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पूर्वोत्तर में प्रत्यक्ष बिक्री कारोबार 1,854 करोड़ रूपये के पार, असम 1009 करोड़ की हिस्सेदारी के साथ शीर्ष पर

देश के पूर्वोत्तर क्षेत्र के राज्यों ने प्रत्यक्ष बिक्री में लम्बी छलांग भरते हुये करीब 16 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज कर वर्ष 2022-23 में 1854 करोड़ रूपये से अधिक का कारोबार किया जो न केवल गत वर्षावधि से 255 करोड़ रूपये अधिक है बल्कि ठोस भावी दिशा को भी परिलक्षित करता है। देश में प्रत्यक्ष बिक्री उद्योग की अग्रणी संस्था इंडियन डायरेक्ट सेलिंग एसोसिएशन (आईडीएसए) ने आज यहां आयोजित “द्वितीय पूर्वोत्तर प्रत्यक्ष बिक्री सम्मेलन और प्रदर्शनी“ कार्यक्रम में इसका खुलासा किया।

आईडीएसए ने बताया कि 21,282 रूपये के कुल राष्ट्रीय प्रत्यक्ष बिक्री बाजार में पूर्वोत्तर क्षेत्र की लगभग 8.7% की हिस्सेदारी है और यह 4.2 लाख से अधिक प्रत्यक्ष विक्रेताओं को स्वरोजगार के अवसर प्रदान करता है। इस क्षेत्र में असम 13 प्रतिशत की सालाना विकास दर के साथ 1009 करोड़ रूपये की बिक्री और 4.7% की बाजार हिस्सेदारी से देश का न केवल 9वां सबसे बड़ा प्रत्यक्ष बिक्री बाजार है बल्कि सहयोगी राज्यों में भी शीर्ष क्रम पर है और यह मुकाम उसे 2.4 लाख से अधिक प्रत्यक्ष विक्रेताओं की अथक मेहनत की बदौलत हासिल हुआ है।

आईडीएसए के अनुसार पूर्वोतर क्षेत्र के अन्य सात राज्य कुल बिक्री में लगभग 845 करोड़ का योगदान करते हैं जिनमें नागालैंड 227 करोड़, मिज़ोरम 156 करोड़, अरुणाचल प्रदेश 78 करोड़, त्रिपुरा 72 करोड़, मेघालय 19 करोड़ और सिक्किम की पांच करोड़ रूपये की हिस्सेदारी है। मिजोरम ने सर्वाधिक 31%, सिक्किम 25%, नागालैंड 22.7% और मणिपुर ने 20% की चौंकाने वाली विकास दर हासिल की है। उल्लेखनीय है कि प्रत्यक्ष विक्री उद्योग पूर्वोत्तर राज्यों के खजाने में करों के माध्यम से सालाना लगभग 300 करोड़ रूपये का भी योगदान करता है जो इस क्षेत्र के विकास में इसकी मजबूत भूमिका को दर्शाता है।

असम की उपभोक्ता मामले विभाग की सचिव सुश्री अनासुआ दत्ता बरुआ ने इस अवसर पर अपने सम्बोधन में कहा कि राज्य सरकार प्रत्यक्ष बिक्री उद्योग के लिए निर्धारित नियामक तंत्र के अंतर्गत अनुकूल माहौल सुनिश्चित करते हुये उपभोक्ताओं के हितों और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। उपभोक्ताओं के लिए उत्पादों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि प्रत्यक्ष बिक्री कम्पनियों की गतिविधियों पर नजर रखने तथा उपभोक्तओं की शिकायतों के निवारण हेतु राज्य सरकार ने उपभोक्ता संरक्षण (प्रत्यक्ष बिक्री) नियम 2021 के प्रावधानों के अनुरूप राज्य में निगरानी कमेटी का गठन किया है जिसके सदस्यों में विषय विशेषज्ञ के तौर पर आईडीएसए भी शामिल है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार एक तंत्र बनाने पर काम कर रही है ताकि प्रत्यक्ष बिक्री कम्पनियां नियमों का पालन करें। 

प्राइड ईस्ट एंटरटेनमेंट की अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक रिनिकी भुयान शर्मा ने इस अवसर पर अपने सम्बोधन में समाज और राष्ट्रीय विकास में महिलाओं के योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा कि महिलाओं ने घरों तक ही सीमित रहने की  पारम्परिक बेड़ियों से बाहर निकल कर विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय सफलताएं हासिल की हैं और यह सिलसिला बरकरार है।  उन्होंने कहा कि प्रत्यक्ष बिक्री क्षेत्र भी महिलाओं के सशक्तिकरण का माध्यम बन रहा है जहां इन्होंने अपनी उद्यमशीलता क्षमता साबित कर उपलब्धियों के माध्यम से ठोस मिसाल कायम की है। उन्होंने  कार्यक्रम में सम्मानित महिलाओं को बधाई दी और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की। उन्होंने अन्य महिलाओं से भी इनसे प्रेरणा लेने की अपील करते हुये इस तरह के कार्यक्रमों के आयोजन के लिए आईडीएसए की सराहना की।

आईडीएसए के अध्यक्ष विवेक कटोच ने देश में प्रत्यक्ष बिक्री परिदृश्य की जानकारी देते हुये कहा कि पूर्वोत्तर क्षेत्र प्रत्यक्ष बिक्री उद्योग के लिए प्रमुख और प्राथमिकता वाले बाजारों में शामिल है। 16% की विकास दर स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं कि प्रत्यक्ष बिक्री उद्योग यहां नये आयाम छूने की ओर अग्रसर है जो इसके प्रत्यक्ष विक्रेताओं की अथक मेहनत का नतीजा है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्तर 12% की सालाना और आठ प्रतिशत से अधिक की सीएजीआर के साथ बढ़ रहे इस उद्योग ने लगभग 86 लाख लोगों को स्वरोजगार प्रदान किया है। आईडीएसए सदस्य कम्पनियां उपभोक्ता हितों के साथ क्षेत्र के 4.2 लाख से अधिक प्रत्यक्ष विक्रेताओं के हितों की सफलतापूर्वक रक्षा करने का दावा आत्मविश्वास से कर सकती हैं। उन्होंने कहा कि असम समेत दस राज्यो ने केंद्र द्वारा अधिसूचित उपभोक्ता संरक्षण (प्रत्यक्ष बिक्री) नियम 2021 का पालन करते हुये अपने यहां निगरानी समितियों का गठन कर लिया है तथा आशा करते हैं कि अन्य राज्य भी यह काम जल्द पूरा कर लेंगे।

कार्यक्रम में प्रत्यक्ष बिक्री उद्योग के दिग्गजों और विशेषज्ञों ने उद्योग के विकास, नियामक तंत्र, उपभोक्ता जागरूकता, सुधाारों

