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ईमानदार लेकिन न दाएं, न बाएं : दाएं या बाएं

फिल्म दाएं या बाएं

निर्देशक बेला नेगी

कलाकार दीपक डोबरियाल, बदरुल इस्लाम, भारती भट्ट

आप एक कटोरी कोई भी फिल्म लीजिए जिसमें अंत से पहले पीछा करने के कुछ सीक्वेंस हों- ‘क’ किसी वजह से ‘ख’ के पीछे है और ‘ख’ किसी वजह से ‘ग’ के पीछे और बीच में कोई कीमती चीज बलि का बकरा बनी हुई है (कहीं यह पैसा होता है, यहां कार है). यहीं ‘दाएं और बाएं’ थोड़ा फंसती है. उसके आखिरी आधे घंटे की कहानी प्रियदर्शन की किसी भी फिल्म की शैली की है और उसे वह शालीन भी बनाए रखना चाहती है. मतलब वह बहुत देर तक बची रहने के बाद एक फ़ॉर्मूला आखिर चुन ही लेती है और उस फ़ॉर्मूले के मुख्य मंत्र को भूल जाती है. हो सकता है कि बेला नेगी उठा-पटक की कॉमेडी से जानबूझकर दूर रही हों लेकिन तब उन्हें पहाड़ी की चोटी पर कार के चढ़ने और लटक जाने के शुद्ध बॉलीवुडी दृश्य से परहेज क्यों नहीं था?

हां तो आप एक कटोरी ‘मालामाल वीकली’ लीजिए (हम फिल्म की कहानी की नहीं, उसके स्वभाव की बात कर रहे हैं), उसमें से पांच चम्मच नकली गांव को हटाकर दस चम्मच उत्तराखंड का एक बिल्कुल सच्चा गांव रख दीजिए, कहानी को कुछ और चम्मच अपने यथार्थ के प्रति ईमानदार बनाइए, छोटे किरदारों में सब एक्टर बुरे रखिए और नायक के किरदार को दीपक डोबरियाल नाम का प्रतिभाशाली तोहफा दे दीजिए, ‘दाएं या बाएं’ तैयार हो जाएगी.

 

आप दूसरी तरफ से भी आ सकते हैं. यदि आप एक कटोरी ‘ब्लू अम्ब्रेला’ लेना चाहते हों तो उसमें से कोई छ:-सात चम्मच सुन्दरता और तीन-चार चम्मच उदासी निकाल दीजिए, ठहरिए मत, घटनाएं बढ़ाइए और गहराई कम कीजिए, हंसी के कई दृश्य जोड़िए और ‘दाएं या बाएं’ तैयार हो जाएगी. लेकिन इस तरह कटोरी-चम्मच लेकर संजीव कपूर खाना बनाना सिखाते हैं और हमारे खयाल से कला के जानकार होने का गुमान रखने वाले लोगों को इस रसोई या दुकानदारी शैली में बात करना शोभा नहीं देता. इसलिए हम निरपेक्ष होकर ‘दाएं या बाएं’ के बारे में सोचें तो तो लगता है कि कुछ बहुत अच्छे लिखे गए दृश्य छोटी भूमिका वाले अभिनेताओं ने बर्बाद कर दिए हैं. बदरुल, मानव, भारती और बच्चे प्रत्यूष के अलावा अधिकांश की डायलॉग डिलीवरी सपाट है और अपने परिवेश को इतनी सच्चाई से दिखाने वाली एक फिल्म को जब-जब आप सच मानकर उससे जुड़ना चाहते हैं, तभी वे अभिनेता आपको परेशान करते हैं.

 

लेकिन ये कमियां व्यंग्य से भरे उन अच्छे दृश्यों के प्रभाव को खत्म नहीं कर पातीं, जिनमें इतनी स्वाभाविकता से बेला ही पहली बार गई हैं. वे सरकारी स्कूल के अध्यापकों और बच्चों को उनकी असलियत के सबसे करीब दिखाती हैं. वे सास-बहू वाले टीवी सीरियलों के गांव तक पहुंचने को बहुत अच्छी तरह पकड़ती हैं. वे उस बूढ़े के बहुत नज़दीक हैं जिसे लगता है कि सरकार उन लोगों को खत्म करके ही दम लेगी. लेकिन कहीं न कहीं आप इसे ‘पीपली लाइव’ को याद करते हुए भी देखेंगे और तब ज्यादा तेज, तीखी और अच्छे अभिनेताओं वाली पीपली लाइव बाजी मार ले जाएगी.

गौरव सोलंकी

‘पैसे के लिए मशीन की तरह नहीं गा सकती’

पटना के राजेंद्र नगर में स्थित शारदा सिन्हा के घर ’नारायणी’ में  निराला से हुई उनकी बातचीत के अंश – 

नया क्या हो रहा है इन दिनों?

नया क्या, मेरे जेहन में तो हमेशा पुराना ही चलता रहता है. गीतों की तलाश में लगी रहती हूं. पारंपरिक, ठेठ लोकगीत मिल जाए तो उसे गाकर अगली पीढ़ी के लिए सुरक्षित कर जाऊं. नए में ज्यादा रुचि नहीं.

पर नया हो तो बहुत कुछ रहा है. लोकगीतों में टैलेंट हंट प्रोग्राम, एलबमों की भरमार, भोजपुरी फिल्मों का अंधाधुंध निर्माण…

टैलेंट हंट में जो बच्चे आ रहे हैं, उनमें काफी संभावनाएं हैं. बस, वे एक चीज से बचें तो बेहतर. गीतों की नकल कर के गायक बनने का ख्वाब न रखें, फटाफट फॉर्मूले में विश्वास न करें. यह तुरंत सफलता तो दिला भी दे, लेकिन आखिर में खारिज कर दिए जाएंगे. रियाज करें, धैर्य रखें और जो गाएं उसे निजी जीवन में निभाएं भी. रही बात अंधाधुंध एलबम निर्माण की तो मैं कभी रेस में नहीं रहती. सिर्फ पैसे के लिए मशीन की तरह गीतों की बौछार नहीं कर सकती. गीत मेरे मनमुताबिक होने चाहिए. और फिर यह जो भोजपुरी फिल्मों का दौर है उससे तो मैं रिदम ही नहीं बिठा पाती. मैं तो डरती हूं कि अभी जो हो रहा है, कहीं वही मुख्यधारा न बन जाए. गीतकार, बाजार, गायक, कलाकार और श्रोता, सब लोकसंगीत को हाईवे सांग बनाने पर आमादा हैं.

इसके लिए किसको जिम्मेदार मानती हैं?

जिम्मेदार तो सभी हैं. सरोकार खत्म हो रहे हैं. अश्लीलता बढ़ती जा रही है. म्यूजिक कंपनियों का भी दबाव रहता है कि गीत ऐसे हों जो रातों-रात, चाहे जिस भी वजह से हो, चर्चे में आ जाएं. नये गायकों को समझाती हूं कि क्यों ऐसे ऊल-जुलूल गीत गाते हो तो कहते हैं कि पेट का सवाल है. रही बात श्रोताओं की तो वे कभी रिएक्ट नहीं करते, इसलिए यह सब चल रहा है.

गीत-संगीत का सफर आपने कैसे शुरू किया?

गाने का शौक बचपन से था. शादी-ब्याह के लोकगीतों के अलावा क्लासिकल गीत-संगीत में भी रुचि थी. संगीत से प्रभाकर कर रही थी और मणिपुरी नृत्य का प्रशिक्षण भी ले रही थी. इस बीच मेरी शादी समस्तीपुर में डॉ बीके सिन्हा से हो गई. उसके बाद ससुराल में भी मैंने गाना नहीं छोड़ा. सास कहती थीं कि क्या करती है, खाली गाती फिरती है. बाद में सास भी मेरे रंग में रंग गईं, वे ही गीत खोज-खोजकर देतीं कि सुन तो यह गीत मेरी दादी सुनाया करती थीं, तुम गा सकती हो तो गाओ.

शादियों में कई रस्में होती हैं,  आपकी शादी में हुई कोई रस्म जो आज भी याद आती हो?

मेरी शादी के बाद विदाई की रस्म शुरू होने लगी उससे पहले मेरे पिता जी ने घर के अंदर मौजूद सभी पुरुष सदस्यों को ओसारे में चलने के लिए कहा. मेरे पति को भी पिता जी ने कहा, ‘मेहमान, आप भी कुछ देर बाहर बैठें.’ उसके बाद उन्होंने धीरे-से मुझसे कहा कि जा ही रही हो शारदा तो एक टा गीत सुनाती जाओ. फिर मैंने पिताजी को उनके दो मनपसंद गीत गाकर सुनाए. मैं गा नहीं पा रही थी, खुद को संभाल नहीं पा रही थी. पिता जी ने गले से लगा लिया. वहां मौजूद सारे लोग रो रहे थे. ऐसे ही माहौल में मैं अपने पिता के घर से विदा हुई.

उस रोज लखनऊ पहुंचकर जितनी कुल्फियां खा सकती थी, खाईं. अपनी आवाज को एकदम से बिगाड़ देने की जिद सवार हो गई थी

तब तक तो आप घर-परिवार के बीच ही गाती थीं, स्टेज और पर्दे पर आपकी संगीत यात्रा कैसे शुरू हुई?

1971 की बात है, तब अखबार में एक इश्तहार आया था कि लखनऊ में ‘टैलेंट सर्च’ चल रहा है. हमने अपने पति बीके सिन्हा को इस बारे में बताया तो वे हमें वहां ले जाने को तैयार हो गए. लखनऊ में ट्रेन से उतरकर सीधा एचएमवी कंपनी के ऑडिशन सेंटर पर पहुंचे. काफी भीड़ थी. जहीर अहमद रिकॉर्डिंग इंचार्ज थे और मुकेश साहब के ‘रामायण’ अलबम में संगीत देने वाले मुरली मनोहर स्वरूप संगीत निर्देशक. नेक्स्ट-नेक्स्ट कर प्रतिभागियों को बुलाया जा रहा था. आखिरी में मैं पहुंची और कहा कि गाना गाऊंगी. जहीर अहमद ने मेरी आवाज में यह एक वाक्य सुनते ही कहा, ‘नहीं जाओ, तुम्हारी आवाज ठीक नहीं है’. उनकी बात से मैं बेहद निराश हो गई थी. सोच लिया कि जब मेरी आवाज रिजेक्ट ही कर दी गई है तो अब कभी नहीं गाऊंगी. उस रोज लखनऊ के अमीनाबाद पहुंचकर जितनी कुल्फियां खा सकती थी, खाईं. अपनी आवाज को एकदम से बिगाड़ देने की जिद सवार हो गई. लेकिन सिन्हा जी ने मेरा हौसला बढ़ाया, कहा कि एक बार और बात करेंगे. अगली सुबह हम फिर बर्लिंगटन होटल के कमरा नंबर 11 में बने एचएमवी के टेंपररी स्टूडियो में पहुंचे. मेरे पति बीके सिन्हा ने वहां मौजूद संगीत निर्देशक मुरली मनोहर स्वरूप से अनुरोध किया, ‘मेरी पत्नी गाना गाती हैं, पांच मिनट का समय दे दीजिए.’ मुरली मनोहर जी तैयार हो गए. सामने देखा तो ऑडिशन लेने के लिए एक महिला बैठी थीं. मैं क्या गाऊं, तय नहीं कर पा रही थी. लोकसंगीत के नाम पर अपनी भौजाई से सीखे दो गीत मुझे याद थे, एक द्वार छेंकाई का गीत ताकि भाई की शादी में द्वार छेंकूं तो कुछ पैसे मिल जाए और दूसरा कन्यादान का. मैंने वही गीत गाना शुरू किया- द्वार के छेंकाई एक दुलरूआ भइया, तब जइहो कोहबर पर… इस गीत के दौरान ही एचएमवी के जीएम केके दुबे भी वहां पहुंच चुके थे. गीत खत्म होते ही केके दुबे ने कहा- मस्ट रिकॉर्ड दिस आर्टिस्ट. और वह महिला जो ऑडिशन जज के रूप में बैठी थीं, उन्होंने पास बुलाकर सर पर हाथ फेरते हुए कहा- बहुत आगे जाओगी, बस रियाज किया करो. इस तरह मेरे गीत रिकॉर्ड हो गए. बाद में पता चला कि वह महिला कोई और नहीं बल्कि बेगम अख्तर थीं जिनकी मैं बहुत बड़ी प्रशंसक हूं.

संगीत की दुनिया में बेगम अख्तर के अलावा और किन्हें पसंद करती हैं?

रशीद अली खान मुझे बेहद पसंद हैं. पंडित हरि प्रसाद चौरसिया को सुनती हूं. बड़े गुलाम अली खां साहब और लता जी को खूब सुनती हूं, गुलाबबाई की गायकी अदा पर फिदा हूं. हबीब तनवीर साहब अब रहे नहीं. उनका स्नेह कभी नहीं भूल सकती.

हबीब साहब से जुड़ी यादों के बारे में कुछ बताएं.

एक बार मैं देहरादून गई थी, ‘विरासत’ नामक आयोजन में भाग लेने. काफी सीनियर कलाकारों का जुटान हुआ था. गंभीर गीत-संगीत चल रहा था. मेरी बारी आई. मैंने भोजपुरी गीत गाया- नजरिया हो हमरी ओर रखियो. कोठा उठवले, कोठरिया उठवले, खिड़िकिया हो हमरी ओर रखियो… प्रोग्राम खत्म हुआ, देखा कि हबीब तनवीर साहब नीचे दर्शक दीर्घा से खुद चले आ रहे थे स्टेज की ओर. किसी ने बताया कि हबीब साहब मिलना चाहते हैं, लेकिन चलने में उन्हें परेशानी है. मैं भागी-भागी नीचे जाने लगी, वे स्टेज तक आ चुके थे. उन्होंने माथे पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘शारदा, तबीयत खुश हो गई. मैं मिलना चाहता था आपसे. आप भोपाल जरूर आओ.’ फिर मैं अगले साल हिंदी दिवस के एक आयोजन में भोपाल गई. विद्यापति के गीतों को गाकर सुनाया. हबीब साहब मौजूद थे. तय हुआ कि अगले कार्यक्रम में मैं ‘जयदेव’ की रचनाएं सुनाऊंगी. पर तब तक हबीब साहब नहीं रहे. उनके जैसा सहज कलाकार, उनका प्यार… हमेशा याद आते हैं हबीब साहब.

आपने गीत-संगीत के कई प्रोग्रामों में हिस्सा लिया है, सबसे यादगार आयोजन कौन-सा रहा?

मेरी शादी बेगूसराय जिले के सिहमा गांव में हुई है. इस नाते बेगूसराय वाले मुझे बहुरिया कहते हैं. वर्षों पहले की बात है. इलाके के कुछ नामी-गिरामी बदनाम-कुख्यात लोगों ने मिलकर एक धार्मिक यज्ञ का आयोजन किया. इलाके में यही हल्ला था कि वे लोग अपने पाप का प्रायश्चित करने के लिए यज्ञ का आयोजन कर रहे हैं. तब बात उठी कि इस यज्ञ की पूर्णाहुति कैसे हो. अधिकतर लोगों ने कहा ‘आपन पतोह छतीन शारदा सिन्हा, उन्हीं से’ मुझे यज्ञ के आखिरी दिन बेगूसराय बुलाया गया. मैं समस्तीपुर से चली तो स्वागत में बछवारा से बेगूसराय तक सड़क के दोनों ओर लोग जमा हुए थे. मैंने अपने जीवन में कभी एक कलाकार को देखने-सुनने के लिए उस तरह की भीड़ नहीं देखी. वह प्यार, वह धैर्य और उतनी बड़ी भीड़ में बहू का मान-सम्मान रखने के लिए अनुशासन बनाए रखना, कभी नहीं भूल सकती. जगदंबा घर में दियरा बार अईनी हे…गीत तब काफी मशहूर हो चुका था. सड़क किनारे लोग एक ही नारा लगा रहे थे- जगदंबा माई की जय.

आपकी जिंदगी में कभी ऐसा मोड़ आया जब खुद पर आपको बहुत गर्व हुआ हो?

एक बार बिहार से किसी सांस्कृतिक दल के मॉरिशस जाने की बात सामने आई. मैंने भी इच्छा जताई तो कहा गया कि पहले आपका ऑडिशन होगा. यह जानकर मैं हैरत में पड़ गई कि ऑडिशन टेस्ट बिहार की एक मंत्री कृष्णा शाही के सामने होगा. मैंने मना कर दिया. विदेश जाने के लिए किसी के पास जाकर ऑडिशन तो नहीं ही दे सकती थी और फिर इसकी जरूरत क्या थी, बिहार की कौन-सी ऐसी गली थी जहां लोग शारदा सिन्हा को छठ गीत के रूप में नहीं सुन रहे थे, विवाह गीत नहीं बजा रहे थे. उस वक्त किसी ने लिखा भी था, ‘कौआ चला कोयल की वॉइस टेस्ट लेने’ दो साल बाद भारत के राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा का बुलावा आया. मैं उस वक्त ‘मैंने प्यार किया’ फिल्म के गीत की रिकार्डिंग के लिए मुंबई में थी. फोन गया कि राष्ट्रपति जी आपको साथ में लेकर मॉरिशस जाना चाहते हैं. मॉरिशस की तैयारी हुई. वहां एयरपोर्ट पर उतरते ही सबसे पहले डॉ शर्मा से प्रेसवालों का यही सवाल था कि शारदा सिन्हा आई हैं कि नहीं. वहां एयरपोर्ट पर मैं एक कार में बैठी. कार में  ‘पनिया के जहाज से पलटनिया बनी अईह…’ गीत बज रहा था. सड़क किनारे और कई दुकानों पर भी यही गीत बज रहे थे. मैं सोच में पड़ गई कि मेरे गाए गीत यहां कैसे आ गए. ड्राइवर से इस बारे में जानना चाहा मगर वह न हिंदी जानता था, न इंग्लिश, सिर्फ क्रेयोल जानता था. रास्ते में मैंने गाड़ी रुकवाई. एक लड़की साइकिल से जा रही थी. वह इंग्लिश समझती थी. उससे पूछा कि यह गीत कैसे बज रहे हैं सभी जगह. तो उसने बताया, ‘यह एमबीसी है यानी मॉरिशस ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन और यह जो गीत सुन रही हैं, वह शारदा सिन्हा का है. मस्त गाती हैं. आज आ रही हैं यहां. आना हो तो आइए, आज उनका प्रोग्राम होगा, मजा आएगा.’

