छात्रों पर पढ़ाई का दबाव, सामाजिक तुलना, अपमान और असफलता का डर , स्कूलों का कड़ा रवैया देशभर में छात्र इन मानसिक चुनौतियों के आगे टूट रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की ताज़ा रिपोर्ट ने बड़ा खुलासा किया है। महाराष्ट्र छात्रों की आत्महत्याओं में देश में पहले स्थान पर पहुंच गया है।
शिक्षा और प्रगतिशील सोच के लिए पहचाने जाने वाले इस राज्य के लिए यह आंकड़ा बेहद चिंताजनक है। रिपोर्ट बताती है कि बीते वर्षों में छात्रों की आत्महत्या के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हुई है और अब यह समस्या राष्ट्रीय संकट बन चुकी है।
महाराष्ट्र सबसे आगे, देश में 13,892 छात्रों ने 2023 में की आत्महत्या NCRB के अनुसार 2023 में 13,892 छात्रों ने आत्महत्या की
इनमें से सबसे ज्यादा 2,046 मामले महाराष्ट्र से मध्यप्रदेश दूसरे स्थान पर1,459, उत्तरप्रदेश तीसरे स्थान पर 1,373, तमिलनाडु चौथे स्थान पर 1,339
इन आंकड़ों से साफ है कि पढ़ाई और प्रतिस्पर्धा का दबाव बच्चों की मानसिक सेहत पर गहरा असर डाल रहा है।
स्कूलों में अपमान और तुलना से बढ़ रहा तनाव
दिल्ली के छात्र शौर्य पाटिल और जालना की आरोही बिटलान की आत्महत्या ने पूरे देश को झकझोरा। NCRB रिपोर्ट में बताया गया की स्कूलों में अपमानजनक व्यवहार, दोस्तों के सामने डांटना
फेल होने पर ताने, दूसरे बच्चों से तुलना, फीस न भरने पर बच्चों को अलग बैठाना
ये कारण छात्रों को गहरे तनाव में धकेल रहे हैं। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि स्कूल में अपमान झेलने के मामलों में महाराष्ट्र पहले स्थान पर है।
सबसे ज्यादा आत्महत्याएं 10वीं ओर 12वीं के छात्रों में 24.6% आत्महत्याएं 10वीं, 12वीं के छात्रों द्वारा
18.6% प्रथम से तृतीय वर्ष कॉलेज छात्रों द्वारा 17.5% उच्च प्राथमिक (मिडिल स्कूल) छात्रों द्वारा
यह दर्शाता है कि सबसे अधिक तनाव स्कूल स्तर पर ही झेला जा रहा है।
10 साल में 72% बढ़ीं छात्रों की आत्महत्याएं
2015 में 900 मामलों की बढ़ोतरी, 2020 में 2,100 मामलों की बढ़ोतरी, 2023 में 848 नए केस
विशेषज्ञों के मुताबिक कोरोना काल के बाद बच्चों में तनाव, प्रतिस्पर्धा और सामाजिक दबाव और तेज़ी से बढ़ा है।
सरकार की पहलें तो की है लेकिन असर सीमित है।
सरकार की तरफ से छात्रों की आत्महत्या रोकने के लिए।मेंटल हेल्थकेयर एक्ट, एंटी-रैगिंग उपाय
‘A Global India Through Independent Cinema: A Women’s Panel’ शीर्षक वाले पैनल डिस्कशन में चार प्रभावशाली आवाज़ों ने भाग लिया — अभिनेता-निर्माता राजनी बासुमतरी, सिनेमैटोग्राफर फौज़िया फातिमा, अभिनेता-निर्माता राचेल ग्रिफिथ्स, और अभिनेता मीनाक्षी जयन। इस चर्चा में इस बात पर चर्चा की गई कि महिलाओं की रचनात्मक और व्यक्तिगत यात्राएँ स्वतंत्र सिनेमा के भविष्य को कैसे आकार दे रही हैं।
चर्चा की शुरुआत महिलाओं के फिल्म निर्माण में सहानुभूति को एक निर्णायक तत्व के रूप में किए गए विचारों से हुई। फौज़िया ने बताया कि संपूर्ण रचनात्मक प्रक्रिया, विचार के बीज से लेकर अंतिम फ्रेम तक, सहानुभूति पर आधारित होती है, जो फिल्म निर्माताओं को स्थानीय कथाओं को वैश्विक स्तर पर गूंजने वाली कहानियों में बदलने की क्षमता प्रदान करती है। राजनी ने जोड़ा कि महिलाएं जीवन के छोटे से छोटे पहलुओं को ध्यान से देखती हैं, और यही सूक्ष्म निरीक्षण उनके फिल्मों को उन कहानियों को आवाज देने की क्षमता प्रदान करता है, जो अन्यथा अनकही रह जातीं।
जब चर्चा का रुख प्रतिनिधित्व की ओर मुड़ा, तो पैनल ने यह पूछा कि क्या आज के समय में महिलाएं इंडस्ट्री में अधिक देखी जाती हैं। राचेल ने बताया कि उनके अपने उद्योग में महिला सिनेमैटोग्राफर्स और निर्माता की संख्या बढ़ रही है। फौज़िया ने भारतीय महिला सिनेमैटोग्राफर्स कलेक्टिव के विकास की कहानी सुनाई, जो 2017 में कुछ सदस्यों के साथ शुरू हुआ था और अब यह लगभग दो सौ सदस्यों तक फैल चुका है, जिसमें जूनियर से लेकर सीनियर तक शामिल हैं। उन्होंने बताया कि यह कलेक्टिव मेंटरशिप और सहयोग को बढ़ावा देता है, जो महिला फिल्म निर्माताओं के लिए वह समर्थनपूर्ण माहौल प्रदान करता है, जिसकी उद्योग में महिलाओं को लंबे समय से आवश्यकता रही है। उन्होंने आईएफएफआई में महिला सिनेमैटोग्राफरों की उपस्थिति की सराहना करते हुए ‘विमुक्ति’ में शेली शर्मा और ‘शेप ऑफ मोमो’ में अर्चना घांगरेकर के शिल्प की तारीफ की।
राजनी ने याद किया कि दो साल पहले उनके अपने प्रोजेक्ट के लिए इस कलेक्टिव के एक सिनेमैटोग्राफर का संदर्भ दिया गया था, और यह उस नेटवर्क के प्रभाव को रेखांकित करता है। मीनाक्षी ने केरल राज्य सरकार द्वारा समर्थित उस पहल को बताया, जो महिलाओं द्वारा बनाई गई फिल्मों को वित्तीय सहायता प्रदान करती है, और बताया कि उनकी फिल्म ‘विक्टोरिया’ इसी अवसर से उपजी थी। फौज़िया, जिन्होंने केरल राज्य सरकार के महिला-नेतृत्व वाली फिल्मों को समर्थन देने वाले पहले चयन पैनल में काम किया, ने बताया कि कुछ पुरुष महिला नामों के तहत परियोजनाएँ प्रस्तुत करते हैं, जिससे सतर्कता की आवश्यकता बनी रहती है।
पैनलिस्टों ने फिर फिल्म निर्माण और व्यक्तिगत जीवन को संतुलित करने की चुनौतियों पर चर्चा की। राचेल ने अपने तीन बच्चों के साथ उद्योग में काम करते हुए संतुलन बनाने के बारे में ईमानदारी से बात की, और महिलाओं को समर्थन देने के लिए कार्य सप्ताहों को वैकल्पिक करने जैसे मॉडल का सुझाव दिया। फौज़िया ने मातृत्व के बाद अपने शिल्प में वापसी की कठिनाई साझा की और आभार व्यक्त किया कि उनका करियर जारी रहा, विशेष रूप से उनकी आगामी व्यावसायिक फिल्म ‘ट्रेन’ के साथ, जिसमें विजय सेतुपति हैं।
जब यह सवाल आया कि अभिनेता सेट पर कथानक को कैसे आकार देते हैं, तो मीनाक्षी ने कहा कि नए लोग अक्सर अपने सहयोगियों को चुनने की स्वतंत्रता नहीं रखते हैं, लेकिन जैसे-जैसे उनका करियर बढ़ता है, वे अधिक महिला फिल्म निर्माताओं के साथ काम करने की उम्मीद करती हैं। राजनी ने देखा कि ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स ने महिलाओं के लिए उपलब्ध भूमिकाओं की संख्या को बढ़ाया है, जिससे उन्हें अधिक गहराई और उपस्थिति मिली है। फौज़िया ने यह जोड़ा कि अब अधिक महिला अभिनेता निर्माण में भी जा रही हैं, जिससे रचनात्मक निर्णय लेने वालों का दायरा बढ़ रहा है। मीनाक्षी ने अपनी इच्छा का ज़िक्र किया कि एक दिन वह खुद फिल्म निर्माण करना चाहती हैं, जबकि राचेल ने हॉलीवुड में महिला निर्माताओं की लंबी उपस्थिति और उनके द्वारा सामना की जाने वाली समस्याओं पर चर्चा की। राचेल ने वेतन समानता पर भी बात की, और कहा कि वास्तविक बदलाव के लिए पुरुषों को इस असंतुलन को स्वीकार करना होगा और महिलाओं के लिए निष्पक्षता सुनिश्चित करने के प्रयासों का समर्थन करना होगा।
जब चर्चा लेखन और प्रक्रिया की ओर मुड़ी, तो राजनी ने अपनी कहानियों को स्थानीय वास्तविकताओं और अपनी क्षेत्रीय पीड़ा से जोड़ने की बात की। उनकी हाल की फिल्म में जेंडर न्याय का विषय लिया गया है, और इसमें पूरी तरह से महिला कलाकारों की कास्ट है। मीनाक्षी ने बताया कि उनकी फिल्म ‘विक्टोरिया’ पूरी महिला कास्ट के इर्द-गिर्द बनाई गई थी, जो एक ऐसा विकल्प था, जिसने अक्सर सवाल उठाए, बस इसलिए क्योंकि उसने सामान्य ढांचे को बदल दिया।
जैसे-जैसे पैनल फिल्म निर्माण और उसे बनाए रखने की वास्तविकताओं की ओर बढ़ा, राचेल ने कहा कि फिल्म निर्माता को ऐसी कहानियाँ बनानी चाहिए जो अपनी ऑडियंस तक पहुँच सकें, और यह विश्वास रखना चाहिए कि सही कथानक सही लोगों तक पहुंचेगा। राजनी ने कहा कि उनकी फिल्में छोटे बजट में बनी हैं और उन्हें महिला निर्माताओं का समर्थन प्राप्त था, और उन्होंने सुनिश्चित किया कि उनकी फिल्मों को कभी भी नुकसान न हो।
सत्र के समापन के करीब, पैनलिस्टों से पूछा गया कि वे कौन सी फिल्में मानती हैं कि हर किसी को देखनी चाहिए। राचेल ने ‘दंगल’ का नाम लिया, क्योंकि यह लड़कियों का उत्सव है; फौज़िया ने ‘द पावर ऑफ द डॉग’ चुनी; राजनी ने ‘आर्टिकल 15’ और ‘आई इन द स्काई’ की सिफारिश की; और मीनाक्षी ने ‘शिवा बेबी’ को चुना, क्योंकि यह चिंता का चित्रण करती है, और एक चंचल मुस्कान के साथ यह भी कहा कि वह अपनी खुद की फिल्म ‘विक्टोरिया’ की सिफारिश भी करेंगी।
