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बिहार चुनाव 2025 

बिहार के चुनाव परिणाम जिस सुस्त, धुंधले नवंबर की सुबह खुलने शुरू हुए, उसी क्षण से यह साफ़ होने लगा था कि यह सिर्फ़ एक हार-जीत का खेल नहीं है; यह राज्य की मन:स्थिति का वह आइना है जिसमें राजनीति के सारे छल, सारे वादे और सारे भय बिना धूल के दिखने लगते हैं। ईवीएम के उन ठंडे अंकों में न सिर्फ़ राजनीतिक गठबंधनों का भविष्य दर्ज था, बल्कि बिहार के मतदाता के बदलते मानस की छिपी परतें भी थीं।वे परतें, जिन्हें शायद महागठबंधन समझ नहीं पाया और एनडीए ने चुपचाप पढ़ लिया।

सुबह छह बजे जब पहले रुझान आए, राजद कार्यालय में उम्मीदें हवा में तैर रही थीं। पीले रंग की इमारत के बाहर जुटी भीड़ को लग रहा था कि तेजस्वी की मेहनत रंग लाएगी। उनके कस्बों, शहरों, देहातों में फैले भाषणों की तपिश अभी भी लोगों की स्मृति में थी। अधिकार यात्रा के समय लोगों की आँखों में चमक थी। यह चमक कि शायद इस बार कोई नया अध्याय खुलेगा। लेकिन जैसे-जैसे घंटे आगे बढ़ते गए, यह चमक एक बेचैन, चुप्पी भरे डर में बदलने लगी।

यह वही डर था जो महीनों पहले चुनाव की हवा में उड़ रहा था।वह डर, जिसे एनडीए ने बहुत धीरे-धीरे बूथ तक पहुँचाया था। ‘जंगलराज’ का वह पुराना, धुंधला हो चुका मुहावरा फिर एक बार धूल झाड़कर मतदाताओं के मानस में डाल दिया गया। कई युवा तो शायद उस दौर को जानते भी नहीं, लेकिन प्रचार ने उन सबके मन में एक कहानी उकेर दी।एक कहानी कि अगर सत्ता बदली, तो शायद स्थिरता भी खो जाएगी। बिहार का मतदाता स्थिरता से डरता नहीं, पर अस्थिरता से थरथरा उठता है।

इस चुनाव में महागठबंधन का संघर्ष यहीं से शुरू होता है।

तेजस्वी यादव की छवि एक युवा, शांत, नए युग के नेता की थी। वे मंच पर संयमित रहते, विरोधियों को चुनौती भी देते लेकिन भाषा में तीखापन नहीं लाते। उनके चेहरे पर वह साफ़-सुथरी राजनीतिक ऊर्जा थी जिसमें युवाओं को भविष्य दिखता है। लेकिन राजनीति केवल चेहरों से नहीं जीती जाती। चेहरों के पीछे खड़ी मशीनरी का दम होना चाहिए।वह मशीनरी जो हर दरवाज़े तक पहुँच सके, जो हर फोन पर उपलब्ध हो, जो हर बूथ पर सुबह से शाम तक जमी रहे। और यही वह बिंदु था जहाँ महागठबंधन की आंधी, एनडीए की अदृश्य जकड़न से हार गई।

महागठबंधन के बड़े रणनीतिकार मान रहे थे कि लोकसभा में 10 सीटें जीत लेने के बाद विधानसभा में 60 के आसपास पहुँच जाना कोई मुश्किल काम नहीं होना चाहिए। यह चुनावी गणित, यह हवा, यह मीटिंगें सभी कुछ यही संकेत दे रहे थे कि माहौल विपक्ष के पक्ष में है। बिहार के गाँवों में घूमने वाले पत्रकारों को लोकसभा के बाद यह लगता था कि जनता बदलाव चाहती है। बेरोज़गारी की शिकायतें थीं, महंगाई का दर्द था, और महिलाओं का डर था कि सुरक्षा से समझौता न हो। यह एक ऐसा मिश्रण था जो किसी भी सरकार के खिलाफ़ जाता है। पर बिहार में कहानी कभी सीधी नहीं होती। यहाँ राजनीति रस्सी पर चलने जैसा है, संतुलन ज़रा बिगड़ा नहीं कि पूरा ढाँचा गिर गया।

महागठबंधन ने उस संतुलन को समझने में गलती की।

राहुल गांधी की ‘वोट चोरी यात्रा’ ने बिहार में अपनी एक अनोखी गूँज पैदा की थी। 25 जिलों से गुजरती हुई, 110 विधानसभा सीटों को छूती हुई, 1300 किलोमीटर लंबी इस यात्रा ने कांग्रेस को एक बार फिर सक्रिय दिखाया। राहुल की सभाओं में भीड़ आती थी, युवा नारे लगाते थे, महिलाओं की संख्या भी बढ़ी थी। लेकिन यात्रा का प्रभाव वह नहीं बना जो प्रभाव एक चुनावी लहर बनाता है।

लोग राहुल को सुनते तो थे, पर उन्हें अपने बीच का नहीं मानते थे। उनकी आवाज़ में जो चिंता थी, वह असली थी, पर राजनीति में असली चीज़ें भी असर तभी करती हैं जब उनमें निरंतरता हो। राहुल आते थे, बोलते थे, चले जाते थे। बिहार जैसे राज्य में, जहाँ चुनाव का आधा असर जनता के साथ ‘सतत उपस्थिति’ से बनता है, वह उपस्थिति कांग्रेस दे नहीं पाई।

राजद और कांग्रेस दोनों ही अपने-अपने दायरों में कैम्पेन कर रहे थे, पर उनके बीच वह समन्वय नहीं था जो दिखना चाहिए था। सीट बंटवारे ने एक और दरार पैदा कर दी। कई जगहों पर कांग्रेस को उसके अपेक्षा से कम सीटें मिलीं, कई जगहों पर राजद नेताओं को लगा कि कांग्रेस कमजोर सीटें लेकर बोझ बढ़ा रही है। यह तनाव ज़मीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं तक पहुंचा, जिसने साझी लड़ाई की एकता को कमज़ोर कर दिया।

एनडीए ने इसके मुकाबले एकदम सटीक संयम रखा। वहाँ सीट बंटवारे पर न कोई सार्वजनिक नाराज़गी, न पोस्टर युद्ध, न बगावत सब कुछ असामान्य रूप से शांत। यह शांत वातावरण मतदाता के लिए ‘स्थिरता’ का संकेत था। कई क्षेत्रों में पत्रकारों ने पाया कि लोग कहते हैं, “इनका घर में झगड़ा नहीं है, तो सरकार भी स्थिर होगी।” राजनीति में यह बारीक संकेत बहुत मायने रखते हैं।

महागठबंधन को इस संकेत की गंभीरता समझ नहीं आई।

तेजस्वी यादव की हर सभा में भारी भीड़ इकट्ठा हो रही थी। युवा लड़के उनकी गाड़ियों के पीछे दौड़ते थे, महिलाएँ उनके भाषण में उत्साह से सिर हिलाती थीं, बुजुर्ग कहते थे कि लड़का ठीक है। पर समस्या यह थी कि तेजस्वी का भाषण हर सभा में लगभग समान रहता था—बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, और विकास के वादे। इन विषयों पर वे बात करते तो साफ़, पर विस्तार में नहीं जाते। बिहार का मतदाता विस्तार चाहता है। वह जानना चाहता है कि नौकरी आएगी कैसे। शिक्षकों की भर्ती होगी कैसे। स्वास्थ्य तंत्र सुधरेगा कैसे।

तेजस्वी यह सब कहते-कहते आगे बढ़ जाते थे, यह जल्दबाज़ी मतदाता को खटकती थी।

उनकी अधिकार यात्रा अपनी जगह शानदार थी। यात्रा के दौरान लोग उन्हें देखकर उत्साहित होते, कुछ महिलाएँ बच्चों को गोद में लेकर उनके सामने खड़ी हो जातीं, कई बूढ़े किसान उनसे हाथ मिलाने की कोशिश करते। उस यात्रा में ‘राजनीतिक संवेदना’ थी। लेकिन यात्रा के बाद जो संगठनात्मक ढाँचा उस संवेदना को वोट में बदलना चाहिए था, वह ढाँचा उतना सशक्त नहीं था।

महागठबंधन की अंदरूनी कमजोरी यहाँ साफ़ उभरती है।

इसके विपरीत, भाजपा का बूथ स्तर पर काम बेहद संगठित था। उनके ‘पन्ना प्रमुख’ सिस्टम ने हर मोहल्ले, हर टोले तक उनकी उपस्थिति कायम रखी। चुनाव में कौन किस परिवार को प्रभावित कर रहा है, किस बूथ पर दलित वोट खिसक रहे हैं, किस इलाके में राजपूतों में असंतोष है, किस गाँव में यादवों के बीच दुविधा है। इन सबकी जानकारी भाजपा के पास थी, लगातार अपडेटेड। यह वही मशीनरी है जो चुनाव जीतने के लिए असली हथियार होती है।

महागठबंधन के पास यह सूक्ष्म जानकारी का नेटवर्क कमज़ोर था।

भारत के कई राज्यों में एक दिलचस्प बात देखी जाती है। विपक्ष जितनी भीड़ जुटा ले, जब तक उसके पास बूथ-स्तर की मशीनरी नहीं होती, वह भीड़ वोट में नहीं बदलती। बिहार इसका सबसे बड़ा उदाहरण बन गया।

इसी बीच, एक और बात जिसने महागठबंधन को भारी नुकसान पहुंचाया, वह था उसके समर्थकों का व्यवहार। तेजस्वी तो सभ्य भाषा में बोलते थे, लेकिन कई स्थानीय स्तर के कार्यकर्ता, खासकर युवा नेता, पुराने राजद वाले अंदाज़ में व्यवहार करने लगे। कहीं रोड शो में बदतमीज़ी, कहीं विरोधियों को धमकाने जैसी घटनाएँ, कहीं सोशल मीडिया पर घमंड भरी पोस्ट इन सबने एनडीए के आरोपों को जस्टिफाई कर दिया कि ‘सत्ता मिली तो जंगलराज आएगा।’

बिहार में वोटर बहुत संवेदनशील है। वह चेहरे से ज़्यादा व्यवहार देखता है। और यही व्यवहार महागठबंधन को नुकसान दे गया।

चुनावी मौसम के दौरान जिस तरह गांवों की पगडंडियों पर चर्चाएँ बदल रही थीं, वह महागठबंधन के लिए चेतावनी थी, लेकिन शायद उन्होंने उसे सुनने की कोशिश नहीं की। एक तरफ जहां तेजस्वी और राहुल की यात्राओं से एक राजनीतिक माहौल बन रहा था, वहीं दूसरी तरफ एनडीए की टीम गांवों में चुपचाप उन कमजोर बिंदुओं को पकड़ रही थी, जहाँ महागठबंधन की पकड़ ढीली थी। यह चुनावी लय किसी को दिखाई नहीं दे रही थी, लेकिन उसका असर धीरे-धीरे जड़ पकड़ रहा था।

कई गांवों में महिलाओं ने साफ कहा था कि वे कोई जोखिम नहीं लेना चाहतीं। तेजस्वी और राहुल के वादों में उन्हें उम्मीद तो दिखती थी, लेकिन सुरक्षा और स्थिरता का भाव नहीं। महिलाओं ने यह भी कहा कि हर बार चुनाव में बड़े वादे सुनकर वे थक चुकी हैं।वे अब सिर्फ यह देखना चाहती हैं कि घर सुरक्षित रहे, रात में सड़कें शांत रहें, और बच्चों के स्कूल जाने में कोई रुकावट न हो। महागठबंधन ने महिलाओं के लिए योजनाएँ ज़रूर बनाई थीं, पर योजनाएँ वही असर नहीं डाल पाईं, जो मतदाता के वास्तविक डर को कम कर पातीं।

बिहार में महिलाओं की भागीदारी किसी भी चुनाव का निर्णायक हिस्सा होती है। इस बार भी महिलाएँ भारी संख्या में वोट डालने पहुँचीं। लेकिन जिस तरह चुनावी समीकरण बने, उससे लगा कि उनका वोट बड़ी मजबूती से एनडीए के पक्ष में गया। यह बात महागठबंधन ने देर से समझी कि महिलाओं का यह भरोसा,स्थिरता और सुरक्षा पर उनके खिलाफ़ चला गया।

राहुल की वोट चोरी  यात्रा अपने आप में बड़ी थी, पर वह एक ‘लंबी लड़ाई’ की शुरुआत नहीं बन सकी। यात्रा के दौरान राहुल गांधी के मंचों पर ताली बजाने वाले हजारों लोग थे, पर चुनाव परिणामों में उस ताली की गूंज नहीं सुनाई दी। बिहार का मतदाता यह सवाल पूछ रहा था कि क्या ये यात्राएँ चुनाव के कुछ महीने पहले की राजनीतिक घटनाएँ थीं या यह किसी लंबे संघर्ष की रणनीति है?

