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ओसामा की दहशत, ओबामा की नीयत

ओसामा बिन लादेन बहुत खतरनाक आदमी था. इक्कीसवीं सदी में आतंकवाद के उभार की जो डरावनी वैश्विक प्रक्रिया चली वह उसका एक महत्वपूर्ण सूत्रधार था. इस आतंकवाद ने भारत को भी बुरी तरह क्षत-विक्षत किया है, और इस लिहाज से हमें खुश होना चाहिए कि आतंक का सबसे बड़ा सौदागर मारा गया. हमारे मीडिया में यह खुशी दिख भी रही है जो इस बात से कुछ और छलकी पड़ रही है कि ओसामा किन्हीं गुफाओं में नहीं, पाकिस्तान के एक महफूज शहर में मिला और वहां अमेरिका की नेवी सील के कमांडो ने उसे घुसकर मारा. इस घटना से पाकिस्तान का सिर नीचा हुआ है, यह बात हमारे मध्यवर्गीय मानस को कुछ तृप्ति देती है.

सिर्फ इसलिए नहीं कि पाकिस्तान भारत में आतंकवाद का सबसे बड़ा प्रायोजक और निर्यातक रहा है, बल्कि इसलिए भी कि ओसामा के एबटाबाद में मिलने से लेकर उसको मार गिराने तक की कार्रवाई में पाकिस्तान कई संदेहों से घिरा दिख रहा है. अगर उसने ओसामा को जान-बूझकर छिपाया, तो यह आतंकवाद से उसकी मिलीभगत का पुख्ता सबूत है, और अगर ओसामा उसकी बेखबरी में वहां छिपा रहा तो इससे पाकिस्तान के राजनीतिक और सैन्य तंत्र की विफलता उजागर होती है जो इस बात से कुछ और पक्की हो जाती है कि बाद में जब अमेरिकियों ने जो कार्रवाई की उसकी भी थाह उसे नहीं मिली.

बीते सौ वर्षों में राष्ट्रवाद ऐसी ही हिंसक और आत्मघाती परियोजनाओं के सहारे आगे बढ़ा और बढ़ाया गया है

सच क्या है, यह पाकिस्तान को मालूम होगा या फिर शायद अमेरिका को, जो पाकिस्तान का कॉलर भी पकड़ता है, उसकी पीठ भी थपथपाता है और उसकी जेब भी भरता है. पाकिस्तान में ओसामा की उपस्थिति इस बात का इकलौता प्रमाण नहीं है कि वह आतंकवाद और आतंकी संगठनों का हमदर्द और मददगार मुल्क है. 1993 में मुंबई में हुए कई धमाकों के मुजरिमों को पनाह देने का मामला हो या 26 नवंबर, 2008 को मुंबई पर हुए हमले के सूत्रधारों को पालने और प्रशिक्षित करने का- भारत में चल रहे आतंकवाद को सीमा पार से मिल रहे शह और समर्थन की तस्दीक बार-बार होती रही है.

शायद यह इन जख्मों की भी याद है जिसकी वजह से भारतीय मीडिया पाकिस्तान की खिल्ली उड़ती देख खिलखिला रहा है और अब यह सवाल भी पूछ रहा है कि क्या भारत को भी पाकिस्तान में छिपे आतंकवादियों को मार गिराने के लिए अमेरिका जैसी ही कार्रवाई नहीं करनी चाहिए. इस सवाल के साथ एक मायूसी भरा जवाब भी छिपा हुआ है कि भारत ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि उसके पास ऐसे नपे-तुले हमले करने की न ताकत है और न ही इसका हौसला है. इसी क्रम में इन दिनों कई रिटायर हो चुके कूटनीतिज्ञ टीवी चैनलों पर विशेषज्ञ बनकर यह व्यावहारिक ज्ञान देने में जुटे हैं कि कूटनीति में कोई किसी का दोस्त या दुश्मन नहीं होता, कुछ भी नैतिक या अनैतिक नहीं होता, सिर्फ अपने हित होते हैं और उनकी व्याख्या होती है. अमेरिका ताकतवर है, इसलिए उसने ओसामा को मार गिराया. भारत को भी अपने हित देखने चाहिए, अपनी ताकत तौलनी चाहिए और अपने ढंग से फैसला करना चाहिए.

राष्ट्रवादी राजनीतिक परियोजनाओं की मांग के आईने में देखें तो कूटनीति का यह पाठ बिलकुल सही लगता है. लेकिन संकट यह है कि यह पूरा राष्ट्रवाद अंततः एक ऐसी अंधी भूलभुलैया में जाता दिखाई पड़ता है जिसमें हम पहले ओसामा को बनाते हैं, और उसके बाद उसे मारते हैं. अब यह कायदे से याद दिलाने की भी जरूरत नहीं है कि ओसामा बिन लादेन शीतयुद्ध के अंतिम वर्षों में अफगानिस्तान में सोवियत संघ के विरुद्ध अमेरिका द्वारा खड़ी की गई तालिबानी व्यूह रचना का एक छोटा-सा मोहरा भर था. अफगानिस्तान में धार्मिक उन्माद की यह अफीम अमेरिका ने ही बोई, उसे पाकिस्तान की मदद से मिट्टी, पानी और हवा दी, उसके हाथ में एके 47 पकड़ाया, उसे जेहाद के नये मतलब समझाए और उसे ऐसे फिदायीन दस्ते के तौर पर तैयार किया जो जान लेने और देने का खूनी खेल खेल सके.

लेकिन इस लेख का मकसद आतंकवाद को लेकर अमेरिका के दोहरे चरित्र की तरफ ध्यान खींचना भर नहीं है, बल्कि यह बताना है कि बीते सौ वर्षों में राष्ट्रवाद ऐसी ही हिंसक और आत्मघाती परियोजनाओं के सहारे आगे बढ़ा और बढ़ाया गया है. जब तक अमेरिका ताकतवर रहा, जब तक उसके पास एक विचारधारात्मक कवच की सुविधा रही, तब तक वह लोकतंत्र, साम्यवाद विरोध और मानवाधिकार के आवरण में सब कुछ करता रहा, लेकिन इक्कीसवीं सदी के इन आखिरी वर्षों में उसकी निचुड़ती हुई ताकत ने, उसके सूखते हुए आर्थिक स्रोतों ने, उसके थके हुए चिड़चिड़ेपन ने और उसकी लगातार अनावृत्त होती स्वार्थपरता ने उसके इरादों और औजारों को एक तरह से बेनकाब कर दिया है. हम चाहें तो याद कर सकते हैं कि जिसे अमेरिका 9/11 कहता है, जिस हमले को वह अपने आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा हमला बताता है, उसी की बदौलत जॉर्ज बुश द्वितीय को वह राजनीतिक स्थिरता और स्वीकार्यता मिली जिसकी बदौलत वे चार साल नहीं, आठ साल शासन कर गए. वरना साल 2000 में हुआ उनका चुनाव बुरी तरह विवादों में घिरा हुआ था, उन पर मतदान में घपले के आरोप थे, उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई चल रही थी और इतने तीखे राजनीतिक प्रदर्शन हो रहे थे कि वे लगातार व्हाइट हाउस से भागे रहने को मजबूर थे.

अल कायदा से कहीं ज्यादा अमेरिका ने निर्दोष लोगों का खून बहाया है, जनता की चुनी हुई सरकारें पलटी हैं और क्रूर तानाशाहों को संरक्षण दिया है

लेकिन जैसे ही 9/11 हुआ, बुश के खिलाफ सारे इल्जाम हवा हो गए. अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान ने शोक में डूबे अपने नागरिकों के गम और गुस्से का फायदा उठाते हुए आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक युद्ध का एलान किया और इस युद्ध की आड़ में अपने ही नागरिकों के अधिकार स्थगित करने शुरू किए. सुरक्षा के नाम पर चली इस कवायद में पहली बार अमेरिकी नागरिकों को अपमान सहने पड़े, रुकावटें झेलनी पड़ीं, विमानों पर अपने बच्चों के लिए दूध की बोतल लेकर महिलाओं का चढ़ना मना हो गया, सिर्फ नाम की वजह से एशियाई मूल के, और मुसलिम अमेरिकियों को भयानक पूछताछ से गुजरना पड़ा, अवैध गिरफ्तारियां हुईं, गुआंतनामो बे जैसे शिविर चले- कुल मिलाकर सरकारी आतंक का एक ऐसा चक्र चला जिसमें अमेरिका सुरक्षित हो गया, लेकिन दुनिया असुरक्षित हो गई. इससे भी ज्यादा बुरी बात यह हुई कि आधुनिकता और विश्व बंधुत्व की ओर बढ़ते जमाने के पांव ठिठक गए, लोग एक-दूसरे से उसकी कौम और नस्ल पूछने लगे, एक-दूसरे पर संदेह करने लगे.

जॉर्ज विलियम बुश यहीं नहीं रुके. उन्होंने पहले इराक पर हमला किया और फिर अफगानिस्तान को निशाना बनाया. इराक में उन्हें विध्वंसक हथियार नहीं मिले, लेकिन सद्दाम हुसैन मिल गया, जो सीनियर बुश के जमाने में शुरू हुई और अधूरी रह गई एक और अमेरिकी परियोजना की आंखों का चुभता हुआ कांटा था. अफगानिस्तान में उन्हें ओसामा बिन लादेन नहीं मिला, लेकिन दक्षिण एशिया में ऐसा ठिकाना मिल गया जहां से वह मिनटों में अपने लड़ाकू विमान और हेलिकॉप्टर आसपास कहीं भी भेज सकता था. बरसों बाद जलालाबाद के एयरबेस से उड़े और ओसामा के ठिकाने तक पहुंचे अमेरिकी हेलिकॉप्टर बताते हैं कि अफगानिस्तान में अमेरिका ने क्या हासिल किया है- इस पूरे इलाके पर नजर रखने और हमला करने की ताकत.

