
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि सुरक्षित और स्पष्ट रूप से चिह्नित फुटपाथों पर पैदल चलना नागरिकों का मौलिक अधिकार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा है। साथ ही न्यायालय ने कहा कि पैदल यात्रियों का अधिकार कई मामलों में मोटर वाहनों की सुविधा और आवाजाही पर भी प्राथमिकता रखता है।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा की अध्यक्षता वाली पीठ ने अपने फैसले में कहा, “यदि कोई सड़क मौजूद है, तो यह सुनिश्चित करना सरकार और संबंधित प्राधिकरणों का दायित्व है कि वहां पैदल चलने वालों के लिए स्पष्ट रूप से चिह्नित और सुव्यवस्थित फुटपाथ बनाए जाएं तथा उनका रखरखाव किया जाए। यह एक लागू करने योग्य (Enforceable) दायित्व है। चिह्नित फुटपाथों पर चलने का मौलिक अधिकार मोटर चालित वाहनों के विशेषाधिकार पर वरीयता रखेगा।”
यह फैसला एक दर्दनाक मामले में आया, जिसमें एक पांच वर्षीय बच्चे की अपने पिता के साथ पड़ोस के स्कूल जाते समय ट्रक की चपेट में आने से मौत हो गई थी। अदालत ने माना कि सुरक्षित फुटपाथों की कमी और पैदल यात्रियों के लिए पर्याप्त व्यवस्था न होना ऐसी दुर्घटनाओं का बड़ा कारण बनता है।
फैसला लिखने वाले जस्टिस नरसिम्हा ने कहा कि चौड़े और सुरक्षित फुटपाथों पर बिना किसी भय और खतरे के चलना नागरिकों के सबसे बुनियादी अधिकारों में से एक है। उन्होंने कहा कि पैदल चलना “मानव जीवन की सबसे सरल गतिविधियों में से एक है, जो जीवन के अधिकार से अविभाज्य रूप से जुड़ी हुई है।” अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि नागरिकों को हर मोड़ पर दुर्घटना के डर के बिना सुरक्षित रूप से चलने का अवसर मिलना चाहिए।
न्यायालय ने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि वह ऐसा कानून बनाने पर विचार करे, जिसके तहत देश की सभी सड़कों पर उचित, सुरक्षित और स्पष्ट रूप से चिन्हित फुटपाथों की व्यवस्था अनिवार्य हो। अदालत ने कहा कि यदि फुटपाथ नहीं होंगे तो लोगों को मजबूरन सड़क पर चलना पड़ेगा, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि संविधान स्वयं नागरिकों को स्वतंत्र रूप से आवागमन का अधिकार देता है। अदालत ने संविधान के प्रावधान का उल्लेख करते हुए कहा कि “सभी नागरिकों को भारत के पूरे क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से घूमने-फिरने का अधिकार होगा।” न्यायालय के अनुसार, यह संवैधानिक गारंटी पैदल चलने के अधिकार को भी संरक्षण प्रदान करती है।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि फुटपाथ केवल मौजूद होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि वे अतिक्रमण मुक्त और सभी नागरिकों, विशेषकर दिव्यांगजनों, बुजुर्गों और बच्चों के लिए सुलभ होने चाहिए। न्यायालय ने कहा कि स्थानीय निकायों और सरकारी एजेंसियों की जिम्मेदारी है कि वे फुटपाथों को सुरक्षित, उपयोगी और बाधारहित बनाए रखें।
फैसले को शहरी विकास और सड़क सुरक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के अधिकांश शहरों में फुटपाथों पर अतिक्रमण, अवैध पार्किंग और खराब रखरखाव के कारण पैदल चलना कठिन और जोखिमपूर्ण हो गया है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला स्थानीय निकायों और सरकारों पर बेहतर पैदल यात्री अवसंरचना विकसित करने का दबाव बढ़ा सकता है।
अदालत का संदेश स्पष्ट है—सड़कें केवल वाहनों के लिए नहीं हैं। पैदल चलने वाले नागरिकों की सुरक्षा, गरिमा और सुविधा सुनिश्चित करना सरकारों की संवैधानिक जिम्मेदारी है, और सुरक्षित फुटपाथ उपलब्ध कराना अब केवल एक प्रशासनिक सुविधा नहीं बल्कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा का प्रश्न है।