विपक्ष का सबसे बड़ा संकट यही था। वे विश्वास जगा नहीं सके कि यह लड़ाई केवल सत्ता पाने की नहीं, बल्कि सत्ता बदलने की है।

तेजस्वी यादव की अधिकार यात्रा में जोश था। युवाओं के चेहरे पर उम्मीद थी। यह यात्रा कई बार उस पुरानी याद को जगाती थी कि बिहार एक युवा मुख्यमंत्री को स्वीकार कर सकता है, जैसे एक वक्त युवा नीतीश को किया था। लेकिन तेजस्वी के सामने समस्या यह थी कि वे अपने पूरे गठबंधन को एक सूत्र में नहीं बाँध पाए।

राजद की जातीय पकड़ मजबूत थी, पर बिहार 2025 में सिर्फ जातीय समीकरणों से नहीं चलता। EBC, OBC, SC, ST और अल्पसंख्यक वोट का एक बड़ा हिस्सा अभी भी नए पटरी पर चलते विकास और स्थिरता के मुद्दों को प्राथमिकता दे रहा है। महागठबंधन जातिवाद के आरोप से बाहर निकलने में जितना संघर्ष कर रहा था, उतना ही वह जातियों के जोड़-तोड़ में उलझता भी जा रहा था। यह एक विरोधाभास था, जिसे मतदाता ने महसूस किया।

इधर एनडीए इस सवाल का जवाब बहुत साफ़-सुथरे ढंग से दे रहा था। उनका प्रचार कह रहा था कि विकास वही कर सकता है जो सत्ता में स्थिर है। कानून-व्यवस्था वही संभाल सकता है जो राज्य को लंबे समय से चला रहा है। और बिहार के गांवों में यह संदेश बहुत गहराई से बैठ गया था।

साथ ही, पीएम मोदी का चेहरा इस चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा रहा था। बिहार में एक सामान्य भावना यह है कि राज्य चाहे किसी भी दल को चुने, लेकिन केंद्र में प्रभावशाली नेतृत्व के साथ तालमेल बनाए रखना जरूरी है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में यह भी सुना गया कि लोग कहते थे।“जो सरकार केंद्र में है, वही राज्य को पैसे देती है।” यह असलियत चाहे राजनीतिक मायने में जटिल हो, लेकिन अधिकांश वोटरों की नज़र में यह एक सीधी, सरल बात थी।

महागठबंधन का यह भी दुर्भाग्य रहा कि वह भाजपा के प्रचार की धार को काट नहीं पाया। हर इलाके में भाजपा के कार्यकर्ता यह बात फैला रहे थे कि ‘अगर महागठबंधन आया तो फिर वही पुराने दिन लौट आएंगे।’

राजद ने इसे चुनौती दी, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका बचाव करने के लिए वे उतना मजबूत संदेश नहीं दे सके।

जब जंगलराज का आरोप बार-बार दोहराया जाता है, और उसके खिलाफ़ आपका प्रत्युत्तर कमजोर पड़ जाता है, तो मतदाता की सोच पर उसका असर पड़ता है।

यही महागठबंधन की सबसे भारी चूक थी।

इसके अलावा सीट बंटवारे को लेकर जो मनमुटाव था, उसने कार्यकर्ताओं को भीतर से कमजोर कर दिया। कांग्रेस के कई परंपरागत क्षेत्रों में राजद के युवा समर्थक सक्रिय नहीं दिखे। राजद की मजबूत सीटों पर कांग्रेस के कार्यकर्ता उतने उत्साहित नहीं थे। महागठबंधन का यह ढीला जोड़ चुनावी मैदान में बिखर गया।

इस चुनाव में एक और दिलचस्प बात दिखाई दी—युवाओं की मानसिकता।

वे बदलाव चाहते थे, लेकिन अनिश्चित बदलाव नहीं।

वे नौकरी चाहते थे, पर नौकरी देने वाले तंत्र की स्थिरता भी चाहते थे।

वे वादे सुनना चाहते थे, पर वादों के पीछे की ईमानदारी भी देखना चाहते थे।

तेजस्वी ने नौकरी देने का बड़ा वादा किया था, पर युवाओं के बड़े हिस्से ने इस वादे पर भरोसा नहीं किया, क्योंकि उन्हें लगा कि राजद की सरकार में नियुक्तियाँ घोटाले में फँस सकती हैं या प्रक्रिया धीमी हो सकती है। यह डर किसी बड़े प्रचार का हिस्सा नहीं था। यह बिहार की राजनीतिक स्मृति का हिस्सा था।

इधर भाजपा ने नौकरी का वादा नहीं किया, पर स्थिरता का वादा किया। और बिहार जैसे राज्य में स्थिरता एक बड़ी राजनीतिक मुद्रा होती है।

यही कारण है कि चुनाव के आखिरी हफ्ते में ऐसे मतदाता भी एनडीए की ओर झुकते दिखे, जो पहले महागठबंधन को वोट देने के मुड में थे।

यह झुकाव इतना सूक्ष्म था कि महागठबंधन उसे पढ़ नहीं पाया।

और जब तक पढ़ पाया, तब तक देर हो चुकी थी।

चुनाव परिणामों ने यह साफ कर दिया कि बिहार की राजनीति अब एक नए युग में प्रवेश कर चुकी है—जहाँ जाति की भूमिका बनी रहने वाली है, लेकिन निर्णायक नहीं। जहां नेता की लोकप्रियता मायने रखती है, लेकिन उससे ज्यादा मायने रखता है उसका संगठन। जहां भीड़ जुटाना जरूरी है, लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है बूथ संभालना। जहां यात्रा निकालना प्रभावशाली है, लेकिन उससे भी ज्यादा प्रभावशाली है वर्ष भर जनता के बीच रहना।

महागठबंधन ने केवल चुनाव लड़ा।

एनडीए ने पूरा सिस्टम चलाया।

यही वजह है कि दोनों का नतीजा इतना अलग-अलग दिखाई दिया।

चुनाव के बाद जब सन्नाटा छाया, महागठबंधन की हार का सबसे बड़ा दर्द यह था कि वे अपनी ही बढ़त को बरकरार नहीं रख पाए। लोकसभा में मिली 10 सीटें उम्मीद की खिड़की थीं, लेकिन वे खिड़कियाँ विधानसभा में बंद हो गईं। यह विफलता सिर्फ़ राजनीति की विफलता नहीं, रणनीति की विफलता भी थी।

तेजस्वी यादव अपनी मेहनत, अपनी सभाओं, अपने संयमित भाषणों के बावजूद हार गए—क्योंकि उनके पास वह मशीन नहीं थी जो वोट को संभाल सके।

राहुल गांधी यात्रा करके भी प्रभावित नहीं कर पाए—क्योंकि कांग्रेस अपनी जमीनी पकड़ खो चुकी है।

महागठबंधन ने बिहार को कुछ नया देने की कोशिश की,लेकिन बिहार तैयार नहीं था।

यह चुनाव सिर्फ़ यह नहीं बताता कि एनडीए जीता और महागठबंधन हारा।

यह बताता है कि राजनीति केवल भावनाओं का खेल नहीं, यह संगठन, रणनीति, धैर्य और जनमानस की धारणा का खेल है।

यह बताता है कि भीड़ और वोट का रिश्ता बहुत अलग-अलग होता है।

यह बताता है कि बिहार का मतदाता अब पुरानी राजनीति नहीं चाहता।वह स्थिरता के साथ बदलाव चाहता है, पर ऐसा बदलाव जो उसके हर दिन को प्रभावित न कर दे।

महागठबंधन को अब अपने भीतर झांककर यह तय करना होगा कि आगे का रास्ता क्या होगा।

क्या वे उसी पुरानी रणनीति के साथ अगला चुनाव लड़ेंगे?

या एक नई दिशा, नई भाषा और नए संगठन के साथ अपनी लड़ाई दोबारा शुरू करेंगे?

चुनाव परिणाम एक संदेश हैं।

और बिहार ने इस बार बहुत स्पष्ट संदेश दिया है—

कि जूनून से चुनाव जीता जा सकता है,

लेकिन सिर्फ़ जूनून से सत्ता नहीं पाई जा सकती।

समय की यात्रा: पैग्स, महलों और लोगों की दास्तान — पंजाब के शाही अतीत को फिर से जीवंत करती पुस्तक

तेहलका ब्यूरो द्वारा पुस्तक समीक्षा

Of Pegs, Palaces, and the People छोटे-छोटे लेकिन प्रभावशाली किस्सों का मनमोहक संग्रह है, जो पाठकों को पंजाब के समृद्ध और अक्सर भूले हुए इतिहास के बीच ले जाता है। हर कहानी, जो वास्तविक घटनाओं पर आधारित है, उन बादशाहों, योद्धाओं, रानियों, विद्रोहियों और आम लोगों को फिर से जीवंत करती है, जिन्होंने पंजाब के अतीत पर अमिट छाप छोड़ी। हरशित नारंग एक प्रथम बार लेखक और अनुभवी नौकरशाह इन भूली-बिसरी शख्सियतों को जिस जीवंतता और गहराई से प्रस्तुत करते हैं, वह विद्वता और संवेदनशील कहानी कहने की कला का बेहतरीन मेल है।

11 अगस्त 2025 को नई दिल्ली में जारी हुई यह पुस्तक भारतीय नॉन-फिक्शन की दुनिया में नारंग की एंट्री का ऐलान करती है। यह सिर्फ एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि उस पंजाब को समर्पित एक भावनात्मक श्रद्धांजलि है—जो शाही किस्सों, बगावत, परंपराओं और गर्व से भरा था, लेकिन जिसकी कहानियों से नई पीढ़ी का रिश्ता धीरे-धीरे टूटता जा रहा है।

नारंग की कहानी कहने की क्षमता पूरे पुस्तक में चमकती दिखती है। शोधकर्ता की बारीकी और कथाकार की आत्मा के साथ, वह पंजाब के अतीत के उन अध्यायों को सामने लाते हैं जो अक्सर पाठ्यपुस्तकों में जगह नहीं बना पाते। दुले भट्टी—जिसे पंजाब का रॉबिन हुड कहा जाता है—से लेकर कपूरथला की स्पैनिश महारानी प्रेम कौर तक, हर अध्याय पंजाब के शाही वैभव और क्रांतिकारी तेवरों की एक सजीव तस्वीर पेश करता है। “पटियाला पैग” की अनोखी विरासत भी इस पुस्तक को धरातल से जोड़ती है—जहाँ इतिहास सिर्फ राजसी नहीं, बल्कि रोजमर्रा की संस्कृति में भी सांस लेता है।

हर अध्याय एक अलग यात्रा है—कभी ढहते महलों की गूंज, कभी पीढ़ियों से चली आ रही लोककथाओं की सरगोशियाँ, तो कभी उन तकनीकी नवाचारों की झलक, जिन्हें इतिहास में शायद ही कहीं दर्ज किया गया, जैसे पटियाला स्टेट मोनोरेल। नारंग सिर्फ घटनाओं का वर्णन नहीं करते—वह उन्हें पुनर्जीवित करते हैं, ऐसा महसूस कराते हैं मानो पाठक स्वयं उस दौर में मौजूद हों।जैसा कि नारंग कहते हैं, “यह वही पंजाब है जिसे मैंने बचपन में सुना—परतों से भरी विरासतें, जिद्दी रानियाँ, अजीबोगरीब राजा और पीढ़ियों से फुसफुसाई जाती कहानियाँ। ये कहानियाँ आगे बढ़ाए जाने लायक हैं।”