इत्तिफाक से ओसामा भी तब मारा गया जब अमेरिका कई तरह के संकटों से घिरा है. वह अब भी दो साल पहले आई आर्थिक मंदी से उबरने की कोशिश में है. इसी दौर में चीन विश्व की नयी आर्थिक महाशक्ति की तरह उभरा है. यही वक्त है जब फोर्ब्स ने दुनिया के सबसे ताकतवर लोगों की सूची बनाते हुए बराक ओबामा से ऊपर चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ को जगह दी है. सच तो यह है कि ओबामा की लोकप्रियता भी इस दौर में लगातार गिरी है. ऐसे में जब ओसामा मारा जाता है तो ओबामा की लोकप्रियता लौटती है, अमेरिकी राष्ट्रवाद का महानायकत्व लौटता है. अमेरिका और ओबामा के लिए यह दांव इतना बड़ा है कि ओसामा पर हमले के लिए वे अंतरराष्ट्रीय कानूनों की सारी सरहदें तोड़ते हैं, किसी आतंकी संगठन की तरह नेवी सील को गुपचुप पाकिस्तान में हमले के लिए भेजते हैं और यह भी भूल जाते हैं कि वे आम राष्ट्रपति नहीं हैं, उन्हें शांति का नोबेल पुरस्कार मिला है, जिसकी मर्यादा, जिसके शील की रक्षा उन्हें करनी चाहिए थी.

वैसे अमेरिका ने ऐसे शील की परवाह कभी नहीं की है. इस तथ्य में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि अल कायदा से कहीं ज्यादा अमेरिका ने निर्दोष लोगों का खून बहाया है, जनता की चुनी हुई सरकारों को पलटने का काम किया है और क्रूर तानाशाहों को संरक्षण दिया है. वियतनाम से चिली तक, और इराक से अफगानिस्तान तक इस अमेरिकी आतंकवाद के उदाहरण बिखरे पड़े हैं. दरअसल अमेरिका के इसी रवैये से ओसामा बिन लादेन बनते हैं. इस लिहाज से ओबामा ने एक ओसामा को तो मार दिया है लेकिन अमेरिकी कार्रवाई को अपने मुल्क पर और अपनी कौम पर हमले की तरह देखने वाले बहुत सारे मायूस नौजवानों के भीतर ओसामा बनने का इरादा बो दिया है.

दुर्भाग्य से अमेरिका ने यह काम तब किया है जब इस्लामी दुनिया के अंदर से ही अल कायदा और उसके पोषित आतंकवाद के खिलाफ सुगबुगाहट तेज थी और उसके आंदोलन से धर्म की आड़ में हुकूमत कर रहे तानाशाहों के तख्तो ताज उड़ रहे थे. खतरा यह है कि इस अमेरिकी हमले के बाद अल कायदा फिर अपने उखड़ते हुए पांव जमाने की कोशिश न करे, क्योंकि ओसामा के मारे जाने के बाद वह सांगठनिक तौर पर कमजोर भले पड़ा हो, लेकिन सैद्धांतिक तौर पर उसे एक ऐसा शहीद मिल गया है जिसके नाम पर वह नयी कुमुक जुटा सकता है. अमेरिका भूल गया कि हत्याओं से लोग भले मारे जाएं, उनकी विचारधारा मजबूत होती है.

जहां तक भारत का सवाल है, वह अमेरिका की राह पर न चल सकता है और न उसे चलना चाहिए. जो राष्ट्रवादी अमेरिका की तरह भारत को भी सर्जिकल स्ट्राइक के लिए उकसा रहे हैं वे भूल जाते हैं कि राष्ट्रवाद के नाम पर युद्ध पतनशील व्यवस्थाओं का सबसे बड़ा सहारा होते हैं. आतंकवाद से युद्ध के बहाने पाकिस्तान पर एक हमला हमारी सरकारों के सारे पापों से ध्यान हटा लेगा. भले इसका नतीजा दोनों तरफ के हजारों बेकसूर नागरिकों को भुगतना पड़ेगा. पाकिस्तान की लुंजपुंज हुकूमत को भी ऐसी लड़ाई रास आएगी. अगर हम इस नकली और जुनूनी राष्ट्रवाद से दूर खड़े होकर अपने देश और दुनिया को देखेंगे तो कहीं ज्यादा ठीक से समझ पाएंगे कि ओसामा बिन लादेन क्यों बनते हैं और कैसे उन्हें खत्म किया जा सकता है.

नीर की पीर

वाकया काफी दिलचस्प है. एक टपोरी ने सज्जन को धमकाते हुए कहा, ‘दूं क्या खर्चा-पानी?’ सज्जन तपाक से बोले, ‘खर्चा दे न दे, बस पानी दे दे यार’. ये सुनते ही टपोरी के मनोबल पर घड़ों पानी पड़ गया. जाहिर है, उन सज्जन की हाजिर जवाबी के आगे टपोरी की धृष्टता पानी भरने लगी. मगर इतना पानी-पानी होने के बावजूद उन सज्जन की पानी की समस्या जस की तस रही. कबीर की उलटबांसी इसे नहीं तो किसे कहेंगे!

रंगहीन पानी कैसे-कैसे रंग दिखा रहा है. जब टोंटी से आता है तो आता है, मगर जब नहीं आता तब आती है, आती है, नानी की याद. इधर गर्मी अपने पूरे शबाब पर आई नहीं कि उधर सरकारी विभाग द्वारा कटौती का जाल फेंका गया. सरकारी नल शांत ऐसे जैसे जीवन रक्षक प्रणाली पर रखा मरीज.
 सभ्यता की शुरुआत नदियों के कगार पर हुई, तो उसी सभ्यता के कारण अब नदियां विनाश के कगार पर हैं. यह बात पानीदार लोग बोतलबंद पानी पी-पीकर चेता रहे हैं. कैसा अद्भुत दृश्य है प्यारे! आज भगीरथ आएं तो शर्तिया उनके पैर कांप जाएं. यह देखकर कि उस भागीरथी को अपने सहजरूप से बहने के लिए भगीरथ प्रयास करना पड़ रहा है जिसे उन्होंने आकाश से उतारा था. तब भगीरथ ने गंगा को धरती पर लाकर अपने पुरखों को तार दिया था. आज यहां मात्र दो बूंद पानी के लिए ही भगीरथ प्रयास करना पड़ रहा है. पुरखों की कौन कहे, खुद ही तर जाए तो मोक्ष जानो!

जीनियस कह रहे हैं कि पानी के लिए तृतीय विश्व युद्ध होगा. और मैं मूढ़मति कह रहा हूं कि विश्व युद्ध तो बाद में होगा, उससे पहले पानी के लिए गृह युद्ध होगा. प्रेमियों की जगह पानी पर पहरे बिठाए जाएंगे. सास-बहू के झगडे़ नहीं, घर-घर पानी के लफडे़ होंगे. विलासितापूर्वक जीवन उसका कहा जाएगा जो शौच के बाद शौचालय में एक लोटा पानी डालेगा. ‘जीते रहो’ की जगह ‘पीते रहो’ का आशीर्वाद नौनिहालों को अपने बुजुर्गों से मिलेगा. पनघट पर गोपियां बोर होंगी और नंदलाल उनसे ज्यादा बोर होंगे. न गोपियां कपडे़ बदलेंगी न नंदलाल चुराएंगे. क्योंकि नदी तो सूखी होगी न! 

अभी तक पानी बचाने के लिए सिर्फ पानी मथा गया है. जब आंखों का पानी मर गया हो तो ‘जल ही जीवन है’ जैसे स्लोगन से काम चलने वाला नहीं है. देश में ऐसे भी रत्न होंगे जो सिर्फ होली दर होली को चमकते होंगे. उन्हें खोजकर निकाला जाए और सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया जाए. दीगर है, चुल्लू भर पानी में डूब मरने वाला आदमी नहाने के लिए पूरी टंकी खाली कर देता है.

अपनी सारी मेधा पेट्रोल का विकल्प तलाशने में  भिड़ा रखने वाले आदमी को फिलहाल पानी का कोई विकल्प नजर नहीं आ रहा. उसे महसूस हो रहा कि उसकी स्थिति तो जल बिच मीन प्यासी जैसी होकर रह गई है. वह पूछ रहा है कि जब दाने-दाने पर खाने वाले का नाम लिखा है, तब बूंद-बूंद पर पीने वाले का नाम क्यों नहीं लिखा!

दरअसल, पानी की चिंता से ज्यादा चिंता, पानी के पीछे पानी की तरह पैसा बहाने को लेकर है. गुरू दिक्कत प्रबंधन की है, पानी की किल्लत की नहीं. यक्ष प्रश्न आदमी के गिरने का है, जल स्तर गिरने का नहीं. असल में, सूखा संवेदनाओं का है, पानी का नहीं. अब आदमी चाहे जितना भी गला फाडे़ कि पानी खत्म हो रहा, तो फाड़ता रहे. पानी पर लाठी मारने से पानी फटता है कहीं!

– अनूप मणि त्रिपाठी

‘हल्के बुखार को हल्के में न लें’

बुखार को कभी भी बिना ठीक सा विशेषण लगाए नहीं बताया जाता. मामूली बुखार, हड्डी तोड़ बुखार, ऐसा तेज बुखार कि जैसा कभी हमें जिंदगी में हुआ ही नहीं, हल्का बुखार, मियादी बुखार आदि कई तरह से मरीज इसके बारे में बताता है. बुखार को लेकर इतनी तरह की गलतफहमियां हैं, बतकहियां हैं और चिकित्सा विज्ञान की सीमाएं हैं कि इस मामूली-सी प्रतीत होती बीमारी के इन पक्षों को जानना जरूरी हो जाता है.