और प्रत्यक्ष बिक्री में मौजूद अवसरों से महिलाओं और युवाओं के सशक्तिकरण आदि महत्वपूार् विषयों  पर भी विचार-मंथन किया। इस दौरान प्रत्यक्ष बिक्री में उत्कृष्ट उपलब्धियों के लिए पूर्वोत्तर क्षेत्र की 45 महिला उद्यमियों का सम्मान, पूर्वोत्तर की पारम्परिक वेशभूषा में मॉडल का उत्पादों के साथ रैंप वॉक तथा आईडीएसए की सदस्य प्रत्यक्ष बिक्री कम्पनियों की विभिन्न उत्पादों और नवाचारों को लेकर प्रदर्शनी जैसे कार्यक्रम आकर्षण का केंद्र बने1

इस अवसर पर आईडीएस के सचिव रजत बनर्जी, आईडीएसए की विभिन्न सदस्य कम्पनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी,   न्यूट्रीशन एवं फिटनेस कोच रूचि भारद्वाज बरूआ समेत अन्य गणमान्य और बड़ी संख्या में प्रत्यक्ष विक्रेता मौजूद थे।

आईडीएसए के बारे में : आईडीएसए भारत में प्रत्यक्ष बिक्री उद्योग के लिये एक स्वायत् और स्व-नियमन संस्था है जो उद्योग के कारोबार को बढ़ावा देने के लिये अनुकूल माहौल बनाने, इसके हितों और इससे जुड़े मुद्दों को लेकर सरकार के नीति निर्धारण निकायों के बीच एक माध्यम और सेतु का काम करती है। इसके अलावा यह सरकार के साथ नीतिगत मुद्दों पर मिल कर काम करने और इसमें दक्षता बढ़ाने, प्रत्यक्ष बिक्री में वांछित विश्वसनीयता, स्पष्टता और विश्वास सुनिश्चित करने के लिये एक सलाहकार और परामर्शदाता की भूमिका भी अदा करती है।

सबसे पहले किसने किया था पाकिस्तान शब्द का प्रयोग?

भारत वैश्विक मंच पर एक मज़बूत राष्ट्र के रूप में उभर सकता था; लेकिन विभाजन की मानसिकता, जो सांप्रदायिक और सहिष्णुता को बढ़ावा देती है; फिर से सिर उठा रही है। पिछले समय में बांग्लादेश में हुई घटनाओं ने इस ख़तरे को स्पष्ट रूप से उजागर किया है। यदि हमें एक सशक्त और एकजुट राष्ट्र बने रहना है, तो हमें इस मानसिकता को समाप्त करना होगा। सन् 1947 के विभाजन की त्रासदी को ध्यान में रखते हुए हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में ऐसी परिस्थितियाँ पैदा न हों। केवल एक संगठित, सशक्त और सहिष्णु समाज ही भारत की वास्तविक शक्ति हो सकता है। पिछले दिनों यहाँ राष्ट्रीय तकनीकी शिक्षा प्रशिक्षण और अनुसंधान संस्थान में पंचनद शोध संस्थान की 31वीं वार्षिक व्याख्यानमाला के अवसर पर प्रख्यात चिंतक, विचारक और शोधकर्ता डॉ. प्रशांत पॉल ने कई बातें साझा कीं।

भारत-पाक विभाजन से जुड़ी कई बातों पर चर्चा करते हुए डॉ. प्रशांत पॉल ने कई ऐतिहासिक तथ्यों को उजागर किया। उनका कहना है कि बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हुए जघन्य अत्याचार और नरसंहार ने भारत के समय की भयावह घटनाओं को फिर से जीवंत कर दिया है। उन्होंने बताया कि अंग्रेजों के भारत में आने के बाद अनेक आन्दोलन हुए, जिसमें 1857 का आन्दोलन, संन्यासियों का, जिस पर आनंदमठ लिखा गया, असहयोग आन्दोलन, सत्याग्रह और कई अन्य आन्दोलन हुए। इनमें से सन् 1905 में बंग-भंग आन्दोलन एकमात्र सफल आन्दोलन था। इस आन्दोलन को डिफ्यूज करने के लिए 30 दिसंबर, 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना की गयी थी। ठीक 24 साल बाद 30 दिसंबर, 1930 को इलाहाबाद में मुस्लिम लीग का अधिवेशन हुआ, जिसमें मुस्लिम राष्ट्र की माँग की गयी थी। इस अधिवेशन की अध्यक्षता कर रहे थे- अल्लामा मोहम्मद इक़बाल। यह वही इक़बाल थे, जिनकी कविताओं को हमने स्कूल में गुनगुनाया था- ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा।’ उस वक़्त मुस्लिम राष्ट्र की माँग को बहुत ज़्यादा तवज्जो नहीं दी गयी थी।

डॉ. पॉल बताते हैं कि इसी बीच ब्रिटिश सरकार ने भारत को स्वतंत्रता देने के लिए ब्रिटेन में कुछ गोलमेज कॉन्फ्रेंस रखी। तीसरी कॉन्फ्रेंस नवंबर, 1932 में हुई। उस वक़्त पंजाब के होशियारपुर का रहमत अली कैंब्रिज पढ़ने गया था। वहाँ पर उस कॉन्फ्रेंस में जो लोग आये हुए थे, इसने उनको एक पर्चा दिया, जिसका शीर्षक था- नाउ ऐंड नेवर (Now and Never)। उस परचे में पाकिस्तान शब्द लिखा था और आगे लिखा था- ‘हम इस बात से आश्वस्त हैं कि भारत में शान्ति और प्रगति नहीं हो सकती यदि हम मुसलमानों को हिन्दू-प्रधान संघ में धोखा दिया जाता है, जिसमें हम अपने भाग्य के निर्माता और अपनी आत्मा के कप्तान नहीं बन सकते।’ (We are convinced there can be no peace and progress in India if we the Muslims are duped into a Hindu dominated Federation in which we cannot become the masters of our own destiny and captains of our own souls.)