विषय के प्रति लेखक का यह भावनात्मक जुड़ाव पुस्तक में सर्वत्र महसूस होता है और इसे एक सांस्कृतिक दायित्व जैसा महत्व देता है—पंजाब की भूलती हुई विरासत को सहेजने का प्रयास। आज जब इतिहास को अक्सर एकरूप कथाओं में ढाल दिया जाता है, Of Pegs, Palaces, and the People एक महत्वपूर्ण पुनःअभिग्रहण बनकर सामने आती है। नारंग याद दिलाते हैं कि इतिहास केवल तारीखों और तथ्यों का जोड़ नहीं, बल्कि एक जीवित, सांस लेती सत्ता है—भावनाओं, जटिलताओं और रंगों से भरी। पुस्तक पंजाब के अतीत की परतें खोलती है—कभी प्रसिद्ध तो कभी गुमनाम किरदारों के माध्यम से—दुले भट्टी के विद्रोह से लेकर महारानी प्रेम कौर की रहस्यमयी ज़िंदगी तक।

पुस्तक की संरचना—हर अध्याय का स्वतंत्र होना—इसे विविधता से भर देता है। चाहे लाहौर के खोये खजाने हों या पटियाला की मोनोरेल—पाठक एक समय-यात्रा में प्रवेश करता है। नारंग सिर्फ स्थानों और व्यक्तियों का परिचय नहीं देते; वह पाठक को उन्हें महसूस करने के लिए आमंत्रित करते हैं। शीश महल का वर्णन पढ़ते हुए लगता है मानो उसके आइने आज भी अपनी चमक बिखेर रहे हों।

लेखन शैली जीवंत, सटीक और पंजाब की मिट्टी में रची-बसी है। भाषा अकादमिक बोझिलता से दूर है—यह सांस्कृतिक स्पंदन और भावनात्मक बनावट से भरी है। यहाँ इतिहास स्थिर नहीं—पन्नों के बीच फुसफुसाता, धड़कता और कभी-कभी रहस्यों की तरह झिलमिलाता है।

हालाँकि कुछ स्थानों पर अध्यायों के बीच बदलाव अचानक महसूस होता है। यदि एक संक्षिप्त टाइमलाइन या अध्याय-पूर्व परिचय होता तो यह पाठकीय अनुभव को और सहज बना सकता था। साथ ही, नए पाठकों के लिए क्षेत्रीय शब्दों का एक ग्लॉसरी भी उपयोगी होता।

अंत में, Of Pegs, Palaces, and the People पंजाब के शाही और लोक इतिहास के अनमोल पहलुओं को उजागर करने वाली एक महत्वपूर्ण, रोचक और पठनीय कृति है। हरशित नारंग की यह पहली पुस्तक उनकी जड़ों के प्रति व्यक्तिगत समर्पण भी है और व्यापक पाठकों के लिए एक आह्वान भी—कि उस इतिहास को संजोएं, जिसने इस शानदार धरती को आकार दिया।

पुस्तक के बारे में

पेपरबैक, 256 पृष्ठ / मूल्य: ₹399

प्रकाशक: सप्तऋषि पब्लिकेशन्स

टेंडर प्रक्रिया के कारण डीआई पाइपों की खरीद में हरियाणा को करोड़ों का नुकसान

हरियाणा लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग द्वारा दो वर्ष की दर अनुबंध (रेट कॉन्ट्रैक्ट) के अंतर्गत डीआई पाइपों की खरीद के लिए अपनाई गई टेंडर प्रक्रिया राज्य के लिए भारी वित्तीय नुकसान का कारण बन रही है। यह तरीका राज्य की वित्तीय स्थिति के लिए हानिकारक है और हरियाणा सरकार के हितों के विपरीत प्रतीत होता है।

हालांकि अनुबंध में मूल्य परिवर्तन (Price Variation) की एक शर्त शामिल है, लेकिन यह बाजार में उतार-चढ़ाव से पर्याप्त सुरक्षा प्रदान नहीं करती। इसका स्पष्ट उदाहरण रेट कॉन्ट्रैक्ट संख्या 99/HR/RC/E-2/2023-24/4256-59 दिनांक 17.07.2024 से देखा जा सकता है, जो 17.07.2025 तक मान्य था। इस अनुबंध के तहत फरवरी 2025 में लगभग 800 करोड़ रुपये मूल्य के डीआई पाइप ऊंचे दामों पर खरीदे गए।

उदाहरण के तौर पर, 100mm (K-7) पाइप की दर, जो पहले रेट कॉन्ट्रैक्ट के तहत PVC फार्मूले के अनुसार ₹1260 से घटकर ₹1157 प्रति मीटर हो गई थी, वह नई टेंडर प्रक्रिया (28.03.2025 को खुली) में ₹1085 प्रति मीटर तक गिर गई। यानी दरों में करीब 15% तक की गिरावट आई थी, फिर भी विभाग ने पुराने अनुबंध के तहत ऊंची कीमतों पर पाइप खरीदे, जबकि वह अनुबंध 24.07.2025 तक वैध था।

लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग के मुख्य अभियंता (Engineer-in-Chief) दविंदर दहिया ने इस पर कोई टिप्पणी करने या आधिकारिक पक्ष साझा करने से इनकार कर दिया। प्राप्त विवरणों के अनुसार, मूल्य परिवर्तन की शर्त के बावजूद विभाग को लगभग 100 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। किसी कारणवश यह टेंडर रद्द कर दिया गया और ₹2800 करोड़ के डीआई पाइपों की खरीद के लिए एक नया दो वर्षीय दर अनुबंध 29.08.2025 को खोला गया — ठीक पुराने अनुबंध की समाप्ति के बाद।

नए और पुराने अनुबंध की दरों में लगभग 30% का अंतर था। उदाहरण के लिए, पुराने अनुबंध में 100mm (K-7) पाइप की दर PVC फार्मूले के बाद ₹1157 प्रति मीटर थी, जबकि नई टेंडर में यही दर ₹910 प्रति मीटर रह गई (लगभग 28% का अंतर)। यदि पिछला अनुबंध दो वर्ष के लिए वैध रहता, जैसा कि अब प्रस्तावित किया जा रहा है, तो सरकार अगले एक वर्ष तक लगभग 30% अधिक दरों पर खरीद जारी रखती, जिससे लगभग ₹1000 करोड़ रुपये का नुकसान होता।

डीआई पाइपों की कीमतों में गिरावट का मुख्य कारण मांग में कमी (विशेषकर जल जीवन मिशन परियोजना के अभाव में) और नए व पुराने निर्माताओं की उत्पादन क्षमता में वृद्धि है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब बाजार में कीमतें घट रही हैं, तो दो वर्षों के लिए दरें तय करना कहां तक उचित है? हरियाणा सरकार ने राज्य के बहुमूल्य धन की अनदेखी करते हुए हर साल लगभग ₹400 करोड़ के नुकसान की दिशा में कदम बढ़ा दिया है।

इन तथ्यों को देखते हुए यह स्पष्ट है कि दो वर्षीय दर अनुबंध राज्य के हित में नहीं है, क्योंकि इससे आर्थिक नुकसान होता है और सरकार प्रतिस्पर्धात्मक दरों तथा नई उत्पादन क्षमताओं का लाभ उठाने से वंचित रह जाती है। यह नीति कुछ चुनिंदा निर्माताओं के लिए एकाधिकार (monopoly) का वातावरण भी तैयार करती है। आमतौर पर यह भी देखा गया है कि जब किसी निर्माता को लंबे समय के लिए आपूर्ति करनी होती है, तो वह भविष्य की अनिश्चितताओं को ध्यान में रखकर कीमतें बढ़ा देता है।

लोक स्वास्थ्य विभाग के गोदामों में वर्तमान में लगभग ₹700 करोड़ के डीआई पाइपों का स्टॉक है और ठेकेदारों व आपूर्तिकर्ताओं के प्रति सैकड़ों करोड़ की देनदारी है। विशेषज्ञों का मानना है कि विभाग को अपने दीर्घकालिक दर अनुबंधों की नीति पर पुनर्विचार कर, विशिष्ट मात्रा (specific quantity) वाले टेंडरों की ओर बढ़ना चाहिए ताकि अधिक प्रतिस्पर्धी दरें प्राप्त हो सकें और राज्य के वित्तीय हितों की रक्षा की जा सके।

लोक हित में अधिवक्ता एवं विधिक सलाहकार गौरव दीप गोयल ने इस विषय में हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी, मुख्य प्रधान सचिव राजेश खुल्लर, मंत्री एवं उच्चस्तरीय क्रय समिति के सदस्य विपुल गोयल और अन्य अधिकारियों को पत्र लिखा है।

गुरुग्राम में कन्वेंशन सेंटर बनाने के लिए केंद्रीय आवासन एवं शहरी मंत्री मनोहर लाल हरियाणा के मुख्यमंत्री से करेंगे विचार विमर्श

केंद्रीय मंत्री शुक्रवार को गुरुग्राम में आयोजित तीन दिवसीय 18वें अर्बन मोबिलिटी इंडिया सम्मेलन एवं प्रदर्शनी का  शुभारंभ करने उपरान्त सम्बोधित कर रहे थे । उन्होंने  परिसर में लगी शहरी विकास और गतिशीलता को दर्शाती विकासात्मक प्रदर्शनी का उद्घाटन करने उपरांत अवलोकन भी किया। 18वें अर्बन मोबिलिटी इंडिया सम्मेलन एवं प्रदर्शनी का उद्देश्य शहरी क्षेत्रों में इजी मोड ऑफ ट्रेवलिंग थीम के साथ सुगमता बनाए रखने के लिए बेहतर यातायात व्यवस्था व सेवाएं प्रदान करना है।

शहरी विकास पर घोषणाएं

मनोहर लाल ने अपने मंत्रालय के माध्यम से आमजन की सुविधा व बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने के उद्देश्य पर केंद्रित तीन बड़ी घोषणाएं करते हुए कहा कि इनके शुरू होने से विकास की नई शुरुआत देखने को मिलेगी। उन्होंने घोषणा की कि दिल्ली मेट्रो इंटरनेशनल लिमिटेड-डीएमआईएल की स्थापना की जाएगी जिसके तहत भारत के अलावा अन्य देशों के लिए यह एजेंसी मेट्रो के विस्तारीकरण की दिशा में काम करेंगी। वहीं मास रेपिड ट्रांसिट सिस्टम विकसित किया जाएगा जिसके लिए डीएमआरसी सहयोगी रहेंगी। इस सिस्टम से मेट्रो का बेहतर ढंग से एक दूसरे से जुड़ाव होगा और सुरक्षा मानकों व साइबर सिक्योरिटी सिस्टम के साथ आमजन को सुरक्षित यातायात सुविधाएं व सेवाएं कार्य करेंगी। मेट्रो सेवा में गुणवत्तापरक सुधार लाने व नए प्रयोग करने के लिए दिल्ली मेट्रो रेल अकादमी का गठन शहरी मंत्रालय द्वारा किया जाएगा। इसके गठन से तीव्र गति से केपेसिटी बिल्डिंग का काम होगा और सेंटर ऑफ एक्सिलेंस के साथ यह केंद्र मेट्रो सेवा में नवाचार पद्धति के साथ नई दिशा प्रदान करेगा। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय राजधानी में अनेक बड़े कन्वेंशन सेंटर हैं किंतु बड़े शहरों में शामिल गुरुग्राम में भी कन्वेंशन सेंटर की जरूरत है, ऐसे में वे हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी से विचार विमर्श करते हुए यहां भी अत्याधुनिक सुविधाओं से परिपूर्ण कन्वेंशन सेंटर बनाने की दिशा में कार्य करेंगे।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि आज देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के कुशल नेतृत्व में भारत आत्मनिर्भरता के साथ आगे बढ़ रहा है। ट्रांसपोर्ट नेटवर्किंग को जोड़ते हुए देश मेक इन इंडिया के सिद्धांत के साथ 2047 को विकसित राष्ट्र के रूप में पहचान दिलाने में अग्रणी रहेगा। उन्होंने बताया कि शहरी क्षेत्र में आवश्यकता अनुरूप सकारात्मक परिवर्तन किया जा रहा है। शहरी क्षेत्र में यातायात पर सरकार का पूरा फोकस है। उन्होंने बताया कि भारत आज मेट्रो सेवा प्रदान करने में दुनिया में तीसरे स्थान पर हैं और आने वाले करीब 3 साल में हम अमेरिका को पीछे छोडक़र अग्रणी देशों में शामिल होंगे। नई तकनीक के साथ जनसुविधाएं प्रदान करने के लिए केंद्र सरकार कार्य कर रही है और इस प्रकार के सम्मेलन के माध्यम से विशेषाज्ञों के सहयोग से नवाचार पद्धाति पर हम काम करेंगे।