शारदा सिन्हा को हर जगह मान्यता मिली हुई है, बिहार के अपने कॉलेज समस्तीपुर महिला महाविद्यालय को छोड़कर जहां मैं प्राध्यापक हूं

आप जन्मीं झारखंड यानी रांची में, मूलतः हैं मैथिली और पहचान बनी भोजपुरी के कारण. खुद को ज्यादा करीब कहां पाती हैं?

गीत-संगीत के स्तर पर तो सबके करीब हूं लेकिन आत्मीय रूप से ज्यादा करीब झारखंड के हूं. मैं अपने घर में सहयोगी के रूप में झारखंड की लड़कियों को ही रखती हूं. उनके साथ रहना, उनसे बोलना-बतियाना सुकून देता है. जन्मभूमि से जुड़े रहने का एहसास भी. मैं कभी यह कोशिश भी नहीं करती कि वे नागपुरी बोलती हैं तो मुझसे हिंदी में बोलें. मैं भी उनसे नागपुरी सीख चुकी हूं, उसी भाषा में बात करती हूं. खाली समय में उनसे नागपुरी गीत सुनती हूं, सीखती हूं, फिर गाने की कोशिश करती हूं. मुझे आदिवासी जीवन सबसे ज्यादा पसंद है. कोई छल-कपट नहीं, एक निश्छलता है उनके जीवन में.

आपको बिहार कोकिला, बिहार की लता मंगेशकर, मिथिला की बेगम अख्तर, बिहार की सांस्कृतिक प्रहरी, लोक कोयल आदि-आदि कई उपनामों से संबोधित किया जाता है. कई-कई सम्मान मिले हैं. आपको इनमें सबसे ज्यादा क्या पसंद है?

हर सम्मान, उपनाम के साथ जिम्मेवारियां बढ़ती जाती हैं. आपको कोई सांस्कृतिक पहरुआ कहता है तो आपको हर पल सचेत रहना पड़ता है. इन सारे सम्मानों को मैं समाज द्वारा दी गई जिम्मेवारी के तौर पर लेती हूं. वैसे पश्चिम बंगाल के कुल्टी में साहित्यकार संजीव, जो अब हंस के संपादक हैं, ने 1986 में एक सम्मान पत्र मुझे अपने हाथों से लिखकर दिया था. वह सम्मान मुझे सबसे ज्यादा पसंद है.

इस बार निर्वाचन आयोग ने आपको बिहार चुनाव में ब्रांड एंबेसडर बनाया है. कहा गया कि शारदा जी ही ऐसी हैं जिनकी अपील पूरे बिहार में कारगर होगी. शासन या सरकारों से कभी कोई शिकायत?

निर्वाचन आयोग का यह भरोसा कि मेरी अपील बिहार में असरदार होगी, मेरे लिए सम्माननीय है. शासन या सरकारों से एक शिकायत है कि जब भी कला-संस्कृति से जुड़ी गतिविधियां हों, संस्थान बने तो उसकी जिम्मेवारी उन लोगों के हाथों में ही दी जाए, जिन्हें इनकी समझ हो. राजनीति से इसे कचरा न बनाया जाए. और एक मजेदार बात बताऊं, शारदा सिन्हा को हर जगह मान्यता मिली हुई है, बिहार के अपने कॉलेज समस्तीपुर महिला महाविद्यालय को छोड़कर जहां मैं प्राध्यापक हूं. वहां अब तक मैं कन्फर्म्ड स्टाफ नहीं बन सकी हूं. मुझे तो हंसी आती है, दुख भी होता है कि रिकोगनिशन कमेटी के फेरे में तीन दशक से नौकरी कर रही हूं लेकिन अब तक मान्यता नहीं मिली.

कोई ऐसी हसरत जो पूरी होनी बाकी है?

एक तो लता जी से मुलाकात की. पढ़ने के समय में कितने खत मैंने लता जी को लिखे होंगे, मुझे खुद याद नहीं आता. रोज ही लिखकर भेजती थी. पता नहीं उनको वे खत मिले भी या नहीं. इसके अलावा चाहती हूं कि एक संगीत संस्थान की स्थापना हो जहां आज के बच्चों को सही दिशा में प्रशिक्षण दे सकूं. वहां से निकलने वाले बच्चे अपनी माटी से जुड़े रहें. वे बहकाव में आकर संगीत की मूल आत्मा को बर्बाद न करें बल्कि शास्त्रीयता और लोकपरंपरा का असली मतलब समझें और भविष्य में इसे बचाने, बनाने, बढ़ाने का काम करें. यह एक ख्वाब है, जिसे इसी जन्म में पूरा करना चाहती हूं.

नकल है पर बदशक्ल नहीं : आक्रोश

प्रियदर्शन ने अपने लिए एक नया शब्द गढ़ा है. वे ‘डायरेक्टेड बाय’ की बजाय ‘फिल्म्ड बाय’ लिखना पसंद करते हैं. शायद इसलिए उन्होंने तय कर लिया है कि वे मौलिक नहीं रहेंगे. वे निर्देशन नहीं करेंगे, बस शूटिंग करेंगे. इसीलिए जब आप यह जानकर और देखकर खुश होते हैं कि ‘ऑनर किलिंग’ जैसे मुद्दे पर प्रियदर्शन ने एक गंभीर फिल्म बनाई है तो आपको दुखी करने वाली वजहें भी मैदान में कूद पड़ती हैं. इसीलिए आक्रोश के बारे में बात करने के दो नजरिए हो सकते हैं. पहला, आप 1988 की अमेरिकन फिल्म ‘मिसिसिपी बर्निंग’ के बारे में जानते हों और दूसरा, आप या तो न जानते हों या आंखों पर पट्टी बांध लें.

मिसिसिपी बर्निंग  दक्षिणी अमेरिका में रहस्यमय ढंग से लापता हुए तीन सामाजिक कार्यकर्ताओं को तलाशते दो एफबीआई एजेंटों की कहानी है और ‘आक्रोश’ बिहार के एक जिले में लापता हुए दलित युवक और उसके दो दोस्तों को तलाशते हुए सीबीआई अधिकारियों की कहानी. कहानी का हर मोड़, सारे तनाव और दुविधाएं, सब मुख्य किरदार और उनकी कमियां-खूबियां मिसिसिपी बर्निंग से उठाकर चिपका दी गई हैं.
लेकिन आप इस नकलधाम की ओर से आंखें मूंद लें तो आक्रोश अच्छी लगती है. परेश रावल फिल्म के केंद्र में हैं, सबसे अच्छी एेक्टिंग करते हुए और सबसे अच्छे सीन अपनी जेब में रखे हुए.

फिल्म की सिनेमेटोग्राफी और साबू सिरिल के बनाए सेट, जिनका नकली होना जानते हुए भी आप अभिभूत होते हैं, कमाल के हैं. पूरी फिल्म एक अंधेरे-से रंग में है, आसमान हर समय ऐसा, जैसे धूल उड़ रही हो और यही एक डार्क थ्रिलर का असर पैदा करने के लिए काफी है. फिल्म में कुछ चीजें मौलिक भी हैं. एक प्रेम-कहानी, एक आइटम नंबर और अजय देवगन के पीछा करने के दो लंबे सीक्वेंस. यह सब खालिस बॉलीवुड स्टाइल में मसालेदार है लेकिन रोमांच तो बढ़ाते ही है. यह और बात है कि प्रियदर्शन के संसार में दिल्ली के मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहा दलित लड़का ‘कोर्ट’ को ‘कोरट’ बोलता है या अजय देवगन चलती कार पर देर तक खड़े रहते हैं जब इसकी कोई जरूरत नहीं है. 

वैसे फिल्म कैसी भी होती, यही तथ्य भला लगता है कि फिल्म किसी सामाजिक मुद्दे के प्रति इतनी सचेत है. फिर यह आप पर निर्भर करती है कि आपको किसी अंग्रेजी फिल्म के क्रॉस को त्रिशूल से और काले-गोरे के भेदभाव को जातीय भेदभाव से बदल देने की मौलिकता से कोई शिकायत है या नहीं. आप इसे इसके बॉलीवुडीय अंत के लिए भी देख सकते हैं जो बहुत जरूरी था, आकर्षक बिपाशा बसु के लिए भी और तीनों लड़कों को पकड़ने के बाद की निर्दयी ब्लैक कॉमेडी के लिए, जो हिंदी फिल्मों में कम ही देखने को मिलती है. ‘आक्रोश’ परेशान करती है, जो यह करना भी चाहती थी.

गौरव सोलंकी

राम भरोसे अयोध्या

बदबू मारते घाट, निराश व्यापारी और बुनियादी सेवाओं की बदहाल हालत यह बताने के लिए काफी है कि राम की नगरी वास्तव में रामभरोसे ही है. जयप्रकाश त्रिपाठी की रिपोर्ट

जिस अयोध्या को मुद्दा बनाकर कुछ सियासी पार्टियों ने सालों उत्तर प्रदेश व दिल्ली की सत्ता पर शासन किया, जिस शहर के नाम पर कई सियासी पार्टियों के लोग देश के दिग्गज नेताओं की जमात में शामिल होकर अपने भविष्य का सितारा चमकाने में सफल रहे, उस अयोध्या की हालत पर वहां के निवासी ही नहीं बल्कि देश के कोने-कोने से आने वाले पर्यटक और तीर्थयात्री भी आंसू बहा सकते हैं. मंदिर-मस्जिद मुद्दे को लेकर देश की आस्था और सियासत के केंद्र में रहने वाला अयोध्या एक तीर्थ स्थल के रूप में और बतौर शहर भी, विकास की दौड़ में काशी-मथुरा तो छोड़ दीजिए, देश के अन्य छोटे-छोटे तीर्थ स्थलों से भी कोसों दूर है. बजबजाती नालियां, सरयू के पानी से आती जानवरों की लाशों की बदबू और टूट चुके व्यापारी…तीर्थ नगरी की मानो यही नियति बन गई है. राम के नाम पर सालों से अयोध्या विधानसभा सीट से जीत रहे भाजपा विधायक हों या वर्तमान कांग्रेसी सांसद, सभी इन अव्यवस्थाओं से आंखें मूंदे बैठे हैं.

आस्था के नाम पर भगवान राम की नगरी में आने वालों के लिए हरिद्वार में बनी हर की पौड़ी की तर्ज पर  24 साल पहले करोड़ों रु खर्च करके सरयू नदी के किनारे राम की पौड़ी का निर्माण कराया गया था. इसके एक ओर घाट बनाए गए और दूसरी ओर सुंदर पार्क, जहां से तीर्थयात्री घाटों के दूसरी ओर बने मंदिरों का विहंगम नजारा देख सकते थे. लेकिन अब देश-विदेश से यहां आने वाले सैलानियों को एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंचने के लिए नाक पर कपड़ा रखकर गुजरना पड़ता है. घाट की सीढ़ियों पर मरे हुए बंदर व कुत्तों के कंकाल और पानी में बजबजाते कूड़े-करकट के ढेर बताते हैं कि व्यवस्था यहां से किस कदर नदारद है.

साफ-सफाई की व्यवस्था ऐसी हुई तो लोगों ने घाट की सीढ़ियों व पार्क में ही मल-मूत्र करना शुरू कर दिया है. जो पार्क तीर्थयात्रियों के लिए बनाए गए वहां आवारा जानवरों का कब्जा हो गया है. लोगों की आस्था ही है कि वे फिर भी अपने आराध्य के नाम पर बने घाट को देखने के लिए चले ही आते हैं. भीषण बदबू व गंदगी के बीच में ही करीब आधा दर्जन छोटे दुकानदार घाट के किनारे माला, कंगन, सिंदूर आदि बेचकर परिवार का पेट पाल रहे हैं. घाट की दुर्दशा के बारे में पूछते ही दुकानदार रामकेवल का चेहरा तमतमा उठता है. वे कहते हैं, ‘इसे अजुध्या (स्थानीय दुकानदार अयोध्या को यही कहते हैं) में राम की पौड़ी नहीं साहब नरक की पौड़ी कहिए.’ रामकेवल बताते हैं कि आसपास के क्षेत्र में मरने वाले जानवरों को सफाई कर्मचारी उठाकर यहीं डाल जाते हैं. लोग आते तो हैं लेकिन बदबू व गंदगी के कारण तेजी से आगे बढ़ते जाते हैं जिसके कारण दुकानदारी भी नहीं हो पाती. लोगों की प्यास बुझाने के लिए लगे नल सूखे और जंग खाए हुए हैं.

राम की पौड़ी पर इतनी बदबू है कि तीर्थयात्रियों को नाक पर कपड़ा रखकर चलना पड़ता है

मंदिर-मस्जिद के नाम पर समय-समय पर जो तनावपूर्ण स्थिति तीर्थनगरी में बनती है उससे यहां के व्यापारी वर्ग की कमर भी पूरी तरह टूट चुकी है. श्रीराम होटल के मालिक अनूप कुमार गुप्ता का पूरा कारोबार इस समय अस्त व्यस्त है. लाखों रुपए खर्च करके होटल बनवाया, लेकिन उनके होटल पर उनसे अधिक अधिकार जिला प्रशासन का रहता है. अनूप बताते हैं कि 15 सितंबर को अचानक जिला प्रशासन की ओर से एक नोटिस आया जिसमें लिखा गया था कि 16 सितंबर से होटल खाली करा लिया जाए, उसमें फोर्स रुकेगी. 16 सितंबर से लेकर 4 अक्टूबर तक होटल पर फोर्स का ही कब्जा रहा. जिला प्रशासन ने महज एक पत्र भेजकर चंद घंटों में ही होटल तो ले लिया लेकिन 15 दिन गुजरने के बाद भी उसका कोई भुगतान नहीं किया है. 2002 में भी होटल 22 दिनों के लिए लिया गया था जिसका पूरा पैसा अब तक नहीं दिया गया. जब भी जरूरत होती है जिला प्रशासन मनमर्जी से होटल को अपना मान लेता है. अनूप कहते हैं, ‘अयोध्या को लेकर बात हमेशा अंतर्राष्ट्रीय स्तर की होती है, लेकिन यहां सुविधाएं किसी विकसित गांव से भी कम हैं.’

अयोध्या आने वाले तीर्थयात्रियों में दक्षिण भारतीयों की अच्छी-खासी संख्या होती है, इसके बावजूद यहां से दक्षिण भारत के लिए कोई सीधी ट्रेन नहीं है. लिहाजा यहां आने वाले तीर्थयात्री 225 किमी दूर बनारस या 170 किमी दूर इलाहाबाद या फिर 135 किमी दूर लखनऊ उतरकर अयोध्या पहुंचते हैं. वे जिस शहर में उतरते हैं वहीं होटल लेकर रुक जाते हैं और कार या किसी अन्य साधन से दिन में अयोध्या पहुंचकर दर्शन करके शाम को वापस चले जाते है, जिससे यहां के कारोबारियों को इन पर्यटकों का पूरा फायदा नहीं मिल पाता.

विकास की दौड़ में पिछड़ने से लोगों का गुस्सा उफान पर है. अयोध्या नगर पालिका से अवकाशप्राप्त कर्मचारी प्रेम शंकर पांडे कहते हैं, ‘नेता लोग मंदिर-मस्जिद मुद्दे को लेकर विधानसभा से लेकर संसद तक हंगामा करते हैं, लेकिन कभी यहां के विकास को लेकर  उन्होंने संसद या विधानसभा में कोई आंदोलन किया हो ऐसा कभी देखने को नहीं मिला.’ पांडे कहते हैं कि यह अयोध्या की उपेक्षा ही है कि 1978 में बनी नगर पालिका का कार्यालय आज भी 250 रुपए महीने के किराए के भवन से संचालित हो रहा है. नगर के बीच में स्थित ऐतिहासिक छोटी देवकली के आसपास के मोहल्लों की स्थिति गांव से भी बदतर है. वहां रहने वाले 70 वर्षीय सरजू प्रसाद प्रजापति दिखाते हैं कि बिजली विभाग के पास लोगों के घरों तक तार पहुंचाने के लिए खंभे तक उपलब्ध नहीं हैं. मजबूरी में लोगों ने लकड़ी के डंडे खड़े करके जैसे-तैसे तारों को अपने घरों तक पहुंचाया है. पक्की सड़क न होने के कारण लोग कच्चे रास्तों से होकर घर तक पहुंचने को मजबूर हैं. शिक्षा का हाल यह है कि करीब 50 हजार की आबादी वाले अयोध्या के लिए महज दो इंटर कॉलेज हैं, एक लड़कियों का व एक लड़कों का.