पहली बात तो यह कि कोई भी, कितना भी कम बुखार हो वह कभी भी मामूली नहीं होता. हर बुखार इस बात की घोषणा है कि शरीर में कुछ ऐसा गलत हो रहा है जिससे लड़ने के शरीर के अपने हथियारों के चलने के कारण यह गर्मी पैदा हो रही है. बल्कि हल्के बुखार कई मायनों में ज्यादा खतरनाक हैं. थोड़ा-थोड़ा बुखार हो रहा हो तो कई बार आदमी लंबे समय तक इसकी परवाह ही नहीं करता और बाद में बीमारी बढ़ाकर डॉक्टर के पास पहुंचता है. दूसरा यह कि वे हल्के-हल्के निन्यानवे-सौ वाले, कभी-कभी आने वाले बुखारों की जड़ में बेहद खतरनाक, जानलेवा होने की हद तक खतरनाक कारण भी हो सकते हैं. टीबी, एड्स, कई तरह के कैंसर, आंतों की बीमारियां, यहां-वहां पनपती पस (मवाद) आदि किसी के कारण भी ऐसा हो सकता है. प्रायः यह हल्का बुखार विभिन्न तरह की जांचों में आपके खासे पैसे लगवा सकता है. हो सकता है कि तब भी डॉक्टर किसी ठीक नतीजे पर न पहुंच पाए और आप डॉक्टरों की जमात को ही कहते फिरें कि स्साले यहां-वहां से कट लेने के लिए ऐसा करते रहते हैं. हल्का बुखार गठिया से लेकर साइकोलोसिक फीवर तक कुछ भी हो सकता है. हो सकता है कि मैं किसी पक्ष की जांच न कराऊं और दो माह बाद पता चले कि हड्डी में टीबी थी या आंतों में कैंसर था, जो मैंने तब सोचा या देखा ही नहीं. कुल कहना यह है कि हल्के बुखार को कभी भी हल्के में न लें. हमेशा किसी बहुत अच्छे डॉक्टर से इसकी सलाह लें क्योंकि मामूली बुखारों की डायग्नोसिस के लिए गैरमामूली डॉक्टर ही चाहिए जो इस जटिल चीज को समझता हो.

बुखार को गंभीरता से लें क्योंकि बुखार यदि गंभीर हो गया तो लेने के देने पड़ सकते हैं

इससे भी पूर्व मैं सलाह दूंगा कि बुखार लगे तो थर्मामीटर से नापकर कागज पर रिकार्ड कर लें. डॉक्टर को इससे बड़ी मदद मिलेगी. बहुत से मरीज कहते हैं कि हमारा हड्डी का बुखार है, या अंदरूनी बुखार है जो रहता तो है पर किसी भी थर्मामीटर में नहीं आ पाता. ऐसा कोई बुखार नहीं होता जो थर्मामीटर में रिकॉर्ड नहीं होगा. बुखार जैसा लगने के पचासों और भी कारण हो सकते हैं. उनका इलाज भी कुछ अलग ही होगा. आप बुखार कहते हो, और लापरवाह चिकित्सक बुखार की कोई दवाई आपको दे देता है.  तो पहले यह तय कर लें कि बुखार है भी या नहीं? नापें. जब लगे तब नापें. मैं यह सलाह नहीं दे रहा कि जेब में थर्मामीटर लेकर घूमें और जब-तब मुंह में रखते फिरें. पर रिकॉर्ड जरूर करें. बुखार रिकॉर्ड न हो तो डॉक्टर को यही कहें कि मुझे बुखार सा लगता है पर होता नहीं. इस तरह की स्थिति एनीमिया, थकान, तनाव से लेकर अन्य बहुत सी गंभीर बीमारियों से भी हो सकती है.

और नापने में भी याद रखें कि आदमी के नार्मल टेंपरेचर में भी बहुत-से नार्मल उतार-चढ़ाव हो सकते हैं. हिंदी के एक बड़े कहानीकार की बिटिया का टायफायड तो ठीक हो गया परंतु रोज शाम होते-होते 99.8 डिग्री चढ़ जाता था. कहने वालों ने कहा कि टायफायड बिगड़ गया है. मैंने सलाह दी कि यह नार्मल वेरिएशन है. समझदार थे. मान गए. तो सामान्यतः शाम को हमारा तापमान 99.9 तक भी हो जाए तो इसे बुखार न मानें. डॉक्टर को तय करने दें.

तेज बुखार हो तो डॉक्टर कहते हैं कि मरीज की कोल्ड स्पोन्जिंग कीजिए. कहते हैं पर बताते नहीं कि कैसे कीजिए? प्रायः वे नर्स को कह देते हैं और नर्स आपसे कह देती है कि ठंडे पानी की पट्टियां रखिए. बस कहां रखिए, कैसे रखिए – यह बताने का समय किसी के भी पास नहीं. आप दिन भर लगे रहते हैं और बुखार नहीं उतरता. कारण यह कि कोल्ड स्पोंजिंग के कुछ सामान्य सिद्घांत हैं. एक तो यह कि इसे बर्फ के पानी से न करें. बर्फीला ठंडा पानी चमड़ी की खून की नलियों को उल्टा सिकोड़ ही देता है जिससे शरीर और ठंडे कपड़े के बीच तापमान का आदान-प्रदान नहीं हो पाता और बुखार उतनी तेजी से नहीं उतर पाता. नल में आ रहे सामान्य ताप वाले पानी या घड़े में भरे पानी को लें. दूसरी बड़ी बात यह करें कि गीले कपड़े को बढ़िया निचोड़कर और गले पर, कांखों में, पेट पर तथा जांघ के संधि स्थल (हिप ज्वायंट के पास) रखते जाएं और हर बीस-पच्चीस सेकंड में बदलकर नया गीला कपड़ा लगाएं. गर्दन, कांख, जंघा तथा पेट से खून की बहुत बड़ी नलियां एकदम चमड़ी के पास से गुजर रही होती हैं. इनमें बुखार से तपता हुआ गर्म खून बह रहा है जिसे ठंडक मिलेगी तो बुखार फटाफट कम होगा. शेष शरीर पर रखी पट्टियां इतनी जल्दी न बदलें क्योंकि हाथ-पांव की चमड़ी की पतली रक्त नलियों में खून ठंडा होने में समय लेगा. हां, माथे तथा सिर पर बर्फ की थैली (आइस कैप) रखना चाहिए क्योंकि खोपड़ी की हड्डियों का तापमान इतनी आसानी से कम न होगा.

और एक आखिरी बात. स्वयं इलाज न लें. बुखार एक ऐसी बीमारी है जिसका सबसे ज्यादा सेल्फ ट्रीटमेंट होता है. याद रखें कि हर ठंड के साथ कंपकंपी देने वाला बुखार मलेरिया नहीं होता. न ही वही एंटीबायटिक इस बार भी काम करेगी जो कभी पिछले बुखार में आपको दी गई थी. बुखार होने पर डॉक्टर की बताई दवाएं ही लें.

नन्हे लेकिन बड़े सितारे

दस साल की जन्नत का आज ब्याह हो गया. एक हट्टे-कट्टे डकैत ने अपना अंगूठा चीरकर खून से उसकी मांग भर दी और ऐलान किया कि दोनों मरते दम तक साथ रहेंगे. बाकी डकैत इस दौरान इस छोटी सी बच्ची के मां-बाप की खोपड़ी पर बंदूक ताने रहे. शॉट खत्म होने के बाद जन्नत आइने की तरफ भागती है. अपना सिंदूर पोंछते हुए वह पास ही बैठे अपने पिता जुबेर रहमानी से शिकायती लहजे में कहती है, ‘पापा, यह दुखता है.’ उसकी बात सुनकर टीवी सीरियल फुलवा की शूटिंग कर रही यूनिट के लोग धीरे से हंसते हैं.

लेकिन इस तरह के नाटकीय दृश्य और कुछ समय की थकान उस स्टारडम के लिए एक बहुत ही छोटी सी कीमत है जो आज जन्नत को हासिल है. जन्नत इस इंडस्ट्री में तब से है जब वह महज तीन साल की थी. आज सात साल बाद वह छोटे परदे को दो चर्चित धारावाहिकों में मुख्य भूमिका निभा रही है. पहला है इमेजिन पर आने वाला काशी और दूसरा कलर्स पर हाल ही में शुरू हुआ फुलवा.
यह वह दुनिया नहीं है जहां छोटी-छोटी बच्चियां सिर्फ जगह भरने लिए काम करती हैं. यहां उनके काम करने का मतलब है कांट्रेक्ट्स, प्रतिस्पर्धा और घंटों तक चलने वाले शूटिंग शेड्यूल.

जन्नत, उल्का और उनके जैसे कई दूसरे बच्चे अपने माता-पिता की अधूरी महत्वाकांक्षाओं का भार भी ढो रहे हैं

छोटे परदे पर बालक्रांति का यह सिलसिला सही मायनों में बालिका वधू से शुरू हुआ. यह दस साल की आनंदी (अविका गौर) की कहानी थी जिसका ब्याह लगभग उस जितनी ही उम्र के जगदीश (अविनाश कपूर) से हो जाता है. सास, बहू और साजिश से भरा यह फॉर्मूला था तो वही पुराना, बस उसे एक अलग रंग इस मायने में दे दिया गया था कि इसका हर एपीसोड एक सामाजिक संदेश के साथ खत्म होता था. मध्य वर्ग ने इसे खूब पसंद किया. इतना कि बालिका वधू ने कलर्स को देखते ही देखते मनोरंजन चैनलों की सबसे ऊपरी पांत में खड़ा कर दिया. 13 साल की चुलबुली अविका रातों-रात स्टार बन गई. दूसरे चैनलों को भी यह समझते ज्यादा देर नहीं लगी कि अब उन्हें भी इसी राह पर चलना है.