बिहार चुनाव: कई उम्मीदवारों पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और बिहार इलेक्शन वॉच ने बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के दूसरे चरण में चुनाव लड़ रहे 1,302 उम्मीदवारों में से 1,297 उम्मीदवारों के स्वयं-शपथपत्रों का विश्लेषण किया है। रिपोर्ट के अनुसार, 1,297 उम्मीदवारों में से 415 (32%) उम्मीदवारों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं।
ADR ने यह अवलोकन किया कि ऐसा प्रतीत होता है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का राजनीतिक दलों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है, क्योंकि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 (दूसरा चरण) में उन्होंने फिर से लगभग 32% आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों को टिकट दिया है। बिहार चुनाव के दूसरे चरण में सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने 19% से 100% तक ऐसे उम्मीदवारों को टिकट दिया है जिन्होंने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने 13 फरवरी 2020 को अपने निर्देशों में राजनीतिक दलों को स्पष्ट रूप से आदेश दिया था कि वे ऐसे उम्मीदवारों को चुनने के कारण बताएं, और यह भी स्पष्ट करें कि आपराधिक पृष्ठभूमि न रखने वाले अन्य व्यक्तियों को उम्मीदवार क्यों नहीं बनाया गया। इन अनिवार्य दिशानिर्देशों के अनुसार, चयन के कारण उम्मीदवार की योग्यता, उपलब्धियों और मेरिट से संबंधित होने चाहिए।
हाल ही में फरवरी 2025 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनावों में यह देखा गया कि राजनीतिक दलों ने “व्यक्ति की लोकप्रियता, सामाजिक कार्य करना, या मामले राजनीतिक रूप से प्रेरित हैं” जैसे निराधार कारण बताए। ऐसे कारणों को आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को मैदान में उतारने के लिए ठोस और वैध कारण नहीं माना जा सकता। यह आंकड़े स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि राजनीतिक दल चुनाव प्रणाली में सुधार करने में कोई रुचि नहीं रखते, और हमारी लोकतंत्र प्रणाली कानून तोड़ने वालों के हाथों में ही पीड़ित होती रहेगी, जो बाद में कानून निर्माता बन जाते हैं।
कुल 341 (26%) उम्मीदवारों ने अपने खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले घोषित किए हैं, जबकि 19 उम्मीदवारों पर हत्या (IPC धारा 302, 303) और (BNS धारा 103(1)) के मामले दर्ज हैं। 79 उम्मीदवारों पर हत्या के प्रयास (IPC धारा 307) और (BNS धारा 109) के मामले दर्ज हैं।
महिलाओं के खिलाफ अपराध से संबंधित मामलों की बात करें तो 52 उम्मीदवारों ने ऐसे मामलों की घोषणा की है। इनमें से 3 उम्मीदवारों पर बलात्कार (IPC धारा 375 और 376) के मामले दर्ज हैं।
दलवार विश्लेषण से पता चलता है कि सभी प्रमुख दलों ने संदिग्ध पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को टिकट दिया है।
• जन सुराज पार्टी के 117 उम्मीदवारों में से 58 (50%) ने आपराधिक मामले घोषित किए हैं।
• बसपा (BSP) के 91 उम्मीदवारों में से 17 (19%)।
• राजद (RJD) के 70 उम्मीदवारों में से 38 (54%)।
• भाजपा (BJP) के 53 उम्मीदवारों में से 30 (57%)।
• जदयू (JD(U)) के 44 उम्मीदवारों में से 14 (32%)।
• आप (AAP) के 39 उम्मीदवारों में से 12 (31%)।
• कांग्रेस (INC) के 37 उम्मीदवारों में से 25 (68%)।
• लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) के 15 उम्मीदवारों में से 9 (60%)।
• CPI(ML)(L) के 6 उम्मीदवारों में से 5 (83%)।
• CPI के 4 उम्मीदवारों में से 2 (50%)।
• CPI(M) के एकमात्र उम्मीदवार (100%) ने आपराधिक मामले घोषित किए हैं।
गंभीर आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों के संदर्भ में:
• जन सुराज पार्टी के 117 में से 51 (44%) उम्मीदवार,
• बसपा के 91 में से 12 (13%),
• राजद के 70 में से 27 (39%),
• भाजपा के 53 में से 22 (42%),
• जदयू के 44 में से 11 (25%),
• आप के 39 में से 12 (31%),
• कांग्रेस के 37 में से 20 (54%),
• लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) के 15 में से 9 (60%),
• CPI(ML)(L) के 6 में से 4 (67%),
• CPI के 4 में से 2 (50%) और
• CPI(M) के 1 में से 1 (100%) उम्मीदवारों ने गंभीर आपराधिक मामले घोषित किए हैं।
लगभग 122 विधानसभा क्षेत्रों में से 73 (60%) क्षेत्र ऐसे हैं जिन्हें “रेड अलर्ट निर्वाचन क्षेत्र” कहा गया है। “रेड अलर्ट निर्वाचन क्षेत्र” वे होते हैं जहाँ तीन या उससे अधिक उम्मीदवारों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं।

जीबी रियल्टी ने न्यू चंडीगढ़ में लॉन्च किया ‘ओपस वन’ — एक ‘आइकॉनिक सर्टिफाइड’ अल्ट्रा-लग्ज़री रेज़िडेंशियल प्रोजेक्ट

क्षेत्र के तेजी से उभरते रियल एस्टेट समूह जीबी रियल्टी के अत्याधुनिक लग्ज़री प्रोजेक्ट ‘ओपस वन’ के अनावरण से पंजाब की आर्किटेक्चरल और रियल एस्टेट दुनिया में एक नया अध्याय जुड़ गया है। इस प्रोजेक्ट को कंपनी ने अपनी ‘मैग्नम ओपस’ यानी सबसे खास रचना बताया है।

यह न्यू चंडीगढ़ का पहला रेरा एप्रूव्ड ‘आइकॉनिक सर्टिफाइड’ रेज़िडेंशियल प्रोजेक्ट है, जिसे यहां आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में आधिकारिक रूप से लॉन्च किया गया। यह उपलब्धि इसके आधुनिक डिज़ाइन, पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी और टिकाऊ निर्माण की सोच को दर्शाती है। न्यू चंडीगढ़ के इकोसिटी-II में बनने जा रहा ‘ओपस वन’ एक ऐसा लैंडमार्क प्रोजेक्ट है जो अंतरराष्ट्रीय डिज़ाइन विशेषज्ञता, टिकाऊ आर्किटेक्चर और समय से परे लग्जरी का सुंदर संगम होगा।

जीबी रियल्टी के फाउंडर एवं चेयरमैन गुरिंदर भट्टी ने कहा कि, “हालांकि मेरे पास दुबई जैसे वैश्विक केंद्रों में जीबी रियल्टी का पहला प्रोजेक्ट शुरू करने का अवसर था, पर मैंने इसे पंजाब में ही आरंभ करने का निर्णय लिया ताकि यह ब्रांड मेरी मातृभूमि में जड़ें जमाए।” प्रेस कांफ्रेंस में गुरिंदर भट्टी के साथ राजेश मित्तल, एमडी सूर्यकॉन और रोहित सेठी, निदेशक (संचालन), जीबी रियल्टी भी मौजूद रहे । भट्टी ने बताया कि ‘ओपस वन’ को क्षेत्र की सबसे ऊंची रिहायशी इमारत के रूप में तैयार किया जा रहा है, जिसमें 32 मंज़िलों तक ऊंचे 11 टावर होंगे और लगभग 688 अल्ट्रा-लग्जरी अपार्टमेंट्स शामिल होंगे।

खास बात यह है कि इस प्रोजेक्ट को पंजाब सरकार से मान्यता मिल चुकी है और इसे इंडियन ग्रीन बिल्डिंग काउंसिल (आईजीबीसी) की ओर से सर्टिफिकेशन भी मिला है। इतना ही नहीं, ‘ओपस वन’ ने सतत और पर्यावरण-अनुकूल लग्जरी के क्षेत्र में नया कीर्तिमान बनाते हुए प्लैटिनम रेटिंग भी हासिल की है।

प्रिंसिपल आर्किटेक्ट त्रिपत गिरधर, एरेट डिज़ाइन स्टूडियो से हैं, जिन्होंने इस प्रोजेक्ट को आधुनिक मूर्तिकला के रूप में परिकल्पित किया है। प्रत्येक टावर ‘डुअल कोर लेआउट’ पर आधारित है, जिसमें प्रति मंज़िल केवल दो अपार्टमेंट्स होंगे — जो निवासियों को पूर्ण गोपनीयता (प्राइवेसी), विशिष्टता और शिवालिक हिल्स के शानदार नज़ारे प्रदान करेंगे। यहां 3 बीएचके (3000 वर्ग फुट), 4बीएचके (4500 वर्ग फुट) और 5 बीएचके (5500 वर्ग फुट) के रेजिडेंसज़ होंगे। प्रत्येक टावर में पाँच लिफ्टें होंगी, जिनमें से एक प्राइवेट लिफ्ट सीधे अपार्टमेंट के फॉयर में खुलेगी। जो इस परियोजना के अनूठे और व्यक्तिगत लग्जरी अनुभव को और भी उभारता है।

हिर्श बेडनर एसोसिएट्स (एचबीए), सिंगापुर, जो दुनिया के कुछ सबसे प्रसिद्ध हॉस्पिटैलिटी स्थलों जैसे द रिट्ज-कार्लटन आदि के डिजाइन के लिए जानी जाती है, अब अपनी कला का अनुभव ‘ओपस वन’ के इंटीरियर डिजाइन में लेकर आएगी। इसी तरह, ऑस्ट्रेलियन लाइटिंग डिज़ाइन पार्टनरशिप (एएलडीपी), जिसने सिडनी ओपेरा हाउस जैसे प्रतिष्ठित स्थलों की रोशनी की डिजाइन तैयार की है, वह भी अपनी विशेषज्ञता इस प्रोजेक्ट में दे रही है।


‘ऑपरेशन ट्रैकडाउन’ शुरू; “सबसे बदनाम” अपराधियों पर सख्त कार्रवाई!


हरियाणा पुलिस ने 5–20 नवंबर, 2025 के बीच राज्यभर में “ऑपरेशन ट्रैकडाउन” शुरू किया है। मकसद साफ है—गोलीबारी से जुड़े भगौड़ों की पहचान करके उन्हें जल्दी से जेल भेजना और आगे अपराध रोकना। आदेश में जिम्मेदारी, समय-सीमा और काम का तरीका साफ बताया गया है। इस ऑपरेशन का समन्वय IG क्राइम राकेश आर्य करेंगे। कोई भी नागरिक उनसे सीधे मोबाइल नंबर +91 90342 90495 पर सूचना दे सकता है। पहचान गोपनीय रखी जाएगी।

आदेश के मुताबिक जिनकी पहचान नहीं हुई है, उनकी पहचान करें। जिनकी पहचान हो गई है लेकिन वे फरार हैं, उन्हें पाताल से भी ढूंढ निकालें और गिरफ्तार करें। जो आरोपी जमानत पर बाहर हैं, उनकी हिस्ट्री शीट खोलें। अगर वे फिर से अपराध में सक्रिय हैं, तो उनकी जमानत रद्द कराने की कार्रवाई करें। जहां अपराध सुनियोजित तरीके से हो रहा है, वहां संगठित अपराध की सख्त धाराएं लगाएं। अपराध से कमाई गई संपत्ति को चिन्हित कर जब्त करें। जो लोग ऐसे अपराधियों को प्रश्रय, संरक्षण या फंडिंग दे रहे हैं, उन पर भी सख्त कानूनी कार्रवाई करें।