शहर होने के बावजूद यहां की कॉलोनियों में ग्राम प्रधान के चुनाव हो रहे हैं

राम की नगरी की स्वास्थ्य सेवाएं भी राम के भरोसे ही हैं. श्रीराम अस्पताल के एक डॉक्टर बताते हैं कि उनके यहां रोज करीब 600-700 मरीज इलाज के लिए आते हैं. इसके बावजूद डॉक्टरों के 19 पद सालों से रिक्त चल रहे हैं. कोई महिला प्रसव के चलते या किसी अन्य गंभीर बीमारी का इलाज कराने श्रीराम अस्पताल पहुंचे तो उसे निराशा ही हाथ लगेगी, क्योंकि यहां महिला रोग विशेषज्ञ का पद भी खाली है. फैजाबाद के सीएमओ डॉ आरए राय बताते हैं कि महिला अस्पताल बनकर तैयार है. वे कहते हैं, ‘बस डॉक्टरों की तैनाती होनी बाकी है, प्रस्ताव शासन को भेजा गया है.’ लेकिन तैनाती कब तक होगी, इसका उनके पास कोई जवाब नहीं. यातायात की सुविधा का आलम यह है कि अयोध्या के पास अपना रोडवेज बस अड्डा तक नहीं है.

फैजाबाद के दवा व्यापारी व उत्तर प्रदेश युवा उद्योग व्यापार मंडल के प्रदेश अध्यक्ष सुशील जायसवाल कहते हैं, ‘अयोध्या व फैजाबाद दोनों ही शहर एक-दूसरे से सटे हुए हैं और दोनों नगर पालिकाएं हैं. दोनों शहरों को मिलाकर एक नगर निगम जब तक नहीं बनाया जाएगा तब तक विकास नहीं होगा. चार किलोमीटर में ही दो नगर पालिकाओं का होना राजनीतिक खेल है.’ जायसवाल बताते हैं कि फैजाबाद नगर पालिका की सीमा इतनी छोटी है कि रेलवे स्टेशन के बाहर निकलते ही ग्रामीण क्षेत्र शुरू हो जाता है जबकि हकीकत में आज यहां कई किलोमीटर दूर तक रिहाइशी कॉलोनियां विकसित हो चुकी हैं. वे बताते हैं कि शहर के भीतर ही 50 के करीब गांव हैं. यह शहर का दुर्भाग्य ही है कि शहर होने के बावजूद यहां की कॉलोनियों में ग्राम प्रधान के चुनाव हो रहे हैं. नगर पालिका की सीमा छोटी होने के कारण विश्वविद्यालय, आरटीओ, नगर टांसपोर्ट कार्यालय सहित कई कार्यालयों का अस्तित्व शहर में होने के बाजवूद ग्राम सभाओं में है. शहर के बीचोबीच स्थित कौशलपुरी कॉलोनी अयोध्या-फैजाबाद के पॉश रिहाइशी इलाकों में से है, लेकिन पंचायत चुनाव की लहर यहां भी खूब देखी जा सकती है. यहां रहने वाली हनी श्रीवास्तव बताती हैं कि फैजाबाद विकास प्राधिकरण ने पार्क के सामने मकान होने के कारण उनसे 27 हजार रुपए अतिरिक्त चार्ज लिया था, लेकिन घर के बाहर बना पार्क, पार्क नहीं बल्कि तालाब नजर आता है. यहां फूल पौधों की बजाय जलकुंभी व बड़ी-बड़ी घास लोगों के लिए समस्या बनी है. यहीं रहने वाले राम जन्म यादव बताते हैं कि बिजली कब आएगी और कब जाएगी इसका कोई समय नहीं है.

पूरी अयोध्या और सटे हुए फैजाबाद, जो अयोध्या का जिला भी है, में फैली इस तरह की दुश्वारियां तीर्थयात्रियों और वहां के लोगों को भले ही कांटों के समान चुभती हों लेकिन अयोध्या विधानसभा सीट से पिछले कई सालों से चुने जा रहे भाजपा विधायक लल्लू सिंह की नजर में यह सब सियासी कारणों से हो रहा है. वे कहते हैं, ‘राम की पौड़ी कांग्रेस के शासन में बनी, उसका नक्शा इस तरह बनाया गया कि नदी का पानी पौड़ी तक पहुंच ही नहीं पाता जिससे इसमें गंदा पानी भरा रहता है. भाजपा शासन काल में इसे दुरुस्त कराने का प्रयास हुआ लेकिन इंजीनियरों ने कहा कि इसे तैयार करने वालों ने प्लान ही गलत बना दिया है लिहाजा अब कुछ नहीं हो सकता.’ साफ-सफाई का ठीकरा वे नगर पालिका पर फोड़ते हुए कहते हैं कि जिला प्रशासन ही रुचि नहीं लेता. फैजाबाद के सांसद निर्मल खत्री से फोन पर संपर्क किया गया तो कई प्रयासों के बावजूद उनका मोबाइल स्विच ऑफ बताता रहा.

सहल नहीं सुलह

कई दिनों तक उत्तर प्रदेश की फिजा में तैरता रहा अयोध्या विवाद का गर्द-ओ-गुबार अब लगभग छंट चुका है. मालिकाना हक का फैसला आने की आहट के बाद लगभग दो महीनों से जो बेचैनी का माहौल बना था वह फैसला आने के कुछ घंटों के बाद ही काफूर होता दिखा. लेकिन देश और प्रदेश की सियासत के पास इस मुद्दे को जिंदा रखने की अपनी मजबूरियां हैं, इसलिए फैसला आने के तुरंत बाद फैसले पर बयानबाजी और फिर अदालत से बाहर सुलह को लेकर गहमागहमी शुरू हो गई. गौरतलब है कि फैसला आने के पहले के साठ साल में अदालत से बाहर सुलह को प्रदेश की सियासत और सहाफत दोनों में इतनी जगह कभी नहीं नसीब हुई जितनी अब हो रही है. 26 जुलाई को सुनवाई खत्म होने पर भी हाई कोर्ट की सुलह की कोशिशें बेनतीजा रहीं थी और फैसले से पहले एकाएक उपजे रमेश चंद्र त्रिपाठी की याचिका पर सुनवाई के दौरान भी इस तरह की कोशिशों को बेमानी ही बताया गया था. फैसला आने के बाद से ही सुलह की कोशिशें एकाएक तेज हुई हैं, बावजूद इसके ये ज्यादा उम्मीदें नहीं जगातीं.

अधिसंख्य हिंदू समुदाय जन्म से ही इस तरह की कहानियां सुन-सुनकर होश संभालता है कि मुसलिम आतताइयों ने देश में तमाम मंदिरों को ध्वस्त कर दिया था. उनके लिए यह बात ज्यादा मायने नहीं रखती कि कोर्ट में यह सिद्ध कर पाना असंभव है कि भगवान राम का जन्म बाबरी मस्जिद के मध्य गुंबद के नीचे हुआ था. पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट भी पूरी तरह से कोई निष्कर्ष देने में असफल रही है. जो वे बचपन से अपने से बड़ों, पौराणिक ग्रंथों आदि के जरिए पढ़ते-सुनते आए हैं, उनके लिए तो वही सत्य बन चुका है.

मीडिया द्वारा बढ़-चढ़कर इस प्रकार के दावे करना कि युवा भारत अयोध्या विवाद को पीछे छोड़ चुका है, अब अयोध्या कोई भावनात्मक मुद्दा नहीं रहा, पूरी नहीं बल्कि अधूरी सच्चाई है

इसी तरह मुसलिम मानसिकता में भी यह बात गहरे पैठी हुई है कि 23 दिसंबर, 1949 को उनकी मस्जिद में मूर्तियां रखकर उन्हें वहां से बेदखल कर दिया गया. उनके लिए ये बातें कोई मायने नहीं रखतीं कि यह मस्जिद शरिया के मुताबिक थी या नहीं, इसमें मीनारें क्यों नहीं हैं, इसमें वुजू के लिए कोई व्यवस्था क्यों नहीं थी. इसके अलावा यह साबित कर पाना उनके लिए मुश्किल है कि मस्जिद बाबर ने बनवाई, औरंगजेब ने या फिर किसी और ने. इन बातों से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता. इस तरह की मनःस्थिति को 6 दिसंबर, 1992 की घटना ने और बढ़ावा दिया है.

दोनों समुदायों के बीच प्रचलित ये कहानियां अभी भी उतनी ही मजबूती से जमी हुई हैं जितनी दो अथवा छह दशक पहले थीं. आज की युवा पीढ़ी इसी माहौल में पली-बढ़ी है. ऐसे में मीडिया द्वारा बढ़-चढ़कर इस प्रकार के दावे करना कि युवा भारत अयोध्या विवाद को पीछे छोड़ चुका है, अब अयोध्या कोई भावनात्मक मुद्दा नहीं रहा, पूरी नहीं बल्कि अधूरी सच्चाई है.

यह सच है कि भारत में एक वर्ग इससे आगे बढ़ चुका है. असल में यह तबका भारत में लंबे समय से मौजूद रहा है और पिछले कुछ समय में इसका दायरा काफी विस्तृत भी हो चुका  है. इस तबके ने उस वक्त कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई जब विहिप ने 1980 में एक स्थानीय मसले को राष्ट्रीय अभियान बना दिया था. इसे भारत के अन्य भागों में मौजूद सांप्रदायिकता की दबी और कम दबी चिंगारियां नहीं दिखाई देतीं. यह उन पर केवल तब ध्यान देता है जब वे एक बड़े विवाद का सबब बन जाती हैं, दंगों की वजह बन जाती हैं. देश का यह खाया-पीया वर्ग यह मानता है कि अाधुनिकता और आर्थिक तरक्की जल्दी ही समाज में मौजूद संकीर्ण सांप्रदायिक सोच और इससे प्रभावित राजनीति को अप्रासंगिक बना दंेगी और अयोध्या की बित्ते भर जमीन तब उतनी महत्वपूर्ण नहीं रह जाएगी.

लेकिन यह तबका शायद भूल गया है कि हिंदुत्व अपने आप में ही एक आधुनिक उत्पाद है. 100 साल पहले हिंदू महासभा के माध्यम से विनायक दामोदर सावरकर और हिंदू समुदाय के दूसरे उच्चवर्गीय लोगों ने खुद को पारंपरिक सनातन धर्म की उन चीजों से अलग कर लिया था जिन्हें वे नापसंद करते थे. इसे ही उन्होंने हिंदुत्व नाम दिया था. इसका मकसद एक आक्रामक समुदाय की स्थापना करना था जो अपनी पहचान, अपनी रक्षा के लिए सभी हिंसक रास्तों को अपनाने के लिए तैयार हो. यह यूरोपीय राष्ट्रवाद की नकल जैसा था. इन बातों को ध्यान में रखना यहां इसलिए भी जरूरी है कि टेलीविजन चैनल इन बातों की तरफ ध्यान देना जरूरी ही नहीं समझते हैं. ऐसा लगता है कि हमारा मीडिया इन दिनों झुंड की मानसिकता से ज्यादा काम कर रहा है. मसलन हर कोई यह बता रहा है कि असल विवादित जमीन 2.77  एकड़ है जबकि सच्चाई इसके विपरीत है. असल विवादित जमीन महज 0.26 एकड़ है. 2.77 एकड़ वह जमीन थी जिसे कल्याण सिंह की सरकार ने 1991 में अधिगृहीत किया था लेकिन अगले ही साल उसे निरस्त कर दिया गया. लेकिन मीडिया के मन में वह बात अभी तक जमी हुई है.

ज्यादातर मीडिया चर्चाओं में साक्षात्कार करने वाले से लेकर उसमें भाग लेने वाले अन्य लोगों को  दो भागों में विभक्त कर दिया जाता है. या तो आप धर्मनिरपेक्ष हैं या फिर हिंदूवादी. थोड़ी-बहुत रटी-रटाई बातें खत्म हुई नहीं कि स्पष्ट हो जाता है कि मुसलमान वहां हर हाल में मस्जिद चाहते हैं और हिंदू मंदिर की चाह रखते हैं. पर कैसे बनेगी या बनेगा, यह व्यक्ति दर व्यक्ति बदलता रहता है. सिर्फ गरीब और अशिक्षित ही इसमें शामिल नहीं हैं. पत्रकार, शिक्षक, पुलिसवाले, वकील. इस विश्वास के साथ कि उनके सबूत ही विश्वसनीय और अकाट्य हैं.

अयोध्या मामले के सबसे पुराने पक्षकार 90 वर्षीय हाशिम अंसारी ने खुद को मीडिया की जरूरतों के मुताबिक भलीभांति ढाल लिया है. आज शांति के सबसे बड़े पैरोकार बनकर उभरे वे एक प्रकार से सुलह के रास्ते की मुश्किलों का भी बखूबी प्रतिनिधित्व करते हैं. एक समय वे अवध की गंगा-जमुनी तहजीब की बात करते हैं, हिंदू-मुसलिम एकता की बात करते हैं और बताते हैं कि किस तरह से नेताओं ने उन्हें आपस में लड़ाया है. दूसरी तरफ कभी-कभी अचानक ही अल्पसंख्यक समुदाय की असुरक्षा उन्हें अपने घेरे में ले लेती है और वे अन्याय की बातें करने लगते हैं. वे 1949 में मस्जिद पर कब्जे और 1992 में उसे ढहाने की घटना सुनाने लगते हैं. वे उन नेताओं को गरियाते हैं जिन्होंने मुसलिम समुदाय की असुरक्षा की भावना पर अपनी रोटियां सेकी हैं.

हालांकि अयोध्या इस विवाद और इस पर जब-तब लगते रहे मीडिया की पीपली लाइव से आजिज आ चुका है. लेकिन जब उनसे मंदिर-मस्जिद या समझौते पर कोई सवाल पूछा जाए तो जवाब तुरंत मिल सकता है – ‘मुसलमानों के लिए ये सिर्फ बाबर द्वारा बनवाई गई एक मस्जिद है. मगर हमारे लिए यह सिर्फ एक मंदिर नहीं है. यह हमारे भगवान का जन्मस्थान है. यह हमारे लिए उतना ही पवित्र है जितना उनके लिए मक्का.’

इस हालात में सुलह-समझौते के प्रयास किस हद तक व्यावहारिक हैं? हिंदू महासभा विवादित स्थल की जमीन में मुसलमानों को हिस्सा देने के खिलाफ शीर्ष अदालत जा रही है तो सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड अपना दावा खारिज होने को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचेगा. इसी बीच कुछ सियासी बयान भी आ गए जिनमें से एक समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव का था, ‘इस फैसले से मुसलमान अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहा है. देश आस्था से नहीं कानून से चलता है.’ पूर्व सपा नेता आजम खान के मुताबिक सुलह के बहाने दूसरा पक्ष मुसलमानों के साथ हेकड़ी दिखा रहा है.

दो दशक पहले तक दोनों पक्षों के जो लोग इस दिशा में काम कर रहे थे उनकी अपनी एक विश्वसनीयता और स्पष्ट सोच थी. मसलन सैयद शहाबुद्दीन कांची पीठ के परमाचार्य की बात को आज भी याद करते हैं जब उन्होंने शहाबुद्दीन को कांची मठ के बगल में स्थित मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए आमंत्रित किया था. रामजन्मभूमि न्यास के पूर्व मुखिया परमहंस रामचंद्र दास की हाशिम अंसारी से नजदीकी जगजाहिर है. इस तरह के लोग आज कहीं नजर नहीं आते. मौजूदा आधुनिकता की सबसे बड़ी समस्या यही है. आधुनिक भारत की नई पीढ़ी सिर्फ एक ही भारतीय भाषा जानती है. इसका भारत की विविध संस्कृतियों से कोई मेल ही नहीं हुआ है, न ही इसकी ऐसी कोई इच्छा है. इन चीजों में रुचि रखने वाले और इसका महत्व समझने वाले नेताओं और व्यक्तियों की पीढ़ी अब खत्म हो चुकी है. भरोसेमंद मध्यस्थों ने अपने पैर काफी समय पहले पीछे खींच लिए थे क्योंकि अपने पक्ष में फैसले की उम्मीद में दोनों पक्ष बातचीत करना ही नहीं चाहते थे. मगर अब काफी लोग इसके बारे में बात करते देखे-सुने जा सकते हैं.

फैसला आने के बाद देश के मुसलमानों ने परिपक्वता दिखाई है. अब जिम्मेदारी कांग्रेस (और भाजपा भी) के कंधों पर है कि वे अल्पसंख्यक तबके के मन में एक विश्वास जगाए कि इस फैसले से भारतीय समाज में उनकी स्थिति किसी भी लिहाज से कमजोर नहीं होने वाली. सुप्रीम कोर्ट अपना काम करता रहेगा, लेकिन यहां राजनीतिक पार्टियों की जिम्मेदारी बनती है कि वे सुलह-समझौते से रास्ता निकालने के लिए ईमानदार प्रयास करें, कुछ हद तक वैसा ही समर्पण, ईमानदारी और लचीला रुख दिखाएं जितनी गंभीरता और समर्पण उन्होंने परमाणु करार के मसले पर दिखाया था. और आरएसएस को भी भाजपा की राजनीतिक अवसरवादिता की नकेल कसकर रखनी होगी.