जीटीवी पर आने वाले धारावाहिक झांसी की रानी की लेखिका शालू कहती हैं, ‘यह सब बालिका वधू से शुरू हुआ.इसके बाद जब कलर्स ने जब उतरन शुरू किया, जिसमें दो छोटी बच्चियों की कहानी थी, तो साफ हो गया कि केंद्रीय भूमिकाओं में बच्चे भी जान फूंक सकते हैं.’ कलर्स जैसी सफलता दोहराने के लिए दूसरे चैनलों ने भी तेजी से अपना ढर्रा बदला और बच्चों के लिए अपने दरवाजे खोल दिए. अब बच्चे सिर्फ एक्स्ट्रा या छोटी और हल्की-फुल्की भूमिकाओं में नहीं दिख रहे. अब वे नायक-नायिकाएं हैं जिनके इर्दगिर्द पूरी कहानी घूमती है. इमैजिन के लिए काशी लिख चुके गौतम हेगड़े कहते हैं, ‘ आनंदी ने साबित कर दिया कि बच्चे भी शानदार तरीके से मुख्य भूमिका निभा सकते हैं. बच्चों की आंखों से दुनिया बिल्कुल अलग दिखती है. घिसे-घिसाए प्लॉट भी एक नई तरह से पेश किए जा सकते हैं. बच्चे सुंदर होते हैं और क्योंकि उनका चरित्र वास्तव में दर्शकों की आंखों के सामने ही विकसित होता है इसलिए दर्शकों को भी उनसे ज्यादा जुड़ाव महसूस होता है.’

छोटे परदे पर बच्चों की इस क्रांति का एक हिस्सा उल्का गुप्ता भी हैं. 14 साल की उल्का को जी टीवी पर आने वाले धारावाहिक झांसी की रानी में मुख्य भूमिका के लिए चुना गया था. जब बालिका वधू मशहूर हुआ तो उस समय उल्का स्टार वन पर आने वाले फैमिली ड्रामा रेशम डंक में अपनी शूटिंग का आखिरी चरण निपटा रही थी. शूटिंग के आखिरी दिन उन्हें झांसी की रानी के लिए ऑडिशन देने के लिए बुलाया गया. उन्हें चुन लिया गया और इसके बाद के दो वर्षों में अपनी अभिनय क्षमता की बदौलत वे घर-घर में जाना-पहचाना चेहरा बन गईं.
अब जब उनका किरदार उम्र की पगडंडी पर आगे बढ़ चुका है तो थोड़ी सी फुर्सत के इस दौर में उल्का अपनी 10वीं की परीक्षा के नतीजे आने का इंतजार कर रही हैं. गर्व से दमकते उनके पिता गगन गुप्ता कहते हैं, ‘मुझे रोज ही चैनलों से फोन आते हैं. लोग पूछते हैं कि क्या वह शोज में आने के लिए एक हफ्ते की छुट्टी ले सकती है.’ उल्का अपने छोटे भाई जानू और बहन जिज्ञासा के साथ सोफे पर बैठी टीवी देख रही है. सोफे के पीछे की दीवार पर उसकी एक तस्वीर टंगी हुई है. उसके हाथ में तलवार है और आंखों में गुस्सा.

कुछ माता-पिता ऐसे भी हैं जिन्हें बच्चों को इस मुकाम तक पहुंचाने के लिए कुछ ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है

एक तरह से देखा जाए तो जन्नत, उल्का और उनके जैसे कई दूसरे बच्चे अपने माता-पिता की अधूरी महत्वाकांक्षाओं का भार भी ढो रहे हैं. नौ साल पहले बतौर अभिनेता पहचान पाने को जूझ रहे गगन गुप्ता ने अपनी बेटी को ऑडिशंस के लिए ले जाना शुरू किया था. जब उल्का पूरा वाक्य तक नहीं बोल पाती थी तब गुप्ता उसे उच्चारण की बारीकियां सिखाया करते थे. हालांकि एक बार जब उल्का का चयन रेशम डंक के लिए हो गया तो गुप्ता ने उसके साथ जाना बंद कर दिया. वे कहते हैं, ‘मैंने उसके साथ उसकी मां को जाने दिया ताकि उसकी ठीक से देखभाल हो सके. जैसे एक मां ही कर सकती है. मैं खुद भी एक एक्टर हूं. दूसरे एक्टर काम में मसरूफ हों तो उनके सामने खाली बैठा रहना मेरे लिए एक ऐसी स्थिति है जिसे में बर्दाश्त नहीं कर सकता.’

लेकिन सभी माता-पिता खुद पर इतना काबू नहीं रख पाते. कास्टिंग डायरेक्टर जैनेट इलिस कहती हैं, ‘बाल अभिनेताओं में से ज्यादातर के माता-पिता की अपनी भी महत्वाकांक्षाएं होती हैं. बच्चे को एक बार रोल मिल जाए तो वे ऐसा बर्ताव करने लगते हैं जैसे वे ही असली टैलेंट हों. कभी वे अपने मनपसंद खाने की जिद करेंगे, कभी स्क्रिप्ट में बदलाव की और कभी वैनिटी वैन की. हालांकि इसका सकारात्मक पहलू यह है कि उन्हें यह अहसास होता है कि उनके बच्चे उनकी हसरतों की जिंदगी का टिकट हैं और इसलिए वे उन्हें निखारने पर खूब ध्यान देते हैं.’

डिंपल पेंडकलकर का बेटा राहुल चार साल का हुआ तो वे उसका पोर्टफोलियो एक एजेंट के पास ले गईं जिसने एक मोटी फीस लेकर इस बच्चे की सिफारिश कास्टिंग डायरेक्टरों से करनी शुरू की. आज राहुल 10 साल का है और अब तक 11 टीवी सीरियलों, 11 फीचर फिल्मों और 76 विज्ञापनों में काम कर चुका है. एक सेट पर उसकी हर दिन की औसतन फीस 40 हजार रु है. आय पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है तो राहुल के पिता ने भी कुछ समय के लिए अपनी वकालत छोड़कर स्क्रिप्टराइटिंग और डायरेक्शन सीखना शुरू कर दिया है. शूटिंग के दौरान टेक के बाद भी डिंपल मॉनीटर से चिपकी रहती हैं ताकि वे देख सकें कि राहुल शॉट में है या नहीं. दूसरे बच्चों के माता-पिता इस दौरान एयरकंडीशंड वैनिटी वैन में बैठकर उन्हें उनके हिस्से की लाइनें रटवाते हैं. उनकी फरमाइशें धैर्य से सुनते हैं और वे थकान की शिकायत करें तो उनके कंधों की मालिश भी कर देते हैं.

कुछ माता-पिता ऐसे भी हैं जिन्हें अपने बच्चों को इस मुकाम तक पहुंचाने के लिए इससे कुछ ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है. सात साल की अशनूर कौर का ही मामला लें जिसकी मां अवनीत कौर ने मुंबई स्थित रेयान इंटरनेशनल स्कूल की अपनी नौकरी छोड़ दी ताकि वे अपनी बेटी के करियर पर ध्यान दे सकें. जी टीवी पर जल्द आने वाले धारावाहिक जय सोमनाथ में मुख्य भूमिका निभाने वाली अशनूर को अपनी शूटिंग के पहले दिन तब बहुत दिक्कत हुई जब एक सीन में उन्हें लाल मिर्च पीसनी थी. तपती दोपहर में जब यह शॉट पूरा हुआ तो तब तक उनकी आंखों और हाथों में इतनी तेज जलन होने लगी थी कि डॉक्टर की मदद लेनी पड़ी. अवनीत कौर मुस्कराते हुए बताती हैं, ‘वह बहादुर लड़की है. कभी-कभी उसे नींद आ रही होती है और वह रोती है. क्योंकि उसका किरदार कुछ ऐसा है कि उसे रिश्तेदारों द्वारा सताया जाता है, इसलिए जब उसका मूड ऐसा होता है तो भी मैं शूटिंग के लिए कहती हूं ताकि सीन वास्तविक लगे.’

अशनूर का परिवार अब मलाड के अपने साधारण घर से मुंबई के पॉश इलाके मीरा रोड पर स्थित एक फ्लैट में शिफ्ट हो गया है. मुंबई जैसे शहर में जहां खुद का आशियाना एक बड़ा सपना हो, यह एक बड़ी उपलब्धि है. शायद इसलिए माता-पिता को भी ऐसे बच्चों के करियर के लिए अपने करियर की कुर्बानी नहीं खलती.

इन बच्चों में वह मासूमियत नहीं दिखती जो आमतौर पर इस उम्र के बच्चों में पाई जाती है. कम उम्र में ही बड़े हो गए इन बच्चों का बचपन आत्मकेंद्रित हो गया है

हालांक किसी रोल के लिए चुन लिया जाना सिर्फ आधा मैदान मारने जैसा है. इसके बाद भी बच्चों को काफी पापड़ बेलने पड़ते हैं.  गर्मियों की छुट्टियों में जहां उल्का के दोस्त मस्ती कर रहे थे वहीं उल्का हर सुबह वरसोवा बीच पर घुड़सवारी और तलवारबाजी का पांच घंटे लंबा कठिन प्रशिक्षण ले रही थी. वह बताती है, ‘मैं घंटों तक बिना खाए-पिए ट्रेनिंग लेती थी. शुरुआत में चैनल इस भूमिका के लिए किसी दूसरी लड़की को लेना चाहता था. उन्होंने उसे ट्रेनिंग देना भी शुरू कर दिया था. जब भी मैं घोड़े से गिरती ट्रेनर कहता कि पहले वाली ज्यादा अच्छी थी. यह सुनकर मैं फिर से घोड़े पर सवार हो जाती.’ इस ट्रेनिंग के बाद उच्चारण और संस्कृत श्लोक दोहराने का प्रशिक्षण शुरू होता. सीरियल में अपनी भूमिका खत्म होने तक उल्का ने सारे स्टंट खुद किए. इस दौरान वह चार बार घोड़े से गिरी.

जिस दूसरी लड़की का जिक्र उल्का ने किया उसका नाम आयशा कादस्कर है. आयशा को जब यह बताया गया कि अब यह रोल वह नहीं करेगी तो वह नर्वस ब्रेकडाउन का शिकार हो गई.  इस बारे में बात करने पर उल्का कहती है, ‘इंडस्ट्री में टिकना बड़ा मुश्किल है. मेरी बहन दो आडिशनों में रिजेक्ट हुई है. जब कोई टेक अच्छा नहीं हुआ और लोग चिल्लाए तो मैं भी सेट पर कई बार रोई. लेकिन मैंने और भी ज्यादा मेहनत की.’