जवाबदेही साफ है। SHO और DSP अपने-अपने क्षेत्र में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सीधे जिम्मेदार होंगे। हर थाना/उपमंडल अपनी “सबसे बदनाम 5” अपराधियों की सूची बनाएगा और उन्हें जेल भेजेगा—गिरफ्तारी, सरेंडर या जमानत रद्दीकरण के जरिए। इसी तरह हर जिला और जोन “सबसे बदनाम 10” की सूची बनाएंगे। इसके नतीजों के लिए SP/DCP/CP जिम्मेदार होंगे। राज्य स्तर पर STF “सबसे बदनाम 20” की सूची तैयार करेगा और उनकी धर-पकड़ के लिए व्यापक ऑपरेशन चलाएगा।

आदेश में यह भी कहा गया है कि इन सूचीबद्ध अपराधियों को आगे अपराध करने से रोकना और पुराने अपराधों के लिए कानून के सामने जवाबदेह ठहराना जरूरी है। अगर ये आगे भी अपराध करते हैं, तो संबंधित अधिकारी जिम्मेदार माने जाएंगे। मतलब, केवल गिरफ़्तारी नहीं, बल्कि रोकथाम और मजबूत कानूनी कार्रवाई—दोनों पर बराबर जोर है।

पड़ोसी राज्यों से मिलकर काम होगा। पंजाब, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, और केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली व चंडीगढ़ के साथ समन्वय कर सीमावर्ती इलाकों में चेकिंग, संयुक्त कार्रवाई और कस्टडी ट्रांसफर तेज किए जाएंगे। लक्ष्य यह है कि फरार अपराधी राज्य बदलकर बच न निकलें।

इस ऑपरेशन की भाषा और तरीका सरल और सीधा है। फोकस दिखावे पर नहीं, बल्कि काम के नतीजों पर है—कितने गिरफ्तार हुए, किन मामलों में जमानत रद्द हुई, कहां संगठित अपराध की धाराएं लगीं, कितनी संपत्ति जब्त हुई, और क्या नई वारदातें रोकी गईं। नागरिकों के लिए IG क्राइम का नंबर साझा करना इस बात का संकेत है कि पुलिस सूचना को महत्व दे रही है और पहचान की गोपनीयता सुनिश्चित करेगी।

“सबसे बदनाम 5/10/20” की सूची सिर्फ कागज नहीं, बल्कि प्राथमिकता तय करने का टूल है। इससे संसाधन और समय वहीं लगेंगे जहां जोखिम सबसे ज्यादा है। थानों को पहचान, तलाश और गिरफ्तारी—तीनों मोर्चों पर साथ काम करना होगा। पहचान में CCTV फुटेज, कॉल डिटेल रिकॉर्ड, स्थानीय सूचनाएं और ट्रांजिट पॉइंट की निगरानी मदद करेगी। जमानत रद्द कराने के लिए ताजा गतिविधियों के रिकॉर्ड और साक्ष्य के साथ अदालत जाना होगा। जहां नेटवर्क और फंडिंग दिखे, वहां संगठित अपराध की धाराएं लगेंगी और संपत्ति जब्ती होगी, ताकि दोबारा अपराध करने की ताकत टूटे।



यह भी साफ संकेत है कि हर स्तर पर नाम लेकर जिम्मेदारी तय की जा रही है—किस SHO/DSP के इलाके की “सबसे बदनाम 5” सूची में कौन-कौन हैं, जिला/जोन की “सबसे बदनाम 10” का स्टेटस क्या है, STF की “सबसे बदनाम 20” पर कितनी प्रगति हुई। 16 दिनों में गिरफ्तारी, अदालत में दायर याचिकाएं, वारंट की तामील और सीमाओं पर समन्वित कार्रवाई जैसे सूचकांकों से सफलता मापी जाएगी।

ऑपरेशन के अंत में इस्तेमाल किए गए हैशटैग—#HotOnYourTrail, #NoPlaceToHide, #OperationTrackdown, #कानून_करेगा_अपना_काम—भगोड़ों के लिए चेतावनी भी हैं और लोगों के लिए भरोसा भी कि कानून अपना काम करेगा, समय पर और साक्ष्यों के साथ।

फिलहाल दिशा साफ है: “सबसे बदनाम” अपराधियों की पहचान और गिरफ्तारी, उनके नेटवर्क पर कानूनी नकेल, पड़ोसी राज्यों के साथ मिलकर तेज कार्रवाई, और नागरिकों से मिली सूचना का सुरक्षित इस्तेमाल।

फतेहाबाद के ‘जैक’ और ‘रैम्बो’: स्वान टीम के दो सितारे जिन्होंने बदल दिया ऑपरेशन का रुख

चंडीगढ़, 04 नवंबर।
आमतौर पर पुलिस की वीरता की कहानियों में इंसानी चेहरों का जिक्र होता है, मगर फतेहाबाद पुलिस की एक हालिया और ऐतिहासिक कामयाबी के पीछे दो ऐसे वीर योद्धा हैं, जो चार पैरों पर चलते हैं लेकिन जिनकी नाक ने बड़े-बड़े अपराधियों की नींदें उड़ा दीं। ये हैं – स्वान टीम के प्रशिक्षित स्वान (डॉग) ‘जैक‘ और ‘रैम्बो‘। इन दोनों ने अपनी सूंघने की अद्भुत क्षमता और पुलिस बल के साथ तालमेल के ज़रिए ‘ऑपरेशन जीवन ज्योति’ को एक नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है।
ये केवल डॉग नही बल्कि हमारी टीम के हैं अग्रिम योद्धा-डीजीपी हरियाणा
पुलिस महानिदेशक ओ पी सिंह ने इस ऑपरेशन की सराहना करते हुए कहा कि जैक और रैम्बो जैसे स्वान अब केवल पुलिस के सदस्य नहीं बल्कि असली हीरो हैं। उन्होंने कहा कि ये स्वान हमारी आंख और नाक बनकर काम करते हैं और आपराधिक नेटवर्क को जड़ से उखाड़ फेंकने में यह स्वान-शक्ति बेहद कारगर साबित हो रही है। उन्होंने कहा कि हरियाणा पुलिस अपराधियों के खिलाफ ज़ीरो टॉलरेंस की नीति पर काम कर रही है, और आगे भी ऐसे अभियान लगातार चलाए जाएंगे।
गुप्त सूचना और गोरखपुर की धरपकड़
सोमवार की सुबह, जब भूना थाना प्रभारी उपनिरीक्षक ओम प्रकाश के नेतृत्व में पुलिस टीम गुप्त सूचना के आधार पर गोरखपुर गांव में एक संदिग्ध घर की तलाशी के लिए निकली, तो साथ थे जैक और रैम्बो भी। मौके पर पहुंचते ही जैक ने अपनी सधी चाल और तीव्र सूंघने की शक्ति से संदिग्धता जताई और घर के एक हिस्से पर ध्यान केंद्रित किया। रैम्बो भी उसी दिशा में इशारा करता हुआ आगे बढ़ा, जिससे पुलिस टीम का शक और गहरा हुआ।
गुप्त कक्ष का खुलासा और बरामदगी
दोनों स्वानों की सतर्कता ने कमांडो दस्ता को तुरंत सक्रिय किया और घर के भीतर बने एक गुप्त कक्ष का पता चल गया। इस कक्ष में छिपाए गए हथियारों और कारतूसों ने इस पूरे नेटवर्क का सच सामने ला दिया। चार अवैध हथियार, 14 जिंदा कारतूस और शराब बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाला बीस लीटर लाहन, सब कुछ इसी छुपे हुए कमरे से बरामद हुआ।
अपराधियों में हड़कंप, जनता में भरोसा
‘ऑपरेशन जीवन ज्योति’ की इस सफलता ने न केवल अपराधियों के नेटवर्क पर बड़ा प्रहार किया है, बल्कि आम जनता में पुलिस व्यवस्था के प्रति विश्वास को और प्रगाढ़ किया है। जैक और रैम्बो जैसे प्रशिक्षित स्वान यह साबित कर रहे हैं कि जब तकनीक, मानव कौशल और पशु शक्ति एकसाथ हो जाएं, तो अपराध और नशे के खिलाफ लड़ाई में जीत निश्चित है।
स्वानः पुलिस परिवार के समर्पित प्रहरी
हरियाणा पुलिस की स्वान यूनिट में काम करने वाले ये डॉग सिर्फ़ एक ऑपरेशन का हिस्सा नहीं, बल्कि पुलिस परिवार के ऐसे सदस्य हैं, जिनकी प्रतिबद्धता और पराक्रम हर समय जनता की सुरक्षा के लिए समर्पित रहता है। जैक और रैम्बो की यह कहानी केवल एक अभियान की नहीं, बल्कि इस बात का सबूत है कि असली प्रहरी कभी थकते नहीं-भले ही वे इंसान हों या स्वान।


क्या रील लाइफ़, हमारी रियल ज़िंदगी को बरबाद कर रही है?

खंडेलवाल द्वारा
28 अक्तूबर 2025

पहले खाली वक्त में अंताक्षरी खेलते थे, अब रील्स और यूट्यूब शॉट्स से फुर्सत नहीं मिल रही। फालतू बैठी गृहणियां मोबाइल पर इस दूषित, खतरनाक कंटेंट की सबसे ज्यादा कंज्यूमर हैं। उधर ओल्ड एंड यंग, “पुरुष सोशल मीडिया निपल को चूसे बगैर छटपटाते रहते हैं।”


यह बस 15 सेकंड का एक स्टंट होना था — इंस्टाग्राम पर “लाइक” पाने के लिए नहर में छलांग लगाना। लेकिन मध्य प्रदेश के 19 साल के राकेश के लिए यह रील उसकी आख़िरी बन गई। दोस्त वीडियो बनाते रहे, और राकेश डूब गया। वीडियो फिर भी वायरल हो गया।
आज हिंदुस्तान में सोशल मीडिया की यह दीवानगी जानलेवा बन चुकी है। जो प्लेटफ़ॉर्म कभी रचनात्मकता के लिए बने थे, अब वहाँ अश्लीलता, हैरानी और हद से ज़्यादा दिखावे की दौड़ मची है। “वायरल” होने की इस पागलपन ने न सिर्फ़ क़ीमती जानें ली हैं, बल्कि हमारी तहज़ीब और सामाजिक मूल्यों को खोखला कर दिया है।
हाल ही में दिल्ली मेट्रो में एक जोड़े ने ऐसा वीडियो बनाया जिसमें वे सॉफ्ट ड्रिंक को एक-दूसरे के मुँह में डालते दिखे — लोगों को घिन आई, लेकिन व्यूज़ लाखों में पहुंचे।

नोएडा में दो लड़कियों ने “अंग लगा दे” गाने पर रील बनाई, जिसमें वे एक-दूसरे को रंग लगाते और आपत्तिजनक हरकतें करती दिखीं। वीडियो वायरल हुआ, पर साथ में भारी आलोचना भी मिली।
एक इन्फ़्लुएंसर ने एक वीडियो डाला, जिसमें एक लड़का गाड़ी पर नाचता दिखा और पीछे दो लड़कियाँ थीं — नतीजा, ₹33,000 का जुर्माना और सोशल मीडिया पर हंगामा।
तेलंगाना में एक कुल्फ़ी बेचने वाला भी तब गिरफ़्तार हुआ जब उसने ग्राहकों के सामने अश्लील इशारे करते हुए रीलें बनाईं।
और फिर वे हादसे — जो इस पागलपन की असली कीमत दिखाते हैं:
श्वेता सुरवसे, 23, महाराष्ट्र में रील बनाते वक़्त कार समेत 300 फ़ीट गहरी खाई में गिरी और जान चली गई।
छत्तीसगढ़ में एक 20 साल का स्टूडेंट दोस्तों के साथ रील बनाते हुए छत से गिरकर मर गया।
शिवम कुमार, 21, यूपी के खैराडा गाँव में झंडे के डंडे पर उल्टा लटकने का स्टंट करते वक़्त नीचे दब गया।
2023 में ही देशभर की पुलिस ने 100 से ज़्यादा ऐसी मौतों की रिपोर्ट दी — ज़्यादातर 25 साल से कम उम्र के लड़के-लड़कियाँ, जिन्हें चाहिए था बस थोड़ा सा नाम और कुछ “फ़ॉलोअर्स।”
नशे की तरह लाइक्स की भूख निरंतर बढ़ रही है।मनोवैज्ञानिक इसे “डोपामिन इकॉनमी” कहते हैं — जितनी सनसनीख़ेज़ हरकत, उतने ज़्यादा लाइक्स। हर “लाइक” एक नशे जैसा एहसास देता है।