रहमत अली ने जब यह पर्चा सारे लोगों को दिया, जिसमें हिन्दू महासभा भी थी। कांग्रेस भी थी। मुस्लिम लीग भी थी। छोटी-छोटी पार्टियाँ भी थीं। सबने इस प्रस्ताव को सिरे से नकार दिया था। जिन्ना ने भी उसको ख़ारिज कर दिया और कहा कि यह संभव नहीं है। उसके बाद सन् 1940 में रावी के तट पर मुस्लिम लीग का लाहौर अधिवेशन हुआ। इसकी अध्यक्षता बैरिस्टर मोहम्मद जिन्ना ने की थी और पहली बार वहाँ अलग राष्ट्र की माँग की। लेकिन फिर भी पाकिस्तान शब्द का प्रयोग नहीं हुआ। सन् 1943 में जिन्ना ने पहली बार पाकिस्तान शब्द का प्रयोग किया। जब सबने रहमत अली के परचे को नकार दिया, तो उसने अकेले ही पाकिस्तान नेशनल मूवमेंट चलायी।

डॉ. प्रशांत आगे बताते हैं कि जब पाकिस्तान बन गया, तब राष्ट्रपति जिन्ना थे, लियाक़त अली प्रधानमंत्री थे। रहमत अली उन दोनों से मिलने गया; लेकिन दोनों नहीं मिले। मोहम्मद जिन्ना की मौत के बाद सितंबर, 1948 में वह फिर पाकिस्तान गया; लेकिन उसको दुत्कारकर भगा दिया गया। लेकिन वह हिन्दुस्तान भी नहीं आ सका; कैंब्रिज चला गया। उसकी मौत के बाद वहाँ उसका शव पाँच दिन तक सड़ता रहा। कोई उसकी सुध लेने वाला नहीं था। कैंब्रिज में उस रहमत अली की एक छोटी-सी क़ब्र है, जिसने पाकिस्तान बनाया।

सैफ अली खान पर हमला करने वाला मुख्य आरोपी गिरफ्तार

मुंबई :सैफ अली खान पर हमले के आरोपी को मुंबई पुलिस ने गिरफ्तार करने का दावा किया है। पुलिस रिमांड के लिए उसे आज कोर्ट में पेश किया जाएगा। इसी मामले को लेकर पुलिस प्रेस कॉन्फ्रेंस करेगी। अब तक की मिली जानकारी के मुताबिक आरोपी का नाम विजय दास है और वह पश्चिम बंगाल का रहने वाला है।

पुलिस ने आरोपी को पकड़ने के लिए 35 से अधिक टीमों का गठन किया था। बांद्रा पुलिस बांद्रा हॉलीडे कोर्ट में विजय दास को पेश करेगी और पुलिस कस्टडी की मांग करेगी। आरोपी विजय दास ठाणे के हीरानंदानी एस्टेट में ब्लाबर नाम के एक होटल में काम करता था। आरोपी जिस होटल में पहले काम करता था, उसी होटल में उसे एक समय बेस्ट एम्पलाई का अवॉर्ड भी दिया गया था। बाद में उसने काम छोड़ दिया।

शनिवार की रात 12 बजे करीब क्राइम ब्रांच और बांद्रा पुलिस को हीरानंदानी एस्टेट में एक कंस्ट्रक्शन साइट पर आरोपी के होने की सूचना मिली। जिसके बाद जोन 6 के डीसीपी नवनाथ ढबले को सूचित किया गया ताकि आरोपी हाथ से न निकले। डीसीपी नवनाथ की टीम तुरंत थाने के लिए रवाना हुई, साथ में क्राइम ब्रांच की टीम भी पहुंची लेकिन आरोपी को पुलिस के आने की सूचना मिल गई थी।

इसके बाद आरोपी एक कंस्ट्रक्शन साइट पर घनी कंटीली झाड़ियों में जाकर छुप गया। जंगल के अंदर झाड़ियों में छुपने की वजह से आरोपी को खोजने में दिक्कत हो रही थी। ऐसे में टॉर्च और मोबाइल टॉर्च तक का सहारा लेना पड़ा और आरोपी को चारों तरफ से झाड़ियों में क्राइम ब्रांच और पुलिस ने घेर लिया। जिसके बाद कंटीली झाड़ियों में से उसे गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के बाद आरोपी को बांद्रा पुलिस आज बांद्रा पुलिस हॉलीडे कोर्ट में पेश करेगी। रात 2 बजे के करीब आरोपी को घंटों की मेहनत के बाद कंटीली झाड़ियों से पकड़ा गया।

आपको बता दें कि गुरुवार की सुबह सैफ पर उनके बांद्रा स्थित अपार्टमेंट में कई बार चाकू से हमला किया गया। इस हमले में उन्हें गंभीर चोट लगने के बाद लीलावती अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनकी सर्जरी की गई। डॉक्टरों के मुताबिक उनकी हालत स्थिर है और वे खतरे से बाहर हैं।

ईरान के सुप्रीम कोर्ट में फायरिंग: तीन जजों की मौत, एक घायल

ईरान: ईरान के सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को एक भयानक घटना घटी, जब एक कोर्ट कर्मचारी ने अंधाधुंध फायरिंग कर तीन जजों की हत्या कर दी और एक अन्य जज को गंभीर रूप से घायल कर दिया। फायरिंग के बाद हमलावर ने खुद को भी गोली मार ली, जिससे मौके पर ही उसकी मौत हो गई। इस हमले के बाद अदालत परिसर को तुरंत खाली कराया गया और सुरक्षा बलों ने पूरे इलाके को घेर लिया।

घटना का विवरण – जानकारी के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में सामान्य कार्यवाही चल रही थी, तभी एक कोर्ट कर्मचारी ने अपनी सर्विस गन निकालकर जजों पर फायरिंग शुरू कर दी। घटना इतनी अचानक हुई कि कोर्ट परिसर में भगदड़ मच गई। जज और अन्य कर्मचारी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे।

हमलावर ने तीन जजों को सीधे निशाना बनाया, जिनकी घटनास्थल पर ही मौत हो गई। एक अन्य जज को गंभीर चोटें आई हैं और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां उनकी हालत नाजुक बताई जा रही है।

हमलावर की आत्महत्या- फायरिंग के बाद हमलावर ने खुद को भी गोली मार ली। पुलिस ने पुष्टि की है कि हमलावर सुप्रीम कोर्ट का ही एक कर्मचारी था। प्रारंभिक जांच में हमले का कारण व्यक्तिगत तनाव या मानसिक अस्थिरता माना जा रहा है।

आतंकवादी हमले की संभावना- घटना के बाद सुरक्षा एजेंसियां इस बात की जांच कर रही हैं कि हमलावर का किसी आतंकी संगठन से संबंध था या नहीं। हालांकि, इसे अभी तक आधिकारिक रूप से आतंकी हमला घोषित नहीं किया गया है।

अदालत परिसर खाली कराया गया- घटना के तुरंत बाद सुप्रीम कोर्ट को पूरी तरह से खाली करा लिया गया। सभी कर्मचारियों और वहां मौजूद लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला गया। फॉरेंसिक टीम ने घटनास्थल पर पहुंचकर सबूत जुटाने शुरू कर दिए हैं।

देशभर में आक्रोश-  यह घटना ईरान के लोगों को गहरे सदमे में डालने वाली है। अदालत जैसी सुरक्षित मानी जाने वाली जगह पर इस तरह के हमले से जनता में गुस्सा और चिंता का माहौल है। सोशल मीडिया पर लोग इस घटना की निंदा कर रहे हैं और न्यायपालिका की सुरक्षा पर सवाल उठा रहे हैं।