सत्र ने गर्मजोशी और संभावनाओं के पल के साथ समापन किया। मीनाक्षी ने ऑस्ट्रेलियाई फिल्म उद्योग की सराहना की और एडिलेड फिल्म महोत्सव में देखी गई एक फिल्म को याद किया, जिसमें वह अभिनय करना चाहती थीं। राचेल ने मित्रता के साथ प्रतिक्रिया दी, और सुझाव दिया कि ये चार महिलाएं एक दिन एक साथ काम कर सकती हैं, इस प्रकार इस अपराह्न के आत्मा को पकड़ा: महिलाएँ एक साथ नए भविष्य की कल्पना करती हैं, और स्वतंत्र सिनेमा उन भविष्य की शुरुआत के लिए स्थान प्रदान करता है।
हरियाणा मानव अधिकार आयोग ने पानीपत के रामपुरा कॉलोनी, काबरी रोड स्थित ट्रांसफार्मर के असुरक्षित एल.टी. फ्यूज बोर्ड के कारण नाबालिग बालक रूद्र की करंट लगने से हुई मृत्यु के मामले में गंभीर रुख अपनाते हुए बिजली विभाग और नगर निगम पानीपत दोनों की लापरवाही पर कड़ी टिप्पणी की है।
पुलिस अधीक्षक, पानीपत द्वारा दिनांक 27.10.2025 की रिपोर्ट आयोग को प्राप्त हुई है, जिसके अनुसार एफआईआर संख्या 80 दिनांक 06.02.2024, धारा 304-ए आईपीसी, थाना ओल्ड इंडस्ट्रियल एरिया, पानीपत में दर्ज मामले में आरोपी संदीप पुत्र बलबीर सिंह को गिरफ्तार किया जा चुका है तथा जांच पूर्ण होने के उपरांत अंतिम रिपोर्ट (चालान) न्यायालय में प्रस्तुत कर दी गई है। मामला 20.03.2026 को अभियोजन साक्ष्य हेतु नियत है। अधीक्षण अभियंता (ओपी) सर्कल, उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम (यूएचबीवीएन), पानीपत की दिनांक 10.09.2025 की रिपोर्ट भी प्राप्त हुई है।
हरियाणा मानव अधिकार आयोग ने यूएचबीवीएन, पानीपत के अधीक्षण अभियंता द्वारा दायर रिपोर्ट का सावधानीपूर्वक परीक्षण किया है, जो नाबालिग रूद्र की विद्युत करंट लगने से हुई मृत्यु से संबंधित है। अध्यक्ष जस्टिस ललित बत्रा तथा दोनों सदस्यों कुलदीप जैन और दीप भाटिया को मिलाकर बने पूर्ण आयोग इस रिपोर्ट से, विशेषकर मुआवजा संबंधी पहलू से, बिल्कुल संतुष्ट नहीं है। यह पाया गया है कि विभागीय अधिकारियों को दोषी ठहराने और सार्वजनिक सुरक्षा मानकों के पालन में लापरवाही स्वीकार किए जाने के बावजूद पीड़ित परिवार को मात्र ₹1,00,000/- की अल्प वित्तीय सहायता प्रदान की गई है, जो घटना की गंभीरता और परिवार द्वारा झेले गए अपूरणीय नुकसान के मद्देनज़र पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। आयोग का मत है कि यूएचबीवीएन उचित और न्यायसंगत मुआवजे के निर्धारण और वितरण के लिए समयबद्ध एवं उपयुक्त कार्रवाई करने में विफल रहा है।
अतः अधीक्षण अभियंता (ओपी) सर्कल, यूएचबीवीएन, पानीपत को निर्देशित किया जाता है कि वे अगली सुनवाई तिथि पर व्यक्तिगत रूप से हरियाणा मानव अधिकार आयोग के समक्ष उपस्थित हों और यह स्पष्ट करते हुए एक नवीन स्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत करें कि ₹1,00,000/- मुआवजा राशि निर्धारित करने हेतु कौन-सा आधार और मानदंड अपनाया गया, साथ ही विभागीय नियम/निर्देश भी प्रस्तुत किए जाएं तथा मुआवजा पुनः निर्धारित करने और बढ़ाने के लिए अब तक उठाए गए कदमों की जानकारी भी प्रदान करें।
आयुक्त, नगर निगम, पानीपत द्वारा विस्तृत रिपोर्ट दिनांक 12.09.2025 भी प्राप्त हुई है, जिसमें यह बताया गया है कि विद्युत करंट लगने की दुखद घटना 06.02.2024 को वार्ड नंबर 24, रामपुरा कॉलोनी, काबरी रोड, पानीपत में हुई। यह भी उल्लेख किया गया है कि सड़क निर्माण कार्य (जून 2023) के दौरान सड़क स्तर मात्र लगभग छह (6) इंच ही ऊँचा किया गया था। यह वृद्धि नियमित सड़क सुदृढ़ीकरण एवं पक्का करने की प्रक्रिया का हिस्सा थी।
रिपोर्ट अनुसार, नगर निगम, पानीपत ने एक रिपोर्ट तैयार कर उपायुक्त, पानीपत को भेजी है, जिसमें सड़क निर्माण से पहले व बाद की स्थिति के फोटोग्राफ शामिल हैं, जो सड़क की कच्ची/अर्ध-पक्की अवस्था और ट्रांसफार्मर तथा एल.टी. फ्यूज बोर्ड की कम ऊँचाई दर्शाते हैं। 63 केवीए ट्रांसफार्मर (11 केवी रामपुरा फीडर) का एल.टी. फ्यूज बोर्ड सड़क कार्य से पूर्व ही असुरक्षित एवं कम ऊँचाई पर स्थित था। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि क्षेत्र के निवासी, जिनमें श्री सांचित बत्रा भी शामिल हैं, ने एल.टी. फ्यूज बोर्ड की ऊँचाई कम होने की शिकायतें बार-बार बिजली विभाग को दी थीं। क्षेत्रीय लाइनमैन प्रत्येक 15 दिन में फ्यूज फेल होने पर साइट पर आता था तथा मीटर रीडर भी नियमित रूप से आता था।
नगर निगम-पानीपत, द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट से हरियाणा मानव अधिकार आयोग संतुष्ट नहीं है। आयोग यह अवलोकन करता है कि यद्यपि नगर निगम, पानीपत यह दावा करता है कि सड़क स्तर मात्र लगभग छह (6) इंच ही बढ़ा था, लेकिन कार्य आरंभ करने से पहले नगरपालिका द्वारा बिजली विभाग (यूएचबीवीएन) से कोई पूर्व समन्वय अथवा लिखित सूचना नहीं की गई, जबकि क्षेत्र में सक्रिय विद्युत संरचनाएँ मौजूद थीं। विभिन्न विभागों के बीच उचित समन्वय अत्यावश्यक है ताकि सड़क निर्माण/मरम्मत के दौरान ट्रांसफार्मर, एल.टी. बोर्ड अथवा विद्युत पोलों को सुरक्षित ऊँचाई पर समायोजित किया जा सके। ऐसा न करना प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाता है।
यहाँ तक कि यदि ट्रांसफार्मर की असुरक्षित स्थिति पूर्व से विद्यमान थी, तब भी स्थानीय निकाय होने के नाते नगर निगम, पानीपत अपनी जिम्मेदारी से पूर्णतया मुक्त नहीं हो सकता। सार्वजनिक सड़कों पर खतरनाक स्थिति में स्थित एल.टी. फ्यूज बोर्ड की निरंतर मौजूदगी यह दर्शाती है कि निगम संभावित खतरे की पहचान कर उसे संबंधित विभाग के संज्ञान में लाने में विफल रहा।
उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर जस्टिस ललित बत्रा की अध्यक्षता वाले पूर्ण आयोग पाता है कि नगर निगम, पानीपत ने अत्यधिक आबादी वाले क्षेत्र में स्थित इस खतरनाक विद्युत संरचना के चारों ओर कोई बैरिकेडिंग, फेंसिंग अथवा चेतावनी बोर्ड नहीं लगाए, जबकि यह नागरिकों—विशेषकर बच्चों—की सुरक्षा के लिए आवश्यक था। यद्यपि विद्युत करंट लगने की घटना का तात्कालिक कारण यूएचबीवीएन, पानीपत के अधीन असुरक्षित एल.टी. फ्यूज बोर्ड था, परन्तु नगर निगम, पानीपत भी अपने वैधानिक दायित्वों में विफल रहा है, क्योंकि उसने कार्य शुरू करने से पहले समुचित समन्वय नहीं किया, सुरक्षा का सत्यापन नहीं किया और आवश्यक सावधानियाँ नहीं बरतीं।
आयोग के प्रोटोकॉल, सूचना व जनसम्पर्क अधिकारी डॉ. पुनीत अरोड़ा ने बताया कि उपलब्ध तथ्यों और गंभीर आरोपों को देखते हुए हरियाणा मानव अधिकार आयोग ने आयुक्त, नगर निगम, पानीपत को निर्देशित किया जाता है कि वे उपर्युक्त बिन्दुओं पर नवीन स्थिति रिपोर्ट अगली सुनवाई तिथि तक प्रस्तुत करें। इसके अतिरिक्त, आयोग ने इस मामले से संबंधित एफआईआर संख्या 80 दिनांक 06.02.2024 (धारा 304-ए IPC), थाना ओल्ड इंडस्ट्रियल एरिया, पानीपत के जांच अधिकारी को भी अगली सुनवाई पर सम्पूर्ण जांच रिकॉर्ड सहित उपस्थित होने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 15 जनवरी 2026 को निर्धारित की गई है।
इसके अतिरिक्त, प्रधानमंत्री द्वारा महाभारत अनुभव केंद्र का अवलोकन भी किया जाएगा और इस महाभारत अनुभव केंद्र को देश व विदेश के पर्यटकों के लिए खोल दिया जाएगा। इसी परिसर में पंचजन्य का उदघाटन भी प्रधानमंत्री द्वारा किया जायेगा। इसके साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव कार्यक्रम में शिरकत करेंगे और महाआरती में भाग लेंगे।
हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि श्री गुरु तेग बहादुर जी ने मानवता, धर्म और देश की रक्षा के लिए महान बलिदान दिया जिसे प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंचाना आवश्यक है ताकि आने वाली पीढिय़ां इस प्रेरणादायक इतिहास से सीख ले सके।
मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी शुक्रवार को कुरुक्षेत्र ज़िले के ज्योतिसर कार्यक्रम स्थल का निरीक्षण करने के उपरांत पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। इससे पहले मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी सहित मुख्य सचिव अनुराग रस्तोगी, सूचना, जनसंपर्क एवं भाषा विभाग के महानिदेशक के. एम. पांडुरंग, पूर्व मंत्री सुभाष सुधा, पर्यटन विभाग की प्रधान सचिव कला रामचंद्रन, पर्यटन विभाग के निदेशक डा. शालीन, ओएसडी डॉ प्रभलीन सिंह ने कार्यक्रम स्थल और अनुभव केंद्र का निरीक्षण किया।
मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश देते हुए कहा कि श्री गुरु तेग बहादुर जी के 350वें शहीदी वर्ष के उपलक्ष्य में प्रदेशभर में चार पवित्र नगर कीर्तन यात्राएं निकाली जा रही है, जो हरियाणा के सभी जिलों से गुजरेंगी। इन यात्राओं का समापन 24 नवंबर को कुरुक्षेत्र में होगा, 25 नवंबर को श्री गुरु तेग बहादुर जी के शहीदी वर्ष पर कुरुक्षेत्र में समागम का आयोजन होगा, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे।
मुख्यमंत्री ने कहा कि हरियाणा सरकार भी गुरुओं और महापुरुषों की परंपरा, शिक्षा और त्याग को आगे बढ़ाने के लिए निरंतर कार्य कर रही है। इसी कड़ी में राज्य सरकार ने श्री गुरु नानक देव जी की 550वीं जयंती को बड़े सम्मान और श्रद्धा के साथ मनाया और अब श्री गुरु तेग बहादुर जी के 350वें शहीदी वर्ष को भी बड़े स्तर पर आयोजित किया जा रहा है। उन्होंने प्रदेश सरकार द्वारा किए गए विभिन्न कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि गुरुओं के बलिदान और मानवता के लिए किए गए अतुलनीय योगदान को जन-जन तक पहुंचाना सरकार का संकल्प है ताकि आने वाली पीढिय़ां इन पावन प्रेरणाओं से मार्गदर्शन प्राप्त कर सकें।
हरियाणा में इस एक दिन की कार्रवाई में पुलिस ने 75 मामले दर्ज करते हुए 98 कुख्यात अपराधियों को गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे पहुँचाया है। इसके अलावा अन्य अपराधों में संलिप्त 256 अपराधी भी जेल भेजे गए है। वही इसके अलावा, प्रदेश पुलिस ने एक और उपलब्धि हासिल की जिसमें अकेले एक ही दिन में 81 अपराधियों की हिस्ट्री शीट खोली गई है। यह संख्या पिछले 12 दिन में अब तक खोली गई कुल हिस्ट्री शीट (179) में एक महत्वपूर्ण वृद्धि है, जिससे हिस्ट्री शीट की कुल संख्या अब 260 पर पहुँच गई है। अगर इस ऑपरेशन की कुल सफलता पर नज़र डालें तो अब तक ऑपरेशन ट्रैकडाउन के तहत अब तक कुल 768 कुख्यात अपराधी पकड़े जा चुके हैं, और वहीं अन्य अपराधों में भी पुलिस ने 2980 अपराधियों को गिरफ्तार किया है।
इस ऑपरेशन की सफलता में विभिन्न जिलों का योगदान सराहनीय रहा है। इस एक दिन की बात करें तो, कुख्यात अपराधियों को पकड़ने में झज्जर जिला आज सबसे आगे रहा, जिसने 18 केसों में 21 गिरफ्तारियाँ करके शीर्ष स्थान हासिल किया है । इसके बाद कुख्यात अपराधियों में पकड़ने में करनाल (9), कैथल (8), और रोहतक (8) जिले आगे रहे। वहीं हिस्ट्री शीट खोलने के मामले में, सोनीपत जिले ने सर्वाधिक 26 अपराधियों की हिस्ट्री शीट खोलकर अपनी तत्परता दिखाई है । इसके अलावा, रोहतक ने 16 और गुरुग्राम ने 11 अपराधियों की हिस्ट्री शीट खोलकर संगठित अपराधों पर लगाम लगाने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया है ।
दर्ज किए गए कुल मामलों पर नज़र डालें तो, ऑपरेशन ट्रैकडाउन के तहत एक दिन में कुल 75 केस दर्ज हुए और 98 गिरफ्तारियाँ हुईं । अपराधों की श्रेणी में, आर्म्स एक्ट के तहत सर्वाधिक 27 केस दर्ज किए गए और 33 गिरफ्तारियाँ हुईं । वहीं, ‘हत्या के प्रयास’ (Attempt to Murder) के 16 केस में 23 गिरफ्तारियाँ और ‘लूट’ (Robbery) के 6 केस में 10 गिरफ्तारियाँ हुईं । ‘उगाही’ (Extortion) के 10 केस में 10 गिरफ्तारियाँ दर्ज की गईं । यह व्यापक कार्रवाई पुलिस की बहुआयामी रणनीति को दर्शाती है, जिसका उद्देश्य सिर्फ गिरफ्तारी ही नहीं, बल्कि अपराधों की जड़ पर प्रहार करना है।
ऑपरेशन ट्रैकडाउन को आगे बढ़ाते हुए, करनाल पुलिस ने 18 नवंबर 2025 को ज़मीन पर अवैध कब्जा करने की कोशिश करने वाले दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है। थाना रामनगर की टीम ने शिकायतकर्ता अनिल कुमार की शिकायत पर अनुसंधान अधिकारी सहायक उप निरीक्षक विनोद कुमार की टीम ने आरोपी रमेश पुत्र रघुनाथ (निवासी रामनगर, करनाल) और विशाल वालिया पुत्र अमरजीत सिंह (निवासी करनाल) को प्रेम नगर से काबू किया है। इन आरोपियों ने अपने अन्य साथियों के साथ मिलकर दिनांक 16 नवंबर 2025 को यमुना विहार कॉलोनी, करनाल में प्लॉटों पर अवैध कब्जा करने का प्रयास किया था। जाँच में यह बड़ा खुलासा हुआ है कि मुख्य आरोपी रमेश पुत्र रघुनाथ के खिलाफ इस मामले के अलावा विभिन्न गंभीर अपराधों के तहत छह मामले पहले से ही दर्ज हैं। उसके खिलाफ दर्ज मुकदमों में 2011 में धारा 384 (जबरन वसूली) और 25 आर्म्स एक्ट के तहत दर्ज मामले और 2022 में धारा 307 (हत्या का प्रयास) के तहत दर्ज मामला शामिल है। दोनों आरोपियों को अदालत में पेश कर पुलिस ने एक दिन का रिमांड हासिल किया है, जिसके दौरान वारदात में इस्तेमाल हथियार और मामले में संलिप्त अन्य आरोपियों को गिरफ्तार करने के लिए गहनता से पूछताछ की जाएगी।
इसी कड़ी में करनाल पुलिस ने ऑपरेशन ट्रैक डाउन में अपनी कार्रवाई को आगे बढ़ाते हुए पुरानी रंजिश के चलते लड़ाई-झगड़े के मामले में वांछित चल रहे चार अन्य आरोपियों को भी 18 नवंबर 2025 को गिरफ्तार किया है। थाना शहर की टीम ने गुप्त सूचना के आधार पर सहायक उप निरीक्षक दीपक कुमार की टीम ने बबली पुत्र ओमप्रकाश, जसराम पुत्र सुशील कुमार, प्रदीप पुत्र बबली, और सागर पुत्र जगदीश को काबू किया। ये सभी आरोपी दिनांक 26 अप्रैल 2025 को मीरा घाटी पार्क में शिकायतकर्ता मोहित और उसके दोस्त के साथ गाली-गलौच और लाठी-डंडों से मारपीट कर मौके से फरार हो गए थे, जिसके संबंध में थाना शहर में मुकदमा दर्ज था। इस मामले में पहले भी पाँच आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। पूछताछ में यह सामने आया है कि मुख्य आरोपी बबली पुत्र ओमप्रकाश के खिलाफ भी विभिन्न धाराओं के तहत छह मामले दर्ज हैं, जिसमें 2015 में 25 आर्म्स एक्ट के तहत दर्ज मुकदमा और 2019 में जबरन वसूली (धारा 384) के तहत दर्ज मामला शामिल है। पुलिस सभी आरोपियों से पूछताछ कर रही है ताकि मामले में संलिप्त अन्य पहलुओं का भी खुलासा किया जा सके।
माया, जो कभी सर्कस में दर्शकों का मनोरंजन करने के लिए मजबूर हथिनी थी, और बिजली, जो पहले आगरा की सड़कों पर भीख मांगती थी, जिसे एक दुखद सड़क हादसे के बाद बचाया गया था, दोनों को 2010 में केंद्र में लाया गया। आज, दोनों हथिनी पुनर्वास, करुणा और प्रेम एवं देखभाल की परिवर्तनकारी शक्ति के जीवंत प्रमाण हैं।
वर्षों के दुर्व्यवहार से बचाई गईं माया और बिजली, गहरे भावनात्मक और शारीरिक ज़ख्मों के साथ हाथी संरक्षण एवं देखभाल केंद्र पहुँचीं पिछले डेढ़ दशक में, दोनों हथिनियाँ विशेषज्ञ पशु चिकित्सकों की देखरेख में फल-फूल रही हैं, एवं विश्वास और दोस्ती के साथ जीवन जीने का आनंद उठा रही हैं। माया ने अपनी दोस्त फूलकली के साथ एक गहरा रिश्ता बना लिया है, जबकि बिजली अपनी साथ हथनियां चंचल और लक्ष्मी के साथ घनिष्ठ विश्वास का बंधन बना चुकी है, और अपना दिन पसंदीदा भोजन खाने, मड बाथ और लंबी सैर का आनंद लेने में बिताती है।
51 वर्षीय माया और 45 वर्षीय बिजली, अपनी स्वास्थ्य चुनौतियों के बावजूद, वाइल्डलाइफ एसओएस की समर्पित देखभाल में फल-फूल रही हैं। माया, जिसकी दृष्टि कमज़ोर है, और बिजली, जिसका पिछला पैर पुराने फ्रैक्चर के कारण विकृत हो गया है, नियमित उपचार, पोषण और देखभाल प्राप्त कर रही हैं। दोनों ने विशेषज्ञ चिकित्सा देखभाल और सहानुभूतिपूर्ण पुनर्वास के माध्यम से उल्लेखनीय सुधार दिखाया है। उनके रेस्क्यू की 15वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में, वाइल्डलाइफ एसओएस टीम ने एक भव्य फल भोज का आयोजन किया, जिसमें गन्ना, तरबूज, पपीता, केला, चुकंदर और फूलगोभी का रंग-बिरंगा व्यंजन परोसा गया, जो दर्द से शांति की ओर उनके उल्लेखनीय सफ़र के जश्न का एक छोटा उपहार था।
वाइल्डलाइफ एसओएस के सह-संस्थापक और सीईओ, कार्तिक सत्यनारायण ने कहा, “माया और बिजली की यात्रा वाइल्डलाइफ एसओएस के सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करती है- क्रूरता को देखभाल में बदलना। उनका जीवन हमें याद दिलाता है कि हर रेस्क्यू केवल जीवित रहने की कहानी नहीं है, बल्कि आशा की एक बड़ी उम्मीद भी है।”
वाइल्डलाइफ एसओएस की सह-संस्थापक और सचिव, गीता शेषमणि ने कहा, “पंद्रह साल पहले, माया और बिजली को सिर्फ़ मुश्किलें ही झेलनी पड़ीं। आज, वे दया, संगति और सुरक्षा के बीच रहती हैं। उनका यह बदलाव हमें हर उस हाथी के लिए लड़ते रहने की प्रेरणा देता है जो आज भी इस मौके का इंतज़ार कर रहे है।”