सोशल मीडिया के एल्गोरिदम अब अच्छाई या रचनात्मकता नहीं, बल्कि हैरान कर देने वाले या गंदे कंटेंट को आगे बढ़ाते हैं।
आगरा में कुछ लड़कों ने बुज़ुर्ग आदमी का मज़ाक उड़ाते हुए रील बनाई। दिल्ली में एक औरत ने भिखारी की नकल की — वीडियो को लाखों ने देखा, कुछ ने ही विरोध किया। आज मज़ाक के नाम पर ज़िल्लत और बेइज़्ज़ती को भी मनोरंजन मान लिया गया है।
और सिर्फ़ अश्लीलता नहीं — सोशल मीडिया पर ग़लत जानकारी (मिसइनफ़ॉर्मेशन) सबसे तेज़ फैलती है। किसी “चमत्कारी इलाज” या “झटपट अमीरी के नुस्खे” वाला वीडियो कुछ ही घंटों में लाखों लोगों तक पहुँच जाता है। एक वायरल वीडियो में “डायबिटीज़ का देसी इलाज” बताया गया — दस मिलियन लोगों ने देखा, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
डिजिटल थिएटर बिना किसी निगरानी के बंदर के हाथ स्तर बन रहे हैं। हर फ़िल्म को रिलीज़ से पहले सेंसर बोर्ड (CBFC) की मंज़ूरी चाहिए। मगर सोशल मीडिया पर कुछ भी, कभी भी पोस्ट किया जा सकता है — कोई रोक नहीं, कोई जवाबदेही नहीं।
15 सेकंड की एक रील करोड़ों लोगों की सोच को बदल सकती है — और कोई नहीं पूछता कि ये सही है या नहीं।
चीन ने जब ऐसी ही समस्या देखी, तो तुरंत क़दम उठाया। अब वहाँ जो भी स्वास्थ्य, फ़ाइनेंस, क़ानून या शिक्षा पर कंटेंट डालना चाहता है, उसे अपनी क़ाबिलियत साबित करनी पड़ती है। सज़ा भारी नहीं, पर संदेश साफ़ है — ज़िम्मेदारी के बिना असर नहीं।
भारत में भी आईटी नियम 2021 हैं, जो सरकार को आपत्तिजनक कंटेंट हटाने का अधिकार देते हैं, मगर तब जब कोई शिकायत करे। तब तक वीडियो लाखों बार देखा जा चुका होता है।

भारत को सेंसरशिप नहीं, बल्कि जवाबदेही चाहिए।
सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के तहत एक “सोशल मीडिया मानक परिषद” (Social Media Standards Council) बनाई जा सकती है, जो:
हेल्थ, फ़ाइनेंस या क़ानून से जुड़े कंटेंट डालने वालों की जाँच करे,
अश्लील या हिंसक वीडियो को चिन्हित कर नीचे करे,
बार-बार ग़लत जानकारी फैलाने वालों को सस्पेंड करे,
और सच्चे, जिम्मेदार क्रिएटर्स को बढ़ावा दे।

जैसे फ़िल्म सेंसर बोर्ड सिनेमाघरों में मर्यादा बनाए रखता है, वैसे ही सोशल मीडिया के लिए भी एक हल्की लेकिन असरदार निगरानी ज़रूरी है — ताकि आज़ादी बनी रहे, पर अराजकता नहीं फैले।
हर ख़तरनाक रील के पीछे एक ख़ालीपन है — देखा जाने की, सुना जाने की, क़द्र पाने की तलब।
नौकरी, मौके और उम्मीदें कम होती जा रही हैं। ऐसे में सोशल मीडिया एक झूठा सुकून देता है — कुछ सेकंड की शोहरत, थोड़ी सी पहचान। मगर यह पहचान अक्सर ज़िल्लत, मौत या गिरावट में बदल जाती है।
कितने और राकेश मरेंगे कुछ “व्यूज़” के लिए?
अगर हमने अब भी रोक नहीं लगाई, तो रील लाइफ़ हमारी असली ज़िंदगी को निगल जाएगी।

जीएसटी राहत :सब धुआं

जनता को नहीं मिल रहा जीएसटी कम होने का फायदा

जीएसटी कम करने की सरकारी घोषणा के बावजूद दिल्ली-एनसीआर में अधिकांश स्थानीय दुकानदार उपभोक्ताओं को जीएसटी छूट का लाभ नहीं दे रहे हैं, जिससे आम जनता की जेब पहले की तरह ही कट रही है। उपभोक्ताओं का बोझ कम करने के लिए केंद्र सरकार ने जीएसटी में कटौती की थी, लेकिन दिल्ली-एनसीआर में ज़्यादातर स्थानीय खुदरा विक्रेता जरूरी सामान पुरानी दरों पर ही बेच रहे हैं और ग्राहकों द्वारा जीएसटी कम होने की बात कहने पर भी उन्हें राहत देने से इनकार कर रहे हैं। इसी को लेकर इस बार तहलका ने पड़ताल की है। तहलका एसआईटी की रिपोर्ट :-

15 अगस्त 2025 को अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘अगली पीढ़ी’ माल और सेवा कर (जीएसटी) सुधारों की घोषणा की, जिसमें पर्याप्त दर में कटौती शामिल होने की घोषणा हुई। प्रधानमंत्री मोदी ने इन बदलावों को नागरिकों के लिए दीपावली उपहार और आम आदमी पर कर का बोझ कम करने का एक तरीका बताया। जीएसटी की नई दरें नवरात्रि के पहले दिन 22 सितंबर 2025 से लागू हो भी चुकी हैं। नई जीएसटी दरें लागू होने से एक दिन पहले भी प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए वादा किया था कि “अगली पीढ़ी के जीएसटी सुधार” कर ढांचे को सरल बनाएंगे और सैकड़ों रोजमर्रा की वस्तुओं और सेवाओं को अधिक किफायती बनाएंगे। इस तरह जीएसटी घटाने के लिए चार-स्तरीय संरचना- 5 प्रतिशत, 12 प्रतिशत, 18 प्रतिशत, 28 प्रतिशत को 5 प्रतिशत और 18 प्रतिशत की दो-स्तरीय सरल प्रणाली के बदल दिया गया है।

जीएसटी की दरों में कटौती की घोषणा के तुरंत बाद केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (सीसीपीए) को यह सुनिश्चित करने का काम सौंपा गया कि व्यवसायी जीएसटी दरों में कटौती का पूरा लाभ खरीदारों तक पहुंचाएं। उल्लंघनकर्ताओं पर अनुचित व्यापार प्रथाओं का आरोप में कार्रवाई की जा सकती है, क्योंकि ऐसा करना उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत एक अपराध है। उपभोक्ता अधिकार निगरानी संस्था की एक विशेष शाखा को नए, निम्न राष्ट्रीय उपभोग कर (टैक्स) के बाद क्षेत्रीय निरीक्षण के माध्यम से 430 से अधिक सामान्यतः व्यापार की जाने वाली वस्तुओं की बाजार दरों पर निगरानी रखने का निर्देश दिया गया। केंद्रीय उपभोक्ता मामलों की सचिव निधि खरे ने मीडिया को बताया- ‘सीसीपीए यह सुनिश्चित करने के लिए कड़ी निगरानी रखेगा कि नई जीएसटी व्यवस्था के सभी लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचें। किसी भी उल्लंघन को अनुचित व्यापारिक व्यवहार माना जाएगा तथा कार्रवाई की जाएगी।’

जीएसटी दरों में कटौती के बाद बड़े धूमधाम से सरकार ने जीएसटी बचत उत्सव शुरू किया। लेकिन देश भर से मिल रही रिपोर्टों से पता चलता है कि दुकानदार इन कटौतियों का लाभ ग्राहकों को नहीं दे रहे हैं। व्यापारी पुरानी कीमतों पर ही चीजें बेच रहे हैं। जीएसटी कम होने से चीजों के बाजिव दाम लेने की बात कहने पर व्यापारी दावा कर रहे हैं कि वे पिछली जीएसटी दरों के तहत खरीदे गए पुराने स्टॉक को खत्म कर रहे हैं, जिसके चलते वे चीजों के दाम कम नहीं ले सकते। जीएसटी 2.0 सुधारों के तहत केंद्र सरकार ने यह दावा करते हुए कई श्रेणियों के उत्पादों पर कर की दरें कम कर दी थीं कि इससे त्योहारी सीजन से पहले आम नागरिकों पर बोझ कम होगा और उन्हें अधिक बचत करने में मदद मिलेगी। हालांकि उपभोक्ताओं का आरोप है कि व्यापारी ढीली व्यवस्था और कमजोर निगरानी प्रणाली का फायदा उठाकर उन्हें गुमराह कर रहे हैं और चीजों की अधिक कीमतें वसूल रहे हैं।

जमीनी हकीकत जानने के लिए तहलका ने दिल्ली-एनसीआर में एक रियलिटी चेक किया, ताकि पता लगाया जा सके कि क्या दुकानदार वास्तव में जीएसटी का लाभ आम आदमी को नहीं दे रहे हैं। इस दौरान तहलका ने कई बड़ी और छोटी दुकानों का दौरा किया और आम लोगों से बात की, जिनके लिए सरकार ने जीएसटी दर में कटौती के माध्यम से राहत का वादा किया था।

‘जीएसटी दरों में कटौती का फायदा ज्यादातर अमीरों को हो रहा है, गरीबों को नहीं। कटौती के बाद कारों की कीमतें कम हुई हैं, लेकिन कारें आम आदमी नहीं, बल्कि अमीर लोग खरीदते हैं। बड़े ब्रांडेड स्टोर जीएसटी का लाभ दे रहे हैं, लेकिन साधारण किराना दुकानदार दरों को कम नहीं कर रहे हैं। गरीब लोग आमतौर पर अपनी दैनिक जरूरत की चीजें स्थानीय किराना दुकानों से खरीदते हैं, ब्रांडेड दुकानों से नहीं।’ -नोएडा के सेक्टर 134 स्थित वाजिदपुर में मोबाइल की दुकान चलाने वाले सुधीर कुमार ने कहा। उन्होंने स्वीकार किया कि वे खुद भी पुरानी दरों पर सामान बेच रहे हैं।

‘मैं पुरानी दरों पर दवाइयां बेच रहा हूं, क्योंकि मेरा स्टॉक पुराना है। इसलिए मैं अपने ग्राहकों को कोई जीएसटी राहत नहीं दे रहा हूं। जब नया स्टॉक नए एमआरपी के साथ आएगा, तब हम देखेंगे।’ -नोएडा सेक्टर 134 के नागली में दुर्गा मेडिकल स्टोर के मालिक परविंदर मावी ने कहा।

‘जब मुझे दिल्ली की आजादपुर मंडी से खरीदे गए नारियल पर कोई जीएसटी राहत नहीं मिल रही है, तो मैं नारियल पानी कम कीमत पर कैसे बेच सकता हूं? जब भी मैं मंडी में व्यापारियों से जीएसटी कटौती का जिक्र करता हूं, तो वे इसे नजरअंदाज कर देते हैं और मुझसे कहते हैं कि या तो पुरानी कीमत पर खरीदो या चले जाओ।’ -नोएडा के सेक्टर 107 में नारियल पानी बेचने वाले नदीम खान ने कहा।

‘सभी दैनिक जरूरत की चीजें पुराने दामों पर ही बिक रही हैं। जीएसटी में कटौती के बाद कुछ भी नहीं बदला है, सब कागजों पर है। चाहे आप आटा खरीदें, दूध खरीदें या कुछ और, कीमतें अपरिवर्तित हैं। आम आदमी के लिए जीएसटी में कोई राहत नहीं है। यदि मैं चश्मे के फ्रेम पुरानी दरों पर बेच रहा हूं, तो यह समझ में आता है, क्योंकि वे पुराने स्टॉक से हैं। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि दैनिक उपयोग की चीजें भी उसी कीमत पर बेची जा रही हैं।’ -नोएडा के सेक्टर 134 स्थित वाजिदपुर स्थित मलिक ऑप्टिकल शॉप के मालिक मुस्तकीम ने कहा।

‘जीएसटी कटौती के बाद मुझे कोई राहत नहीं मिली है। मैं दैनिक आवश्यक चीजों के लिए पहले की तरह ही कीमत चुका रहा हूं।’ -उपभोक्ता कृपाल मौर्य ने कहा।