सरकार की प्रतिक्रिया- ईरान के गृहमंत्री ने इस घटना को दुखद बताते हुए मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त की है। उन्होंने आश्वासन दिया है कि घटना की गहन जांच की जाएगी और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। इसके साथ ही, उन्होंने देश की अदालतों की सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने की बात कही है।

निष्कर्ष- यह घटना ईरान की न्यायपालिका और सुरक्षा व्यवस्था के लिए एक गंभीर चुनौती है। घटना के पीछे के वास्तविक कारणों और हमलावर की मंशा का पता जांच पूरी होने के बाद ही चल पाएगा। फिलहाल, देश में शोक और आक्रोश का माहौल है।

दिल्ली मेट्रो में छात्रों को मिले 50% छूट, केजरीवाल ने प्रधानमंत्री मोदी को लिखी चिट्ठी

नई दिल्ली : आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने दिल्ली मेट्रो में छात्रों के लिए 50 फीसदी छूट की मांग की है। केजरीवाल ने अपने पत्र में कहा कि दिल्ली मेट्रो में केंद्र और दिल्ली सरकार दोनों का योगदान है, और इसलिए इस छूट का भार दोनों सरकारों को मिलकर उठाना चाहिए।

उन्होंने इस पत्र में यह भी उल्लेख किया कि उनकी सरकार छात्रों के लिए एक फ्री बस यात्रा योजना की शुरुआत करने जा रही है। यह कदम दिल्ली में छात्रों की यात्रा को और अधिक सुलभ और किफायती बनाने के लिए उठाया गया है। केजरीवाल ने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया है कि वे दिल्ली मेट्रो में छात्रों के लिए 50 फीसदी छूट की इस योजना को जल्द से जल्द लागू करने में सहयोग करें।

तकनीकी उड़ान भरना चाहती हैं लड़कियाँ

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के स्नातक पाठ्यक्रमों में वर्ष 2019 में जेईई एडवांस्ड परीक्षा पास करने वाली महिलाओं की संख्या 5,356 थी। वर्ष 2020 में यह संख्या 6,707; वर्ष 2021 में 6,452; वर्ष 2022 में 6,516 और वर्ष 2023 में 7,509 पहुँच गयी। अब वर्ष 2024 में यह आँकड़ा 7,964 को छू गया। आँकड़ों से पता चलता है कि आईआईटी जैसे क्षेत्र में लड़कियों का अनुपात तेज़ी से बढ़ रहा है। वर्ष 2019 से पहले राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक अहम पहचान बनाने वाले आईआईटी संस्थानों में लड़कियों की संख्या बहुत कम, औसतन आठ फ़ीसदी तक ही रहती थी। लेकिन अब यह आँकड़ा 20 फ़ीसदी तक पहुँच गया है।

देश में इस समय 23 आईआईटी संस्थान हैं। आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में दाख़िला पाने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है और यहाँ लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या बहुत कम होना बराबरी की भूमिका निभाने के लिहाज़ से एक गंभीर मुद्दा बना रहा है। वैसे यहाँ लैंगिक समावेशी वाला पहलू भी अहम है। लेकिन सरकार ने इस समस्या के समाधान के लिए 2018 में इन संस्थानों में लड़कियों के लिए 20 प्रतिशत अतिरिक्त कोटे की शुरुआत की। इस अतिरिक्त कोटा के तहत इन संस्थानों के स्नातक पाठ्यकमों में तय सीटों की संख्या में कोई बदलाव नहीं किया गया, बल्कि लड़कियों के लिए 20 प्रतिशत अतिरिक्त सीटें जोड़ दी गयीं। अतिरिक्त सीटों वाली योजना का असर 2018 के बाद साफ़ नज़र आता है। आँकड़े इसके गवाह हैं। इसका असर अन्य जगहों पर दिखायी देता है। मसलन क्लासरूम बड़े हो गये हैं।

नये महिला शौचालयों का निर्माण, छात्रावास आदि। दिल्ली आईआईटी ने महिला वॉशरूमों में सेनेटरी नैपकिन मशीनें लगवायी हैं। रुड़की आईआईटी ने 13 छात्रावास में से चार लड़कियों के लिए आवंटित किये हैं और प्रशासन ने सुरक्षा के मद्देनज़र छ: करोड़ रुपये कैमरों पर ख़र्च किये हैं। दिल्ली व बॉम्बे आईआईटी की महिला फुटबॉल टीमें हैं। महिलाओं के ख़िलाफ़ यौन सुरक्षा व अन्य लैंगिक संवेदनशील विषयों पर कार्यशालाओं का आयोजन भी समय-समय पर किया जाता है। इससे आशा जगती है कि आने वाले वक़्त में तकनीकी संस्थानों में लड़कियों की संख्या और बढ़ेगी।

तकनीक, डिजिटल व एआई के युग में अधिक-से-अधिक लड़कियों को ऐसी शिक्षा की दरकार है। यहाँ इस बिंदु पर भी ग़ौर करना चाहिए कि लड़कियों की संख्या में इज़ाफ़े के पीछे सरकार की 20 प्रतिशत अतिरिक्त कोटे वाली योजना ने तो अहम भूमिका निभायी ही है; लेकिन इसमें ऑनलाइन कोचिंग, ऑनलाइन सामग्री की उपलब्धता, आईआईटी संस्थानों में बढ़ोतरी व संस्थानों द्वारा जारी अतिरिक्त प्रयासों का भी अपना महत्त्व है। पहले कई मर्तबा माता-पिता आईआईटी में चयन होने के बावजूद घर से दूरी के कारण अपनी लड़कियों को वहाँ नहीं भेजते थे। लेकिन अब यह बाधा कुछ हद तक कम हो गयी है। बॉम्बे आईआईटी ने 2020 में जेईई एंडवास्ड परीक्षा पास करने वाले लड़कियों व उनके अभिभावकों के लिए एक विशेष सत्र का आयोजन किया, जिसमें उन्हें बताया गया कि उनकी लड़कियाँ बॉम्बे आईआईटी का चयन क्यों करे। हालाँकि लड़कियों की सुरक्षा का मुद्दा आज भी बहुत बड़ा मुद्दा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब 22 जनवरी, 2015 को हरियाणा के पानीपत से बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा दिया, तो यह नारा पूरे देश में इतना गूँजा कि रास्ते में चलने वाली गाड़ियों पर लिखा जाने वाला स्लोगन बन गया। लेकिन क्या आज वास्तव में देश में बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ की मंशा में हम सफल हो सके हैं? यह एक बहुत बड़ा सवाल है। क्योंकि पिछले नरेद्र मोदी के देश पर 10 साल से ज़्यादा के शासन-काल में कोई भी सरकार इस नारे को साकार नहीं कर सकी है, ख़ुद मोदी सरकार भी नहीं।