वाइल्डलाइफ एसओएस के पशु चिकित्सा सेवाओं के उप निदेशक, डॉ. एस इलियाराजा ने कहा, “दर्दनाक चोटों और आघात से ग्रस्त हाथियों की देखभाल एक दीर्घकालिक प्रतिबद्धता है। 15 वर्षों के समर्पित पुनर्वास के बाद माया और बिजली को स्वस्थ और संतुष्ट देखना दर्शाता है कि उचित पशु चिकित्सा देखभाल से क्या हासिल किया जा सकता है।”
बिहार के 2025 विधानसभा चुनाव ने भारतीय राजनीति की किताब में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। लंबे समय से चली आ रही सत्ता-विरोधी लहर को पीछे छोड़ते हुए नीतीश कुमार के नेतृत्व में भाजपा-नीत NDA ने वह जीत हासिल की है, जिसकी बहुत कम लोगों ने कल्पना की थी। यह चुनाव एक कांटे की टक्कर माना जा रहा था, लेकिन ‘महागठबंधन’ अपनी अंदरूनी कलह, कमजोर रणनीति और अधूरे वादों के बोझ तले ढह गया। लेकिन असली गेम-चेंजर वह ताकत बनी, जिसकी ओर राजनीतिक दल अक्सर आख़िरी में देखते हैं वह है महिला मतदाता।
Tehelka की कवर स्टोरी “NDA Scripts Historic Win in Bihar” में Vibha Sharma बताती हैं कि कैसे भाजपा-नीत NDA ने कांग्रेस–RJD गठबंधन को पछाड़ते हुए बिहार में ऐतिहासिक जीत दर्ज की, और इसमें निर्णायक भूमिका महिलाओं की रही। बिहार के इतिहास में पहली बार महिला मतदाताओं की भागीदारी पुरुषों से अधिक रही—महिलाओं का मतदान प्रतिशत 71.6%, जबकि पुरुषों का 62.8% था। यह आंकड़ा सिर्फ़ रिकॉर्ड नहीं था, बल्कि उसने चुनाव का रुख़ पलट दिया। महिलाओं ने NDA को उसके वास्तविक लाभ देने वाले कामों के लिए पुरस्कृत किया जैसे “दस हज़ारी” योजना, जिसके तहत 1.2 करोड़ से अधिक महिलाओं को 10,000 रुपये का प्रत्यक्ष लाभ मिला।
दूसरी ओर, विपक्ष केवल वादे करता रहा। NDA की जीत का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय लोकप्रियता और नीतीश कुमार के शासन मॉडल की उस विश्वसनीयता को भी जाता है, जिसे “डबल इंजन सरकार” के रूप में पेश किया गया। मतदाताओं ने स्थिरता, विकास और कल्याण की राजनीति को चुना, जबकि विपक्ष का जातिगत समीकरण और विभाजनकारी भाषण असर खो बैठा।
तेजस्वी यादव की RJD, लगातार कोशिशों के बावजूद, “जंगल राज” की छवि से पीछा नहीं छुड़ा पाई। उनके प्रयास कि वे लालू प्रसाद यादव की विरासत से खुद को अलग दिखाएँ, जनता के बीच ज्यादा असरदार नहीं हुए। महागठबंधन की आंतरिक खींचतान ने स्थिति को और बिगाड़ दिया। कांग्रेस केवल 6 सीटें जीत पाई, और राहुल गांधी के चुनाव-प्रचार से दूर रहने ने विपक्ष की एकता पर सवाल खड़े कर दिए। वहीं, प्रशांत किशोर का जन सुराज अभियान विपक्षी वोटों में और दरार डाल गया।
इन परिणामों ने बिहार की राजनीति को एक नया समीकरण दे दिया है। महिलाएँ अब एक निर्णायक राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरकर सामने आई हैं, और यह संकेत है कि राज्य की राजनीति परंपरागत जातीय ढाँचों से आगे बढ़ रही है। विपक्ष के लिए यह स्पष्ट संदेश है कि NDA जैसी मज़बूत चुनौती देने के लिए केवल जोश नहीं, बल्कि एकता, विश्वसनीय नेतृत्व और स्पष्ट कल्याणकारी एजेंडा ज़रूरी है।
महागठबंधन के लिए बिहार की जनता कह रही है “सिर्फ़ वादे नहीं, काम करके दिखाइए।” NDA की इस जीत के साथ अब भाजपा की नजर पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल पर है—जहाँ महिला मतदाताओं की इसी नई उभरती शक्ति के आधार पर आने वाले चुनावों की दिशा बदल सकती है।
अपनी इसी खोजी परंपरा को जारी रखते हुए, Tehelka की विशेष जांच टीम ने एक और बड़ा खुलासा किया है—कैसे मीडिया संस्थान राजनीतिक दलों के साथ मिलकर ‘पेड न्यूज़’ के ज़रिए चुनावी नैरेटिव को प्रभावित करते हैं। अखबारों, मैगज़ीनों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में इस तरह की खबरें विज्ञापन जैसी दिखती हैं, पर विज्ञापन का टैग नहीं होता। समाज को लंबे समय से प्रभावित कर रहे इस ‘पेड न्यूज़’ उद्योग की तह तक जाने के लिए Tehelka ने गहन जांच की—जिसका नतीजा है हमारी विशेष रिपोर्ट: “द पेड न्यूज़ फ़ाइल्स।”
दिल्ली की भीड़भाड़ शाम में पर्यटक, इतिहास और कैमरों की क्लिक सब कुछ सामान्य था। लेकिन अगले कुछ सेकंड में एक धमाके ने लाल क़िले की सैकड़ों साल पुरानी दीवारों को कंपा दिया। देश की सबसे सुरक्षित धरोहरों में शामिल इस परिसर के भीतर हुआ यह विस्फोट सिर्फ़ एक हमला नहीं था, बल्कि एक संकेत था।आतंकवाद का नया संस्करण हमारे सामने खड़ा है, और इसकी जड़ें कहीं ज्यादा भीतर तक फैली हुई हैं।
जांच टीम जब घटनास्थल से सबूत उठाने लगी, तो जल्द ही यह स्पष्ट हो गया कि यह कोई साधारण आतंकी कार्रवाई नहीं थी।इस घटना को अंजाम देने के पीछे किसी छोटे आतंकवादी का नहीं बल्कि किसी बड़े, साफ-सुथरे, प्रतिष्ठित और ‘व्हाइट-कॉलर’ शख्स का था।
जबकि देश में आतंकवादी संगठनों की पारंपरिक भर्ती में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की जा रही है, लेकिन सुरक्षा एजेंसियाँ एक नए और खतरनाक रुझान को लेकर सतर्क हैं। अब आतंकवाद का चेहरा बदल रहा है । हथियार उठाने वालों की संख्या घटी है, पर ‘वाइट-कॉलर आतंकियों’ यानी पढ़े-लिखे और पेशेवर सहयोगियों का नेटवर्क तेज़ी से फैल रहा है।
सुरक्षा एजेंसियों के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में इस वर्ष अब तक केवल दो नए रिक्रूट सामने आए हैं। 2023 में यह संख्या 17, 2022 में 120, 2021 में 124 और 2020 में लगभग 200 थी। भले यह गिरावट राहत देती हो, पर विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि खतरा अब “अदृश्य” रूप में समाज के भीतर पनप रहा है।
बदलता पैटर्न: हथियार कम, लेकिन सपोर्ट सिस्टम मज़बूत
खुफिया सूत्रों का कहना है कि अब आतंकी संगठन ओवर-ग्राउंड नेटवर्क (OGW) और लॉजिस्टिक सपोर्ट सिस्टम पर ज़ोर दे रहे हैं। ये वाइट-कॉलर सहयोगी सीधे हथियार नहीं उठाते, बल्कि आतंकियों को सूचना, फंडिंग, रहने की जगह और प्रचार-प्रसार में सहायता करते हैं।
इनकी पहचान मुश्किल होती जा रही है क्योंकि ये लोग आम नागरिकों की तरह पेशेवर जीवन जीते हैं और समाज में घुले-मिले रहते हैं।
राष्ट्रीय खुफिया ब्यूरो (IB) और राज्य स्तरीय IB विंग्स ने हाल के महीनों में ऐसे नेटवर्कों पर कड़ी निगरानी बढ़ाई है। सूत्रों के अनुसार, कई शिक्षित पेशेवर आईटी, मेडिकल, सोशल सेक्टर और बिज़नेस पृष्ठभूमि के लोग संदिग्ध गतिविधियों में पाए गए हैं।
एजेंसियाँ इन प्रोफेशनल्स की डिजिटल गतिविधियों, वित्तीय ट्रांजैक्शनों और संपर्कों की गहन जांच कर रही हैं ताकि किसी बड़े आतंकी षड्यंत्र को समय रहते रोका जा सके।
रैडिकलाइज़ेशन का नया चेहरा , स्थानीय नागरिकों का परिवर्तन
एक सुरक्षा अधिकारी का कहना है कि पहले अधिकांश आत्मघाती हमलों के पीछे पाकिस्तान से भेजे गये या संगठनों द्वारा भेजे गये आतंकवादी रहते थे। अब खुफिया रिपोर्ट में ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि कुछ भारतीय नागरिकों को मानसिक रूप से रैडिकलाइज (ब्रेनवॉश) कर के आत्मघाती या हिंसक गतिविधियों के लिये प्रेरित किया जा रहा है। अधिकारी इसे ‘‘ब्रेन-वॉश की ऊँची स्तर’’ बताते हैं और कहते हैं कि यह प्रक्रिया समाज के भीतर धीरे-धीरे काम करती है । ऑनलाइन प्रचार, संदिग्ध संपर्क और प्रेरक लोकल नेटवर्क के जरिए।
एजेंसियों ने यह भी बताया कि जिन धमाका, विस्फोटक सामग्रियों का उपयोग हुआ, वे हमेशा घरेलू स्रोतों से नहीं आते। कई मामलों में शक है कि विस्फोटक या उनके घटक देश के बाहर से आए स्रोतों से मंगवाए गए या भेजे गए हैं। कुछ खुफिया संकेतों के अनुसार ऐसी सामग्री को देश के विभिन्न हिस्सों में छिपाकर रखा जा सकता है । इसलिए सुरक्षा उपाय सिर्फ सीमाओं पर ही नहीं बल्कि आंतरिक तह में भी तेज किए जा रहे हैं।
अधिकारियों का कहना है कि हिंसक रिक्रूटमेंट में गिरावट सकारात्मक है, पर वाइट-कॉलर सहयोगियों और देशी रैडिकलाइज़ेशन की बढ़ती घटनाएँ एक नई सुरक्षा चुनौती पेश करती हैं। इसलिए खुफिया एकीकरण, स्थानीय पुलिस-इंटेलिजेंस तालमेल, डिजिटल मॉनिटरिंग और नागरिक जागरूकता को बढ़ाना अनिवार्य माना जा रहा है। साथ ही सीमा सुरक्षा के साथ-साथ घरेलू सप्लाई चेन और फंडिंग चैनलों की भी गहन जाँच चल रही है।
सुरक्षा तंत्रों के मुताबिक केवल रिक्रूटमेंट के घटते आंकड़ों से संतोष नहीं किया जा सकता; तब तक पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित नहीं मानी जाएगी जब तक ओवर-ग्राउंड नेटवर्क, फंडिंग सूत्र और रैडिकलाइज़ेशन के स्थानीय ढांचे प्रभावी रूप से बाधित न किए जाएँ। सरकार और नागरिक समाज दोनों की भूमिका अब पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है । सूचना देना, संदिग्ध गतिविधियों की रिपोर्ट करना और सामुदायिक निगरानी बढ़ाना आवश्यक है। लाल क़िला—एक हमले से ज्यादा, एक चेतावनी थी