‘मेरे सेल्समैन ने मुझे बताया कि मैं अपनी दुकान के लिए जो सामान खरीदता हूं, उसकी कीमत अभी भी वही है। सरकार द्वारा हाल ही में घोषित जीएसटी कटौती के बाद कोई कमी नहीं हुई है। इसलिए मैं बाल कटाने, शेविंग, हेयर कलर और अन्य सेवाओं के लिए समान दरें ले रहा हूं। जीएसटी में कटौती सिर्फ़ कागजों पर ही है। यहां तक कि चावल, आटा और खाने का तेल जैसी घरेलू चीजेंं भी अभी भी पुरानी दरों पर ही बिक रही हैं। कीमतों में कोई छूट नहीं दी गई है।’ -नोएडा के सेक्टर 134 में नाई की दुकान के मालिक नसीम ने कहा।

जीएसटी कटौती की पड़ताल के दौरान तहलका रिपोर्टर की मुलाकात नोएडा के सेक्टर 134 में दुर्गा मेडिकल स्टोर के मालिक परविंदर मावी से हुई। उनके साथ हुई संक्षिप्त बातचीत में रिपोर्टर को पता चला कि बहुप्रचारित जीएसटी दर में कटौती उपभोक्ताओं तक पहुंचने में विफल रही है। मावी ने स्वीकार किया कि वह पुरानी दरों पर ही दवाइयां बेच रहे हैं, जिसका कारण उनका न बिका हुआ स्टॉक है। हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि नई आपूर्ति के साथ कीमतें गिर सकती हैं, लेकिन अभी तक यह लाभ तथाकथित ही है, जिससे आम खरीदार को कोई सैद्धांतिक राहत नहीं मिल रही है।
रिपोर्टर : अब तो रेट कम हो गए होंगे दवाई पर, जीएसटी हटने से?
परविंदर : अभी तो चल रहा है।
रिपोर्टर : चल रहा मतलब?
परविंदर : अभी मार्केट जाना नहीं हुआ ना, कुछ पर बढ़ेंगे, कुछ पर घटेंगे।
रिपोर्टर : तो आपके वही रेट हैं, …पुराने वाले?
परविंदर : हां।
रिपोर्टर : पुराना स्टॉक होगा, किसी पर जीएसटी कम नहीं हुई?
परविंदर : अभी मेरे पास तो नहीं, जो है पुराना ही है।
रिपोर्टर : दवाइयों पर तो लगभग सभी पर जीएसटी कम हुई है?
परविंदर : हां, अब जो माल आएगा ना, उस पर।
रिपोर्टर : अभी पुराना माल है?
परविंदर : अभी पुराना माल है।
रिपोर्टर : उसी रेट पर बेच रहे हो, …पुराने वाले?
परविंदर : हां, अब जो आएगा ना, एमआरपी कम होकर आएगा।
रिपोर्टर : तभी जनता को फायदा नहीं हो रहा आपसे?

परविंदर

अब हमारी मुलाकात नदीम से हुई, जो कई वर्षों से नोएडा के सेक्टर 107 में नारियल पानी बेचते हैं। हमने उनसे पूछा कि क्या जीएसटी में कटौती के बाद नारियल की कीमत कम हुई है? इस पर नदीम ने कहा कि दिल्ली की आजादपुर मंडी से वह नारियल खरीदता है, जहां नारियल के दाम कम नहीं हुए हैं। इसलिए वह भी कम दामों पर नारियल पानी नहीं बेच सकता। पिछले कई महीनों से उनकी दरें एक समान बनी हुई हैं- 80 रुपये प्रति नारियल। इस चर्चा में यह स्पष्ट हो गया कि जीएसटी कटौती का प्रभाव जमीनी स्तर पर नहीं हुआ है।

नदीम

रिपोर्टर : क्या रेट है नारियल पानी?
नदीम : 80 रुपए।
रिपोर्टर : अभी कम नहीं किए रेट तुमने?
नदीम : काफी टाइम से है।
रिपोर्टर : अरे पर अब तो जीएसटी कम हो गई?
नदीम : आज भी 72-71 रुपए है नारियल आजादपुर मंडी में।
रिपोर्टर : नारियल पानी पर भी तो जीएसटी कम हुई है?
नदीम : मंडी वाले जब कम दे तभी तो हो।
रिपोर्टर : मैं तो समझ रहा था कि तुम 60 रुपए का बेचोगे आज?
नदीम : आज भी 70-72 रुपए आजादपुर मंडी में है।
रिपोर्टर : नारियल की कीमत?
नदीम : हां।
रिपोर्टर : कहां से लाते हो?
नदीम : आजादपुर से।
रिपोर्टर : वहां भी कम नहीं हुआ?
नदीम : वहां भी कम नहीं हुआ।
रिपोर्टर : हमें कैसे पता, हो सकता है झूठ बोल रहे हो तुम?
नदीम : हमारा डेली का काम है।
रिपोर्टर : वहां जीएसटी कम हो गई हो पर तुम जीएसटी लगा रहे हो?
नदीम : आपकी बात मैं मानता हूं, मगर मंडी के अंदर कोई नहीं मानता। वहां तो पैसा मांगता है, कहते हैं ये रेट है, …लेना हो तो लो, नहीं तो जाओ।
रिपोर्टर : तुम तो 80 रुपए बहुत टाइम से बेच रहे हो?
नदीम : बहुत टाइम से।
रिपोर्टर : नहीं, जीएसटी कम हुई है, …तभ तो सस्ता होना चाहिए?
नदीम : जीएसटी कम हुई है, तो माल सस्ता होना चाहिए, मगर मंडी के अंदर सस्ता नहीं हुआ।

जब तहलका ने मलिक ऑप्टिकल से संपर्क कर यह जानना चाहा कि क्या उपभोक्ताओं को दुकान से सामान खरीदते समय जीएसटी राहत का लाभ मिल रहा है, तो उसके मालिक मुस्तकीम ने संवाददाता को बताया कि जीएसटी दर में कटौती के बाद दैनिक जरूरत की वस्तुओं की कीमतों में कोई बदलाव नहीं आया है। उन्होंने कहा कि वे सभी आवश्यक वस्तुओं के लिए वही कीमत चुका रहे हैं जो वे कर छूट से पहले चुकाते थे। उनके अनुसार, जीएसटी दर में कटौती केवल कागजों पर ही है। उन्होंने कहा कि यहां तक कि वे जो सामान बेच रहे थे, जैसे कि चश्मे के फ्रेम, उनकी कीमतें भी पहले की तरह ही बनी हुई हैं – तथाकथित सुधारों से उन पर कोई असर नहीं पड़ा है।

मुस्तकीम

रिपोर्टर : अब तो रेट कम हो गए होंगे फ्रेम के, ,,,जीएसटी हट गई है?
मुस्तकीम : किस चीज के रेट कम हुए हैं बत दो? दूध आज भी 70 रुपए किलो ही आ रहा है, अनाज भी वही रेट आ रहा है, ..ये दिखाने के लिए ही है कागजों में, हकीकत में कुछ भी नहीं है।
मुस्तकीम (आगे) : दूध 70 ही आ रहा है अभी क्यूं, एक रुपया भी कम न हुआ, ये तो छोड़ो (रिफरिंग टू फ्रेम्स) रोज नहीं खरीदेगा आदमी, जो रोज की चीज है डेली की, उसमें एक रुपया भी कम नहीं हुआ है, कागजों में है बस।
रिपोर्टर : सरकार कह रही है जीएसटी हटा दी 22 सितंबर से।
मुस्तकीम : चलो फ्रेम तो ऐसी चीज है छ: महीने पहले खरीदा, चार महीने पहले खरीदी, लेकिन जो रोज पैकिंग में आ रही है उसमें एक रुपया कम न हुआ अभी तक, दूध का रेट वही है 70, जो पहले था।
मुस्तकीम (आगे) : जो पैकेट में आते हैं दूध उसकी बत कर रहा हूं।
रिपोर्टर : मदर डेयरी का भी वही रेट है?
मुस्तकीम : वही रेट है, एक पैसा भी कम नहीं हुआ।
रिपोर्टर : हमारी सोसायटी में जो मदर डेयरी है उसने तो कम कर दिया।
मुस्तकीम : किसी ने भी कम नहीं किया सर, एमआरपी चेर कर लो, उसी रेट पर मिल रहा है। एक चीज पर भी कम नहीं हुआ है, कागजों में है।
रिपोर्टर : मतलब अभी चश्मों में भी नहीं है, अभी कोई उम्मीद नहीं है?
मुस्तकीम : नहीं सर, अभी कागजों में ही है, …यही हकीकत है।
रिपोर्टर : कागज मतल आपके या सरकार के?
मुस्तकीम : सबके, …हमारे पास तो होकर ही जाएगा जब ऑर्डर आएगा तो।

पता लगाया जा सके कि क्या उन्होंने अपनी दुकान में इस्तेमाल होने वाली कई वस्तुओं पर जीएसटी कटौती के बाद अपनी दरें कम कर दी हैं। नसीम के अनुसार, उनके सप्लायर ने उनसे कहा कि दुकान के लिए वे जो उत्पाद खरीदते हैं, उनकी कीमतें अभी भी कम वही हैं और जीएसटी में छूट के बाद भी उनमें कोई कमी नहीं आई है। इसलिए वह बाल कटाने, शेविंग करने, बाल रंगने और अन्य सेवाओं के लिए पहले वाली ही दरें ले रहे हैं। अपने तर्क के समर्थन में नसीम ने कहा कि जीएसटी में कटौती केवल कागजों पर ही है, वह अभी भी चावल, आटा और खाना पकाने के तेल जैसी दैनिक घरेलू वस्तुएं पुरानी दरों पर ही खरीद रहे हैं। इन चीजों की कीमतों में किसी भी तरह की कोई राहत नहीं दी गई है। नसीम ने बताया कि वह तो दीपावली के बाद दरें बढ़ाने की योजना बना रहे हैं, क्योंकि उनके दुकान मालिक दुकान का किराया बढ़ाने वाले हैं।
रिपोर्टर : अब तो कटिंग के रेट कम कर दिए होंगे तुमने?
नसीम : दिवाली से बढ़ जाएंगे और।
रिपोर्टर : अरे! जीएसटी कम हो गई, सामान सस्ता हो गया, फिर भी?
नसीम : हमारी कम नहीं हुई।
रिपोर्टर : आपकी कम नहीं हुई? क्या चल रहा है कटिंग का रेट?
नसीम : वही, …70 रुपए।
रिपोर्टर : वही जो पहले था? और सेविंग?
नसीम : 60 रुपए स्ट्रेट बनाने का।
रिपोर्टर : कटिंग 70 रुपए जो पहले थी?
नसीम : हां दिवाली से रेट बढ़ जाएगा।
रिपोर्टर : क्यूं?
नसीम : दिवाली के बाद किराया बढ़ जाएगा।
रिपोर्टर : अच्छा, टुम्हारी दुकान का किराया बढ़ जाएगा?
रिपोर्टर : अब तो रेट कम कर दिए होंगे?
नसीम : हमारे सामान पर कम नहीं हुआ।
रिपोर्टर : कुछ कम नहीं हुआ? तुम उसी रेट पर ले रहे हो?
नसीम : वो कहता कहीं कम नहीं हुआ है, ….लाओ दिखाओ हमें, …कहीं कम नहीं हुआ है।
रिपोर्टर : वही रेट चल रहे हैं?
नसीम : राशन के कम हुए हैं? …अब राशन वाले ने भी बंद कर दिया है, …कह रहा है हमारे भी कम नहीं हुए, दिखाओ कहां है?
रिपोर्टर : तुम तो कह रहे हो कम हुए हैं राशन के?
नसीम : अखबार में लिखा है, मगर ये लोग मानते नहीं हैं, उस पर हुआ है… शैम्पू पर।
रिपोर्टर : आप राशन ले रहे हो पुराने रेट में?
नसीम : पुराने रेट में।
रिपोर्टर : आटा-वाटा सब, कोई कम नहीं हुआ? जीएसटी नहीं हटी?
नसीम : नहीं, हम तेल लेते हैं, एक रुपया भी कम नहीं करता है।
रिपोर्टर : एक बार जो बढ़ा देता है, कम नहीं करता है।

