अपनी जगह के साथ हमारी यादें जुड़ी हुई हैं, हम वहां बड़े हुए हैं..लेकिन आज हम भिखारियों की तरह रह रहे हैं.’

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कैंप में रहने वाली एक महिला बहुत आशंकित होकर यह सवाल करती है कि क्या इन अफवाहों में कोई सच्चाई है कि आरक्षण खत्म कर दिया जाएगा. ऐसा प्रतीत होता है कि मोहन भागवत के हालिया बयान ने यहां हरियाणा के इस कैंप तक पर असर डाला है. इन लोगों की दुर्दशा बताती है कि मिर्चपुर हत्याकांड को भुला दिया गया है. जाति आधारित हिंसा की खबरें हर रोज आती हैं. कुछ सुर्खियां बनती हैं तो कुछ छोटी सी जगह में सिमट कर खो जाती हैं. हिसार से 20 किमी. दूर बाठला की घटना सुनपेड की घटना की तरह राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित नहीं हो पाई. 8 अक्टूबर को इसी गांव के गुरुचरण को ऊंची जाति के लोगों ने पेड़ से लटका कर मार डाला.

स्थानीय दलित बताते हैं कि गुरुचरण की मौत के एक दिन पहले से कुछ ऊंची जाति के लोग उसका पीछा कर रहे थे. इस परिवार की त्रासदी यहीं नहीं रुकी. गुरुचरण के चाचा बदन सिंह जो इस मामले के चश्मदीद गवाह थे, उन्हें पुलिस स्टेशन बुलाया गया. गांव वाले बताते हैं कि एसीपी जसनदीप सिंह रंधावा द्वारा पूछताछ के बाद बदन सिंह काफी परेशान दिखाई दे रहे थे. गांव वालों का यह भी कहना है कि गुरुचरण के हत्यारों ने बदन सिंह को अपना बयान बदलने के लिए धमकाया था. एक दिन अचानक उन्होंने आत्महत्या कर ली. उसके पास से एक सुसाइड नोट मिला जिसमें लिखा था कि उस पर बयान बदलने के लिए दबाव बनाया गया था. हालांकि, इस सुसाइड नोट की विश्वसनीयता की पुष्टि नहीं हो पाई है.

गांव वालों ने यह भी बताया कि 24 अक्टूबर तक गुरुचरण की हत्या की एफआईआर भी दर्ज नहीं की गई थी. इस कारण उन्होंने एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया जिसमें वे आधे कपड़े पहने थे. इन प्रदर्शनकारियों के खिलाफ झूठे मामले दर्ज कर लिए गए. ‘तहलका’ ने जब जाटों और पुलिस से संपर्क साधना चाहा तो उन्होंने कोई प्रतिक्रिया देने से इंकार कर दिया.

सोनीपत के गोहाना गांव में 14 वर्षीय एक दलित लड़का कबूतर चोरी के आरोप में पुलिस द्वारा गिरफ्तार करने के बाद रहस्यमय परिस्थितियों में मृत पाया गया. हालांकि पुलिस का कहना है कि लड़का अपने घर में मृत पाया गया है और उनका इस मौत से कोई लेना-देना नहीं है. इस घटना से पुलिस और दलित समुदाय के बीच तनाव बढ़ गया है. गोहाना की घटना के बाद यमुनानगर में 21 वर्षीय दलित युवक को कथित रूप से किसी पुरानी रंजिश के परिणामस्वरूप गांव के पूर्व प्रधान ने जिंदा जला दिया. पुलिस ने इसे प्रथमदृष्टया आत्महत्या का मामला बताया है लेकिन परिवार वालों ने पुलिस की इस कहानी को मानने से इंकार कर दिया है.

हरियाणा और उत्तर भारत के दूसरे हिस्सों में दलितों को इस तरह से निशाना क्यों बनाया जा रहा है? राजनीतिक विज्ञानी रजनी कोठारी की किताब ‘कास्ट एंड इंडियन पॉलिटिक्स’ के प्राक्कथन में बताया गया है कि ‘जहां दलितों के पास जमीन नहीं है, वहां वे अधिक निशाना बनाए जाते हैं.’ भगाना के दलित, जिनके पास जमीन नहीं है, इस वक्तव्य के सटीक उदाहरण हैं. बहरहाल यह विडंबना ही है कि समाज में ऊंच-नीच को कायम रखने के लिए जाति के नाम पर किस तरह आदमी ही आदमी को मौत के घाट उतार रहा है.