यह घटना हमसे कहती है—
सुरक्षा केवल दीवारों और हथियारों पर नहीं टिकी,
बल्कि उन लोगों की नीयत पर भी जो सिस्टम को संभालते हैं। हमले के बाद कई अफसरों ने यह स्वीकारा कि देश की सुरक्षा अब बॉर्डर केंद्रित नहीं,
बल्कि “नेटवर्क केंद्रित” हो चुकी है। अगर इस नए खतरे को नहीं समझा गया, तो बंदूक उठाने वाले कम होंगे पर उन्हें सपोर्ट देने वाला नेटवर्क और अधिक खतरनाक हो जाएगा।
अंतिम निष्कर्ष
“लड़ाई अब बंदूकों से नहीं, दिमागों से है।
दुश्मन सीमा पर नहीं, सिस्टम के भीतर है।
और इसे हराने के लिए सिर्फ़ सेना नहीं, समाज की जागरूकता भी जरूरी है।
आतंकवाद का यह नया चेहरा, अदृश्य भी है,
बुद्धिमान भी और कहीं ज्यादा शक्तिशाली भी।
देश की सुरक्षा एजेंसियों के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती इस व्हाइट-कॉलर जंगल में छिपे उन सायों को ढूँढने की है, जो हाथ में हथियार नहीं रखते,
हरियाणा पुलिस के विशेष अभियान ऑपरेशन ट्रैक डाउन के तहत एसटीएफ यूनिट पलवल ने एक महत्वपूर्ण कार्रवाई करते हुए नूंह जिले के कुख्यात और ₹5000 के इनामी बदमाश राहुल उर्फ धौलू को हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में स्थित मनाली से गिरफ्तार कर लिया। आरोपी के खिलाफ हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में कई संगीन मामलों में संलिप्त होने के आरोप हैं। वह थाना सदर नूंह एवं पुलिस स्टेशन रोज़का मेव में दर्ज एफआईआर संख्या 151, दिनांक 17 अगस्त 2025 में वांछित चल रहा था, जिसके चलते उसकी गिरफ्तारी पर ₹5000 का इनाम घोषित किया गया था। एसटीएफ ने गुप्त सूचना और तकनीकी निगरानी के आधार पर उसे मनाली में दबोच लिया।
राहुल उर्फ धौलू का आपराधिक रिकॉर्ड अत्यंत चिंताजनक है और वह डकैती, यौन अपराध, अपहरण, हत्या के प्रयास और धमकी सहित कुल सात मामलों में वांछित रहा है। वर्ष 2014 में थाना सदर नूंह में यौन अपराध और अपहरण का मामला दर्ज हुआ। वर्ष 2020 में सदर सोहना, गुरुग्राम में धारा 395 आईपीसी के तहत डकैती का मुकदमा और वर्ष 2021 में थाना डीएलएफ फेज-1, गुरुग्राम में धारा 160 आईपीसी के तहत मुकदमा पंजीकृत हुआ। वर्ष 2022 में नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उसके खिलाफ डकैती और चोरी का माल रखने का मामला दर्ज किया गया, जबकि इसी वर्ष थाना सदर नूंह में उस पर हत्या के प्रयास और धमकी का एक और मुकदमा दर्ज हुआ। आरोपी को सदर सोहना, गुरुग्राम के एक मामले में अदालत द्वारा प्रोक्लेम्ड ऑफेंडर भी घोषित किया जा चुका था। गिरफ्तारी के बाद उसे आगे की कानूनी कार्रवाई हेतु गुरुग्राम पुलिस के पीओ स्टाफ के हवाले कर दिया गया है।
ऑपरेशन ट्रैक डाउन
5 से 16 नवंबर 2025 तक चलाया गया ये अभियान राज्य में सक्रिय संगठित अपराध और आपराधिक गिरोहों के खिलाफ बेहद प्रभावी सिद्ध हुआ है। इस 12 दिवसीय कार्रवाई के दौरान हरियाणा पुलिस ने आर्म्स एक्ट, हत्या, हत्या के प्रयास, रंगदारी, डकैती, लूट, झपटमारी और अपहरण जैसे जघन्य अपराधों से जुड़े कुल 518 मामलों में 670 अपराधियों को गिरफ्तार किया। अन्य मामलों में 2724 अतिरिक्त गिरफ्तारियाँ की गईं। अभियान में 179 हिस्ट्रीशीट या व्यक्तिगत फाइलें खोली गईं तथा बड़ी मात्रा में अवैध हथियार बरामद किए गए, जिनमें 250 कारतूस/कार्टिलेज, 21 देशी कट्टे, 55 पिस्तौल, 7 मैगज़ीन, 2 रिवॉल्वर और 4 बंदूकें शामिल हैं।
16 नवंबर को हरियाणा पुलिस ने राज्यभर में संगठित और गंभीर अपराधों के खिलाफ गहन कार्रवाई करते हुए 48 गंभीर मामले दर्ज किए और इन मामलों में शामिल 60 अपराधियों को गिरफ्तार किया। इस कार्रवाई में गुरुग्राम, पलवल, भिवानी और झज्जर जिलों ने प्रमुख भूमिका निभाई। गुरुग्राम में 13 मामलों में 14 गिरफ्तारियाँ, पलवल में 8 मामलों में 9 गिरफ्तारियाँ, भिवानी में 4 मामलों में 8 गिरफ्तारियाँ और झज्जर में 7 मामलों में 8 गिरफ्तारियाँ दर्ज की गईं। फरीदाबाद में हत्या के 3 मामलों में 5 गिरफ्तारियाँ हुईं। इसके साथ ही 29 नए हिस्ट्रीशीट भी खोले गए, जिनमें कुरुक्षेत्र जिला सबसे आगे रहा।
पेड न्यूज या पेड कंटेंट से तात्पर्य समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रकाशित उन लेखों अथवा खबरों से है, जिनके लिए बाकायदा प्रकाशन के माध्यमों के लिए भुगतान किया जाता है। संस्थान खबरों को प्रकाशित-प्रसारित करने के लिए तय रकम देते हैं और मीडिया संस्थान उनके लिए उनके अनुकूल परिस्थितियां खबरों के माध्यम से तैयार करते हैं। ऐसी खबरें विज्ञापनों जैसी होती हैं, लेकिन विज्ञापन टैग के बिना। इस प्रकार के समाचार को लंबे समय से एक गंभीर कदाचार माना जाता रहा है, क्योंकि यह खबरें नागरिकों, पाठकों से सही तथ्यों को छिपाकर उन्हें धोखा देती हैं। खबरों के रूप में दिखाई देने वाली ये सामग्री वास्तव में एक विज्ञापन ही होती हैं। दूसरी बात इस तरह की खबरों के लिए किए जाने वाले भुगतान के तरीके अक्सर कर नियमों और चुनाव व्यय कानूनों का उल्लंघन करते हैं। इससे अधिक गंभीर बात यह है कि इससे चुनावी चिंताएं पैदा होती हैं, क्योंकि मीडिया सीधे तौर पर मतदाताओं को प्रभावित करता है। पेड न्यूज को भ्रष्टाचार का एक रूप माना जाता है और यह अक्सर चुनावों के दौरान देखा जाता है। इसका उपयोग किसी उम्मीदवार को अनुचित तरीके से लाभ पहुंचाने या नुकसान पहुंचाने के लिए किया जाता है। नीरा राडिया टेप विवाद को कौन भूल सकता है? 2001 में स्थापित जनसंपर्क (पीआर) फर्म वैष्णवी कम्युनिकेशंस की प्रमुख नीरा राडिया देश के कुछ सबसे बड़े कॉर्पोरेट घरानों को अपने ग्राहकों में गिनती हैं, जिनमें टाटा और रिलायंस सबसे मूल्यवान हैं। राडिया को एक पीआर पेशेवर के रूप में कम और एक लॉबिस्ट के रूप में अधिक संदर्भित किया गया, जो कॉर्पोरेट घरानों, पत्रकारों, राजनेताओं और नौकरशाहों के बीच संपर्क स्थापित करने में शामिल थी। राडिया टेपों के कारण कुछ पत्रकारों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठे। टेपों का सबसे चिंताजनक पहलू यह था कि पत्रकारों की राजनीतिक और कॉर्पोरेट सौदेबाजी में कथित संलिप्तता थी। रिपोर्ट्स से पता चला कि देश के कुछ शीर्ष पत्रकार राजनेताओं, पार्टियों और कॉर्पोरेट घरानों के लिए बिचौलियों का काम कर रहे थे। यह भी एक तरह की पेड न्यूज़ थी। चूंकि पेड न्यूज का खेल लंबे समय से भारतीय समाज को प्रभावित और परेशान कर रहा है, विशेष रूप से चुनावी मौसम में। ऐसे में तहलका ने बिहार में चुनाव के दौरान और पश्चिम बंगाल सहित कई अन्य राज्यों के विधानसभा चुनावों से पहले देश में पहली बार इस भ्रष्टाचार की पड़ताल करने का निर्णय लिया। ‘मैंने तीन वर्तमान मुख्यमंत्रियों की मदद उनकी पेड न्यूज प्रकाशित करवाने में की है। मैंने उनके प्रोफाइल बनाए, उन्हें सोशल मीडिया पर अपलोड किया और पैसे के लिए उनका प्रचार किया। यह तो बस पेड न्यूज़ है।’ -एक प्रमुख डिजिटल ब्रांड के विनोद तिवारी (बदला हुआ नाम) ने कहा। ‘मैं खबर के रूप में पेड विज्ञापन प्रकाशित करूंगा, ताकि भारत का चुनाव आयोग यह पता न लगा सके कि यह भुगतान की गई खबर है या वास्तविक खबर है। पेड-न्यूज़ के कारोबार में चुनाव आयोग को धोखा देने का यह सबसे अच्छा तरीका है।’ -विनोद ने तहलका रिपोर्टर से कहा। ‘आप मुझे बताएं कि चुनाव के दौरान आप अपने उम्मीदवार की खबरें किस चैनल पर चाहते हैं और ऐसा हो जाएगा। मैं यह सेवा भी पैसे के लिए देता हूं।’ -उसने कहा। ‘मैं सब कुछ करूंगा। उम्मीदवारों के चित्र और वीडियो के साथ लेख प्रकाशित करवाऊंगा। यह सब पैसे से होगा। कोई न कोई उम्मीदवार के पक्ष में लेख लिखेगा। पेड न्यूज अखबारों और डिजिटल प्लेटफॉर्म दोनों पर दिखाई देगी और जो कुछ भी मैं आपको बता रहा हूं, वह सब पेड होगा।’ -ट्रेम्ट टेक्नोलॉजी के संस्थापक निदेशक रोहन मिश्रा ने कहा। ‘मैं देश के शीर्ष डिजिटल प्लेटफॉर्म पर एक सकारात्मक खबरें प्रकाशित करने के लिए 16,000 रुपए लेता हूं। यदि आप अपने प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवारों के बारे में नकारात्मक स्टोरी चाहते हैं, तो दोगुनी कीमत देनी होगी। 16 हजार रुपए से 32 हजार रुपए प्रति लेख।’ -रोहन ने हमारे संवाददाता को बताया। ‘बिहार चुनाव में भारत के चुनाव आयोग को धोखा देने के लिए आपके पेड न्यूज को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया जाएगा। आपका लेख प्रत्येक चैनल पर प्रसारित होने वाले शीर्ष सौ खबरों में दिखाई देगा। इसे विज्ञापन की तरह नहीं, बल्कि खबर की तरह प्रस्तुत किया जाएगा, लेकिन इसके लिए आपको भुगतान करना होगा। 15-20 सेकंड के लिए टेलीविजन का शुल्क 35,000 रुपए है।’ -रोहन ने खुलासा किया। ‘मैं लंबे समय से पेड न्यूज का काम कर रहा हूं और कभी पकड़ा नहीं गया। अब पेड न्यूज विक्रेताओं के माध्यम से प्रकाशित की जाती है, इसलिए यह अखबारों में मौलिक रूप में दिखाई देगी। एक रिपोर्टर जाकर स्टोरी करेगा, लेकिन इसके लिए उसे भुगतान किया जाएगा। इसकी दर लगभग 60-65 हजार रुपए प्रति खबर है।’ -उसने आगे कहा। ‘मुझे पेड न्यूज के लिए सभी भुगतान नकद में किए जाएंगे। यदि मैं किसी खाते के माध्यम से कोई भुगतान लेता हूं, तो वह मेरी कंपनी के खाते में नहीं जाएगा; वह किसी अन्य खाते के माध्यम से भेजा जाएगा।’ -रोहन ने बताया। विनोद कहते हैं कि पेड न्यूज का कारोबार अब अधिक संगठित हो गया है। यह प्रत्यक्ष मीडिया सौदों के बजाय विक्रेताओं के माध्यम से संचालित होने वाला बाजार है। ये विक्रेता राजनेताओं और मीडिया आउटलेट्स के बीच बिचौलियों के रूप में कार्य करते हैं, तथा विषय-वस्तु निर्माण से लेकर प्लेसमेंट तक सब कुछ प्रबंधित करते हैं। विनोद, जो दावा करते हैं कि उन्होंने तीन मुख्यमंत्रियों के साथ काम किया है, अपनी भूमिका को आश्चर्यजनक स्पष्टता के साथ समझाते हैं- ‘मैं उनकी प्रोफाइल बनाता हूँ, उन्हें सोशल मीडिया पर अपलोड करता हूं और उनका प्रचार करता हूं, और ये सब पैसे के लिए करता हूं। ये तो बस पेड न्यूज़ है।’ -उसने तहलका से कहा। व्यवसाय से जुड़े एक अन्य विक्रेता रोहन मिश्रा ने भी विनोद की बातों को दोहराते हुए कहा कि चुनावों के दौरान ऐसी सेवाओं की मांग बढ़ जाती है। ‘स्थानीय विधायकों से लेकर बड़े नेताओं तक, हर कोई खबरों में छाये रहने के लिए मीडिया संस्थानों पर कब्जा करना चाहता है। हम ऐसा करते हैं।’ -उसने मुस्कुराते हुए कहा। निम्नलिखित बातचीत में विनोद ने स्वीकार किया कि वह राजनेताओं के लिए संपूर्ण ब्रांडिंग उपलब्ध कराता है, जिसमें चुनावी पैकेज भी शामिल हैं, जो उम्मीदवारों की प्रोफाइल तैयार करते हैं और उनका प्रचार करते हैं। उनका कहना है कि उन्होंने पहले भी ऐसे प्रोफाइल बेचे हैं और डिजिटल तथा समाचार प्लेटफॉर्म पर प्रचार के लिए शुल्क लेते हैं। विनोद का कहना है कि इन वस्तुओं को समयबद्ध तरीके से प्रस्तुत किया जाता है, ताकि चुनाव आयोग आसानी से यह न पहचान सके कि इन्हें भुगतान किया गया है।
रिपोर्टर : इसके अलावा आप ब्रांडिंग भी करते हैं- इंडिविजुअल, इलेक्शंस में, जैसे पॉलिटिशियंस हैं, इलेक्शन कॉन्टेस्ट करते हैं? विनोद : हां। रिपोर्टर : करते हैं आप? विनोद : करते हैं, मैंने XXXX साहब की की है। रिपोर्टर : XXXXXX की? विनोद : हां, हां… XXXXXX की है, XXXXX के लिए काम किया है। रिपोर्टर : इलेक्शंस में पेड न्यूज, …वो कैसे करोगे आप? विनोद : इलेक्शंस के लिए मेरे पास पूरा एक पैकेज है, पैकेज के थ्रू मैं सारी चीजें कर सकता हूं। रिपोर्टर : देखिए, दो चीजें होंगी, …एक तो नेताजी अपना प्रोफाइल बनाके आप को दे देंगे, वो आपको चलवाना है न्यूज पेपर्स में, अखबारों में उसको पब्लिश करवाना है। एक तरीका ये होगा कि नेताजी कहेंगे मेरी ब्रांडिंग करवानी है, टीम आपकी होगी। अब आप कैसे करेंगे? लेकिन होगा वो इलेक्शन अनाउंस होने के बाद ही, तो आपको ये देखना है कि इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया के सामने न पता चल पाए कि ये पेड न्यूज है। विनोद : वो सब मैं करा लूंगा, वो कहीं किसी की नजरों में नहीं आने वाला, इलेक्शन कमीशन आल्सो नाउ कि यही टाइम होता है अपने को पुलिंग करवाने का, ये हर जगह होता है। ऐसे कोई दिक्कत वाली बात नहीं है। रिपोर्टर : तो आप कर चुके हो पेड न्यूज इलेक्शन के टाइम में? विनोद : हां। रिपोर्टर : पक्का? विनोद : हां, मैंने बताया ना इलेक्शन टाइम में मैंने इन लोगों की ऐसी-ऐसी प्रोफाइल बेची है सर! रिपोर्टर : तो इसमें पेड न्यूज थोड़ी होगा XXXXXX एट्च में? विनोद : बट मैंने उनका प्रोफाइल बनाया, उसको लोड भी किया। चार्जेज भी लिए, आलसो उन्होंने बोला मेरा ये वीडियो है, इसको प्रमोट करिए, या मैं ये चीज कर रहा हूं, आप इसको लिखवाइए, तो वो पेड ही तो हुआ सर!
जब बात पेड न्यूज की आती है, तो हम भारत के चुनाव आयोग से कैसे बच सकते हैं? इस सवाल के जवाब में विनोद ने हमें बताया कि वह भुगतान की गई सामग्री को सामान्य समाचार की तरह प्रस्तुत करता है, यह सामान्य रिपोर्टिंग की तरह दिखता है। लेकिन इसके लिए भुगतान किया जाता है, इसलिए ईसीआई इसे पहचान नहीं पाएगा। इस संक्षिप्त बातचीत में विनोद ने बताया कि किस तरह राजनीतिक खबरों को जनता तक पहुंचने से पहले उन्हें तैयार किया जाता है। विनोद : मैं XXXXX के लिए काम करता हूं। रिपोर्टर : किस टाइप की स्टोरीज लग सकती हैं? विनोद : जैसे हमारे पास न अभी कुछ पॉलिटिकल स्टोरीज आ रही थी, जैसे हर पॉलिटिकल पार्टी ये चाहती है कि मेरे जो इंटरव्यू हैं, वो लोगों तक पहुंचे, कैसे पहुंचेगी? …जब आप उस स्टोरी को एक न्यूज वे में पेश करो। अगर आप सीधा-सीधा बोलोगे, तो सब लोग समझ जाएंगे कि ये पेड स्टोरी है।
विनोद ने स्वीकार किया कि वह भारत में किसी भी समाचार चैनल पर खबरें प्रकाशित करवाने का व्यवसाय करता है। उसने कहा कि उनके पास लोगों की स्टोरीज को समाचार प्लेटफार्मों पर प्रकाशित कराने में मदद करने के लिए पहुंच और संपर्क हैं। उसने बताया कि पार्टियां चाहती हैं कि उनके साक्षात्कार प्रायोजित लगे बिना लोगों तक पहुंचें। विनोद का कहना है कि असली तरकीब उन्हें खबरों के रूप में प्रस्तुत करने में है। विनोद : कहने का मोटिव ये है कि मेरे पास चीजें सारी हैं, मेरे पास रीच है, चैनल्स हैं। आप जो कहेंगे, मेरे पास वो सारी चीजें हैं। रिपोर्टर : चैनल्स में भी स्टोरी लग सकती है? विनोद : आप बताओ कौन-सी है और किस चैनल में लगानी है आपको> रिपोर्टर : अच्छा, ये भी सर्विस है आपके पास? विनोद : ये भी हैं।
अब विनोद ने खुलासा किया कि कैसे एक बार भाजपा उम्मीदवार के प्रचार के लिए उसने जो सौदा किया था, वह विफल हो गया था। विनोद के अनुसार, विधानसभा चुनाव लड़ रही भाजपा की एक उम्मीदवार, जो पूर्व महापौर है; ने उसे फोन किया था और अपने निर्वाचन क्षेत्र के लगभग 1.5 से 2 लाख मतदाताओं के मतदाता पहचान पत्र और फोन नंबर दिए थे। विनोद को उन मतदाताओं को व्हाट्सएप संदेश भेजकर भाजपा उम्मीदवार को वोट देने के लिए कहना था। विनोद ने बताया कि सौदा आठ लाख रुपए में तय हुआ था। लेकिन जल्द ही भाजपा आईटी सेल को इसकी जानकारी हो गई और उन्होंने सौदा रद्द कर दिया। विनोद ने कहा कि यह सौदा इसलिए रद्द किया गया, क्योंकि भाजपा में सब कुछ केंद्रीकृत है, यहां तक कि प्रचार के लिए भी उम्मीदवार स्वतंत्र एजेंसियों को नियुक्त नहीं कर सकते। पार्टी ऐसे सभी काम स्वयं ही संभालती है। विनोद : वो XXXXX हैं ना XXXX में, तो उनको चांसेज थे टिकट मिलने के बीजेपी से, जब XXXXX इलेक्शन हुआ था। रिपोर्टर : XXXXXX तो शायद मेयर भी रह चुकी हैं? विनोद : हां, मेयर भी रह चुकी हैं। सो मैं उनके टच में आया था, तो पेड प्रमोशंस की बात चल रही थी, तो उस समय XXXXX चैनल फंडिंग कर रहा था, तो उन्होंने मेरे को बोला मेरे को व्हाट्सएप कैंपेनिंग करना है। व्हाट्सएप पर मैसेजेज भेजना था, मैंने बोला हो जाएगा। मेरे को दे दो। विनोद (आगे) : मैंने कहा आप मेरे को मेंबर्स दे दो। उन्होंने बोला मैं अपनी कॉन्स्टीट्वेंसी से जो 1.5 लाख से 2 लाख तक मेंबर्स दूंगा, उसमें आपको भेजना है। मैंने बोला ठीक है। मैंने उनको कॉस्टिंग दी, सब चीज़ें फाइनल हो गयी, बट बीजेपी का क्या है सर कि उनका खुद का अपना एक पूरा चैनल है। सो दे सैड अगर आपको कोई भी प्रमोशन करनी है, तो उसे अवर इंटरनल चैनल्स ओनली। विनोद (आगे) : तो XXXXX को पता चला कि ये ऐसे-ऐसा व्हाट्सएप पर प्रमोशन करवाना चाहती हैं, तो उन्होंने उस बंदे को इनसे कॉन्टेक्ट करवा दिया, तो मेरी डील समझिए आप साइन होते-होते रह गई। रिपोर्टर : कितने की थी डील? विनोद : वो मेरी डील थी 8 लाख के आसपास की थी। रिपोर्टर : एक इलेक्शन की? विनोद : हां, सिर्फ व्हाट्सएप कैंपेन। रिपोर्टर : XXXXX इलेक्शन में? विनोद : ये सर जो अभी XXXX में हुआ है, इसी इलेक्शन में। रिपोर्टर : तो वोटर आईडी से ही सारे नंबर निकाल रहे होंगे? विनोद : उन्होंने क्या किया था, वोटर आईडी की पूरी लिस्ट मेरे पास आ गई थी, जिसके अंदर मेरे को मैसेज सेंड करने थे।