इन बच्चों में वह मासूमियत नहीं दिखती जो आमतौर पर इस उम्र के बच्चों में पाई जाती है. कम उम्र में ही बड़े हो गये इन बच्चों के बारे में चिंताजनक बात यह भी है कि उनका बचपन आत्मकेंद्रित हो गया है. क्योंकि वे चौबीसों घंटे बहुत ही आकर्षक बच्चों की भूमिका निभा रहे हैं. फुलवा में जन्नत के पिता की भूमिका निभाने वाले सुशील बौंठियाल कहते हैं, ‘बच्चे सब समझते हैं? उन्हें पता है कि उनकी मासूमियत एक बिकाऊ माल है. चैनल उनके साथ दूसरे कलाकारों की तरह का ही बर्ताव करते हैं. उनसे उम्मीद की जाती है कि वे बाकी लोगों की तरह समय पर आएं और अपना काम पूरा करें. इसलिए स्वाभाविक ही है कि उनमें औरों से ज्यादा पैसा कमाने की होड़ पैदा हो जाती है.’ फुलवा की मां की भूमिका निभाने वाली अभिनेत्री नूपुर अलंकार कहती हैं, ‘इस तरह की इंडस्ट्री में मासूमियत की बलि चढ़ना तो लाजमी ही है. मैं अपने बच्चों से कभी अभिनय नहीं करवाऊंगी.’

सामाजिक संगठन और राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग इस बात पर जोर देते हैं कि बाल अभिनेताओं को स्कूल नहीं छोड़ना चाहिए. लेकिन इन बच्चों की जीवनशैली देखकर यह बहुत मुश्किल काम लगता है. जन्नत के पिता जुबेर भले ही यह दावा करते हैं कि उसे स्कूल के काम में कोई समस्या नहीं है लेकिन यूनिट के लोग दबी जबान में बताते हैं कि वह पिछले चार महीनों से वह स्कूल गई ही नहीं है. राहुल बहुत खुश होकर बताता है कि उसकी  टीचर होमवर्क न करने पर प्यार से उसके गाल खींचती हैं क्योंकि वे उसके सीरियल को पसंद करती हैं. झांसी की रानी की शूटिंग के समय जब उल्का को परीक्षा देनी थी तो वह सेट पर ही जागती थी. स्कूल ड्रेस पहनकर वह हवाई जहाज से जयपुर से मुंबई जाती, परीक्षा देती, एक घंटे सोती और फिर रात भर शूटिंग के लिए वापस जयपुर पहुंच जाती. माता-पिता बहुत गर्व से बताते हैं कि उनके बच्चे पढ़ाई पर कम ध्यान दे पाने के बावजूद पास हो गए. यह बताते हुए वे भूल जाते हैं कि ये बच्चे जिंदगी के उन पाठों से महरूम रह जाते हैं जो हमउम्रों के साथ सीखे जाते हैं.

उल्का से बात करते हुए लगातार यह एहसास बना रहता है कि आप किसी 20 साल की उम्र की लड़की के साथ हैं. बीच में कुछ जीवंतता के भी क्षण होते हैं, जब उसका भाई दौड़कर उसके बाल खींचने चला आता है, या जब उसकी छोटी बहन अपना रबर खोजते हुए उससे झगड़ा करने लगती है. लेकिन यह बात एकदम साफ दिखाई पड़ती है कि उसे नियमित आमदनी वाली अकेली सदस्य होने का एहसास है. उसने सीरियल में 4000 रु प्रतिदिन की फीस पर काम शुरू किया था, जो आगे चलकर 40,000 रु प्रतिदिन हो गई क्योंकि उसके पिता को मुख्य भूमिका निभाने की कीमत समझ में आ गयी थी. फ्लैशबैक सीक्वेंस के लिए उल्का अब भी कभी-कभी झांसी की रानी के सेट पर बुलाई जाती है. इसके अलावा मोटी फीस के एवज में वह अलग-अलग आयोजनों में झांसी की रानी के रूप में तलवार लेकर घोड़े पर बैठकर भी जाती है. जब एक म्यूजिक वीडियो में  रोमांटिक भूमिका के लिए उल्का 20000 रु. के ऑफर को ठुकरा देती है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह शर्मीली है, बल्कि उसे पता है कि यह अभी ठीक नहीं लगेगा. जब राहुल पेंडकलकर की मां उसे हैप्पी मील के लिए मैक्डोनाल्ड में ले जाती हैं, तो वह मुस्कुराता नहीं. वह वह उन लाइनों और भंगिमाओं को दोहराता है, जो उसने मैक्डाेनाल्ड के विज्ञापन में की थीं. जब जन्नत को एक मेकअप मैन सांत्वना देने की कोशिश करता है कि उसे अपने माथे पर लगे सिंदूर को होली का रंग भर समझना चाहिए और रोना नहीं चाहिए तो वह जवाब देती है, ‘मैं रो नहीं रही दादा, यह तो ग्लिसरीन की वजह से निकले आंसू हैं.’
इसमें कतई अजीब लगने वाली बात नहीं है कि अश्नूर हमारे चलने के पहले हमें अपना डांस दिखाना चाहती है. इसमें भी कतई आश्चर्य की बात नहीं कि वह नाचने के लिए शीला की जवानी वाला गाना चुनती है और अपने छोटे से शरीर के साथ कैटरीना कैफ की हर भाव-भंगिमा की ठीक-ठीक नकल करती है.

ये ऐसे बच्चे हैं जो जानते हैं कि उनके बचपन की बाजार में क्या कीमत है और उन्हें खुद को इस बाजार में कैसे पेश करना है. यह बड़ों के लिए भी बच्चों का खेल नहीं. l

ममता की छांव तले

वे इस दिन का पिछले 27 साल से इंतजार कर रही थीं. दिसंबर, 1984 में जब माकपा की सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली सीटों में से एक जाधवपुर में उन्होंने सोमनाथ चटर्जी को हराया तो यह ऐसा था मानो किसी बच्चे ने शेर का शिकार कर दिया हो. तब से ही ममता बनर्जी ने वाममोर्चा सरकार को उखाड़ फेंकने का सपना अपने मन में पाला हुआ था जो अब 27 साल बाद कहीं जाकर हकीकत में तब्दील हुआ है. ममता के इस उभार के पीछे की कहानी क्या है और उन्हें विरासत में किस तरह का बंगाल मिलने जा रहा है? और इस बंगाल के लिए उनके पास क्या योजनाएं हैं?

मुख्यमंत्री के बतौर ममता की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे किस हद तक बुद्घदेव के ही एजेंडे को लागू कर पाती हैं

ममता की जीत को सिंगूर और नंदीग्राम में जमीन अधिग्रहण के खिलाफ होने वाले प्रदर्शनों के परिणाम के रूप में देखना अधूरी तसवीर देखने सरीखा होगा. निश्चित रूप से सिंगूर और नंदीग्राम के प्रदर्शनों और उपजाऊ जमीन को टाटा मोटर्स को सौंपे जाने के खिलाफ ममता बनर्जी की भूख हड़ताल ने तृणमूल कांग्रेस में एक नया जोश और जज्बा पैदा किया. फिर भी अगर आज ममता जीत रही हैं तो इसमें दूसरी महत्वपूर्ण चीजों का भी योगदान है. ममता जनता की बदलाव की भावना या थोड़े बंगाली लहजे में कहें तो ‘पॉरिबॉर्तन’ की प्रतिनिधि बन गईं. पश्चिम बंगाल की जनता पिछले तीन दशकों के माकपा शासन की एकरसता और आत्ममुग्धता से ऊब चुकी थी. यह भी विडंबना ही है कि बदलाव की इस बयार की जड़ में कई मुद्दे ऐसे हैं जिन्हें ममता द्वारा खलनायक के रूप में पेश किए गए बुद्घदेव भट्टाचार्य ने ही सबसे पहले उठाया था. 2006 में बुद्घदेव भट्टाचार्य ने खुद को अपनी ही पार्टी की परंपरागत नीतियों के खिलाफ दिखाकर भारी जनादेश हासिल किया था. उन्होंने व्यापार के अनुकूल माहौल बनाने की बात की, नौजवानों की अपेक्षाओं और आकांक्षाओं को पूरा करने की बात की, कोलकाता के पुनर्निर्माण की बात कही जिसमें उदाहरण के तौर पर कई फ्लाईओवरों का निर्माण भी शामिल था. संक्षेप में कहें तो वे एक बदली हुई सहृदय और विनम्र स्वभाव वाली माकपा की बात कर रहे थे. यह माकपा की पश्चिम बंगाल के समाज के हर क्षेत्र में कठोरता के साथ हस्तक्षेप रखने-करने वाली उस पारंपरिक छवि के विपरीत था जो पार्टी ने दशकों के शासनकाल में खुद को दी थी. मगर सिंगूर के साथ ही यह स्पष्ट हो गया कि माकपा ऊपरी बदलाव से अधिक की इजाजत नहीं दे सकती. परिणामस्वरूप भट्टाचार्य को राइटर्स बिल्डिंग से एक ऐसे आदमी की तरह रुखसत होना पड़ रहा है जिसकी नीयत में कोई खोट नहीं था, जिसके विचार ठीक थे लेकिन जो उन्हें लागू करने की क्षमता नहीं रखता था. बहुत हद तक मुख्यमंत्री के बतौर ममता की सफलता इस बात पर ही निर्भर करेगी कि वे किस हद तक बुद्घदेव के एजेंडे को लागू कर पाती हैं.

लेकिन बंगाल ने इस तरह वोट क्यों किया? भविष्य को लेकर ममता की क्या योजनाएं हैं? यह समझने के लिए बंगाल को इसकी राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था के प्रिज्म से देखना पड़ेगा. ममता ने इनमें से पहले यानी राजनीति पर पकड़ बनाई, समाज को अपने वश में किया और तीसरी चीज यानी अर्थव्यवस्था उनका और बंगाल का भविष्य तय करने वाली है.