अब सवाल यह भी खड़ा होता है कि इस सरकारी योजना का लाभ क्या निम्न व मध्यम वर्ग की लड़कियों के लिए उठाना बहुत आसान है। जवाब नहीं होगा। वजह-प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए बाज़ार में जो कोचिंग संस्थाएँ उपलब्ध हैं, उनकी फीस का पैकेज बहुत-ही अधिक है। यही नहीं उसके बाद अगर लड़की को दाख़िला मिल भी जाता है, तो संस्थानों में फीस भी बहुत अधिक है। बैंक में कार्यरत महिला अधिकारी मनीषा छावड़ा ने बताया कि तीन साल पहले मेरी बेटी ने कठिन परिश्रम के बाद आईआईटी में दाख़िला लिया, हमारा परिवार बहुत ख़ुश हुआ; लेकिन उसकी फीस बहुत ज़्यादा है। पहले कोचिंग पर ख़र्च किया और अब फीस पर ख़र्च कर रहे हैं। यहाँ सरकार को कुछ ठोस क़दम उठाने की दरकार है।’

अब कैंपस प्लेसमेंट पर ध्यान दें, तो बीते दो वर्षों से इस मोर्चे पर भी राहत भरी ख़बर सुनने को नहीं मिली। बेशक इन संस्थानों के सम्बन्धित विभागों ने कहा कि वर्ष 2022 में कोरोना के बाद बहुत भर्तियाँ हुई थीं और 2023 व 2024 में माँग में कमी देखने को मिली। इसके अलावा यह भी कहा गया कि अब कुछ छात्र कैंपस प्लेसमेंट के बाहर भी विकल्प चुन रहे हैं। सरकार के सामने बड़ी चुनौती यह है कि उच्च शिक्षण संस्थानों, कार्यस्थलों को लिंग की दृष्टि से समावेशी बनाने के लिए एक दूरदर्शी विजन अपनाने की है।

नक्सल विरोधी अभियान के दौरान टोन्टो थाना क्षेत्र में 6 IED बरामद

सुरक्षा बलों ने किया निष्क्रिय

चाईबासा- चाईबासा पुलिस, कोबरा, झारखंड जगुआर और सीआरपीएफ की टीमों ने संयुक्त रूप से एक बड़े नक्सल विरोधी अभियान को अंजाम दिया है। यह अभियान प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) नक्सली संगठन के शीर्ष नेताओं मिसिर बेसरा, अनमोल, गोछु, अनल, असीम मंडल, अजय महतो, सागेन अंगरिया और अश्विन के नेतृत्व में चल रही विध्वंसक गतिविधियों को रोकने के लिए चलाया जा रहा है।

दिनांक 10 अक्टूबर 2023 से यह अभियान गोईलकेरा और टोन्टो थाना क्षेत्रों के सीमावर्ती इलाकों में सक्रिय है। इन क्षेत्रों में स्थित ग्राम कुईड़ा, छोटा कुईड़ा, मेरालगड़ा, तिलायबेड़ा, बोथपाईससांग, बायहातु और टोन्टो थानांतर्गत हुसिपी, राजाबासा, रेगड़ा, और पाटातोरब को विशेष रूप से अभियान का केंद्र बनाया गया है।

अभियान के दौरान दिनांक 12 जनवरी 2025 को टोन्टो थाना क्षेत्र के तुम्बाहाका और बगान गुलगुलदा के बीच पहाड़ी इलाके में सुरक्षा बलों ने नक्सलियों द्वारा लगाए गए छह तीर-प्रकार के आईईडी बरामद किए। इन आईईडी का उद्देश्य सुरक्षा बलों को निशाना बनाना था।

सुरक्षा की दृष्टि से तुरंत कार्रवाई करते हुए, बम निरोधक दस्ते ने इन सभी आईईडी को उसी स्थान पर सुरक्षित रूप से निष्क्रिय कर दिया।

बरामदगी :  1. 06 (छः) तीर IED

नक्सल विरोधी अभियान जारी : सुरक्षा बलों ने बताया कि यह अभियान जारी रहेगा और नक्सली गतिविधियों को पूरी तरह से रोकने के लिए सघन तलाशी अभियान चलाया जाएगा। इस अभियान में चाईबासा पुलिस के साथ कोबरा 209 और 203 बटालियन, झारखंड जगुआर और सीआरपीएफ की 60, 197, 174, 193, 134 और 26 बटालियनें शामिल हैं।

पुलिस और सुरक्षा बलों की सतर्कता और कुशलता से बड़ी घटना टल गई है, और अभियान के दौरान आगे भी ऐसी गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए प्रयास जारी रहेगा।

अपराध-मुक्त नहीं हो पा रही मायानगरी

के. रवि (दादा)

मायानगरी मुंबई दुनिया के हरेक इंसान को अपनी चमक-दमक और काम-धंधे के लिए अपनी तरफ़ आकर्षित करती है। यहाँ की ऊँची-ऊँची बिल्डिंगें, सपनों जैसी हॉलीवुड की दौलत-शोहरत वाली दुनिया और सदाबहार मौसम को कौन इंज्वाय नहीं करना चाहता। पर जैसे इस एक दुनिया के भीतर कई दुनियाँ छुपी हुई हैं, वैसे ही मुंबई की इस दुनिया के भीतर और भी कई दुनियाँ छुपी हुई हैं, जहाँ चकाचौंध के बीच अपराध और गुंडागर्दी का काला साया भी है। 

नव वर्ष 2025 की पहली तारीख़ की सुबह तक इस मायानगरी के बाशिंदों ने ख़ूब जश्न मनाया। पर गये साल की 31 दिसंबर और नये साल की 01 जनवरी की मिलीजुली जश्न की रंगीन रात में मुंबई में न जाने कितने ही अपराध हुए होंगे, इसका हिसाब किसी के पास नहीं है। पुलिस के पास भी नहीं। यहाँ पबों, बारों, बाइयों के कोठों में तो हर रात खुलेआम अपराध होते हैं; पर सड़कों-फुटपाथों, गली-कूचों, झुग्गी-झोपड़ियों, चाल जैसी आम बस्तियों से लेकर बड़ी-बड़ी हवेलियों में भी कहीं-कहीं अपराध होते हैं। मुंबई की कई अपराधों की डरावनी घटनाएँ अंदर तक झकझोर देती हैं, तो कई घटनाएँ रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में आम-सी लगती हैं। पर अपराध तो अपराध है। जो अपराध की तलवार से ज़ख़्मी होता है, वो ही इसका दर्द समझ सकता है। अभी चंद दिनों पहले 05 जनवरी को बॉलीवुड की पुरानी मशहूर अभिनेत्री पूनम ढिल्लो के मुंबई-ख़ार में बने फ्लैट में हुई चोरी में लगभग एक हीरे का नेकलेस, 35,000 रुपये और कुछ अमेरिकी डॉलर के चोरी होने की घटना सामने आयी। इस चोरी के अपराध में तो अगले ही दिन 06 जनवरी को मुंबई पुलिस ने समीर अंसारी नाम के एक आदमी को गिरफ़्तार कर लिया, जो अभिनेत्री के फ्लैट की पेंटिंग बीते एक हफ़्ते से कर रहा था। फ्लैट में अभिनेत्री पूनम ढिल्लो का बेटा और उसका परिवार रहता है।