दैव भरोसे देवभूमि

जीवन देने वाला जल जिंदगी के लिए आफत कैसे बन जाता है यह बुद्धिराम म्योली से पूछिए. उत्तराखंड के टिहरी जिले में बसे जलवाल गांव के बुद्धिराम अपने आठ जनों के परिवार के साथ दो महीने पहले तक अपने आठ कमरों के मकान में आराम से रहते थे. लेकिन पिछले महीने एक दिन अचानक उनका मकान हर कोने से धंस गया. हाल यह था कि उसमें रहना तो दूर, उसके भीतर कुछ देर खड़े रहने में भी उन्हें डर लगने लगा था. तब से मजबूरी में म्योली परिवार अपने मवेशियों सहित इस मकान को छोड़कर रिश्तेदारों के घर शरण लिए हुए है. बुद्धिराम कहते हैं, ‘यह सब झील का जलस्तर बढ़ने की वजह से हो रहा है.’

जिस झील की वे बात कर रहे हैं वह विराट टिहरी बांध का विशाल जलाशय है. यह वही झील है जो भागीरथी और भिलंगना नदी के संगम पर बनी और जिसमें पुराना टिहरी शहर सहित दसियों गांव डूबे. लेकिन यह पांच साल पहले की बात है. इन पांच सालों के दरम्यान और खासकर इस साल की बरसात में जो हुआ वह बताता है कि पानी बांधने का काम जब बुद्धि को बांधकर और स्वार्थ को साधकर किया जाता है तो उसकी कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है. इस साल झील का जलस्तर बढ़ने से हुई तबाही ने विस्थापन और पुनर्वास को पुनर्परिभाषित करने की जरूरत तो पैदा की ही है, पिछले कुछ सालों से ठंडे पड़ गए बांध से जुड़े कई मुद्दों को भी फिर से जिंदा कर दिया है.

तबाही यह भी बताती है कि डूब क्षेत्र की फिर से व्याख्या करके दर्जनों गांवों को विस्थापित करने की जरूरत है

सुप्रीम कोर्ट ने टिहरी बांध के जलस्तर को आरएल 820 मीटर से ऊपर बढ़ाने पर रोक लगा रखी थी. लेकिन महीना भर पहले जब बरसात तमाम रिकॉर्डों को ध्वस्त करने में लगी थी तो उसी दौरान टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (टीएचडीसी) भारी बरसात में सुप्रीम कोर्ट से यह रोक हटवाने में सफल हो गया. उस समय तक झील के स्तर के अधिकतम आरएल 830 मीटर तक पहुंचने पर उसकी जद में आने वाले सैकड़ों परिवारों का पुनर्वास नहीं हो पाया था. पानी के आरएल 820 मीटर से आगे बढ़ने के साथ ही गांवों में अफरा-तफरी मचने लगी. शोर हुआ तो राज्य सरकार जागी. आरोप-प्रत्यारोप लगने लगे. 17 सितंबर को न्यायालय ने राज्य सरकार और टीएचडीसी को यह कहकर फटकार लगाई कि पुनर्वास और राहत पर ध्यान देने की बजाय वे एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं.

पानी चढ़ने के साथ बांध से करीब 50 किलोमीटर दूर बसे चिन्याली सौड़ कस्बे का पुल डूबने लगा था. इसके साथ ही कस्बे के जोगत रोड स्थित बाजार में भूस्खलन शुरू हो गया. झील का जल स्तर 830 मीटर तक पहुंचने तक कस्बे का पर्यटक आवास गृह, झूला पुल और कई दुकानें व घर डूब गए थे. उत्तरकाशी जिले में स्थित इस कस्बे में आशा देवी एक होटल चलाती थीं. यह होटल उनके पति की जीवन भर की कमाई से बने तीन मंजिला मकान में था. 2008 में झील का पानी चढ़ने के बाद उनके मकान सहित जोगत बाजार का एक बड़ा हिस्सा झील में समा गया. उसके बाद से आशा देवी सड़क के ऊपर किराए की दुकान में होटल चला रही थीं. 19 सितंबर को झील का पानी 830 मीटर के स्तर तक भरने के बाद उनके होटल तक भी पानी पहुंच गया और आसपास के सारे मकान व दुकानें भर-भराकर झील में गिरने लगीं. अब आशा देवी ने फिर से अपने होटल का सामान एक किराए की दुकान में भर दिया है. वे गुस्से में कहती हैं, ‘दुकान का मुआवजा तो मिला मगर तीन मंजिले मकान के लिए कुछ भी नहीं मिला. हम कहां और कैसे अपने लिए एक नई छत बनाएं?’

टिहरी जिले के थौलधार विकास खंड के सरोट गांव में भी झील का स्तर बढ़ने से भारी नुकसान हुआ. गांव के अनुसूचित जाति के नौ परिवारों को आपदा के डर से उनके मकानों से हटा दिया गया था. झील के जल स्तर को छूते इन लोगों के मकानों में दरारें आ गईं. प्रभावित परिवार के रोशन लाल बताते हैं कि उनके घर आर 835 मीटर की सीमा में आ रहे हैं लेकिन उन्हें मकानों का मुआवजा अभी तक नहीं मिला है, जबकि पुनर्वास निदेशालय 835 मीटर की सीमा के अंदर पड़ने वाले सभी घरों को मुआवजा देने का शपथ पत्र न्यायालय में दे चुका है. वे एक अजीब-सी बात बताते हैं कि पुनर्वास विभाग द्वारा मकानों को तो 835 मीटर की श्रेणी में रखा जा रहा है लेकिन मकान के भूतल को ही इस सीमा के भीतर मानकर उसी तल का मुआवजा देने की बात कही जा रही है. यानी मकान की निचली मंजिल का तो मुआवजा मिलेगा पर ऊपरी मंजिल का नहीं. बेघर हुए इन 9 परिवारों को राहत के नाम पर एक तिरपाल व एक-एक कंबल मिला. रोशनलाल पूछते हैं, ‘एक तिरपाल में 9 परिवारों के लोग कैसे रह सकते हैं?’

जिन कस्बों पर ये गांव अपनी जरूरतों के लिए निर्भर थे वे झील बनने के बाद इन गांवों से दस-दस गुना दूर हो गए

चिन्याली सौड़ से 1.5 किमी पीछे चंबा-धरासू मार्ग पर बसे गोजमीर गांव को ज्योलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जीएसआई) ने भूधंसाव वाला क्षेत्र घोषित किया है. पुनर्वास विभाग ने गोजमीर के 37 परिवारों को 5 साल पहले जमीन की कीमत तो दे थी लेकिन अभी तक मकानों का मुआवजा नहीं दिया. इसलिए ये लोग खतरे के बावजूद गांव में ही रह रहे हैं. यही हाल झील के पार चिन्याली सौड़ विकास खंड के बल्डांगी गांव के 9 परिवारों का भी है. 835 मीटर की सीमा से ऊपर बसे भल्डियाना गांव में भी भूधंसाव शुरू हो गया है. यही हालात तल्ला उप्पू के भी हैं. ये दोनों गांव नए-नए ही बसे थे. यानी ये दोबारा उखड़ने की त्रासदी झेलेंगे.

प्रतापनगर क्षेत्र के रौलाकोट, नकोट तथा स्यांसू गांवों की स्थिति तो और भी नाजुक है. जीएसआई की रिपोर्ट के आधार पर साल 2000 में ही सुप्रीम कोर्ट ने इन गांवों के सभी परिवारों का पुनर्वास करने के आदेश दे दिए थे. रौलाकोट में 150 परिवार हैं. करीब 1,000 साल पुराने इस गांव के प्रधान उम्मेदू लाल कहते हैं, ‘अब तक यह गांव सुरक्षित रहा परंतु झील का पानी बढ़ने के साथ गांव में भूधंसाव से शुरू हुई बर्बादी रुकने का नाम नहीं ले रही है.’ कोर्ट के आदेश के बाद भी अभी तक इस गांव के एक भी घर का विस्थापन नहीं हो पाया है. पुनर्वास निदेशालय इस गांव को डूब क्षेत्र का गांव न मानकर आपदाग्रस्त मानता है जबकि गांववालों का तर्क है कि हमेशा से सुरक्षित रहा उनका गांव झील के पानी से ही उजड़ रहा है, इसलिए इसे डूब क्षेत्र की तरह ही पुनर्वास की सुविधा मिलनी चाहिए.

टिहरी के प्रतापनगर विकास खंड में जलवाल गांव सहित कई गांवों में भी काफी तबाही हुई है. जाखणीधार के पूर्व प्रमुख प्रेम दत्त रतूड़ी बताते हैं, ‘जीएसआई ने वर्ष 1990 में झील के ठीक ऊपर बसे जलवाल गांव, कंगसाली और खोला गांवों को भूगर्भीय दृष्टि से अस्थिर बताया था.’ रिपोर्ट के अनुसार जरा-सा भी संतुलन बिगड़ने पर ये गांव ध्वस्त हो सकते हैं. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पुनर्वास व विस्थापन के अलावा इन गांवों की समस्या का कोई हल नहीं.

भिलंगना घाटी में भी हालात अच्छे नहीं हैं. तिपोली, मुंडा व चोपड़ा गांवों में भी भारी नुकसान हुआ है. घनसाली के विधायक बलवीर सिंह नेगी बताते हैं, ‘पिलखी, नेल, वैंसाधर, पटागली और असेना गांवों में खड़ी धान की फसलों को झील का पानी निगल चुका है. ये सारे क्षेत्र 830 मीटर के निशान से ऊपर हैं. इस क्षेत्र में खाद्यान्न का संकट है. पिलखी के लोग धरने पर बैठे हैं. वे राष्ट्रीय पुनर्वास नीति, 2008 के अनुसार पुनर्वास की मांग कर रहे हैं जबकि टीएचडीसी और पुनर्वास निदेशालय उन्हें आपदाग्रस्त मानकर सुविधाएं देने की बात कर रहा है.

सही रखरखाव के अभाव में रोप-वे की यह हालत है कि इसमें यात्रा कर रहा व्यक्ति डर से कई बार जीता-मरता है

उधर, विस्थापन और पुनर्वास में भी कई पेंच हैं. 1977 में टिहरी के अठूर क्षेत्र से पहला परिवार दून घाटी स्थित भानियावाला क्षेत्र में विस्थापित हुआ था. तब से शुरू हुआ पुनर्वास आज 32 साल के बाद भी समाप्त नहीं हुआ है. बांध निर्माण शुरू होने के 34 सालों के बाद भी अभी तक विस्थापन व पुनर्वास के लिए कोई मास्टर प्लान नहीं बना है. टिहरी बांध परियोजना के कारण टिहरी शहर के अलावा 125 गांव प्रभावित हुए. शुरुआत में यह आकलन किया गया था कि इस परियोजना से टिहरी शहर के अलावा 39 गांव पूर्णतया और 86 आंशिक रूप से प्रभावित होंगे. पर यह संख्या बढ़ती गई. अब हाल ही में झील का स्तर आरएल 832 मीटर तक पहुंचने के बाद भूधंसाव से प्रभावित गांवों की हालत देखकर यह लगता है कि ‘डूब क्षेत्र’ की फिर से व्याख्या करके दर्जनों गांवों को विस्थापित करना होगा. वैसे इन गांवों के लोग वर्ष 2001 से ही अपने पुनर्वास के लिए आंदोलनरत हैं. हर स्तर पर धरना-प्रदर्शन करने व ज्ञापन देने के बाद भी कुछ हासिल न होने पर उन्होंने नैनीताल हाई कोर्ट में याचिका दायर की है. गांववालों ने शिकायत निवारण कमेटी से भी खुद को पुनर्वासित करने की मांग की थी लेकिन यह अनसुनी कर दी गई. अब झील का स्तर 830 मीटर तक बढ़ने के बाद इन गांवों और इनके आसपास के इलाके में काफी तबाही हुई है. बांध से लगे क्षेत्रों के बारे में पहले टीएचडीसी ने तत्कालीन रुड़की इंजीनियरिंग कॉलेज की एक रिपोर्ट के आधार पर कहा था कि जिन ढलानों पर ये गांव बसे हैं वे सुरक्षित हैं. उस समय जीएसआई की एक रिपोर्ट कुछ लोगों के हाथ लग गई थी जिसमें इन ढलानों को असुरक्षित माना गया था. इस रिपोर्ट को अदालत में जमा करने के बाद अदालत के आदेश पर टीएचडीसी फिर से जीएसआई से विस्तृत सर्वे कराने को राजी हुआ था. जीएसआई पानी घटने के बाद ही वास्तविक स्थिति का फिर से आकलन कर पाएगा. 

वैसे भी नए गांवों को पुनर्वासित करना तो बाद की बात है, पुनर्वास निदेशालय व एक सेवानिवृत्त जज की अध्यक्षता में बने शिकायत निवारण प्राधिकरण के पास अभी पुराने पुनर्वास के ही एक हजार से अधिक मामले लंबित हैं. लोगों को टीएचडीसी से सुविधाएं लेकर काम करने वाले शिकायत निवारण प्राधिकरण की कार्यशैली पर भी आपत्ति है. प्रभावित लोगों की समस्याओं के लिए वर्षों से संघर्ष कर रहे ‘माटू संगठन’ के पूरण राणा सुनवाई के लिए स्वतंत्र प्राधिकरण की मांग करते हैं.

पुराने विस्थापितों की हालत भी कोई अच्छी नहीं है. पहाड़ से उखड़कर मैदान में बसे विस्थापितों में कई ऐसे हैं जो वहां ठीक से जड़ें नहीं जमा सके और अपनेपन की तलाश में वापस पहाड़ों की ओर भाग रहे हैं. छाम (टिहरी) के पूलन सिंह नेगी अपने गांव में 300 नाली (15 एकड़) सिंचित जमीन पर खेती करने वाले अच्छे और समृद्ध कास्तकार(किसान) थे. गांव के डूब क्षेत्र में आने के बाद उन्हें हरिद्वार जिले के पथरी क्षेत्र में केवल 2 एकड़ जमीन मिली. 62 वर्षीय नेगी ने पथरी की जमीन किराए पर देकर डूब क्षेत्र के ऊपर पास के गांववालों से थोड़ी सी जमीन लेकर मकान बनाया है. वे कहते हैं, ‘पहाड़ में खेती करने वाले लोग हरिद्वार को अपना नहीं पा रहे हैं. इसलिए वापस आकर फिर अपने ही गांवों के पास अपने लोगों के बीच आकर रह रहे हैं.’ लोगों का कहना है कि शरणार्थी की तरह ही रहना है तो अपने गांव के पास ही रहना बेहतर है जहां कम से कम उनका सुख-दुख देखने वाले लोग तो हैं.

पूरन राणा बताते हैं कि विस्थापितों में 5 फीसदी लोग पहाड़ में बड़ी भूमिधरी वाले अच्छे किसान थे. विस्थापन के बाद ये कहीं के नहीं रहे. कहने को सरकार ने जमीन का मुआवजा दिया लेकिन सिंचित भूमि का मुआवजा केवल 12,000 रुपए प्रति नाली (66 गुना 33 फीट चौड़ा भूखंड) के हिसाब से मिला था जबकि डूब क्षेत्र के पास गांव के बाजार में भी अब 4 लाख रुपए नाली में भूमि नहीं मिल रही है. इसके अलावा मैदान में विस्थापित हुए लोगों के पास भूमिधरी अधिकार भी नहीं हैं. दोषपूर्ण पुनर्वास नीति की वजह से बुजुर्ग अभिभावकों वाले बड़े संयुक्त परिवार नुकसान में रहे जिन्हें मिली जमीन उनकी जरूरतों के लिए नाकाफी पड़ रही है.

पुनर्वास का जिम्मा कभी राज्य सरकार तो कभी टीएचडीसी के पास रहा. 1993 में हैदराबाद प्रशासनिक कॉलेज ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि पुनर्वास के काम को राजस्व विभाग को देना चाहिए, पुनर्वास निदेशक का पद अलग होना चाहिए और वह आईएएस अधिकारी होना चाहिए. पुनर्वास एवं पर्यावरणीय मुद्दों के लिए 1996 में हनुमंत राव कमेटी का गठन हुआ. कमेटी ने 1987 में अपनी रिपोर्ट दे दी थी पर इसे आधा-अधूरा ही लागू किया गया. भारत सरकार ने इस प्रोजेक्ट के लिए एक उच्चस्तरीय निगरानी समिति और अंतर्मंत्रालयीय समिति बनाई थी, साथ ही राज्य सरकार ने एक समन्वय समिति का गठन किया था. निगरानी समिति को साल में 4 बार परियोजना से जुड़े मुद्दों की जांच करके अंतर्मंत्रालयीय समिति को अपनी रिपोर्ट देनी थी. परंतु सालों से किसी ने इन समितियों को आते नहीं देखा. टिहरी बांध विस्थापित संगठन के अध्यक्ष गिरीश घिडिल्याल कहते हैं, ‘इन समितियों में से किसी में भी जनता के लोग या उनके द्वारा किसी भी स्तर पर चुने गए जनप्रतिनिधि नहीं थे. इसलिए इन समितियों के विषय में कोई कुछ नहीं जानता. न ही इनमें कभी जनता का पक्ष रखा गया.’ टिहरी बांध से जुड़े पुनर्वास की समस्याओं के लिए वर्षों से संघर्ष कर रहे संगठन त्रिहरी के अध्यक्ष कमल सिंह मेहरा का मानना है कि आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय समस्याओं वाले इन पेचीदे मामलों के हल के लिए कई विशेषज्ञों वाले उच्च अधिकार प्राप्त आयोग का गठन करना होगा, तभी समस्याओं के हल की आशा होगी.’