कोलकाता में रिजवानुर रहमान की मृत्यु ने तृणमूल के हाथ में मुस्लिम मतदाताओं को आकर्षित करने वाला एक महत्वपूर्ण मुद्दा भी दे दिया

पहले राजनीति की ही बात करते हैं. वाममोर्चा के गढ़ के ढहने की भविष्यवाणी एक प्रकार से 2009 के लोकसभा चुनावों के दौरान ही हो गई थी जब तृणमूल और कांग्रेस ने मिलकर 42 में से 26 लोकसभा सीटों पर जबर्दस्त जीत अर्जित की थी. पूरे खेल का रुख बदल देने वाले इस जनादेश के पहले और बाद में एक-एक कर समाज के तमाम हिस्से तृणमूल में शामिल होते चले गए. टूटने वाला पहला हिस्सा वामपंथी बुद्घिजीवी समुदाय था जो बुद्घदेव पर मार्क्सवादी विचारधारा से भटक जाने के आरोप लगा रहा था. इस बौद्घिक समुदाय की भूमिका को ठीक से समझने की जरूरत है, जिसे ममता बनर्जी का एक विज्ञापन पार्टी का ‘सांस्कृतिक प्रतीक’ कहता है. बंगाल से बाहर के लोगों को यह समझ में आना जरा मुश्किल है कि बंगाल के किसी भावी मुख्यमंत्री को नाटककारों और कवियों की एक पूरी फौज का साथ क्यों चाहिए और किसी पार्टी को अपने चुनाव घोषणापत्र में यह लिखने की जरूरत क्यों पड़ती है कि वह साहित्य, फिल्म, थिएटर, कविता, संगीत और चित्रकारी की महान बंगाली परंपरा को पुनर्जीवित करने के प्रयास करेगी. ये इतिहास के एक खास मोड़ पर बंगाली पुनर्जागरण के प्रमुख घटक रहे हैं और इनसे जुड़ाव ने बंगाली मध्यवर्ग में वर्षों से बनी तृणमूल कांग्रेस की सड़कछापों वाली छवि को तोड़कर उसे एक खास तरह का सम्मान दिलाया है.

इन तथाकथित सांस्कृतिक प्रतीकों से अपने को जोड़ने की ममता की आकांक्षा का आलम यह है कि उनकी पार्टी ने कोलकाता के मृतप्राय थिएटरों को सरकारी खर्चे पर पुनर्जीवित करने की घोषणा तक कर रखी है. दक्षिणी कोलकाता के कालीघाट में ममता के घर के पास के एक पुराने थिएटर का तृणमूल के कब्जे वाली नगर महापालिका ने अधिग्रहण कर लिया है और फिल्म अभिनेता स्वर्गीय उत्तम कुमार के नाम पर इसका नामकरण किया गया है. किस्सा यहीं खत्म नहीं होता. ममता ने बंगाल के कई सांस्कृतिक प्रतीकों को चुनाव में प्रत्याशी भी बनाया. माकपा प्रत्याशी और बंगाल के आवास मंत्री गौतम देव के खिलाफ प्रतिभाशाली नाटककार और अभिनेता ब्रत्य बसु को दमदम से प्रत्याशी बनाया गया. उनके सहयोगी उन्हें विचारधारात्मक रूप से ‘वामपंथियों के भी बायें’ और भविष्य में तृणमूल का सांस्कृतिक चेहरा मानते हैं. इन ‘सांस्कृतिक प्रतीकों’ को अपने साथ जोड़ने को लेकर ममता इतनी गंभीर हैं कि हो सकता है दो तिहाई बहुमत पाने के बाद जल्द ही वे पश्चिम बंगाल विधान परिषद को पुनर्जीवित करके अपने इस नये समर्थक वर्ग में से कइयों को इसमें नामित करना शुरू कर दें. सांस्कृतिक लोगों को अपने पक्ष में करना ममता के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण था कि यह एक तरह से ब्रांड बनाने की कवायद जैसा था. अब तक उनकी पार्टी दक्षिणी बंगाल के कस्बों और छोटे शहरों तक ही सीमित थी. इन इलाकों में पुराने औद्योगिक मजदूरों के परिवार, बेरोजगार नौजवान और वामपंथ की छत्रछाया से बाहर धकेल दिए गए लोग रहते हैं. ग्रामीण बंगाल में परिवर्तन की बड़ी प्यास तब जगी जब सिंगूर और नंदीग्राम में माकपा ने मुसलमानों के एक समुदाय को केमिकल फैक्टरी के लिए विस्थापित करने की कोशिश की.

1951 में कोलकाता में राज्य की 10.3 फीसदी आबादी रहती थी, लेकिन आज यह आंकड़ा घटकर 5 फीसदी पर पहुंच गया है

नंदीग्राम के साथ ही कोलकाता में रिजवानुर रहमान की मृत्यु भी एक बड़ा मुद्दा बनी. कथित तौर पर उसके विवाह से नाखुश हिंदू ससुर के कहने पर पुलिस ने रिजवानुर को इतना प्रताड़ित किया कि उसने आत्महत्या कर ली. इसने तृणमूल के हाथ में मुसलिम मतदाताओं को आकर्षित करने वाला एक महत्वपूर्ण मुद्दा दे दिया. परिणाम अब सबके सामने है. माकपा के एक नेता स्वीकार करते हैं, ‘दक्षिणी कोलकाता में, खास तौर पर कोलकाता और आसपास के जिलों में हम मुसलिम वोट पूरी तरह खो चुके हैं.’ बंगाल में चुनाव जीतने के लिए मुसलमान काफी नहीं हैं, लेकिन करीब 30 फीसदी आबादी के चलते चुनाव जीतने के लिए उनका साथ होना बेहद जरूरी है. दक्षिणी बंगाल से गुजरते हुए साफ दिखाई पड़ता है कि ममता बुद्घदेव भट्टाचार्य को खलनायक बनाने में सफल रही हैं, एक ऐसा खलनायक जिस पर मुसलमान भरोसा नहीं कर सकते. तृणमूल के एक पदाधिकारी कहते हैं कि ‘मुसलमानों को माकपा से कोई समस्या नहीं है, लेकिन उन्होंने बुद्घदेव के खिलाफ मत देने का निर्णय लिया है.’ स्थितियां 1990  के दशक की याद दिलाती हैं. बाबरी विध्वंस के बाद उत्तर भारतीय मुसलमान को कांग्रेस से उतनी समस्या नहीं थी, लेकिन पीवी नरसिंहराव के प्रति उनका अविश्वास चरम पर था. राव की हार के बाद मुसलमानों का विश्वास फिर से हासिल करने के लिए गांधी-नेहरू परिवार की दूसरी पीढ़ी को सामने आना पड़ा. चुनावों के बाद मुसलमानों के माकपा में आने का सिलसिला तभी शुरू हो सकता है जब वह बुद्घदेव को पार्टी नेता की जगह से हटा दे.

जैसे-जैसे वामपंथ में पराजयवाद घर कर रहा था, इसे मजबूती देने वाले खंभे एक के बाद एक ढहे जा रहे थेे. तृणमूल कांग्रेस के एक नेता बताते हैं कि कोलकाता के व्यापारी खास तौर पर मारवाड़ी समुदाय के लोग और कुछ पंजाबी और गुजराती भी कम्युनिस्टों की अपेक्षा ममता बनर्जी को अधिक उदारतापूर्वक चंदा दे रहे थे. ‘मेरी सीट पर मुझे अपने पोस्टर लगवाने के लिए स्थानीय पार्षदों को पैसा देना पड़ा, चाहे वे किसी भी पार्टी के हों. उन्होंने बहुत ऊंची कीमत मांगी लेकिन माकपा उन्हें वे कीमतें नहंी दे पाई.’ लंबे समय से माकपा के करीबी रहे कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर बताते हैं, ‘हमें खतरे का अंदाजा तभी हो गया जब हॉकर और ऑटोरिक्शा यूनियनें हमारे खिलाफ हो गईं. वे तृणमूल के साथ चले गए हैं.’

आखिर कोलकाता और आसपास के इलाकों में हॉकर और ऑटोरिक्शा यूनियनों का पाला बदलना इतना महत्वपूर्ण क्यों है? इस सवाल के जवाब के लिए हमें पिछले 34 वर्षों में परिश्रम से बने माकपा के गढ़ के बारे में कुछ बातें जाननी होंगी. पश्चिम बंगाल की अर्थव्यवस्था न तो साम्यवादी है और न ही बाजारवादी. इसे माकपाई अर्थव्यवस्था कहना ज्यादा उचित होगा. इसने कैसे काम किया?
ऐसे समझते हैं कि आठ ऑटो लाइन में खड़े हैं और एक जगह से दूसरी जगह नियमित तौर पर फेरी लगाते हैं. स्थानीय पार्टी पदाधिकारी एक नोटबुक में उनके फेरों का ब्योरा रखता है. उन्हें इन दो जगहों के बीच की दूरी तय करने में जितना समय लगता है, उतने ही समय में वापस आना होता है. यदि किसी ड्राइवर को किसी फेरे में ज्यादा समय लगता है, तो उसे इसकी सफाई देनी पड़ती है, उसे अपने रूट से इधर-उधर जाने और अतिरिक्त सवारियां बैठाने के लिए दंडित किया जाता है.

देश के 600 जिलों में से 18 पश्चिम बंगाल में हैं. जबकि इन 18 में से 14 देश के 100 सबसे गरीब जिलों में शामिल हैं

समतावाद की नीति भी अपनी जगह पर कायम है. यदि कोई ड्राइवर 25 साल का है और पूरी तरह स्वस्थ है और दूसरा 55 साल का है और जल्दी थक जाता है, तो नौजवान ड्राइवर इस बात का फायदा उठाते हुए अतिरिक्त फेरे लगाकर ज्यादा पैसा नहीं बना सकता. वह दूसरे ड्राइवरों जितने ही फेरे लगा सकता है और हर फेरे के खात्मे पर उसे लाइन के अंत में आकर लगना होता है. इस तरह पार्टी समानता के सिद्घांत को लागू करती है और मु्क्त प्रतियोगिता की पाश्विक वृत्तियों पर लगाम लगाती है. यही फार्मूला हॉकरों पर भी लागू होता है कि वे कैसे केवल उनके लिए तय घरों में ही अखबार पहुंचाएंगे, उनकी शारीरिक स्थिति चाहे जो हो.