इस घटना के बाद मुंबई पुलिस ने सरकंडा इलाक़े से दो नाबालिग़ अपराधियों समेत चार अपराधियों को गिरफ़्तार किया है। इन चोरों पर बीते साल चार जगह हुई चोरियों में लिप्त होने का आरोप है। मुंबई पुलिस हर रोज़ अपराधियों को पकड़ती है; पर मुंबई में अपराध कम नहीं होते। देश का यह इकलौता ऐसा शहर होगा, जहाँ छोटे-से-छोटे अपराधियों से लेकर अंडरवर्ल्ड तक के बड़े-बड़े अपराधियों का ठिकाना रहता है। अंडरवर्ल्ड का डॉन कहे जाने वाले दाऊद इब्राहिम, उसके कई गुर्गों और दूसरे बड़े-बड़े अपराधियों का ठिकाना मुंबई रही है। फ़िल्मों में दिखायी जाने वाली गुंडागर्दी और हफ़्तावसूली की कहानियाँ ऐसे ही नहीं बनीं, उनमें मुंबई की एक बड़ी सच्चाई भी है। आज भी इस मायानगरी की गुमनाम और अति सुरक्षित जगहों पर नामी अपराधी रहते हैं, जिन तक कभी पुलिस उनके ठिकाने पता न होने के चलते नहीं पहुँच पाती और कभी उनके गिरेबान तक पुलिस के हाथ इन अपराधियों की राजनीतिक पहुँच और पैसे की ताक़त के चलते नहीं पहुँच पाते।

सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज मायानगरी की आपराधिक घटनाओं में सिर्फ़ महिलाओं के ख़िलाफ़ 2023 के मुक़ाबले 2024 में 7.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। 2024 में मुंबई पुलिस के पास कुल 5,827 अपराध दर्ज हुए, पर जिस तेज़ी से मुंबई में अपराध होते हैं, वो इससे कहीं ज़्यादा हो सकते हैं। हर शहर की तरह मायानगरी में भी हर रोज़ कितने ही आपराधिक मामले पुलिस के रजिस्टर में दर्ज ही नहीं होते हैं। कुछ घर की लाज के चलते और कुछ अपराधियों के डर से। हमारी पिछली रिपोर्ट में हमने एक ऐसे ही धनी आदमी के अपराधों का काला चिट्ठा खोला था, जिस पर मुक़दमा भी चल रहा है। इतने पर भी उसने अपनी निजी मार्केटिंग वाली कम्पनी में काम करने वाली एक लड़की पर गंदी नज़र डाली और ख़ुद को बचाने के लिए लड़की पर ही एफआईआर दर्ज करा दी थी।

अभी कुछ दिन पहले आठ लड़कियाँ उल्हासनगर के हिल लाइन पुलिस स्टेशन इलाक़े में बने एक छात्रावास की खिड़की की लोहे की सलाखें तोड़कर फ़रार हो गयी थीं। आठों लड़कियों की तलाश के लिए  जोन-4, अंबरनाथ डिवीजन के डीसीपी सचिन गोरे ने विशेष खोज दल तैयार किया था, जिसकी कड़ी जाँच के बात सात लड़कियाँ मिल गयी हैं, पर एक 17 वर्षीय लड़की का अभी तक पता नहीं है। पुलिस उसे भी खोज रही है। पुलिस को मिलीं सात लड़कियों ने बताया है कि वे छात्रावास में असुविधाओं के चलते तंग होकर फ़रार हुई थीं।

पुलिस अब छात्रावास के प्रबंधन और सुरक्षाकर्मियों से पूछताछ कर रही है। मायानगरी को अपराध से बचाने की पुलिस की मुहिम पर तो हम उँगली नहीं उठा सकते। पर अपराध को बढ़ावा देने वालों से जब तक पुलिस नहीं निपटेगी, तब तक मुंबई अपराधों से मुक्त नहीं हो सकेगी। ऐसा सुनते हैं कि अपराध की दुनिया के तार बड़े-बड़े धनवान और सफ़ेदपोश नेताओं से जाकर जुड़ते हैं।

खामोश सच: मुकेश चंद्राकर की दुखद हत्या और जमीनी पत्रकारिता के खतरे

ग्रासरूट्स जर्नलिज्म गर्दिश के साए में- एक पत्रकार की हत्या महज आंकड़ा नहीं है, बल्कि एक प्रवृति का प्रतीक है

बृज खंडेलवाल द्वारा

पिछले हफ्ते, छत्तीसगढ़ के बीजापुर के एक युवा स्वतंत्र पत्रकार मुकेश चंद्राकर की चौंकाने वाली हत्या ने भ्रष्टाचार को एक्पोज करने वाले और संघर्ष से प्रभावित क्षेत्रों, खासकर माओवादी प्रभावित क्षेत्रों में ग्राउंड जीरो से रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों के सामने आने वाले गंभीर खतरों को उजागर किया है।

अपनी साहसिक रिपोर्टिंग और स्थानीय मुद्दों की गहरी समझ के लिए जाने जाने वाले मुकेश न केवल एक कहानीकार थे; वे हाशिए पर पड़े लोगों की आवाज़ थे, जो अशांत माहौल में आम नागरिकों के सामने आने वाली कच्ची सच्चाईयों को उजागर करते थे। कथित तौर पर ठेकेदारों के हाथों उनकी भीषण हत्या, उन खतरों की भयावह याद दिलाती है जिनका सामना स्वतंत्र पत्रकार तब करते हैं जब वे भ्रष्टाचार और दुराचार पर प्रकाश डालने की हिम्मत जुटाते हैं।

1988 में, उत्तराखंड में एक युवा पत्रकार उमेश डोभाल की भी इसी तरह भ्रष्ट गुंडों ने हत्या कर दी थी।

प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं कि पिछले कुछ सालों में देश के अलग-अलग हिस्सों में मीडियाकर्मियों पर हमलों की संख्या में कई गुना वृद्धि हुई है, लेकिन न तो प्रेस संगठन और न ही सुरक्षा एजेंसियां ​​इस मुद्दे को संबोधित करने में सक्षम दिखते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार अजय झा कहते हैं “मुकेश की दुखद घटना इस कठोर सच्चाई को रेखांकित करती है कि पत्रकारिता का काम, खासकर जमीनी स्तर पर, जोखिम से भरा है। उनके जैसे कई पत्रकार शक्तिशाली अभिजात वर्ग के चकाचौंध वाले रडार के नीचे काम करते हैं, जो अक्सर वित्तीय लाभ के बजाय सच्चाई के जुनून से प्रेरित होते हैं। उन्हें अक्सर कम वेतन दिया जाता है या इससे भी बदतर, बिना वेतन के, वे उन कहानियों को उजागर करने के लिए अथक परिश्रम करते हैं जिन्हें मुख्यधारा का मीडिया या तो अनदेखा कर देता है या अपर्याप्त रूप से कवर करता है।”