विनोद के बाद तहलका रिपोर्टर ने रोहन मिश्रा से मुलाकात की, जो एक अन्य पेड न्यूज प्रकाशित-प्रसारित करने वाले हैं और ट्रेम्ट टेक्नोलॉजी के संस्थापक निदेशक हैं। रोहन ने तहलका के संवाददाता को यह भी बताया कि वह सब कुछ संभाल लेंगे, उम्मीदवारों की तस्वीरों और वीडियो के साथ लेख प्रकाशित करवाना। यह सब भुगतान किया जाएगा। रोहन के अनुसार, कोई व्यक्ति चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार के पक्ष में लेख लिखता था। उन्होंने कहा कि पेड न्यूज अखबारों और डिजिटल प्लेटफॉर्म दोनों पर दिखाई देगी और उन्होंने जो कुछ भी उल्लेख किया है, उसके लिए पेड न्यूज होगी। रिपोर्टर : वो आप कैसे करेंगे, मतलब आर्टिकल पब्लिश करवाएंगे? रोहन : आर्टिकल भी है, फोटो भी है, वीडियो शूटिंग भी होती है। रिपोर्टर : अखबारों में आर्टिकल पब्लिश कराएंगे, पेड होंगे वो सारे? रोहन : पेड होंगे, …जो आर्टिकल लिखे जाते हैं, जैसे बैनर होता है। रिपोर्टर : मैं प्रिंट की बात कर रहा हूं. अखबार की; डिजिटल की नहीं। रोहन : मैं दोनों की बात कर रहा हूं, आर्टिकल लिखे जाएंगे, किसी के थ्रू लिखे जाएंगे। रिपोर्टर : पैसा देना पड़ेगा ना उसमें? रोहन : जो भी चीज मैं बोल रहा हूं, सब चीज के पैसे हैं।
अब रोहन ने तहलका को बताया कि वह देश के शीर्ष डिजिटल प्लेटफॉर्म पर एक सकारात्मक कहानी प्रकाशित करने के लिए 16,000 रुपये लेते हैं। रोहन ने कहा कि यदि हम प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवारों के बारे में कोई नकारात्मक स्टोरी प्रकाशित करवाना चाहते हैं, तो शुल्क दोगुना हो जाएगा- 16,000 रुपये प्रति स्टोरी से बढ़कर 32,000 रुपये प्रति स्टोरी हो जाएगा। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि एक कहानी प्रकाशित होने में उन्हें सिर्फ एक घंटा लगता था। रोहन : हम आर्टिकल भी करवाते हैं। रिपोर्टर : आर्टिकल पब्लिश करवाते हो अखबारों में? रोहन : हां, डिजिटल में भी करवाते हैं। रिपोर्टर : क्या रेट है उसका? रोहन : डिपेंड करता है कौन-सा है। XXXXX का हम देते हैं 16,000 रुपए में, XXXX है, XXXXX न्यूज है, XXXX न्यूज है, XXXX है, XXXX है, XXXXX….। रिपोर्टर : सब डिजिटल हैं ये? रोहन : हां। रिपोर्टर : अखबार नहीं है कोई? रोहन : अखबार नहीं है, अखबार का अलग होता है। रिपोर्टर : इसमें पॉजिटिव स्टोरी करवाते हो या नेगेटिव? रोहन : मेनली तो पॉजिटिव, उसका (नेगेटिव का) डबल लगता है, 15 का 32 हजार। रोहन (आगे) : ठीक है, वो डबल लगेगा। रिपोर्टर : नेगेटिव का हो जाएगा? रोहन : हां। रिपोर्टर : हो जाएगा, पर डबल लगेगा? रोहन : पता होना चाहिए ना, क्या हा स्टोरी। किसके बारे में है? 16 का 32 लगेगा। रिपोर्टर : पक्का छपवा दोगे? रोहन : हां, एक घंटे में छपवा दूंगा। रिपोर्टर : किसमें छपवा दोगे? रोहन : XXXX में, सब पर छपवा दूंगा, XXX, XXXX….। रिपोर्टर : एक घंटे में छपवा दोगे, पक्का? रोहन : पक्का। रिपोर्टर : पैसा बाद में दूंगा, मैं दे चुका हूं पहले आपको। रोहन : ठीक है आधा-आधा करेंगे। रिपोर्टर : 16 पहले, 16 बाद में?
अब रोहन ने बिहार चुनाव के दौरान पेड न्यूज कैसे काम करती है, इस पर विस्तार से चर्चा की। रोहन के अनुसार, हमारी पेड न्यूज को भारत के चुनाव आयोग को धोखा देने के लिए सही तरीके से प्रस्तुत किया जाएगा। यह प्रमुख टीवी चैनलों पर प्रसारित शीर्ष सौ खबरों में शामिल होगा, जिसे विज्ञापन के बजाय नियमित समाचार के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा। लेकिन इसके लिए पूरा भुगतान किया जाएगा। रोहन ने तहलका रिपोर्टर को बताया कि 15 से 20 सेकंड के स्लॉट के लिए शुल्क 35,000 रुपए होगा। रिपोर्टर : चुनाव आयोग की पकड़ में तो नहीं आ जाएंगे पेड एडवर्टीजमेंट? रोहन : पेड एड पकड़ में तो आते हैं…, अच्छाई ये है, पेड एड इसलिए लोग ज्यादा नहीं कराते। उनको लगे ही न पेड है। रिपोर्टर : कैसे करवाओगे फिर? रोहन : जैसे XXXX है आपका, उसमें सुबह एक न्यूज आती है, फर्स्ट 1000 क्रेक एक न्यूज आती है सुबह, जिसमें 100 न्यूज बताते हैं 10 मिनट के अंदर उसमें 15 सेकंड की क्लिप जाती है, बाइट जाती है, सब लगाते हैं। रोहन (आगे) : 35 के तक होता है, जैसे अगर मैं XXXX को दूंगा तो वो 35के में तो वो हमारा क्लिप लगा देगा टॉप 100 न्यूज में 15-20 सेकंड का मैक्सिमम, और XXXX जहां-जहां चलता है, वहां वो चलेगा। पेड एड में हम डाइमेंशन कंट्रोल कर सकते हैं, लेकिन जब ऑर्गेनिक एप चलाते हो ना, तो डाइमेंशन कंट्रोल नहीं कर सकते। और दूसरी बात जो ये फास्ट न्यूज चलते हैं ना, इसमें कोई पोड का सिस्टम नहीं होता, ये हमें डायरेक्टली करना होता है। रिपोर्टर : डाइमेंशन कंट्रोल कर सकते हैं,…इसका क्या मतलब? रोहन : जैसे हम काम कर रहे हैं और पेड न्यूज चलाते हैं हम लोग। जैसे अगर हमें बिहार में दिखाना है, तो बिहार में ही दिखेगा, बट जब ऑर्गेनिक दिखाते हो, उसमें कंट्रोल नहीं हो सकता, कि सिर्फ बिहार में दिखे, बिहार के बाहर न दिखे। जैसे XXXX चल रहा है, तो XXXXX लोग जहां-जहां देख रहे हैं, …चाहे इंडिया में या इंडिया के बाहर, तो उनको भी हमारा एड दिखेगा उस टाइम पर, बट ऑर्गेनिक होगा, और इसमें चुनाव आयोग कुछ नहीं कर पाएगी। …इसमें कुछ नहीं होगा ना व्हाइट मनी जाएगी आपकी। तो 15-20 सेकंड की बाइट जाएगी हर चैनल पर और हर चैनल का कास्ट है 35000 रुपए एक दिन का। रिपोर्टर : 15 सेकंड की कॉस्ट है 35 थाउजेंड? रोहन : हां, मतलब XXX का 15-20 सेकंड का 35के, XXXX न्यूज का जहां-जहां में चलवाना है। रिपोर्टर : जो बिहार में है? रोहन : जैसे XXXX का है बिहार XXXX, ऐसे बहुत सारे हैं, ये चुनाव आयोग के पकड़ में नहीं आता, क्योंकि ये ऑर्गेनिक है, इसलिए पेड एड में तो लिखा होता है ना प्रॉपर्टी ‘स्पॉन्सर्ड’ यहां लिखा नहीं होता।
यहां, रोहन पेड न्यूज पारिस्थितिकी तंत्र की कार्यप्रणाली की पूरी झलक प्रस्तुत करते हैं – जिसमें बताया गया है कि किस प्रकार प्रशंसक क्लबों के माध्यम से भुगतान को छिपाया जाता है, तथा किस प्रकार विज्ञापनों को ऑर्गेनिक कहानियों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। उन्होंने स्वीकार किया कि वे लंबे समय से पेड न्यूज के धंधे में हैं और कभी पकड़े नहीं गए। उनके अनुसार, अब पेड न्यूज विक्रेताओं के माध्यम से प्रसारित की जाती है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि समाचार पत्रों में प्रकाशित होने पर यह ऑर्गेनिक लगे। रोहन ने कहा कि रिपोर्टर जाकर स्टोरी दर्ज कर सकता है, लेकिन उसे फिर भी भुगतान किया जाएगा – प्रति स्टोरी लगभग 60,000 से 65,000 रुपये की दर से। उन्होंने यह भी कहा कि कभी-कभी फैन क्लबों के माध्यम से पेड न्यूज चलाई जाती है, जहां उम्मीदवार के समर्थक – जो चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों के अंतर्गत नहीं आते हैं – फैन पेजों के माध्यम से अपने उम्मीदवार के पक्ष में पेड कंटेंट चलाते हैं। टीवी पर चर्चा के बाद रोहन ने हमें समाचार पत्रों के लिए भुगतान की गई समाचार दरों के बारे में भी बताया। रिपोर्टर : आप पेड न्यूज करा चुके हो पहले? रोहन : हां, करा चुके हैं, ये कभी पकड़ में नहीं आएगा, ऑर्गेनिक वाला नहीं पकड़ में आता, XXXX वाला थोड़ी करेगा हम पैसे लेकर काम कर रहे हैं। रोहन (आगे) : हमारा जो एड है ना, वो फैन क्लब से चलता है। रिपोर्टर : मतलब? रोहन : मान लीजिए जैसे पॉलिटिकल पार्टी को बैन होता है, तब फैन क्लब चलता है, मतलब लोग अपना पैसा लगा रहे हैं, ना कि कैंडिडेट अपना पैसा लगा रहा है। इसलिए हम कभी कैंडिडेट की प्रोफाइल से एड नहीं चलाते, अगर चलाते हैं, तो थर्ड पार्टी से। रिपोर्टर : मतलब फैंन चलाते हैं? रोहन : हां, फैंस चलाते हैं। मतलब हमको थोड़ी चुनाव आयोग मना करेगा, हम से क्वेश्चन कर भी ले चुनाव आयोग, हम कहेंगे हमारा कैंडीडेट जीते, और चुनाव के दायरे में हम आते ही नहीं किसी तरीके से। रिपोर्टर : अगले साल और स्टेट्स में भी चुनाव हैं, वहां भी हो जाएगा पेड न्यूज? रोहन : हां, पेड न्यूज सब जगह हो जाएगा, सबका सिस्टम एक ही है, चाहे हम चलाएं या कोई और। वेंडर : सिस्टम एक ही होगा। रिपोर्टर : आपका एप्रोच चैनल और न्यूजपेपर में डायरेक्ट है या वेंडर के थ्रू? रोहन : हमारा खुद का पोर्टल है, हमने वेंडरशिप ले रखी है सबसे हमने, पेपर में ले रखी है, डिजिटल में ले रखी है, टीवी में है, साथ में बिलबोर्ड में भी। रिपोर्टर : जो सड़कों में बिलबोर्ड लगते हैं? रोहन : हां, बट वो मेरा दिल्ली-एनसीआर तक ही है, ….