पूर्व प्रोफेसर बताते हैं, ‘मैंने ऐसा रजिस्टर देखा है. इन्हें बड़ी मेहनत से व्यवस्थित किया जाता है. ड्राइवर या हॉकर को अपनी आय से एक हिस्सा पार्टी को सुरक्षा कोष के बतौर देना पड़ता है. बदले में पार्टी इनके बीच बराबरी का व्यवहार सुनिश्चित करती है. अगर कोई बीमार पड़ता है और कुछ दिन काम नहीं कर पाता तो सुरक्षा कोष में से पार्टी उसे कुछ पैसा भी देती है.’ आज ये पूरी तरह से तृणमूल के पाले में चले गए हैं. यूनियनें और व्यापार संगठन माकपा के वर्चस्व के आधार रहे हैं और स्थानीय स्तर पर संगठन को चलाने के लिए धन भी मुहैया कराते रहे हैं. ये मंझोले स्तर के नेताओं को ताकत भी देते हैं और एक प्रतिबद्ध वोट बैंक भी तैयार करते हैं. माकपा से जुड़े एक बुद्धिजीवी कहते हैं, ‘ये बहुत अच्छे और उपयोगी पार्टी ढांचे हैं. मुझे नहीं पता तृणमूल इनका क्या करेगी. अगर उनमें जरा भी समझदारी है तो वे इन्हें ऐसे ही बनाए रखेंगे.’

मगर इस छोटे-मोटे अर्थतंत्र के इतर अर्थव्यवस्था से जुड़े कुछ बड़े पहलू भी हैं. पश्चिम बंगाल एक समय भारत का औद्योगिक केंद्र था. 20वीं शताब्दी की शुरुआत में देश में सबसे पहला स्टील प्लांट और छोटे कल-कारखाने यहीं लगाए गए थे. जैसे-जैसे तकनीक का जोर बढ़ा, प्रदेश को इस औद्योगिक अर्थव्यवस्था के आगे ले जाए जाने की जरूरत थी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं और प्रदेश अन्य राज्यों से पिछड़ता चला गया. आईटी और बीपीओ बेंगलुरु और हैदराबाद में खुले. 1980 के दशक की शुरुआत में तकनीक और कंप्यूटरीकरण का विरोध और प्राइमरी स्कूलों से अंग्रेेजी हटा देना एक बेहद प्रतिगामी कदम रहा जिसने बंगाल की दो पीढ़ियों को अन्य राज्यों की तुलना में तमाम लाभों से वंचित कर दिया. मोटे तार पर यह ऐसी बात है जिसके लिए कोलकाता के लोगों ने माकपा और खास तौर पर 1977-2000 तक मुख्यमंत्री रहे ज्योति बसु को कभी माफ नहीं किया.

तृणमूल ने इसका इस्तेमाल वाम दलों पर निशाना साधने के लिए किया. पार्टी के घोषणा पत्र में कहा गया है, ‘1975-76 में राज्य की अर्थव्यवस्था में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी 19 फीसदी थी. 2008-09 में यह घटकर 7.4 फीसदी रह गई.’ इस दौरान गुजरात में यह आंकड़ा 19 फीसदी से बढ़कर 29.6 फीसदी पर पहुंच गया. ममता ने राज्य के औद्योगिक विकास को बाधित करने का दोष माकपा पर मढ़ा है.

सबसे बड़ी समस्या यह है कि बीते दशक में बंगाल ने अवसरों का लाभ नहीं उठाया. 1991 में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत हुई और इसके बाद तीन पंचवर्षीय योजनाएं बनीं. आठवीं योजना में राज्य का सकल घरेलू उत्पाद (एसडीपी) राष्ट्रीय औसत से कम रहा जबकि नौवीं योजना में यह राष्ट्रीय औसत से थोड़ा अधिक रहा. लेकिन दसवीं योजना में देश की जीडीपी जहां 7.7 फीसदी रही वहीं बंगाल की एसडीपी की दर उससे काफी कम 6.1 फीसदी थी. हालांकि, लक्ष्य 8.8 फीसदी रखा गया था. दसवीं योजना की अवधि में ही बंगाल में भट्टाचार्य की सरकार रही. इसलिए कहा जा सकता है कि उन्हें जो विरासत में मिला था उसका खामियाजा वे भुगत रहे थे. वैसे भी सियासत और कृषि के मामले में कहा जाता है कि फसल लगाने वाले से ज्यादा नाम उसका होता है जो फसल काटता है.

कोलकाता की स्थिति में गिरावट बंगाल की बदहाली को दिखाती है. 1951 में कोलकाता में राज्य की 10.3 फीसदी आबादी रहती थी, लेकिन आज यह आंकड़ा घटकर 5 फीसदी पर पहुंच गया है. किसी और राज्य की राजधानी की ऐसी बदहाली नहीं हुई है. हाल ही में परिसीमन के बाद कोलकाता में 11 विधानसभा सीटें हैं जबकि 2006 में सीटों की संख्या इसके करीब दोगुना 21 थी. इससे पता चलता है कि शेष बंगाल की तुलना में कोलकाता की आबादी घट रही है.

2009 में अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय और लवीश भंडारी ने पश्चिम बंगाल की स्थिति पर एक रिपोर्ट तैयार की थी. इस रिपोर्ट में कोलकाता बंदरगाह की बदहाली का अध्ययन किया गया था. कभी यह बंदरगाह भारत के वैश्विक कारोबार का मुख्य द्वार हुआ करता था. दसवीं योजना में इस बंदरगाह के लिए यह लक्ष्य तय किया गया था कि यहां से हर साल औसतन 2.14 करोड़ टन माल की आवाजाही होगी. 2002-03 में इस बंदरगाह से 72 लाख टन, 2006-07 में 1.26 करोड़ टन और 2009-10 में तकरीबन 1.3 करोड़ टन माल की ही आवाजाही हुई.

बराबरी की बात करने वाली पार्टी की सरकार द्वारा शासित राज्य का समाज भी उसके तीन दशक से ज्यादा के शासन के बाद भी बुनियादी स्तर पर समान नहीं है. अपनी सभाओं में ममता कहती हैं कि राज्य के महज 16 फीसदी अस्पताल ही सरकार द्वारा चलाए जा रहे हैं और इनमें से भी एक चौथाई ही ग्रामीण क्षेत्रों में हैं. जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में राज्य की 72 फीसदी आबादी रहती है. माकपा गांवों पर ध्यान देने की बात भले ही करती रही हो लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं और अन्य सामाजिक जरूरतों को पूरा करने में उसकी सरकार पूरी तरह से नाकाम रही.

पुरुलिया और बांकुड़ा जैसे दक्षिण बंगाल के जिले खास तौर पर पिछड़े हुए हैं. उत्तर दिनाजपुर राज्य का सबसे गरीब जिला है और इसकी प्रति व्यक्ति एसडीपी कोलकाता की एक तिहाई है. भारतीय सांख्यिकी संस्थान के एक अध्ययन के मुताबिक मुर्शिदाबाद के 56 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे रहते हैं. देश के 600 जिलों में से 18 बंगाल में हैं. जबकि इन 18 में से 14 देश के 100 सबसे गरीब जिलों में शामिल हैं.

सच्चाई तो यह है कि भट्टाचार्य ने बंगाल के ठहराव को समझ लिया था. 2006 में उन्होंने उन बदलावों की बात की थी जिन्हें ममता ने पांच साल बाद अपने परिवर्तन के वादों में शामिल किया. थोड़े समय के लिए बुद्धदेव की बातों का असर दिखा भी. टाटा मोटर्स निवेश के लिए तैयार भी हुई लेकिन कोलकाता के एक कारोबारी की मानें तो उसकी (टाटा मोटर्स) रजामंदी बेहद फायदे वाले जमीन समझौते के बाद हुई थी. इस कारोबारी के मुताबिक, ‘अगर बुद्धदेव टाटा को राजमार्ग से सटी बेहद मौके की जमीन नहीं देते, जिस पर उसके कर्मचारियों के लिए टाउनशिप बसाई जा सकती हो, तो वे निवेश के लिए तैयार नहीं होते. कोई नहीं आता. क्योंकि बंगाल पर कोई दांव लगाने को तैयार नहीं था.’

यहां के बिगड़े हालात का एक अन्य संकेतक है कोलकाता का लग्जरी होटल उद्योग. सालों तक यहां ओबरॉय ग्रैंड के अलावा कोई दूसरा पांचसितारा होटल नहीं था. 1980 के दशक में यहां ताज बंगाल खुला और 2000 के ठीक बाद सोनार और हयात की शुरुआत हुई. आईटीसी सोनार में 800 कमरे हैं और यह शहर का सबसे बड़ा होटल है. पर यह आईटीसी के मुंबई और बेंगलुरु के नये होटलों की तुलना में छोटा है. ओबरॉय में भी 300 कमरे हैं, लेकिन कारोबार की पर्याप्त संभावना नहीं होने की वजह से 100 बंद रहते हैं. ऐसा दिल्ली और मुंबई के किसी होटल में नहीं हो सकता. 2006 के चुनाव के दौरान हुई आर्थिक संभावनाओं की बारिश के चलते आईटीसी ने यहां 500 कमरे के एक दूसरे होटल की योजना बना डाली. जेडब्ल्यू मैरियट समूह भी यहां 800 कमरों का होटल बना रहा है. इन दोनों के कमरों को मिला दिया जाए तो ये कोलकाता के लग्जरी होटलों की क्षमता को दोगुना कर देंगे. पर क्या इनके लिए बाजार है? आईटीसी के एक अधिकारी बताते हैं, ‘योजनाएं इतनी आगे बढ़ गई हैं कि पीछे नहीं हटा जा सकता. 2006 में कारोबार में सुधार की उम्मीद थी. पर अब सावधानी बरती जा रही है. देखते हैं क्या होता है.’