बढ़ी दूरियां

अक्टूबर, 2005 में टिहरी झील में पानी भरना शुरू हुआ तो झील के चारों ओर के दर्जनों गांव दुनिया से दूर होते चले गए. जिन कस्बों पर ये गांव रोजमर्रा की आवश्यकताओं और सुविधाओं के लिए निर्भर थे वे इनसे दस-दस गुना ज्यादा दूर हो गए. सबसे अधिक प्रभावित टिहरी जिले के प्रतापनगर, जाखणीधार, घनसाली और भिलंगना विकास खंडों की जनता हुई. उत्तरकाशी जिले के चिन्यालीसौड़, उसकी डूमरी-गमरी, बिचली-गमरी पट्टियों तथा गांजणा पट्टी (डुंडा तहसील) के 70 गांवों के लोगों की भी पास के कस्बों से दूरी काफी बढ़ गई है. पहले इस क्षेत्र की जनता आवागमन के लिए भागीरथी, भिलंगना नदी और दूसरी छोटी नदियों (गाड-गदेरे) पर चिन्याली सौड़ (उत्तरकाशी) से लेकर घुंटी (घनसाली) तक बने 13 पुलों का प्रयोग करती थी. ये सारे पुल अब झील में समा गए हैं. जाखणीधार विकास खंड के पूर्व प्रमुख प्रेम दत्त जुयाल बताते हैं, ‘झील बनने से पहले सादणा, मदन नेगी आदि गांव उस समय के जिला मुख्यालय टिहरी से पांच से आठ किमी दूर थे.  इन पुलों के डूबने के बाद यह इलाका नई टिहरी स्थित जिला मुख्यालय से 80 किमी दूर हो गया है.’ 

प्रतापनगर विधानसभा क्षेत्र की जनता के लिए आवागमन का एकमात्र सहारा अब पीपलडाली नामक जगह में बना पुल है, लेकिन इसके क्षतिग्रस्त होने से भारी वाहन इससे होकर नहीं जा पाते. प्रतापनगर विकास खंड के प्रमुख पूरण सिंह रमोला बताते हैं, ‘मजबूरन सामान से लदे ट्रकों को 100 किमी और घूमकर जाना होता है. इस कारण उसका भाड़ा बढ़ जाता है जिसका बोझ भी जनता पर ही पड़ता है.’ जुयाल का आरोप है कि जनसुविधाओं के लिहाज से देखा जाए तो इस क्षेत्र के लोगों के लिए जिंदगी कई दशक पीछे चली गई है.

प्रताप नगर क्षेत्र के लोगों के आवागमन के लिए भल्डियाना और टिपरी नामक जगहों पर दो रोप-वे भी लगाए गए हैं. लेकिन पूरण सिंह रमोला का आरोप है कि ये रोप-वे पुनर्वास के पैसों की बर्बादी और पहले से ही पीड़ा झेल रहे लोगों की जान के साथ खिलवाड़ का नमूना हैं. भल्डियाना के रोप-वे का काम सालों से आधे में अटका हुआ है. यह रोप-वे 1.5 करोड़ रुपए की लागत से बन रहा है. उधर, टिपरी और मदन नेगी के बीच 984 मीटर लंबा दूसरा रोप-वे 250 लाख रुपए की लागत से बना है. प्रताप नगर ब्लॉक के कुछ गांवों के लोगों को आवागमन की सुविधा देने के लिए एक साथ 12 व्यक्तियों या 920 किलो भार को ले जाने वाली क्षमता वाले इस रोप-वे का निर्माण भी झील में पानी भर जाने के 4 साल बाद जाकर हुआ था. वह भी तब जब इसके लिए खूब आंदोलन और धरने-प्रदर्शन हुए. लेकिन स्थानीय निवासी बताते हैं कि कुछ महीने चलने के बाद ही यह बंद हो गया. इसका निर्माण करने वाली कंपनी ऊषा-ब्रेको के प्रोजेक्ट मैनेजर बताते हैं, ‘पिछले दो साल से यह बंद था पर हाल ही में भारी वर्षा से सभी सड़क मार्ग बंद होने के बाद तत्कालीन जिला-अधिकारी के आदेशों के बाद इसे चलाया जा रहा है.’ रोप-वे के मैनेजर, सरकारी निर्माण एजेंसी पर रोप-वे के निर्माण में लगी पूरी धनराशि न देने का आरोप लगाते हुए रोप-वे के स्टेशनों पर पानी तक की सुविधा न होने का रोना रोते हैं. यह बात अलग है कि वे आने-जाने वाले आम लोगों से आपदा के समय भी पांच रुपए प्रति व्यक्ति किराया लेने की बजाय ‘पर्यटक टिकट’ के 100 रुपए वसूल कर रहे हैं.

वैसे इस रोप-वे का सफर करना मौत का जोखिम उठाने से कम नहीं. पहली नजर में ही में यह पूरी परियोजना रोप-वे का ‘जुगाड़ प्रारूप’ दिखती है. दो साल से इसकी रोपों और गरारियों पर ग्रीज नहीं हुआ है. इसलिए इसके चलते समय लगने वाले हिचकोलों और होने वाली घरघराहट की आवाज से झील के ऊपर इस रोप-वे की सवारी कर रहा यात्री डर से कई बार जीता और मरता है. रोप-वे के क्षेत्र में विशेषज्ञ एक इंजीनियर नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ‘इस रोप-वे के निर्माण में स्तरीय सामग्री का प्रयोग नहीं हुआ है, साथ ही सुरक्षा उपायों की भी अनदेखी की गई है.’ स्वाभाविक है कि कभी भी दुर्घटना होने की आशंका के कारण इसका निर्माण करने वाली कंपनी खुद ही इसका संचालन नहीं करना चाहती. 

झील बनने से उत्तरकाशी शहर भी टिहरी जिले के निवासियों के लिए 50 किमी और दूर हो गया है. चार धाम यात्रा करने वाले यात्रियों को तो अब 250 किमी की अतिरिक्त दूरी तय करके अपनी यात्रा पूरी करनी पड़ रही है. उत्तरकाशी के सामाजिक कार्यकर्ता लोकेंद्र बिष्ट कहते हैं कि कई वैकल्पिक मार्ग बनाकर इन बढ़ी हुई दूरियों को कम किया जा सकता है लेकिन सरकार इस दिशा में गंभीर ही नहीं है.
टिहरी झील का भागीरथी नदी की ओर अंतिम बिंदु धरासू और चिन्याली सौड़ कस्बे हैं. हाल ही में झील का जलस्तर 830 मीटर (समुद्र तल से) तक बढ़ाने पर चिन्याली सौड़ को उसके सामने के नए बसे कस्बे देवीसौड़-सुनार गांव से जोड़ने वाला झूला पुल भी जलमग्न हो गया और इससे डुमरी-गमरी और बिचली-गमरी के लगभग 50 गांव उत्तरकाशी से दूर हो गए. इन गांवों के छात्रों के लिए कॉलेज तथा स्कूल चिन्याली सौड़ ही में थे. हालांकि प्रशासन ने झील के आर-पार जाने के लिए नावों का इंतजाम किया है, परंतु इनकी क्षमता रोज आने-जाने वालों की संख्या को देखते हुए पर्याप्त नहीं है. इसी तरह झील की दूसरी ओर भिलंगना नदी के आखिरी कोने पर झील ने घुंटी (घनसाली) का पुल भी डुबो दिया है. इससे जुड़े गांव और उनके स्कूल पहले से 25 किमी दूर हो गए हैं. घनसाली विधानसभा क्षेत्र के विधायक बलबीर सिंह नेगी बताते हैं, ‘झील बनने से घनसाली क्षेत्र के लोगों को 60 किमी का अतिरिक्त सड़क मार्ग तय करना पड़ रहा है, साथ ही भूधंसाव के कारण घनसाली-टिहरी सड़क मार्ग बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हुआ है.’

थौलधार ब्लॉक के पूर्व प्रमुख जोत सिंह बिष्ट का आरोप है कि टीएचडीसी, पुनर्वास निदेशालय और राज्य सरकार ने झील से प्रभावित क्षेत्रों के लोगों की सुविधा और आवागमन के लिए दूरगामी सोच के साथ काम नहीं किया. वे कहते हैं, ‘इसीलिए डूब गए 13 पुलों के बदले झील भरने के 5 साल बाद भी केवल पीपलडाली और स्यांसू में दो झूला पुल बनाए गए हैं. 24 करोड़ रुपए की लागत से बने इन पुलों का निर्माण भी इतना निम्नस्तरीय है कि अकसर किसी न किसी तकनीकी गड़बड़ के कारण इन्हें  बंद कर दिया जाता है.’ पहले भल्डियाना पुल जनता के आवागमन का सबसे बड़ा साधन था पर उसका विकल्प अब तक नहीं खोजा गया. झील के आसपास और उसके जलस्तर से 100-200 मीटर ऊपर धंसाव होने के कारण आए दिन सड़कें बंद रहती हैं.

पुनर्वास विभाग में कार्यरत अधिशासी अभियंता राकेश कुमार तिवारी कहते हैं, ‘झील के कारण संपर्क मार्गों से कट गए गांवों के लोगों के आवागमन के लिए पुनर्वास प्रशासन ने 7 नावों का इंतजाम किया है.’ चिन्याली सौड़ से लेकर घुंटी तक लगी ये नावें आम जनता का सबसे बड़ा सहारा हैं. लेकिन झील के पार बल्डोगी गांव के प्रेम सिंह रावत की मानें तो ये नावें कभी भी सड़क मार्ग का विकल्प नहीं बन सकतीं. वे कहते हैं, ‘सुरक्षा की दृष्टि से अंधेरे में और मौसम खराब होने पर ये नहीं चलाई जा सकतीं और परेशानियों के आने का कोई तय वक्त नहीं होता.’ झील का स्तर घटता-बढ़ता रहता है और इससे भी इन नावों के इस्तेमाल में दिक्कत होती है.

सरकार और टिहरी बांध निर्माण से जुड़े विभाग जन सुविधाओं और सड़क मार्गों को बढ़ाने के कितने भी बड़े दावे करें लेकिन घंटों खर्च करके कुछ सौ मीटर दूर जाने में सारा दिन गंवाने के बाद झील से प्रभावित लोगों के दर्द का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं.

(महिपाल कुंवर और विनोद चमोली के सहयोग के साथ)

वर्दी चाहे हमदर्दी

भारत नेपाल सीमा पर स्थित एक थाने के इंस्पेक्टर सुरेंद्र सिंह (बदला हुआ नाम) हाल ही में काफी परेशान थे.  मामला एक बच्चे की हत्या का था. वैसे तो हत्या, लूट, डकैती आदि जैसे मामलों से पुलिसवालों को आए दिन ही दो-चार होना पड़ता है. लेकिन सिंह इसलिए मुश्किल में थे कि मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया था और जिस अपराधी पर हत्या का आरोप था वह नेपाल भाग गया था. वे बताते हैं, ‘नेताओं का दबाव एसपी पर पड़ा तो मुझे चेतावनी मिली कि एक सप्ताह में हत्यारे को पकड़ो या सस्पेंड होने के लिए तैयार रहो. कुर्सी बचानी थी लिहाजा नेपाल में कुछ लोगों से संपर्क कर अपराधी को भारत की सीमा तक लाने की व्यवस्था करवाई जिसमें करीब 70 हजार रुपए लग गए. इस काम में विभाग की ओर से एक पैसे की भी मदद नहीं मिली, पूरा पैसा मैंने खर्च किया. जो रुपया घर से खर्च किया है उसे किसी न किसी तरह नौकरी से ही पूरा करूंगा.’

‘सब इंस्पेक्टर को गश्त के लिए मात्र 350 रुपये महीना ही मिलता है. जिससे सिर्फ सवा छह लीटर तेल ही आ सकता है. जबकि वह प्रतिदिन गश्त में कम से कम डेढ़ लीटर तेल खर्च करता है’इससे आगे सिंह की आवाज का लहजा धीमा और तल्ख हो जाता है. वे कहते हैं, ‘इन्ही वजहों से आम आदमी की नजर में हमारे विभाग के कर्मचारी सबसे भ्रष्ट हैं. लेकिन आप ही बताएं कि हम इधर-उधर हाथ न मारें तो पूरा वेतन सरकारी कामों में ही खर्च हो जाएगा और बच्चे भीख मांगने को मजबूर होंगे.’ यह पुलिस का वह चेहरा है जिसकी तरफ आम निगाह अमूमन नहीं जाती. दरअसल पुलिस शब्द जिन सुर्खियों में होता है उनके विस्तार में जाने पर भ्रष्टाचार, उत्पीड़न, ज्यादती, धौंस, शोषण आदि जैसे शब्द ही पढ़ने को मिलते हैं. लेकिन पुलिस के पाले में खड़े होकर देखा जाए तो पता चलता है कि कुछ और पहलू भी हैं जिनकी उतनी चर्चा नहीं होती जितनी होनी चाहिए, ऐसे पहलू जो बताते हैं कि वर्दी को सिर्फ आलोचना की ही नहीं, कई अन्य चीजों के साथ हमारी हमदर्दी की भी जरूरत है.

इनमें पहली जरूरत है संसाधनों की. जैसा कि आगरा में तैनात रहे एक थानेदार नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ‘हमारे यहां से एक बच्चे का अपहरण हो गया. सर्विलांस से पता चला कि अपहरणकर्ता बच्चे को राजस्थान लेकर गए हैं. बदमाशों का पता लगाने के लिए कई टीमों को लगाया गया. सभी टीमें निजी वाहनों से राजस्थान के शहरों की खाक छानती रहीं. सफलता भी मिली. लेकिन पूरे ऑपरेशन में 50 हजार से ऊपर का खर्च हुआ. गाड़ियों में डीजल डलवाने से लेकर टीम के खाने-पीने तक का जिम्मा थाने के मत्थे रहा. इसमें कुछ दरोगाओं ने भी अपने पास से सहयोग किया. आप ही बताइए, जिस पुलिस विभाग के कंधों पर सरकार ने गांव से लेकर शहर तक शांति, अपराध रोकने और लोगों के जानमाल की सुरक्षा का जिम्मा दे रखा है उसे क्यों इतना भी बजट और अन्य संसाधन नहीं दिए जाते कि वह किसी अपराधी को पकड़ने के लिए बाहर जा सके?’

यह अकेला उदाहरण नहीं. सब इंस्पेक्टर अजय राज पांडे के मुताबिक संसाधनों से जुड़ी दिक्कतें कई मोर्चों पर हैं. वे कहते हैं, ‘यदि कोई दरोगा या सिपाही किसी मुल्जिम को पकड़कर थाने लाता है तो मुल्जिम की खुराक का जिम्मा थाने का होता है. पूछताछ के बाद 24 घंटे में उसे न्यायालय में पेश करना होता है.  24 घंटे यदि मुल्जिम को थाने में रखा गया तो दो बार खाना तो खिलाना ही पड़ेगा. इसमें एक मुल्जिम पर कम से कम 40-50 रुपये खर्च हो जाते हैं. जबकि सरकार की ओर से हवालात में बंद होने वाले मुल्जिम की एक समय की खुराक पांच रुपये ही निर्धारित है. ऐसे में पुलिसकर्मी या तो अपनी जेब से 30-35 रुपये एक मुल्जिम पर खर्च करें या थाने के आसपास के किसी ढाबेवाले पर रौब गालिब कर फ्री में खाना मंगवा कर मुल्जिम को खिलाएं. पुलिस यदि फ्री में खाना मंगवाती है तो कहा जाता है कि वह वसूली कर रही है.  लेकिन अपने पास से खाना खिलाएंगे तो कितना वेतन घर जा पाएगा? इसके अलावा सब इंस्पेक्टर को गश्त के लिए सरकार की ओर से मात्र 350 रुपये महीना ही भत्ते के रूप में मिलता है. जिससे सिर्फ सवा छह लीटर तेल ही आ सकता है. जबकि एक सब इंस्पेक्टर प्रतिदिन गश्त में कम से कम डेढ़ लीटर तेल खर्च करता है.’