बिलबोर्ड का। रिपोर्टर : आप जो काम कर रहे हो, थ्रू वेंडर के कर रहे हो? रोहन : मतलब मैं सब वेंडर हूं, मान लीजिए आप। रिपोर्टर : ये 35 थाउजेंड जो चैनल का है, इसमें सब इन्क्लूसिव है, आपका भी? रोहन : हां। रिपोर्टर : अखबार में? रोहन : अखबार में जितना भी होगा, उसका 20 परसेंट हम चार्ज करते हैं। रिपोर्टर : अखबार में कैसे करते हैं? रोहन : दो तरीके हैं, एक तो हमने एड लगा लिया, दूसरा एडिटर जो लिखता है, या रिपोर्टर जाता है और लिखता है, वो ऑर्गेनिक होता है, तो वो चुनाव आयोग की नहीं पकड़ में आता है। अगर आप अखबार में बड़ा एड दिखाते हो, तो उसका बिल देना पड़ता है कि आपने लगाया था पैसा। रिपोर्टर : आप कैसे करवाओगे? रोहन : देखो, मैं कहूंगा 19-20 वाला करते हैं कुछ एड भी लगाते हैं, उसके साथ किसी एडिटर के साथ, मतलब प्रेस वालों से करवाएंगे। जैसे XXXX है, XXXX है, इनके रिपोर्टर आपके बारे में लेख लिखेंगे और आपका पिक्चर लगा देंगे, कि मैं गया, देखा और लिखा। जबकि बंदा खुद लिख रहा है, वो उसकी रिस्पॉन्सिबिलिटी है, जो लिख रहा है। रिपोर्टर : उसका क्या चार्ज होगा? रोहन : वो डिपेंड करता है कौन-सा पेपर है, कितना चार्ज करेगा? मतलब मान लीजिए 70 से 1.5 लाख तक जाता है। रिपोर्टर : एक आर्टिकल का? रोहन : बड़ा सा पेज पर जाएगा, उसका आधा पेज का होगा। रिपोर्टर : XXXXX बड़ा अखबार है बिहार का? रोहन : उसका अलग होगा, XXXX का अलग होगा। कम से कम 65-70 के जाएगा हाफ पेज का, ये मैं ऑर्गेनिक बता रहा हूं, एड का तो और ज्यादा जाएगा। वो तो 3-3.5 लाख है, आधे पेज का; क्यूंकि वो प्रॉपर्टी दिखता है उस पर लिखा होता है ‘स्पॉन्सर्ड’।
रोहन ने हमें बताया कि पेड न्यूज के लिए सभी भुगतान नकद में किए जाएंगे, बिना किसी बिल या जीएसटी के। उसने कहा कि यदि कोई भुगतान बैंक खाते के माध्यम से किया जाता है, तो वह उनकी कंपनी के खाते में नहीं जाएगा, बल्कि किसी अन्य खाते में जाएगा। रोहन ने आगे कहा कि उनकी पेड न्यूज सेवाएं अगले साल पश्चिम बंगाल, असम और अन्य राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के दौरान भी उपलब्ध रहेंगी। रिपोर्टर : इसमें पेमेंट एडवांस होगा? रोहन : पेमेंट एडवांस होगा और उसके साथ-साथ आपको मेरे किसी अकाउंट में ट्रांसफर करना होगा, मैं बताऊंगा आपको पेमेंट का। कंपनी में नहीं जाएगा। रिपोर्टर : मतलब? रोहन : मतलब इसका कोई जीएसटी बिल नहीं मिलेगा, मेरा ये मतलब है। रिपोर्टर : बिल नहीं मिलेगा ना? रोहन : हां, बिल नहीं मिलेगा। रिपोर्टर : मतलब आप कैश पेमेंट लोगे ना? रोहन : हां, कैश लेंगे या जिस भी अकाउंट में लेना होगा मुझे तो अकाउंट में जिसमें बोलूंगा, उसमें करेंगे। मैक्सिमम कैश रहेगा, जितना ज्यादा कैश दे पाएंगे, उतना अच्छा रहेगा। आपके लिए भी बेहतर है और हमारे लिए भी बेहतर है। रिपोर्टर : मतलब सारे इलेक्शंस में ये हो जाएगी पेड न्यूज? रोहन : हां, कोई भी हो। यही चल भी रहा है। हम देख रहे हैं बिहार में बहुत चल रहा है।
अब रोहन ने खुलासा किया कि कैसे वह अमेरिका के कैलिफोर्निया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वैज्ञानिक के रूप में काम कर रहे एक भारतीय को भारतीय मीडिया में सकारात्मक पेड न्यूज प्रकाशित करवाकर स्थायी निवास (पीआर) प्राप्त करने में मदद कर रहा है। रोहन बताता है कि सकारात्मक खबरों को किस प्रकार तैयार किया गया, भुगतान किया गया, और किस प्रकार ऐसी खबरों को ग्राहक की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए रणनीतिक रूप से विभिन्न प्लेटफार्मों पर रखा जाता है। रोहन : एक क्लाइंट है, यूएस कैलिफोर्निया में, XXXX….। रिपोर्टर : क्या नाम है …XXXX? रोहन : XXXXXX रिपोर्टर : बिजनेसमैन है ये? रोहन : नहीं, इनका भी पॉजिटिव इमेज बनाना है, ताकि इनको परमानेंट पीआर मिले वहां। रिपोर्टर : यूएस में? रोहन : अभी अवार्ड भी दिलवा रहे हैं। रिपोर्टर : किस सेक्टर में हैं ये? रोहन : एआई में। रिपोर्टर : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इंडिया का बंदा है? रोहन : इंडिया का है। रिपोर्टर : इंडिया में कहां से? रोहन : नोेएडा। रिपोर्टर : तो ये इसलिए पॉजिटिव स्टोरी छपरा रहे हैं, ताकि इनका पीआर हो जाए? रोहन : हां, पॉजिटिव बनाना है। रिपोर्टर : तो वहां तक जाती हैं खबरें? रोहन : धीरे-धीरे लगा देते हैं ना, जैसे XXXX है, सब में आएगी। आगामी बातचीत में रोहन बताते हैं कि किस प्रकार वे लोगों को सरकारी पुरस्कार दिलाने में मदद करने के लिए अनुकूल मीडिया कवरेज तैयार करते हैं। उन्होंने बताया कि वह एक लड़के को भारतीय मीडिया में सकारात्मक खबर प्रकाशित करवाकर बच्चों के लिए भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान, प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार प्राप्त करने में मदद कर रहे हैं। ये पुरस्कार जनवरी में भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किये जाते हैं। रोहन : आपने बाल पुरस्कार अवार्ड सुना है आपने? रिपोर्टर : बाल पुरस्कार? रोहन : पीएम देते हैं ये। रिपोर्टर : कौन देते हैं? रोहन : प्रधानमंत्री, पीएम देते हैं, …पीएम या प्रेसिडेंट। रिपोर्टर : 26 जनवरी को? रोहन : हां, रिपोर्टर वो तो नहीं है, जो बहादुरी वाले अवार्ड मिलते हैं बच्चों को? रोहन : बच्चों को, हां, सोशल वर्क के लिए मिलता है। रिपोर्टर : गैलेंट्री अवार्ड? रोहन : तो इस बच्चे ने अप्लाई किया हुआ था अवार्ड के लिए, तो इसकी पॉजिटिव न्यूज बनाया था। रिपोर्टर : अच्छा बच्चे का क्या नाम है? रोहन : XXXX रिपोर्टर : ये चाह रहा है मुझे गैलेंट्री अवार्ड मिल जाए? रोहन : ये नहीं, इसकी मां, इसको पता नहीं कुछ; इसकी मदर कर रही है सब। रिपोर्टर : इसने कोई गैलेन्ट्री वाला काम किया है? रोहन : हां, इसने एक सॉफ्टवेयर बना रखा है, बच्चों को पढ़ाने के लिए, स्मार्ट गैजेट। रिपोर्टर : बच्चे ने? रोहन : हां तो इसको हम प्रमोट कर रहे हैं, इसका वेबसाइट भी है।
भारत में पेड न्यूज पर कार्रवाई में भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) शामिल है, जो जांच करता है और इसकी लागत को उम्मीदवार के खर्च में जोड़ता है और प्रिंट मीडिया के लिए भारतीय प्रेस परिषद (पीसीआई) शामिल है, जो मीडिया घरानों की निंदा कर सकता है। प्रस्तावित विधायी कार्रवाई में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 के तहत पेड न्यूज को चुनावी अपराध बनाना शामिल है। हालांकि यह अभी भी सरकार की मंजूरी के लिए लंबित है। विनोद और रोहन के बाद हमारी मुलाकात दीपक सिंह (बदला हुआ नाम) से हुई, जो पेड न्यूज का कारोबार करने वाले एक अन्य विक्रेता हैं। उन्होंने हमें यह भी आश्वासन दिया कि वे हमारी कहानी देश के किसी भी डिजिटल समाचार प्लेटफॉर्म पर प्रकाशित करवा सकते हैं। इस स्टोरी को लिखते समय दीपक ने तहलका को कई अखिल भारतीय मीडिया घरानों की रेट लिस्ट भेजी थी, जो पैसे लेकर स्टोरी प्रकाशित करते हैं। उनके अनुसार, कुछ मीडिया संस्थान ऐसी सामग्री को प्रायोजित बताते हैं, जबकि अन्य ऐसा नहीं करते। रोहन मिश्रा ने तहलका के साथ उन मीडिया संस्थानों की एक रेट कार्ड भी साझा किया है, जहां पेड न्यूज़ प्रकाशित की जा सकती है। उनकी सूची काफ़ी लंबी है, लेकिन कुछ अंश नीचे दिए गए हैं :- एक प्रमुख समाचार चैनल – दिल्ली-एनसीआर में 1-टू-1 स्टूडियो साक्षात्कार : 75,000 रुपए (23 मिलियन ग्राहक) एक प्रमुख समाचार चैनल – दिल्ली-एनसीआर में 1-टू-1 स्टूडियो साक्षात्कार : 75,000 रुपए (48 मिलियन ग्राहक) एक प्रमुख प्रसारण मंच – दिल्ली-एनसीआर में 1-टू-1 स्टूडियो साक्षात्कार : 90,000 रुपए (43 मिलियन ग्राहक)
ये साक्षात्कार 30-40 मिनट तक चलते हैं और संबंधित चैनलों के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रसारित किए जाते हैं। टेलीविजन के अलावा तहलका के पास पेड न्यूज में शामिल कई अखिल भारतीय समाचार पत्रों और समाचार एजेंसियों की रेट लिस्ट भी है। निष्कर्ष यह स्पष्ट करते हैं कि किस प्रकार वाणिज्य ने पत्रकारिता में चुपचाप घुसपैठ कर ली है, जहां राजनीतिक प्रभाव, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और लाभ एक दूसरे से मिलकर स्वतंत्र प्रेस के विचार को विकृत कर देते हैं।