नसीम

इसके बाद हम नोएडा के गुलशन वन 29 मॉल स्थित मल्टीप्लेक्स मूवीमैक्स गए, जहां जॉली एलएलबी 3 फिल्म दिखाई जा रही थी, वहां सिनेमाघर में दर्शकों को बेचे जा रहे पॉपकॉर्न की कीमतों की जांच की। सेल्समैन ने हमें बताया कि जीएसटी कटौती के बाद भी मूवीमैक्स की कीमतें कम नहीं हुई हैं। उनके अनुसार, अभी तक किसी भी मल्टीप्लेक्स में दरें कम नहीं की गई हैं और कोई भी संभावित परिवर्तन प्रबंधन से प्राप्त मेल पर निर्भर करेगा। यदि उन्हें ब्याज दरों में कटौती की सूचना प्राप्त होती है, तो कीमतें कम कर दी जाएंगी।
रिपोर्टर : पॉपकॉर्न क्य रेट है?
सेल्समैन : 550 और 650।
रिपोर्टर : ओके विद बटर और विदआउट बटर?
सेल्समैन : विदाउट बटर।
रिपोर्टर : ओके कुछ कम नहीं हुए रेट जीएसटी के बाद?
सेल्समैन : नहीं, अभी इतना ही है।
रिपोर्टर : मूवीमिक्स में रेट ही कम नहीं हुए जीएसटी के बाद?
सेल्समैन : नहीं, कहीं भी अभी कम नहीं हुए, XXXX में भी नहीं हुए।
रिपोर्टर : XXXX में भी कम नहीं हुए।
सेल्समैन : हो जाएंगे, मेल आएगा तो उसके बाद हो सकते हैं।
रिपोर्टर : 22 सितंबर को ही जीएसटी कम हो गई थी।
सेल्समैन : मेल तो ऊपर से आता है।
रिपोर्टर : वाटर बोटल कितने की है आपकी?
सेल्समैन : 70 रुपए की, सर!
रिपोर्टर : उस पर भी कम नहीं हुए?
सेल्समैन : होगा तो सर बिलकुल आएगा।

सेल्समैन

चूंकि पनीर की कीमतें भी कम हो गई हैं, इसलिए हमने यह देखने के लिए नोएडा के सेक्टर 134 में एवरग्रीन स्वीट शॉप का दौरा किया कि क्या जीएसटी कटौती के बाद पनीर, समोसे की कीमतें कम हुई हैं या नहीं। हमें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि काउंटर पर बैठे सेल्समैन ने बताया कि पनीर के दाम कम होने के बावजूद समोसे के दाम कम नहीं हुए हैं। उन्होंने बताया कि समोसे तलने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले गैस सिलेंडर की कीमत अभी भी वही है और समोसे तलने में लगे श्रमिकों के वेतन में कोई कटौती नहीं की गई है। इसलिए उन्होंने एक समोसे के लिए 17 रुपए वसूले, जो जीएसटी कटौती से पहले की दर के समान ही था। जब हमने समोसे तल रहे मजदूर से कीमतों के बारे में बात की, तो उसने कहा कि एक बार कीमतें बढ़ जाने पर कोई उन्हें कम नहीं करता। लेकिन जब लागत बढ़ जाती है, तो स्थिति के अनुसार कीमतें तुरंत बढ़ जाती हैं।
रिपोर्टर : ये पनीर का समोसा है ना?
सेल्समैन : हां।
रिपोर्टर : मिल जाएगा?
सेल्समैन : हां।
रिपोर्टर : कितने का एक?
सेल्समैन : 17 रुपए का।
रिपोर्टर : 17 रुपए? सस्ता नहीं हुआ अभी, जीएसटी हटने के बाद, पनीर से जीएसटी हट गई ना? हम समझ रहे थे कि सस्ता हो गया होगा?
सेल्समैन : पनीर से ही तो हटी है, कारीगरों से तो नहीं। कारीगर तो उतने का ही है, गैस सिलेंडर उतने का ही है। केवल पनीर से क्या होगा?
रिपोर्टर : समोसा अभी भी महंगा है, …17 रुपए का एक। मैं सोच रहा था जीएसटी हट गई है पनीर से, तो समोसा सस्ता हो गया होगा?
दूसरा सेल्समैन : रेट घट जाएं तो कम नहीं करते, बढ़ा देंगे।

सेल्समैन

नोएडा के सेक्टर 134 में हमारी मुलाकात मोबाइल दुकान के मालिक सुधीर कुमार से हुई। जीएसटी दरों में कटौती के बारे में पूछे जाने पर सुधीर ने कहा कि इससे ज्यादातर अमीरों को फायदा होगा, गरीबों को नहीं। जीएसटी में कटौती के बाद कारों की कीमतें कम हो गई हैं, लेकिन कारें आम आदमी नहीं, बल्कि अमीर लोग खरीदते हैं। बड़े ब्रांडेड स्टोर तो जीएसटी में कटौती का लाभ ग्राहकों को दे रहे हैं, लेकिन साधारण किराना दुकानें कोई छूट नहीं दे रही हैं। सुधीर कुमार ने कहा कि ‘गरीब लोग अपनी दैनिक जरूरत की वस्तुएं ब्रांडेड दुकानों से नहीं, बल्कि स्थानीय किराना दुकानों से खरीदते हैं।’

ड्राइवर कृपाल मौर्य ने हमें बताया कि स्थानीय किराना दुकानों से दैनिक जरूरत की चीजों पर जीएसटी कटौती के बाद कीमतों में कोई राहत नहीं मिली है। उन्होंने कहा कि वे पहले की तरह ही कीमतें चुका रहे हैं। हम उत्तर प्रदेश के आगरा में फतेहाबाद रोड पर स्थित मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल शांति मांगलिक के गेट के पास स्थित एक मेडिकल स्टोर पर भी गए। जब पूछा गया कि क्या जीएसटी में कटौती के बाद दवाओं की कीमतें कम हुई हैं, तो काउंटर पर मौजूद सेल्समैन ने तुरंत जवाब दिया कि जीएसटी में छूट के बावजूद कीमतें अपरिवर्तित हैं।

हालांकि तहलका रिपोर्टर ने पाया कि सभी दुकानदार ग्राहकों से पुरानी कीमत नहीं वसूल रहे हैं, कुछ उन्हें जीएसटी लाभ दे भी रहे थे। अपोलो फार्मेसी के सेल्समैन मूनिस ने कहा कि वे दवाओं पर जीएसटी में कटौती की पेशकश कर रहे हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि कई स्थानीय मेडिकल स्टोर पुराने स्टॉक को कारण बताते हुए ग्राहकों को लाभ नहीं दे रहे हैं।

मूनिस

नीचे एक मेडिकल स्टोर के मालिक के साथ संक्षिप्त बातचीत से यह स्पष्ट हो जाता है कि जीएसटी कटौती का लाभ केवल कुछ ही लोगों को मिल रहा है, जबकि अधिकांश स्थानीय दुकानों पर ग्राहकों को राहत नहीं दी जा रही है। मूनिस बताते हैं कि अधिकांश दुकानें अभी भी पुराना स्टॉक खत्म करने में लगी हैं, जिससे कीमतों में कोई कमी नहीं हो पा रही है। हालांकि उन्होंने कहा कि उनका स्टोर लाभ दे रहा है, लेकिन अधिकांश व्यापारी पहले की तरह ग्राहकों से रेट ले रहे हैं, जो नीति के असमान कार्यान्वयन को उजागर करता है।
रिपोर्टर : आप तो जीएसटी का फायदा दे भी रहे हो, बहुत से नहीं दे रहे।
मूनिस : रोज सिस्टम अपडेट होता है। बहुत से लोग तो दे नहीं रहे हैं, अभी पुराना स्टॉक पड़ा हुआ है।
रिपोर्टर : बहुत सारे मेडिकल स्टोर नहीं दे रहे।
मूनिस : नहीं, लोकल वाले तो दे नहीं पा रहे, कहते हैं पुराना स्टॉक है।
रिपोर्टर : तो आप कैसे दे रहे हो?
मूनिस : हा.हा..।

नोएडा के गुलशन वन 29 मॉल में स्थित एक बड़ी खुदरा श्रृंखला, मॉडर्न बाजार में हमें उनके बिक्री कर्मचारियों ने बताया कि उनके स्टोर पर सभी किराना वस्तुओं पर जीएसटी कटौती पूरी तरह से लागू है। हालांकि उनके सेल्समैन सत्या ने स्वीकार किया कि स्थानीय किराना स्टोर जीएसटी का लाभ आम लोगों को नहीं दे रहे हैं और वह प्रभावित ग्राहकों में से खुद को भी एक मानते हैं।
रिपोर्टर : ग्रॉसरीज पर रेट कम हुए क्या?
सेल्सगर्ल : हां सर! हुई तो है।
रिपोर्टर : किस-किस पर हुई है?
सेल्सगर्ल : ये नहीं पता, डाल पर, …सारी ग्रॉसरीज पर, इनफेक्ट कितना कम हुआ है ये तो आपको सर बता सकते हैं।
रिपोर्टर : दाल, चावल… सब पर कम हुआ है?
सेल्सगर्ल : जी।
रिपोर्टर : हां ग्रॉसरीज पर रेट कम हुए हैं जीएसटी के बाद?
सत्या : आप रेट देख लीजिए बिल पर आपको रेट दे देता हूं।
रिपोर्टर : जैसे आटा है, दाल है, चावल?
सत्या : सब पर हुआ है, …ये देख रहे हो आप… जीएसटी रेट है। …आइए अभी तो ऑफर चल रहा है।
रिपोर्टर : नो पुराने रेट पर ही बेच रहे हैं?
रिपोर्टर (आगे) : आपने तो कम कर दिए हैं, पर जो नॉर्मल ग्रॉसरी स्टोर्स हैं, वो नहीं कर रहे। मॉडर्न बाजार ने तो कम कर दिए।
सत्या : हां, मैं भी गया था, मुझे भी वही रेट दिए हैं, …अभी पुराना स्टॉक निकल रहा है। मैंने बोला बिल भी तो दिखाना चाहिए।

तहलका ने अपनी इस पड़ताल में पाया गया कि किराने का सामान और दवाइयों का कारोबार करने वाले सभी ब्रांडेड स्टोर अपने ग्राहकों को जीएसटी का लाभ दे रहे हैं। लेकिन छोटे मेडिकल और किराना स्टोर अपने गरीब ग्राहकों को ये लाभ नहीं दे रहे हैं, उनका दावा है कि वे पिछली कर दरों के तहत खरीदे गए पुराने स्टॉक को खत्म कर रहे हैं। दिल्ली-एनसीआर में हमने जिन दुकानों का दौरा किया, उनमें से कई में कोई नोटिस बोर्ड नहीं था और व्यापारी खुलेआम नियमों का उल्लंघन करते मिले। अधिकांश चीजों पर सरकार के वादे के मुताबिक चीजों के मूल्यों में कम जीएसटी के हिसाब से कटौती करके ग्राहकों को बेचते नहीं मिले। उपभोक्ताओं का आरोप है कि निगरानी की कमी के कारण व्यापारी पुरानी दरों पर उत्पाद बेचकर उन्हें बेवकूफ बना रहे हैं और लूट रहे हैं। जीएसटी की नई दरों का क्रियान्वयन न होना विशेष रूप से दवाओं और आवश्यक वस्तुओं के मामले में गंभीर प्रतीत होता है। दुकानदार और मेडिकल स्टोर वाले अधिकारीयों की कार्रवाई के डर के बिना पुरानी दरें वसूल रहे हैं। तहलका में हमारा मानना है कि सरकार को तुरंत विशेष अभियान शुरू करना चाहिए। बाजारों का निरीक्षण करना चाहिए। उल्लंघन करने वालों को दंडित करना चाहिए और एक सार्वजनिक हेल्पलाइन शुरू करनी चाहिए, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि जीएसटी दर में बदलाव का लाभ आम लोगों तक पहुंचे। प्रवर्तन में थोड़ी-सी भी देरी से उपभोक्ताओं को भारी वित्तीय नुकसान होता है। इस मुद्दे पर त्वरित कार्रवाई और जन जागरूकता पैदा करना महत्वपूर्ण है। सरकार ने उन दुकानदारों और व्यवसायों के खिलाफ सख्त कदम उठाने की घोषणा की है, जो ग्राहकों को जीएसटी का लाभ देने में विफल रहे हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन इरादे के अनुरूप होना चाहिए।