‘सूचना क्रांति का दौर है, हर अधिकारी चाहता है कि उसके क्षेत्र में कोई भी घटना हो, सिपाही या दारोगा उसे तत्काल मोबाइल से अवगत कराएं. लेकिन समस्या यह है कि पुलिस कर्मियों को मोबाइल का बिल अदा करने के लिए एक रुपया भी नहीं मिलता’

विभाग का जो कर्मचारी (सिपाही) सबसे अधिक भागदौड़ करता है उसे ईंधन के लिए एक रुपया भी नहीं मिलता. जैसा कि पांडे कहते हैं, ‘सिपाही को आज भी साइकिल एलाउंस ही मिलता है. यह हास्यास्पद है कि अपराधी एक ओर हवा से बातें करने वाली तेज रफ्तार गाड़ियों का इस्तेमाल कर रहे हैं और दूसरी ओर अधिकारी व सरकार इस बात की उम्मीद करते हैं कि सिपाही साइकिल से दौड़ कर हाइटेक अपराधियों को पकड़े. नाम न छापने की शर्त पर पुलिस के स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (एसओजी) में तैनात एक कांस्टेबल बताते हैं कि अधिकारियों से लेकर दरोगा तक का दबाव होता है कि सिपाही भी ‘गुडवर्क’ लाकर दे. वे कहते हैं, ‘गुडवर्क के लिए गली-मोहल्लों की खाक छाननी पड़ती है जो साइकिल से संभव नहीं है. थाने में तैनात एक सिपाही भी गश्त के दौरान करीब 45 लीटर तेल महीने में खर्च कर देता है, जबकि उसे मिलता एक धेला भी नहीं. थानों में तैनात कुछ सरकारी मोटरसाइकलों को ही महीने में विभाग की ओर से तेल मिलता है. लेकिन इनसे केवल 8-10 सिपाही ही गश्त कर सकते हैं, शेष को अपने साधन से ही गश्त पर निकलना पड़ता है. ऐसे में नौकरी करनी है तो जेब से तेल भरवाना मजबूरी है.’ इसके अलावा पुलिस विभाग का सूचना-तंत्र काफी हद तक स्थानीय मुखबिरों पर ही निर्भर होता था. लेकिन चूंकि मुखबिरों को देने के लिए विभाग के पास अपना कोई फंड नहीं होता इसलिए अच्छे मुखबिर मिलना अब मुश्किल होता है. वही व्यक्ति अब पुलिस को सूचना देने में रुचि रखता है जिसका अपना कोई स्वार्थ हो.

पिछले वर्ष पुलिस विभाग से रिटायर हुए इंस्पेक्टर नरसिंह पाल बताते हैं, ‘कोई भी भ्रष्टाचार का आरोप बड़ी आसानी से लगा देता है, लेकिन भ्रष्टाचार के पीछे कारण क्या है, इसे जानने की कोशिश न तो अधिकारियों ने कभी की और न ही किसी सरकार ने. चाहे जिसका शासन हो, सबकी मंशा यही होती है कि अधिक से अधिक अपराधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई हो. ठीकठाक अपराधियों पर एनएसए लगाने के लिए अधिकारियों का दबाव भी होता है. एक एनएसए लगाने में थानेदार का करीब तीन चार हजार रुपये खर्च हो जाता है. इस खर्च में 100-150 पेज की कंप्यूटर टाइपिंग, उसकी फोटो कॉपी, कोर्ट अप्रूवल और डीएम के यहां की संस्तुति तक शामिल होती है. पुलिस विभाग तक की फाइल जब सरकारी कार्यालयों में जाती है तो बिना खर्चा-पानी दिए काम नहीं होता. यह खर्च भी थानेदार को अपनी जेब से देना पड़ता है.’

पूर्वी उत्तर प्रदेश में तैनात एक डीआईजी कहते हैं, ‘विभाग में हर कदम पर कमियां हैं. योजनाओं को ही लीजिए. सरकार योजना शुरू तो कर देती है लेकिन उसे चलाने के लिए भविष्य में धन की व्यवस्था कहां से होगी इस बारे में नहीं सोचती.’ उक्त डीआईजी एक उदाहरण देते हुए बताते हैं कि सरकार की ओर से प्रदेश भर के थानों को कंप्यूटराइज्ड कराने के लिए बड़ी तेजी से काम हुआ. जिन थानों में ठीक-ठाक कमरों की व्यवस्था तक नहीं थी उन जगहों पर थाना प्रभारी ने अधिकारियों के दबाव में किसी तरह व्यवस्था कर कंप्यूटर लगवाने के लिए कमरे दुरुस्त कराए. लेकिन कंप्यूटरों के रखरखाव के लिए कोई बजट नहीं मिला. मतलब साफ है, यदि कंप्यूटर में कोई खराबी आती है तो थानेदार या मुंशी अपनी जेब से उसे सही करा कर सरकारी काम करें. उक्त डीआईजी कहते हैं, ‘सूचना क्रांति का दौर है, हर अधिकारी चाहता है कि उसके क्षेत्र में कोई भी घटना हो, सिपाही या दारोगा उसे तत्काल मोबाइल से अवगत कराएं. लेकिन समस्या यह है कि पुलिस कर्मियों को मोबाइल का बिल अदा करने के लिए एक रुपया भी नहीं मिलता. थानों में स्टेशनरी का बजट इतना कम होता है कि यदि कोई लिखित शिकायत थाने में देना चाहता है तो मजबूरी में मुंशी पीड़ित से ही कागज मंगवाता है और उसी से फोटोस्टेट भी करवाता है. कभी-कभी मुंशी यह सुविधाएं अपने पास से शिकायती को दे देते हैं तो सुविधा शुल्क वसूल करते हैं. ऐसे में आम आदमी के दिमाग में पुलिस के प्रति गलत सोच पनपना लाजिमी है.’

यह तो हुई उन खर्चों की बात जिनके लिए पैसा ही नहीं मिलता. लेकिन जो पैसा पुलिसकर्मियों को अपनी सेवाओं के लिए मिलता है उसकी भी तुलना दूसरे क्षेत्रों से करने पर साफ नजर आ जाता है कि स्थिति कितनी गंभीर है. पाल कहते हैं, ‘तीसरे वेतन आयोग में प्राइमरी स्कूल के अध्यापक का वेतनमान 365 रु तथा कांस्टेबल का 364 रु था. दोनों के वेतन में मात्र एक रुपए का अंतर था. चौथे वेतन आयोग में यह अंतर 200 तथा पांचवें वेतनमान में 1450 रु का हो गया. छठे वेतनमान में पुलिस विभाग का सिपाही प्राइमरी स्कूल के अध्यापक से 4100 रु पीछे रह गया.’ 
और यह हाल तब है जब पुलिस विभाग का सिपाही हमेशा ड्यूटी पर माना जाता है और अध्यापक महज 10 से चार बजे तक ही स्कूल में रहते हैं. पुलिस कर्मचारियों को किसी त्योहार या अन्य मौकों पर भी ड्यूटी करनी पड़ती है. जबकि अन्य विभाग के कर्मचारियों को साल में 109 छुट्टियां मिलती हैं. पुलिस कर्मचारियों को 109 सरकारी छुट्टियों का नगद भुगतान भी नहीं होता. थाने में तैनात सिपाही व दरोगा की ड्यूटी कम से कम 12 घंटे की हो जाती है. चौकी प्रभारी, एसओ व इंस्पेक्टर की ड्यूटी 24 घंटे की होती है. इसके बावजूद कर्मचारियों को ओवर टाइम की कोई सुविधा नहीं है. जबकि मानवाधिकार आयोग व सुप्रीम कोर्ट भी आठ घंटे की ड्यूटी की बात कहते हैं.

काम ज्यादा, वेतन कम और ऊपर से छुट्टियों का टोटा. ऐसे में कर्मचारियों में तनाव व कुंठा आना स्वाभाविक है. लेकिन उनकी शिकायतों की कहीं सुनवाई नहीं. पाल कहते हैं, ‘. थाने की जीप को महीने में मात्र 150 लीटर डीजल मिलता है जबकि जरूरत 350 लीटर डीजल की होती है. ऐसे में यदि कोई थानेदार एसपी के पास जाकर अतिरिक्त डीजल की मांग कर बैठता है तो यही जवाब मिलता है कि थाना चलाना है तो अपने पास से मैनेज करना सीखो.’  पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, ‘मुख्यमंत्री मायावती को अपने हाथों से केक खिलाते तत्कालीन डीजीपी विक्रम सिंह की तस्वीर पुलिस की व्यवस्था में आई विकृति का सबसे शक्तिशाली प्रतीक है. जब पुलिस का सबसे बड़ा अधिकारी ही इस तरह नतमस्तक नजर आए तो क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि कोई कांस्टेबल या सब इंस्पेक्टर किसी छुटभैये नेता की बात न मानने की हिम्मत करेगा?’ एक दूसरे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कहते हैं, ‘ऐसे में खुद ही सोचिए कि क्या फोर्स के मन में अपने मुखिया के लिए आदर का भाव होगा. जब डीजीपी ही यह करते दिखें तो किसी कांस्टेबल या सब इंस्पेक्टर को यही लगता है कि उसकी सुनवाई कहीं नहीं होने वाली और उसे अपना मोर्चा खुद ही संभालना है. इससे फोर्स का मनोबल टूटता है.’ पूर्व डीजीपी और सुप्रीम कोर्ट में पुलिस सुधारों के लिए याचिका दायर करने वाले प्रकाश सिंह कहते हैं, ‘जब एडीजी, आईजी और डीआईजी रैंक के अधिकारी अपने राजनीतिक आकाओं की जीहुजूरी करते दिखें तो एसआई और इंस्पेक्टर रैंक के कर्मचारियों को लगता है कि  खुद को बचाना है तो सत्ताधारी पार्टी के स्थानीय एमएलए या एमपी के साथ रिश्ते बनाकर रखे जाएं. और यही असुरक्षा उन्हें अपने स्थानीय संरक्षकों के हित में काम करने के लिए मजबूर करती है.’

लखनऊ के एक थाने में तैनात कांस्टेबल रमेश कहते हैं, ‘एक पॉश कालोनी में गश्त करते हुए मैंने देखा कि चार लड़के एक कार में बैठे शराब पी रहे थे. मैंने उन्हें मना किया तो उनमें से एक कार से उतरा और उसने मुझे तीन-चार झापड़ रसीद कर दिए. मैंने पुलिस स्टेशन फोन कर और फोर्स भेजने को कहा. लेकिन कार्रवाई करने की बजाय एसओ ने मुझसे कहा कि वे उन लड़कों को जानते हैं और मैं भविष्य में सावधानी बरतूं. मैं उसी दिन मर गया था. आत्महत्या इसलिए नहीं की क्योंकि 12 साल की एक बेटी है. अब तो मेरे सामने बुरे से बुरा भी हो जाए तो कोई फर्क नहीं पड़ता. मैं किसी रोबोट जैसा हो गया हूं जो तभी कुछ करता है जब अधिकारी करने को कहे.’

रमेश हमें अपने आवास में ले जाते हैं. किसी दड़बे जैसी नजर आती यह जगह बहुत छोटी है और लोग बहुत ज्यादा. रमेश कहते हैं, ‘हमारे इस घर से ज्यादा जगह तो हमारी जेल में है. मगर किसे परवाह है.’ पूर्व आईजी एसएस दारापुरी कहते हैं, ‘किसी इलाके में प्रशासन कैसे काम कर रहा है इसका संकेत इससे मिल जाता है कि वहां पुलिस का क्या हाल है.’ और जो तमाम मुश्किलों के बावजूद अपना कर्तव्य निभाने की जिद पर डटे रहते हैं उनके साथ क्या होता है यह जानना हो तो शैलेंद्र सिंह एक उदाहरण हैं जिन्होंने 2004 में डिप्टी एसपी के पद से इस्तीफा दे दिया. चंदौली में जन्मे सिंह प्रदेश में नियुक्ति पाने वाले सबसे कम उम्र के सर्कल अफसरों में से एक थे. लेकिन उन्हें यह समझते देर नहीं लगी कि उत्तर प्रदेश में एक पुलिस अधिकारी होना बड़ा मुश्किल काम है. सिंह बताते हैं, ‘एक बार मुझे खबर मिली कि दो लोग अवैध रूप से 10 लाख 50 हजार रु लेकर जा रहे हैं. पूछताछ के दौरान उन्होंने माना कि वे बेसिक शिक्षा अधिकारी रमेश कुमार की तरफ से यह पैसा ले जा रहे थे जो शिक्षा मंत्री राम अचल राजभर के जरिए पार्टी फंड में जाना था. रमेश कुमार ने मुझे फोन किया और कहा कि आप गलत जगह हाथ डाल रहे हैं. खबर पुलिस मुख्यालय पहुंची तो आईजी स्तर से नीचे तक हड़कंप मच गया. उन्होंने मेरे इंस्पेक्टर को खूब लताड़ा मगर मुझसे सीधे कुछ नहीं कहा. मायावती जी उस समय देश से बाहर थीं. मेरा एक हफ्ते में पांच बार ट्रांसफर हुआ. शाम को मैं सीबी-सीआईडी का चार्ज लेता और सुबह पता चलता कि मेरा तबादला भ्रष्टाचार निरोधक शाखा में कर दिया गया है.’

सजा देने, डर बिठाने और इस तरह पुलिस को अपने इशारों पर नचाने के लिए ऐसे तबादलों का किस खूबी से इस्तेमाल होता है यह आंकड़ों पर नजर डालने से भी साफ हो जाता है. 2007 के मध्य से 2009 के मध्य तक 95 आईपीएस अफसर ऐसे थे जिनका पांच से लेकर 11 बार तक तबादला हुआ. बरेली शहर ने इस दरम्यान 12 एसएसपी देखे. नोएडा का यह हाल है कि कोई एसपी छह महीने टिक जाए तो हैरत होने लगती है. गृह सचिव जीके पिल्लई ने कुछ समय पहले ही एक इंटरव्यू में माना था कि उत्तर प्रदेश में एक एसपी का एक जगह औसत कार्यकाल दो महीने होता है. जब शीर्ष स्तर पर ही यह हाल है तो एसएचओ और सब इंस्पेक्टरों  की स्थिति क्या होगी, अंदाजा लगाया जा सकता है. आईजीपी रैंक के एक अधिकारी व्यंग्यात्मक लहजे में कहते भी हैं, ‘सब इंस्पेक्टर, एएसआई या फिर हेड कांस्टेबल को जो एक वाक्य सबसे ज्यादा सुनने को मिलता है वह यही है कि तेरा ट्रांस्फर करवा दूंगा.’

एक पुलिसकर्मी की समस्याएं रिटायर होने के बाद भी कम नहीं होती. नौकरी के दौरान जिन जिन जगहों पर दरोगा की तैनाती रही है यदि वहां के न्यायालय में उसके द्वारा दाखिल की गई चार्जशीट या गवाही से संबंधित कोई मामला चल रहा हो तो उसे वहां जाना पड़ता है. इस काम के लिए उसे महज 15 रुपये ही खाने का सरकारी खर्च मिलता है. वह भी तब जब न्यायालय में तय तारीख पर गवाही हो जाए. कई बार गवाही किन्हीं कारणों से नहीं हो पाती. ऐसे में खाने का खर्च रिटायर पुलिसकर्मी को अपने पास से उठाना पड़ता है. यदि दारोगा न्यायालय में गवाही के लिए उपस्थित नहीं हो पाता तो उसके खिलाफ वारंट जारी हो जाता है. ऐसे में नौकरी के दौरान ये खर्चे नहीं खलते, लेकिन रिटायरमेंट के बाद यह खासा मुश्किल होता है.

प्रदेश के पूर्व डीजीपी केएल गुप्ता का आरोप है कि पूरा विभाग ही गैर योजनाबद्ध तरीके से चलता आ रहा है. वे खुलकर कहते हैं, ‘हर सरकार चाहती है कि क्राइम का ग्राफ उसके शासन में कम रहे. इसका फायदा पुलिस विभाग बखूबी उठाता है. अब सीएम का फरमान है कि क्राइम 15 परसेंट कम हो. आप बताइए उनके पास ऐसा करने के लिए कोई जादू की छड़ी तो है नहीं. इसलिए वे अपने तरीके निकालते हैं. मसलन पीड़ित की रिपोर्ट ही नहीं दर्ज की जाती. इससे पुलिसकर्मियों को दोहरी राहत मिलती है. एक तो क्राइम का ग्राफ नहीं बढ़ता, दूसरा रिपोर्ट दर्ज होने के बाद होने वाली भागदौड़ से भी राहत मिलती है. क्योंकि भागदौड़ में हजारों रु खर्च होते हैं, जिसके लिए थानों के पास कोई बजट नहीं होता.’ पूर्व डीजीपी उदाहरण देते हैं कि वर्ष 1973 में प्रदेश भर के थानों में 2 लाख 75 हजार मुकदमे दर्ज हुए थे जबकि उन दिनों अपराध आज की तुलना में काफी कम था. लेकिन अब यह आंकड़ा डेढ़ लाख के आसपास सिमट गया है. यही कारण है कि थानों में सुनवाई न होने की दशा में पीड़ितों की फरियाद विभिन्न आयोगों, न्यायालयों सहित पुलिस के आला अधिकारियों के यहां बढ़ रही है. आंकड़े देख कर अधिकारी से लेकर सरकार तक खुश होती है कि अपराध कम हो रहा है, लेकिन इस तरह अपराध कम करने से अपराधियों को ही बढ़ावा मिल रहा है. अधिकारी नेताओं के कृपापात्र हैं, लिहाजा वे कर्मचारियों की मांग सरकार तक नहीं ले जा पाते. दोनों ही यह उम्मीद करते हैं कि थाने में तैनात लोग ही अपने पास से सबकुछ मैनेज करें. नौकरी बचाने के लिए थाने के लोग सबकुछ करने को मजबूर होते हैं. ऐसा नहीं कि अधिकारी उनकी हरकतों से अनभिज्ञ हैं लेकिन जानबूझकर वे भी आंखें बंद किए परंपरा को आगे बढ़ाते रहते हैं. गुप्ता कहते हैं, ‘यह सब कुछ तभी सुधरेगा जब सरकार जैसे विकास योजनाओं पर रुपये खर्च करती है उसी तरह पुलिस विभाग के सभी कामों के लिए सरकारी धन उपलब्ध कराया जाए.’