 वास्तव में, ये जुनूनी पत्रकार  मीडिया उद्योग के गुमनाम नायक हैं, फिर भी उनके योगदान को शायद ही कभी स्वीकार किया जाता है, क्योंकि वे उच्च संपादकीय मंचों की आवाज़ों की बोझ से दबे रहते हैं, वो हाइ प्रोफाइल एंकर्स, जो अपने आरामदायक कार्यालयों की सुरक्षा से उपदेश देते रहते हैं और क्षेत्र में अपने स्ट्रिंगरों के सामने आने वाले जबरदस्त जोखिमों से अंजान बने रहते हैं।

डिजिटल युग में, जहाँ सूचना इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से स्वतंत्र रूप से प्रवाहित होती है, आज की पत्रकारिता में नव गतिशीलता का संचार हो रहा है। उभरते वैकल्पिक मीडिया प्लेटफॉर्म ने पारंपरिक कॉर्पोरेट मीडिया मॉडल को चुनौती देना शुरू कर दिया है, ठेकेदारों, नौकरशाहों और राजनेताओं की सांठगांठ के माध्यम से किए गए गहरे घोटालों को उजागर करके। हालाँकि, इस बदलाव को उन प्रतिष्ठानों द्वारा पॉजिटिव तरह से नहीं लिया गया है जो खुलासे से खतरा महसूस करते हैं। उन्हें ये स्वतंत्र आवाज़ें परेशान करती हैं, अक्सर असहमति को दबाने के लिए धमकी और हिंसा का सहारा लेते हैं। मुकेश का दुखद निधन उन लोगों के खिलाफ इस हिंसक धक्का-मुक्की का प्रतीक है, जो यथास्थिति को चुनौती देने का साहस करते हैं।

आज के हालात ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में स्वतंत्र पत्रकारिता  पर एक लंबी, काली छाया डालते हैं। यह उन पत्रकारों के लिए समर्थन प्रणालियों – या उनकी स्पष्ट कमी – के बारे में जरूरी सवाल उठाता है जो सच्चाई की खोज में खतरनाक क्षेत्रों में जाते हैं। मुकेश की मौत महज एक आंकड़ा नहीं है; यह एक खतरनाक प्रवृत्ति का प्रतीक है ।

सामाजिक कार्यकर्ता डॉ देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं, “स्थानीय स्तर पर स्वतंत्र रूप से कार्यरत मीडियाकर्मियों के लिए ज़रूरी सुरक्षा जाल, कानूनी संरक्षण और सहायता की व्यवस्था की जानी चाहिए, क्योंकि व्यक्तिगत जोखिम उठाकर ये पत्रकार अपने जुनून को आगे बढ़ाते रहते हैं।”

जबकि मुकेश की कहानी मीडिया के विमर्श के परिदृश्य में गूंज रही है, समाज के लिए जमीनी स्तर के पत्रकारों के समर्थन में एकजुट होना ज़रूरी है। सच्चाई और न्याय के पैरोकार से कहीं ज़्यादा, ये लोग हमारे देश के दूर-दराज़ के कोनों में आवाज़ों को जोड़ने वाला ताना-बाना हैं। हम उन्हें हिंसा और धमकी के कारण खोने का जोखिम नहीं उठा सकते। रिपोर्ट करने का उनका अधिकार और समुदायों का जानने का अधिकार स्वतंत्र मीडिया के लिए एक सुरक्षित वातावरण की तत्काल स्थापना पर निर्भर करता है।

लोकस्वर के अध्यक्ष राजीव गुप्ता के मुताबिक, “समय आ गया है कि हर स्तर पर हितधारकों – न केवल पत्रकार, बल्कि नागरिक समाज, कानूनी अधिवक्ता और राजनीतिक नेता – उन लोगों की रक्षा करने के लिए एकजुट हों जो लोकतंत्र की ताने-बाने में ऐसी महत्वपूर्ण लेकिन कमज़ोर भूमिकाएँ निभाते हैं।”

ऐसी दुनिया में जहाँ सच्चाई अक्सर धन और शक्ति से छिप जाती है, मुकेश चंद्राकर उस ईमानदारी के प्रतीक के रूप में खड़े हैं जिसे हम हर बार खो देते हैं जब एक पत्रकार को चुप करा दिया जाता है। उनके दुखद अंत को एक आवाज के रूप में लिया जाना चाहिए, जिससे खोजी पत्रकारिता के भविष्य की रक्षा के लिए एक सामूहिक प्रयास को बढ़ावा मिले और यह सुनिश्चित हो कि हमारे देश  में जवाबदेही, न्याय और सच्चाई की मांग करते हुए स्वतंत्र आवाजें गूंजती रहें।

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लेखक के बारे में

बृज खंडेलवाल, (1972 बैच, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन,) पचास वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता और शिक्षण में लगे हैं। तीन  दशकों तक IANS के सीनियर कॉरेस्पोंडेंट रहे, तथा आगरा विश्वविद्यालय, केंद्रीय हिंदी संस्थान के पत्रकारिता विभाग  में सेवाएं दे चुके हैं। पर्यावरण, विकास, हेरिटेज संरक्षण, शहरीकरण, आदि विषयों पर देश, विदेश के तमाम अखबारों में लिखा है, और ताज महल, यमुना, पर कई  फिल्म्स में कार्य किया है। वर्तमान में रिवर कनेक्ट कैंपेन के संयोजक हैं।

हरियाली का भ्रम: कागज के पेड़ और जमीनी हकीकत

खाली भूमि नहीं है पर हर वर्ष करोड़ों पेड़ पौधे लगाए जा रहे हैं

बृज खंडेलवाल द्वारा

हर साल लाखों पेड़ कागजों पर लगाए जाते हैं, फिर भी जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। केंद्र सरकार के वन विभाग की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, 2021 और 2023 के बीच भारत के वन क्षेत्र में 1,445 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि हुई, जिससे देश का कुल हरित आवरण 25.2% हो गया है।

हालांकि यह क्लेम सुकून देने वाला है, वास्तविकता कहीं अधिक जटिल है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड, महाराष्ट्र, अरुणाचल प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान और मिजोरम जैसे राज्यों में वन आवरण में बेशक वृद्धि दर्ज की गई है। परन्तु, एक अन्य रिपोर्ट से पता चलता है कि पिछले एक दशक में 46,000 वर्ग किलोमीटर वन भूमि को गैर-वन उपयोग में बदल दिया गया है।

आगरा जैसे शहरों में, कहानी गंभीर है। पिछले 30 वर्षों में लाखों पेड़ काटे जा चुके हैं। इनकी भरपाई आज तक नहीं हुई है।  कीथम  के जंगल सिकुड़ गए हैं, और  सूर सरोवर बर्ड सैंक्चूएरी और वेटलैंड  के क्षेत्र को कम करने के षड्यंत्री प्रयास जारी  हैं।   वृन्दावन में, रातोंरात सैकड़ों पेड़ काटे गए थे, और अब गधा पड़ा मलगोदाम  के पेड़ गायब हो गए हैं, जबकि  ताज ट्रेपजियम ज़ोन पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील इलाका है।

अपने प्रदेश में, पिछले 25 वर्षों में, हर मानसून के मौसम में कागजों पर करोड़ों पौधे लगाए गए हैं, लेकिन हम जो देखते हैं वह ज्यादातर  विलायती बबूल जैसी आक्रामक प्रजातियां हैं। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री   अखिलेश यादव ने एक ही दिन में 5 करोड़ पौधे लगाकर गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड भी बनाया था।  वर्तमान मुख्यमंत्री   योगी आदित्यनाथ ने 2018-19 में 9 करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य रखा, जिसमें राज्य भर में औषधीय और धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण पौधों का वादा किया गया था। लेकिन परिणाम क्या हुआ? पौधों के जीवित रहने की दर और फंड उपयोग पर विश्वसनीय डेटा दुर्लभ है। हर साल, वृक्षारोपण का लक्ष्य बढ़ता जाता है, जबकि खाली भूमि है नहीं। पिछले साल, यह टारगेट 22 करोड़ थी । हालांकि, इन प्रयासों को अक्सर जल्दबाजी में और खराब तरीके से नियोजित किया जाता है, जिससे अधिकांश पौधों की अकाल मृत्यु हो जाती है।

अधिकारी बड़े-बड़े दावे करते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश का हरित आवरण  9 फीसदी ही है, जो राष्ट्रीय लक्ष्य 33 फीसदी से काफी कम है।

आगरा में एक हरित कार्यकर्ता ने टिप्पणी की, “ये कागज के पेड़ हैं जो केवल सरकारी फाइलों में मौजूद हैं। जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है। बड़े पैमाने पर निर्माण परियोजनाओं ने हरियाली को मिटा दिया है, जिससे पेड़ों के लिए कम जगह बची है। पर्यावरण के प्रति संवेदनशील   ताज ट्रेपजियम ज़ोन में, मथुरा में सिर्फ 1.28% से लेकर आगरा में 6.26% तक ग्रीन कवर है। मुद्दा यह नहीं है कि हर साल कितने पौधे लगाए जाते हैं, बल्कि यह है कि क्या वे कम से कम तीन साल तक जीवित रहते हैं और पनपते हैं। इसके अतिरिक्त, जैव विविधता को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल विविध प्रजातियों के रोपण पर ध्यान केंद्रित किया जाता है या नहीं।

अगर एक दिन में 10 फुट के अंतराल पर 25 करोड़ पौधे लगाए जाने हैं, तो क्या उत्तर प्रदेश में इतने बड़े अभियान के लिए जगह भी है? पिछले प्रयासों से पता चला है कि इन अभियानों को कितनी लापरवाही से निष्पादित किया जाता है, जिसमें कई पौधे खुले मैदानों या कचरे के ढेर में समाप्त होते हैं। ऐसे निरर्थक अभ्यासों पर धन क्यों बर्बाद करें?

यमुना  और आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, कई फ्लाईओवर, शहर के भीतरी रिंग रोड, और दिल्ली के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग के चौड़ीकरण ने हरी-भरी भूमि के विशाल इलाकों का उपभोग किया है, जिससे  ताज महल  राजस्थान के रेगिस्तान से धूल भरी हवाओं से संघर्ष कर रहा है।  सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक स्मारकों को वायु प्रदूषण से बचाने के लिए ग्रीन बफर बनाने का निर्देश दिया था, लेकिन   ताज ट्रेपजियम ज़ोन में बहुत कम सुधार हुआ है। पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी है कि आगरा का सिकुड़ता हरा आवरण एक टिक टिक टाइम बम है।

1996 के बाद से, सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार अधिकारियों से ग्रीन बेल्ट विकसित करके आगरा में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के प्रयासों में तेजी लाने का आग्रह किया है। पर्यावरणविद इस बात पर अफसोस जताते हैं कि हरे-भरे जंगलों की जगह कंक्रीट के जंगलों ने ले ली है।   वृन्दावन से आगरा तक,   ब्रज  क्षेत्र में कभी 12 प्रमुख वन थे। अब वे केवल नाम ही बचे हैं। हरे क्षेत्र काले, पीले और भूरे रंग के हो गए हैं, एक ग्रीन कार्यकर्ता जगन नाथ पोद्दार ने बताया।

सड़कों, एक्सप्रेसवे और फ्लाईओवरों के निरंतर निर्माण ने हरियाली, विशेष रूप से पेड़ों को बुरी तरह प्रभावित किया है। हरियाली के नुकसान ने वर्षा के पैटर्न को बाधित कर दिया है, जिससे आगरा में बारिश के दिनों की संख्या कम हो गई है।

पर्यावरण कार्यकर्ता डॉ.  Debashish Bhattacharya (देवाशीष भट्टाचार्य)  ने चेतावनी देते हुए कहा, “तथाकथित विकास के नाम पर आगरा को बर्बाद किया जा रहा है। नौकरशाही की लापरवाही और भ्रष्ट प्रथाओं के कारण हरियाली में खतरनाक गिरावट आत्मघाती साबित होगी। उन्होंने कहा कि बंदरों की बढ़ती आबादी आंशिक रूप से दोषी है। “बंदर एक बड़ी समस्या हैं। हम हर जगह पौधे लगाते हैं, लेकिन अगले दिन उन्हें उखाड़ फेंकने का पता चलता है। वृक्ष प्रेमी  (चतुर्भुज तिवारी)  ने कहा, “शहर में हरित संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए, हमें बंदरों की आबादी को भी नियंत्रित करना होगा।

लेखक के बारे में

बृज खंडेलवाल, (1972 बैच, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन,) पचास वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता और शिक्षण में लगे हैं। तीन  दशकों तक IANS के सीनियर कॉरेस्पोंडेंट रहे, तथा आगरा विश्वविद्यालय, केंद्रीय हिंदी संस्थान के पत्रकारिता विभाग  में सेवाएं दे चुके हैं। पर्यावरण, विकास, हेरिटेज संरक्षण, शहरीकरण, आदि विषयों पर देश, विदेश के तमाम अखबारों में लिखा है, और ताज महल, यमुना, पर कई  फिल्म्स में कार्य किया है। वर्तमान में रिवर कनेक्ट कैंपेन के संयोजक हैं।