जानकारों के मुताबिक पुलिस कर्मचारियों पर लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों को कम करने के लिए आईपीएस असीम अरुण ने शासन को एक प्रस्ताव भी बना कर भेजा है. जिसमें थानों की जीप का डीजल, वर्दी भत्ता, मोबाइल खर्च, मुल्जिम खुराक बढ़ाने से लेकर भवनों के मरम्मत, गुप्त व्यय सहित करीब 27 बिन्दु हैं. महीनों हो गए लेकिन यह प्रस्ताव भी अभी ठंडे बस्ते में ही है. 

बृजेश पांडे के सहयोग के साथ

‘बिग बॉस’ यानी ‘मनोरंजन से मौत’

एक बार फिर ‘बिग बॉस’ का घर सज गया है.  हमेशा की तरह ‘बिग बॉस’ के इस नए संस्करण ने भी पर्याप्त विवादों को जन्म दिया है. शो में विवादास्पद यहां तक कि आपराधिक मामलों में आरोपित कथित सेलिब्रिटियों की मौजूदगी पर सवाल उठ रहे हैं. कहा जा रहा है कि इससे अच्छा होता कि ‘बिग बॉस’ का सेट तिहाड़ जेल में लगाया जाता और वहीं की शूटिंग दिखाई जाती.

दूसरी ओर, शिव सेना और एमएनएस ने ‘बिग बॉस’ के घर में दो पाकिस्तानी कलाकारों- वीना मलिक और बेगम नवाजिश अली को शो से तुरंत निकालने की मांग की है. इस मांग को न मानने पर सेना ने इस शो को बंद करने की धमकी भी दी है. लोनावाला जहां बिग बॉस की शूटिंग चल रही है, वहां सेना के आह्वान पर एक दिन का बंद हो चुका है.

मतलब यह कि ‘बिग बॉस’ सुर्खियों में है. चैनल को और क्या चाहिए?  कुछ मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, ‘बिग बॉस’ की जिस दिन शुरुआत हुई, उस दिन उसने टीआरपी की दौड़ में कॉमनवेल्थ खेलों के भव्य उद्घाटन समारोह को भी पीछे छोड़ दिया. असल में, सारा खेल ही टीआरपी के लिए है. टीआरपी के लिए जरूरी है कि विवाद और हंगामे हों. इससे सुर्खियां मिलती हंै. सुर्खियों से दर्शक आकर्षित होते हैं और उससे टीआरपी बढ़ती है. 

रियलिटी शो की ‘रियलिटी’ हमेशा से सवालों के घेरे में रही है, वैसे ही उनसे जुड़े विवादों की ‘वास्तविकता’ भी किसी से छिपी नहीं है

इस तरह, किसी शो की सफलता का फॉर्मूला यह बन गया है कि जितना बड़ा विवाद, उतनी अधिक टीआरपी. और उसी अनुपात में बढ़ता चैनल का मुनाफा. इसलिए, हर चैनल और उसके रियलिटी शो विवादों को न सिर्फ पसंद करते हैं बल्कि विवाद पैदा करने के लिए हर जुगत भिड़ाते हैं. सच पूछिए तो जैसे रियलिटी शो की ‘रियलिटी’ हमेशा से सवालों के घेरे में रही है, उसी तरह से उनसे जुड़े विवादों की ‘वास्तविकता’ भी किसी से छिपी नहीं है.

यही नहीं, चैनल और उनके शो खासकर बिग बॉस जैसे रियलिटी शो अपनी लोकप्रियता बनाए रखने के लिए लगातार विवादों को हवा देते रहते हैं, नए-नए विवाद पैदा करते हैं और ‘विवाद’ रचने में भी पीछे नहीं रहते हैं. आश्चर्य नहीं कि ‘बिग बॉस’ सीजन-4 के लिए ऐसे लोगों को चुना गया है जो पहले से ही किसी न किसी विवाद में रहे हैं और जिनका ‘सेलिब्रिटी’ स्टेटस विवादों पर ही टिका है. जैसे चैनल विवादों के बिना नहीं रह सकते हैं, उसी तरह से ये सभी देवियां और सज्जन बिना विवादों के नहीं रह सकते हैं. दोनों एक-दूसरे की जरूरत हैं. एक-दूसरे की मदद से ही इनका शो बिजनेस चलता है.

ऐसा लगता है कि इनका मंत्र है- ‘मनोरंजन के लिए कुछ भी करेगा’ लेकिन बिग बॉस-4 में तो हद ही हो गई है. ऐसे-ऐसे लोगों को चुना गया जिन्हें शामिल करने का तर्क शायद शो के निर्माताओं के पास भी नहीं होगा. सवाल है कि उनके जरिए ‘बिग बॉस’ क्या संदेश देना चाहते हैं क्या यह अपराध और अनैतिक कार्यों को महिमा मंडित (ग्लैमराइज) करने की कोशिश नहीं है? माफ कीजिएगा, बिग बॉस का घर कोई सुधार गृह नहीं है और न ही वहां कोई सुधरने के लिए लाया गया है. सच तो यह है कि वे सुधरना भी चाहें या अपने को एक बेहतर व्यक्तित्व के रूप में पेश करना चाहें तो चैनल उन्हें ऐसा करने नहीं देगा.

असल में, यह इस शो की अलिखित स्क्रिप्ट का हिस्सा है. इस शो के प्रतिभागियों से अनैतिक, अभद्र, अश्लील, आक्रामक और अटपटे व्यवहार की अपेक्षा की जा रही है. इसके शुरुआती एपिसोडों से यह दिखने भी लगा है. प्रतिभागियों के बीच धड़ल्ले से द्विअर्थी संवाद बोले जा रहे हैं, कृत्रिम प्रेम संबंध रचे जा रहे हैं, एक-दूसरे के खिलाफ षड्यंत्र चल रहे हैं, एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश की जा रही है, झगड़े हो रहे हैं, रोना-गाना चल रहा है और अश्लीलता के नए मानदंड रचे जा रहे हैं. इससे साफ है कि इस शो का मकसद दर्शकों का मनोरंजन करने से अधिक उनकी बुद्धि के सबसे निम्नतम स्तर (लोएस्ट कॉमन डिनोमिनेटर) को सहलाना है.

असल में, ‘बिग बॉस’ जैसे रियलिटी शो दर्शकों को इन कथित सेलिब्रिटियों के आपसी झगड़ों, षड्यंत्रों, अश्लीलताओं, रोने-गाने, प्रेम-नफरत और घर से विदाई में एक परपीड़क आनंद देते हैं. इससे भी बढ़कर वे दर्शकों को चौबीसों घंटे इन सेलिब्रिटीज के घर में ताक-झांक का मौका देते हैं जिससे उन्हें एक खास तरह का रतिसुख मिलता है. यह कहना गलत नहीं होगा कि बिग बॉस जैसे कार्यक्रम दर्शकों को परपीड़क और रतिसुख के आदी बना रहे हैं.

इस तरह, बिग बॉस जैसे कार्यक्रम एक ऐसा मध्यवर्गीय दर्शक वर्ग पैदा कर रहे हैं जो उदात्त मानवीय भावनाओं को आगे बढ़ाने कीे बजाय दूसरों के दुख और कष्ट में लुत्फ लेता है, जो दूसरों के घरों में अनुचित ताक-झांक करने में संकोच नहीं करता, जो दूसरों के झगड़ों में मजा लेता है और जो पीठ पीछे निंदा, चुगली, चापलूसी और षड्यंत्र करने को सफलता के लिए जरूरी मानता है. 

इसे ही मनोरंजन कहते हैं? अगर यह मनोरंजन है तो यह ‘मनोरंजन से मौत’ (डेथ बाई इंटरटेनमेंट) का उदाहरण भी है.

कामयाबी के फसाने में छिप न जाए हकीकत

झारखंड के रातूचट्टी गांव की ज्योति महतो आज कॉमनवेल्थ खेलों की स्वर्ण पदक विजेता है. उसने यह पदक तीरंदाजी में हासिल किया है. कम लोगों को मालूम होगा कि उसका तीर कितनी दूर से चला है, कितने झंझावातों को पार करता हुआ निशाने पर लगा है. उसके पिता शिवचरण महतो ऑटो चलाते हैं. उन्होंने बेटी की प्रतिभा देख उसे आगे बढ़ाने का फैसला किया. ज्योति शारीरिक तौर पर इतनी कमजोर थी कि उससे किसी को उम्मीद नहीं थी. लेकिन आज ज्योति ने सबको गलत साबित किया है.

कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान दूरदराज के कस्बों, गांवों और छोटे शहरों से आईं ऐसी कई ज्योतियां दूसरों को गलत साबित कर रही हैं. शूटिंग में सोना जीतने वाली अनीसा सैयद की कहानी ज्योति से बहुत अलग नहीं है. उनका खेल देखकर रेलवे ने नौकरी दी. उन्होंने तबादला चाहा, नहीं मिला, डेढ़ साल से उन्हें वेतन भी नहीं मिला. शूटिंग चूंकि महंगा खेल है, इसलिए सीमित साधनों में इसका खर्च उठाना आसान नहीं था. पिस्टल की पिन खराब हुई तो उसकी मरम्मत कराने के लिए पैसे जुटाना मुश्किल हो गया. दूसरों की पिस्टल से प्रैक्टिस करनी पड़ी. आज उनके पास दो स्वर्ण हैं और रेलवे के अफसर अपनी भूल सुधारने की कोशिश कर रहे हैं.

कॉमनवेल्थ के आईने में देखें तो गरीब भारत इस देश की नाक ऊंची कर रहा है और अमीर भारत इसकी पगड़ी उछाल रहा है

ऐसी कहानियां और हैं. जिस हरियाणा पर यह तोहमत लगती है कि वहां जनमते ही लड़कियों को मार दिया जाता है वहां के भिवानी जिले के बलाली गांव की दो बहनों, गीता और बबीता ने कुश्ती में स्वर्ण और रजत पदक हासिल किए. गुवाहाटी की रेणु बालाचानू पदक जीतने के बाद ऑटो पर घूमती देखी गईं और सफलता और उपलब्धियों को अमीरों की बपौती और टैक्सियों का सफर मानने वाली दिल्ली ने इस पर भी हायतौबा मचाई.

सिर्फ लड़कियों के नहीं, लड़कों के उदाहरण भी सामने हैं. जो पहलवान और मुक्केबाज कॉमनवेल्थ में पदकों का ढेर लगा रहे हैं वे ज्यादातर बिलकुल सामान्य- बल्कि निम्नमध्यवर्गीय घरों के हैं और बेहद सीमित साधनों के बीच उन्होंने अपनी जगह बनाई है.

ये सारी कहानियां नए सिरे से दुहराने का मकसद सिर्फ यह याद दिलाना है कि यह गरीबों का- गांवों, कस्बों और छोटे शहरों का भारत है  जो कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान इस देश की इज्जत बचा रहा है. अगर अभिनव बिंद्रा, गगन नारंग या ऐसे ही कुछ और उदाहरणों को छोड़ दें तो पदक के मंच पर खड़े होने वाले ज्यादातर भारतीय खिलाड़ी वे हैं जो अपने पीछे एक लंबे और संघर्षपूर्ण सफर की थकान छोड़कर आए हैं.

लेकिन यह गरीब भारत कॉमनवेल्थ के कंगूरे ही नहीं बना रहा, उसकी बुनियाद भी उसी ने तैयार की है. इसकी तैयारी और साज-सज्जा में गरीब भारत की मेहनत लगी है, उसका खून-पसीना लगा है. अफसरों, नेताओं और दलालों का जो अमीर भारत है वह 70,000 करोड़ रुपए में सिर्फ हिस्सा बंटाता रहा, तरह-तरह की कंपनियां और कमेटियां बनाकर सारे ठेके और करार अपने सगे-संबंधियों और दोस्तों को बांटता रहा, और गरीब कई स्तरों पर इस खेल की कीमत चुकाते रहे. जिस दिल्ली को समय रहते तैयार करने का सेहरा अब सारे लोग अपने ऊपर ले रहे हैं उसे संवारने में मजदूरों ने दिन-रात की मेहनत की. कहीं सड़क टूटी, कहीं पुल गिरा और हर जगह मरने और घायल होने वालों की सूची बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश या बंगाल से आए किन्हीं लाचार-अनजान मजदूरों के नाम बताती रही.

इस तैयारी का अगला पड़ाव कहीं ज्यादा मार्मिक और हतप्रभ करने वाला साबित हुआ, जब इन्हीं मजदूरों और इनके साथ आए इनके विस्थापित परिवारों ने पाया कि खेलों के दौरान दिल्ली को सुंदर और साफ-सुथरा दिखाने के लिए उन्हें भेड़-बकरियों की तरह बाहर फेंका जा रहा है. दिन भर की मेहनत के बाद शाम को अपने बच्चों के साथ खाना खा रही मजदूरिनें फुटपाथ से जबरन उठाकर भिखारियों के लिए बने तथाकथित आश्रमों में पहुंचा दी गईं. जिन मजदूरों के पास वापसी के पैसे नहीं थे, उनके हाथ पर दिल्ली पुलिस ने मोहर मारकर उन्हें बेटिकट यात्रा का अधिकारी बना डाला.

इन सबके बीच कॉमनवेल्थ के घपलों-घोटालों की खबर आती रही, इसके ठेकों में दिख रहे भाई-भतीजावाद के आरोप साबित होते रहे, समापन समारोह और महत्वपूर्ण मुकाबलों के टिकट की कालाबाजारी की खबरें चलती रहीं, लेकिन किसी जिम्मेदार आदमी को इस सिलसिले में गिरफ्तार किया गया हो, इसकी खबर नहीं आई.

मीडिया में हो रही बहस में इस पूरे खर्च के औचित्य पर कोई बात नहीं दिखती, इस खर्च में हो रहे घोटाले पर सवाल भर उठते हैं

खबरों की दुनिया में फिर गरीब छाए हुए थे- इस बार वे खिलाड़ी जो अपने अफसरों की धौंसपट्टी और अपने कोच की मनमर्जी झेलते हुए इस मोड़ तक पहुंचे और अपने-अपने खेलों मे कॉमनवेल्थ के नए रिकार्ड बनाते रहे. मेलबॉर्न और मैनचेस्टर के अपने रिकॉर्ड को भारत अगर दिल्ली में दुरुस्त कर सका और अपने दावे के मुताबिक सौ से ज्यादा पदक ला सका तो इसका श्रेय इसी कमजोर, मध्यवर्गीय भारत को देना होगा. कुछ अफसोस के साथ बस यह कल्पना की जा सकती है कि अगर इस भारत को कायदे से प्रशिक्षण की सुविधाएं मिलतीं, जरूरी साजो-सामान और उपकरण मिलते, और वक्त पर मैदान मिलता तो शायद उसका प्रदर्शन कहीं बेहतर होता. अगर कोई ध्यान से सुनना चाहे तो अब भी कॉमनवेल्थ खेलों की कामयाबी के शोर में दबी हुई वे शिकायतें सुन सकता है जो अपने कोच और प्रबंधकों से इन खिलाड़ियों को हैं.

यानी कॉमनवेल्थ के आईने में देखें तो गरीब भारत इस देश की नाक ऊंची कर रहा है और अमीर भारत इसकी पगड़ी उछाल रहा है. अमीर भारत ने तैयारी के नाम पर इतने प्रपंच किए कि एक बार लगने लगा कि ऐसे आयोजन रद्द हों तो देश का भला हो, और गरीब भारत ने खेल के नाम पर इतने पराक्रम दिखाए कि तैयारियों के दौरान हुई गड़बड़ी को भूल जाने की इच्छा होती है.

यह सब लिखना जरूरी भी है और यह सब लिखने का खतरा भी है- खतरा अपने-आप को दुहराने का. इस बात का कि इससे बहस फिर दो अलग-अलग बनते भारतों की जानी-पहचानी सरणियों में घूमने लगती है और एक तरह से एक नया सरलीकरण बनता दिख पड़ता है. क्योंकि ऐसे कई स्तर हैं जिनमें ये दोनों भारत एक-दूसरे में घुसपैठ करते हैं- कॉमनवेल्थ खेलों में भी और बाकी दूसरे कार्यक्रमों में या सार्वजनिक गतिविधियों में भी.

लेकिन जितना सरलीकरण और जितने दुहराव इस तरह के लेखन में है, उससे कहीं ज्यादा सरलीकरण और दुहरावों के साथ अमीर भारत इस गरीब भारत को अपने उपनिवेश की तरह इस्तेमाल करने में जुटा है. कॉमनवेल्थ खेलों के शानदार उदघाटन समारोह की तारीफ से भरे चैनलों और अखबारों के सरलीकृत बखानों की मार्फत यह अमीर भारत गरीब भारत के हिस्से का श्रेय ले लेना चाहता है, वह इस बात को भूलने-भुलाने पर मजबूर करता है कि इस सांस्कृतिक कार्यक्रम की कितनी कीमत इस देश ने चुकाई- वह इस बहस को एक बेमानी बहस में बदल डालना चाहता है कि 14 दिन के खेल के लिए 70,000 करोड़ रुपए के खर्च या एक शाम के लिए 40 करोड़ की लागत वाले हीलियम के गुब्बारे का औचित्य क्या है.

अगर इस देश के समाजवादी आंदोलन में थोड़ी-सी आग और थोड़ी-सी ऊष्मा बची होती तो कॉमनवेल्थ के आयोजकों को, इससे जुड़े मंत्रियों और संतरियों को कई असुविधाजनक सवालों के जवाब देने होते. लेकिन ऐसा कोई आंदोलन फिलहाल इस देश में नहीं है और जिन चैनलों और अखबारों ने कॉमनवेल्थ खेलों की आलोचना की कमान संभाल रखी है उनका वास्ता मूलभूत सवालों से नहीं, उन गड़बड़ियों, घपलों और घोटालों भर से है जो इनकी तैयारियों के सिलसिले में दिखती रही हैं. इस लिहाज से देखें तो फिलहाल जो मीडिया कसम खा रहा है कि कॉमनवेल्थ के दौरान हुआ घोटाला वह भूलने नहीं देगा, वह भी इसी सरलीकरण का मारा है और किसी कलमाड़ी या गिल की बलि से संतुष्ट हो जाएगा. क्योंकि उनकी बहस में इस पूरे खर्च के औचित्य पर कोई बात नहीं दिखती, इस खर्च में हो रहे घोटाले पर सवाल भर उठते हैं.

दरअसल, अमीर भारत इस तरह के घोटाले करने और इससे उबरने की कलाएं भी खूब सीख चुका है. हाल के अतीत के सारे घोटाले-घपले याद कर जाएं तो यह डराने वाला तथ्य सामने आता है कि किसी भी एक मामले में किसी भी ताकतवर आदमी को सजा नहीं हुई. ज्यादा से ज्यादा किसी एक को बलि का बकरा बनाकर पूरे घपले से छुट्टी पा ली गई. आईपीएल के घपले में कुछ ऐसा ही दिख रहा है जहां बीसीसीआई अब सारे गुनाहों के लिए ललित मोदी को जिम्मेदार ठहरा रही है और उनके खिलाफ चेन्नई में एफआईआर से लेकर इंटरपोल का ब्लू कॉर्नर नोटिस तक हैं. खतरा यही है कि कॉमनवेल्थ में यही नाटक दुहराया न जाए और भव्य कॉमनवेल्थ खेलों का परचम उठाकर वे सारी नाइंसाफियां और बेईमानियां भुला न दी जाएं जो इन खेलों की तैयारी के दौरान हुईं. यह बहुत संभव है कि बहुत सारी आंखों को खटक रहे, चुटकुलों का विषय बन चुके सुरेश कलमाड़ी को कांग्रेस और सरकार ठिकाने लगा दे और फिर से कॉमनवेल्थ के बाद ओलंपिक की दावेदारी में जुट जाए जिसके लिए शीला दीक्षित अपनी राजधानी को तैयार बता चुकी हैं. अगर ऐसा हुआ तो इस बार 70,000 नहीं, कई लाख करोड़ का खेल होगा, गरीब नए सिरे से रात-दिन काम करने को मजबूर किए जाएंगे और फिर एक दिन अपनी झोपड़पट्टियों से उठाकर बाहर फेंक दिए जाएंगे. ऐसे कॉमनवेल्थ के खिलाफ कम से कम गरीब भारत को आवाज उठानी होगी. काश कि हमारे राजनीतिक दलों में कोई एक होता जो इन खेलों के खिलाफ, इस संस्कृति के खिलाफ तनकर खड़ा होता और दिल्ली को घेरता, जो इन गरीब लोगों की आवाज बन पाता.

दिग्गजों के दाएं-बाएं

श्याम हुए बेगाने, अब राम का रंग है छाया

रामकृपाल यादव

लालू प्रसाद यादव की राजनीति की एक खासियत है. सब जानते हैं कि उनकी पार्टी में आदि और अंत वे ही हैं फिर भी वे चेहरों का एक ऐसा मायावी चक्रव्यूह रचते हैं जिसमें योद्धाओं के चेहरे समय-समय पर बदलते रहते हैं. इस बार के विधानसभा चुनाव में बादशाह के विजिबल योद्धा हैं- रामकृपाल यादव. अनुशासित सिपाही की तरह जयप्रकाश नारायण यादव भी कभी-कभार लालू के बाएं-दाएं दिख जाते हैं, लेकिन चुनाव की घोषणा के बाद से ही रामकृपाल की हर फ्रंट पर मौजूदगी अनिवार्य-सी हो गई है. टीवी पर, अखबारों में, पार्टी कार्यालय में इलेक्शन के पहले चले सेलेक्शन गेम में बायोडाटा थामते वक्त. राजद की राजनीति में हालांकि वे कभी शिवानंद तिवारी की तरह लालू प्रसाद के चाणक्य नहीं बन सकें और न श्याम रजक की तरह उनका साया. लेकिन आज वे लालू के लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं यह पार्टी में सबको पता है. कुछ समय पहले तक जब श्याम रजक लालू प्रसाद के दाएं हुआ करते थे तब रामकृपाल उनके बाएं खडे़ दिखते थे. तब राम-श्याम की जोड़ी जमती थी. अब श्याम दुश्मन खेमे में चले गए तो अब अकेले राम ही हैं.

रामकृपाल का मूल राजनीतिक आधार पटना ही रहा. एक जमाने में वे यहां के डिप्टी मेयर हुआ करते थे, 1996 और 2004 में लोकसभा सांसद  भी रहे. अब राज्यसभा के रास्ते संसदीय राजनीति में हैं. पटना ही राजनीतिक आधार रहा, बावजूद इसके वे पिछले लोकसभा चुनाव में अपने राजनीतिक आका लालू प्रसाद यादव को पाटलिपुत्र सीट से लोकसभा में विजयश्री नहीं दिलवा सके थे. यह अलग बात है िक इस बार विधानसभा चुनाव में रामकृपाल यादव की बातों को सुनने, उनके हावभाव देखने और बार-बार लालू प्रसाद के पास दिखते रहने से ऐसा लगता है कि राज्य में राजद की नैया पार लगाने का दारोमदार इन्हीं के कंधे पर है. कभी लालू प्रसाद के अनुशासित बगलगीर सैनिक रहे श्याम रजक कहते हैं, ‘राजद में रामकृपाल हों या कोई और, सब दिखावे के लिए होते हैं. सीजनल चेहरे की तरह, आते हैं, चले जाते हैं.’

ऐसा नहीं है कि रामकृपाल ही सबसे ताकतवर योद्धा हैं, इसलिए बाएं-दाएं दिखते हैं. अब्दुल बारी सिद्दिकी, जगतानंद सिंह, रघुवंश प्रसाद सिंह, जयप्रकाश नारायण यादव भी लालू यादव के निकटवर्ती माने जाते हैं, लेकिन लालू इन्हें क्षेत्रवार क्षत्रप की तरह रखते हैं. अब्दुल बारी को मिथिलांचल में प्रभाव जमाने की जिम्मेदारी है, जयप्रकाश अंग प्रदेश में रंग जमाने की जिम्मेदारी के साथ हैं, जगतानंद सिंह भोजपुर पट्टी में तो रघुवंश प्रसाद वैशाली के गढ़ में. लेकिन इनमें जयप्रकाश को छोड़ अन्य नेपथ्य से दस्तक देते हैं, जगतानंद सिंह के बेटे दुश्मन खेमे में जा चुके हैं, रघुवंश प्रसाद कांग्रेस से नाता तोड़ने के बहाने लालू की राजनीतिक आलोचना कर चुके हैं, सिद्दिकी मुसलिम होते हुए भी शहाबुद्दीन या तसलीमुद्दीन की तरह, जो कभी लालू के खास सिपहसालार थे, आक्रामक राजनीति नहीं करते. लालू के एक करीबी बताते हैं कि इस चुनाव में लालू प्रसाद के दाएं-बाएं उनकी ही जाति का बार-बार दिखने वाला फैक्टर कुछ-कुछ विडंबना की तरह भी है. कभी लालू प्रसाद के साथ सटकर राजनीति करने वाले शमशेर आलम कहते हैं, ‘लालू प्रसाद की राजनीति में दाएं-बाएं मत देखिए, वे अपनी पार्टी के अकेले नेता हैं. रामकृपाल हों या कोई और, सब उनकी मेहरबानी…’

नीतीश के छुपे हुए रुस्तम

रामचंद्र प्रसाद सिंह

राजनीति में कुछ लोग धमक के साथ बुलंदियां चढ़ते हैं तो कुछ खामोशी के साथ. रामचंद्र प्रसाद सिंह बिहार की राजनीति में एक ऐसा नाम हैं जिन्होंने खामोशी के साथ सियासी बिसात पर अपने मोहरे बिछाए, सटीक चालें चलीं और आज आलम यह है कि वे सत्ताधारी जनता दल (यू) के लिए अपरिहार्य से बन चुके हैं.

जानने वालों के बीच इन्हें आरसीपी के नाम से  जाना जाता है और गुजरे बीस साल से ये मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दाएं-बाएं, साए की तरह रहते आए हैं. 1984 बैच के आईएएस कैडर के अधिकारी रहे आरसीपी चार महीने पहले तक पर्दे के पीछे से महत्वपूर्ण राजनीतिक फैसलों में अहम भूमिका निभाया करते थे – 2005 से ही वे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के मुख्य सचिव थे. हालांकि अब उन्हें खुले मंच पर बुला लिया गया है और इसके लिए इसी साल जून में उन्होंने आईएएस की नौकरी छोड़ दी. नौकरी छोड़ते ही वे राज्यसभा के सदस्य बना दिए गए. यानी सब कुछ पूरी तरह से पहले से ही तय था. इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि नीतीश कुमार के लिए आरसीपी कितना महत्व रखते हैं. आलम यह है कि रामचंद्र प्रसाद नीतीश मंत्रिमंडल में मौजूद कई सशक्त मंत्रियों से भी अधिक शक्तिशाली माने जाते हैं.

नीतीश के बारे में अमूमन यह कहा जाता है कि वे किसी एक नेता को विशेष महत्व नहीं देते. लेकिन सच्चाई यह है कि अलग-अलग दौर में कई लोग उनके खास रहे हैं. कभी राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह उनके काफी करीब माने जाते थे. उन्हें लंगोटिया यार तक की संज्ञा दी जाती थी. लेकिन ललन ने चुनाव के ऐन मौके पर नीतीश को अंगूठा दिखा दिया. उन दिनों न सिर्फ वे पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हुआ करते थे बल्कि कई महत्वपूर्ण मामलोंे में प्रभावी भूमिका भी निभाते थे. ललन ने कई बार यह दावा भी किया था कि उनसे बेहतर नीतीश को कोई नहीं जानता. हालांकि पार्टी कार्यकर्ताओं की मानें तो ललन सिंह के रहते हुए आरसीपी भले ही बाहर न आते हों लेकिन मुख्यमंत्री सचिवालय से ही नीतीश की कई रणनीतियों का सफल संचालन वे ही किया करते थे.

नीतीश जब पहली बार वीपी सिंह सरकार में उपमंत्री बने थे तो आरसीपी को उन्होंने अपने साथ केंद्र में रखा था. जब वे रेलमंत्री बने तब आरसीपी उनके विशेष सचिव रहे और इसी दरमियान उन्होंने नीतीश का विश्वास जीता.

पार्टी और नीतीश के लिए आरसीपी कितने महत्वपूर्ण हैं इसका अंदाजा बिहार जद(यू) के अध्यक्ष विजय कुमार चौधरी के उस बयान से लगाया जा सकता है जो पिछले दिनों रामचंद्र के राज्यसभा प्रत्याशी घोषित किए जाने पर उन्होंने दिया था. चौधरी ने उस समय कहा था, ‘आरसीपी पार्टी की महत्वपूर्ण धरोहर साबित हुए हैं, अब वे एक अधिकारी नहीं रहे बल्कि हमारे नेता हो गए हैं. इसलिए उनके पास अब खुलकर पार्टी के लिए काम करने के विकल्प खुल गए हैं.’

जद(यू) की महिला सेल की एक प्रमुख नेता आभा सिंह कहती हैं, ‘वैसे तो पिछले पांच वर्षों से आरसीपी नीतीश जी के विश्वास पात्रों में सबसे महत्वपूर्ण रहे हैं लेकिन जब से वे आईएएस की नौकरी से त्यागपत्र देकर राज्यसभा के सदस्य बने हैं, पार्टी के महत्वपूर्ण फैसलों में अहम भूमिका निभाने लगे हैं.’ आभा आगे कहती हैं, ‘हमारी पार्टी में नंबर एक या दो जैसी कोई बात नहीं है, हां यह जरूर है कि पार्टी आपकी योग्यता का ध्यान रखती है और हमारी पार्टी आरसीपी जी की योग्यता का फायदा उठा रही है.’

कभी लालू के खेमे में चाणक्य की भूमिका निभा चुके शिवानंद तिवारी भले ही आज अकसर नीतीश के साथ हर जगह खड़े दिखते हों लेकिन सुशासन सरकार को चाणक्य से ज्यादा आज आरसीपी की जरूरत है. भरोसे की वजहें भी हैं. एक तो बीस साल का साथ है, दूसरा- वे मुख्यमंत्री के स्वजातीय हैं और तीसरा- दोनों ही नालंदा जिले के हैं.

पासवान के साहस, छोटके भाई पारस

पशुपति कुमार पारस

लोक जनशक्ति पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच ये छोटे साहब के नाम से जाने जाते हैं. बड़े साहब यानी रामविलास पासवान और छोटे साहब हैं छोटके भाई- पशुपति कुमार पारस. छोटे साहब को खुश रखने का मतलब हुआ बडे़ साहब को खुश करना, ऐसा पार्टी के ज्यादातर कार्यकर्ता मानते हैं. वैसे पशुपति को जीहुजूरी करवाने का बड़ा शौक है भी. उन्हीं की पार्टी के एक कार्यकर्ता राकेश कुमार बताते हैं, ‘जब छोटे साहब कार्यालय में होते हैं तो आम कार्यकर्ता उनके सामने कुर्सी पर बैठने की जुर्रत नहीं कर सकता.’

पारस घोषित रूप से पासवान के नंबर दो हैं, तभी तो राजद से चुनावी गठबंधन होने के तुरंत बाद उन्होंने (पासवान) खुद ही यह घोषणा की कि उनके गठबंधन की ओर से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार लालू यादव होंगे और गठबंधन की जीत की स्थिति में उपमुख्यमंत्री पद के हकदार पशुपति कुमार पारस होंगे. पासवान की बदौलत ही पारस पिछले पचीस साल से अलौली के विधायक बनते आए हैं. साथ ही वे लोजपा की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष भी हैं.

रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान, जो फिलहाल मुंबई में एक फिल्म की शूटिंग में व्यस्त हैं,  पार्टी में नंबर 1 या 2 के प्रचलन को गलत ठहराते हुए कहते हैं, ‘हमारी पार्टी में फैसले बंद कमरे में नहीं लिए जाते. सभी लोग महत्वपूर्ण हैं और यह कहना कि पासवान जी के बाद पारस जी ही सब कुछ हैं, सही नहीं है, क्योंकि हमारी पार्टी में रमा सिंह व सूरजभान सिंह का भी काफी महत्व है. किसी को नंबर एक या दो के तौर पर आंकने का काम हम नहीं कर सकते.’

बहरहाल, चिराग चाहे जो भी कहें पर हर चुनावी रैली, प्रेसवार्ता और पार्टी ऑफिस की मीटिंगों में पशुपति पारस साए की तरह अपने बड़े भाई के साथ दिखते हैं. उनके करीबियों का भी मानना है कि छोटे साहब प्रबंधन में निपुण हैं, और हर मुश्किल घड़ी में बड़े भाई के संपर्क में रहते हैं, उनसे मिलने वाले दिशानिर्देश को पूरी तन्मयता से लागू करने की कोशिश करते हैं. पासवान जब कभी बिहार से बाहर होते हैं तो राज्य की राजनीति पर कब क्या प्रतिक्रिया देनी है, किस मुद्दे पर कौन-सी रणनीति अख्तियार करनी है, सब पारस के जिम्मे होता है.

इसी निष्ठा और समर्पण की वजह से तो रामविलास भी खुलकर भाई के पक्ष में बोलते हैं. पिछले दिनों पासवान ने परिवारवाद को बढ़ावा देने के आरोपों का खंडन करते हुए कहा था, ‘मेरे भाई पारस और रामचंद्र पासवान अपनी योग्यता के बल पर नेता बनने वालों में से हैं. ये दोनों जनता द्वारा चुनकर विधानसभा या लोकसभा में पहुंचते हैं, इन्हें मैं नहीं चुनता.’

चुनावी मंचों पर भाषण के दौरान छोटे साहब भले ही असहज हों लेकिन पासवान की सारी चुनावी चालों को सटीक बनाने में उनका किरदार अहम है. देखना दिलचस्प होगा कि पिछली बार चुनाव में चोट खाए लोजपा को वापस ढर्रे पर लाने में पारस ‘बड़े साहब’ की कितनी मदद कर पाते हैं.