अब सवाल यह है कि इन होटलों में जाता कौन है. मारवाड़ी समुदाय की शादियों का इन होटलों के कारोबार में बड़ा योगदान है. एक अन्य होटल अधिकारी बताते हैं, ‘बीपीओ में काम कर अच्छी कमाई करने वाले नौजवान यहां आते हैं. मध्य वर्ग के बुजुर्ग भी आते हैं. यह एक ऐसा वर्ग है जिसने कभी किसी पांचसितारा होटल में खाने को सोचा नहीं होगा लेकिन बंगाल से बाहर अच्छी कमाई कर रहे अपने बच्चों की आमदनी के बूते ये लोग पांचसितारा होटलों में आ रहे हैं.’

ममता को इस बात का एहसास है कि कारोबार की सेहत को दुरुस्त किए जाने की जरूरत है. लेकिन वे इसके लिए हर तरह की कोशिश नहीं कर सकतीं. उदाहरण के लिए, वे भट्टाचार्य की तरह जमीन अधिग्रहण की अनुमति नहीं दे सकतीं और संभव है कि सिंगूर के उन किसानों को 400 एकड़ जमीन भी वापस लौटा दें जो अपनी जमीन नहीं देना चाहते. तृणमूल के एक प्रवक्ता कहते हैं, ‘टाटा 600 एकड़ गैरविवादित जमीन पर कारखाना लगा सकते हैं.’ ममता लघु एवं मझोले उद्योग के साथ-साथ हस्तशिल्प और परिधान तैयार करने वालों को प्रोत्साहन देने की बात भी करती हैं. पर यह एक हद तक ही मदद कर पाएगा. माना जा रहा है कि बड़े उद्योग राज्य में जल्दबाजी में नहीं आएंगे. इसकी वजह तृणमूल नहीं बल्कि बंगाल का औद्योगिक नक्शे से हटना है. तृणमूल के एक सूत्र बताते हैं, ‘संभव है कि दीदी वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय अपने पास ही रखें और वित्त मंत्रालय अमित मित्रा को सौंप दें.’ ममता निवेश के मोर्चे पर भी सांकेतिक जीत चाहती हैं. कहा जा रहा है कि शुरुआती छह महीने में ही इंफोसिस या विप्रो में से कोई बंगाल में बड़ा निवेश करने वाला है. इसके लिए बुनियादी ढांचा तैयार है. कोलकाता हवाई अड्डे से सटे राजरहाट में भट्टाचार्य ने एक नया शहर बसाया है. यहां बहुमंजिली इमारतें और चौड़ी सड़कें हैं और  इसे कोलकाता का गुड़गांव भी कहा जा रहा है.

एक तरफ तो ममता माकपा की राजरहाट परियोजना को बदनाम करना चाहती हैं और दूसरी तरफ विकसित बुनियादी ढांचे का इस्तेमाल भी करना चाहती हैं. उन्होंने ‘राजरहाट घोटाले’ और माकपा समर्थित बिल्डरों और कारोबारियों को सस्ती दरों पर जमीन दिए जाने के मामलों की जांच कराने का वादा भी किया है. तृणमूल के एक नेता बताते हैं कि चुनाव तिथियों की घोषणा के एक दिन पहले ही 600 भूखंड आवंटित कर दिए गए और उनकी नेता पश्चिम बंगाल हाउसिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड और उसके प्रभारी मंत्री गौतम देब को निशाना बना रही हैं. कॉरपोरेशन ने ही राजरहाट परियोजना के लिए जमीन दी है.
हो सकता है कि आने वाले वक्त में राजरहाट को कुछ बुरा समय देखना पड़े लेकिन कोलकाता और इससे सटे दो जिले उत्तर और दक्षिण 24 परगना ममता के लिए काफी अहमियत रखते हैं. ये मिलकर दक्षिण बंगाल में तृणमूल का गढ़ बनाते है. इन जिलों में कुल 75 सीटें हैं जिनमें से करीब 90 फीसदी तृणमूल ने जीती हैं. बतौर रेल मंत्री ममता ने पश्चिम बंगाल के लिए 19 परियोजनाएं शुरू कीं जिनमें से आधी इन तीन जिलों में ही हैं. इन परियोजनाओं के जरिए छोटे शहरों और इन जिलों में रहने वाले कामकाजी लोगों की आवाजाही को सुविधाजनक बनाने की योजना है. इसमें मेट्रो रेल का विस्तार भी शामिल है. ममता को उम्मीद है कि इससे आर्थिक गतिविधियों में तेजी आएगी.

ऐसा लग रहा है कि ममता उन लोगों की अगुआई करने जा रही हैं जिनका खुद पर से भरोसा उठ गया है. भले ही राज्य के बाहर बंगाल के लोगों ने कामयाबी के झंडे गाड़े हों लेकिन राज्य के अंदर उनके मन में एक हारे हुए समाज का भाव है. ममता के एक सहयोगी कहते हैं कि बंगाल में मनोवैज्ञानिक तौर पर आत्मविश्वास बढ़ाने के उपाय किए जाने की जरूरत है. अभी यहां के लोग बेहतर अवसर की तलाश में राज्य से बाहर जा रहे हैं. राज्य में इतने अवसर विकसित करने होंगे कि युवा वर्ग यहां वापस आने की बात सोचे.

गौरवशाली अतीत वाला बंगाल अपने वर्तमान से तालमेल नहीं बैठा पा रहा है जिसके चलते यहां 70 के दशक में एक रक्षात्मक स्थानीय पहचान विकसित हुई. इसे माकपा ने जमकर बढ़ावा दिया. इसके फलस्वरूप यह राज्य खुद को अन्य राज्यों से बेहतर समझता रहा है. इस बात की पुष्टि यहां के स्कूलों के अध्ययन से हो सकती है. राज्य के ज्यादातर स्कूल पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड से संबद्ध हैं. यह बोर्ड और इसके तहत चलने वाली समूची स्कूली शिक्षा व्यवस्था वामपंथी दलों के सियासी प्रभाव का स्रोत रही हैं.

माकपा ने बंगाल में शिक्षा को चार मंत्रालयों में बांटा और स्कूली शिक्षा के लिए एक अलग मंत्री बनाया. राज्य बोर्ड से पढ़ाई करने वाले छात्रों को यहां के कॉलेजों में वरीयता दी जाती है. कुछ इस तरह की सोच विकसित कर दी गई है कि राज्य बोर्ड से पढ़ाई करने वाले बच्चे ज्यादा क्षमतावान होते हैं. बंगाल के मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिले के लिए आयोजित प्रवेश परीक्षा में भी बंगाल बोर्ड के छात्रों को परोक्ष तौर पर फायदा मिलता हैैै. इनकी परीक्षा राज्य बोर्ड के सिलेबस के मुताबिक ही आयोजित की जाती है. मगर इस साल कोलकाता के एक प्रमुख स्कूल साउथ प्वाइंट के फैसले ने सभी को चौंका दिया. यह राज्य बोर्ड के सबसे प्रमुख स्कूलों में था. कई पालियों में चलने वाले इस स्कूल में तकरीबन 15,000 छात्र पढ़ते हैं. इस स्कूल ने कई टॉपर दिए हैं और मध्यवर्ग का यह पसंदीदा स्कूल रहा है. इस स्कूल ने यह घोषणा की कि इस साल से वह अपने विद्यार्थियों को सीबीएसई बोर्ड से पढ़ाई करने का विकल्प दे रहा है. एक अभिभावक कहते हैं, ‘अगर आप राज्य के इंजीनियरिंग कॉलेजों के लिए आवेदन करना चाहते हैं तब तो राज्य बोर्ड ठीक है लेकिन अगर राज्य से बाहर के कॉलेजों में दाखिला चाहिए तो सीबीएसई पाठ्यक्रम की जानकारी जरूरी है.’

यहां के दूसरे स्कूल भी साउथ प्वाइंट की राह चल सकते हैं जैसा कि यहां अकसर होता रहा है. इस स्कूल के अभिभावकों का दबाव और मांग आंखें खोलने वाले हैं. पश्चिम बंगाल, इसके संस्थानों और इनमें रोजगार के अवसरों को लेकर भरोसा लगातार कम होता रहा है. अभिभावक चाहते हैं कि स्कूली शिक्षा ऐसी हो जो उनके बच्चों को राज्य से बाहर निकलने में मदद कर सके. बुनियादी स्तर पर यह चुनाव यथास्थितिवाद के खिलाफ है. करीब साढ़े तीन दशक में बनी स्थितियों को बदलना ही ममता की सबसे बड़ी चुनौती होगी. 

ब्रेकिंग न्यूज : ऑपरेशन ओसामा

operation_enduring_freedom_osama_bin_laden[1]अमेरिका की ‘राष्ट्रीय उपलब्धि’ पर हमारे चैनलों का उन्मादी राष्ट्रवाद भी जोर मार रहा है

न्यूज चैनलों का ब्रेकिंग न्यूज प्रेम जगजाहिर है. इस प्रेम का आलम यह है कि चैनलों पर हर दस मिनट (कई चैनलों पर हर पांच, कुछ पर हर एक-दो मिनट) में एक बार ब्रेकिंग न्यूज की पट्टी चलने का एक अघोषित नियम-सा बन गया है. वहां अब वह हर खबर ब्रेकिंग न्यूज है जो चैनल पर पहली बार चलती है.

लेकिन अकसर यह देखा गया है कि जब असल में ब्रेकिंग न्यूज आती है तो वे तैयार नहीं होते हैं. उस समय उनकी हड़बड़ी और गड़बडि़यां देखने लायक होती हैं. उनमें जोश तो बहुत होता है लेकिन होश नहीं रहता. आश्चर्य नहीं कि जब अल कायदा नेता ओसामा बिन लादेन की अमेरिकी कमांडो ऑपरेशन में मारे जाने की ब्रेकिंग न्यूज आई तो हिंदी और अंग्रेजी के देसी चैनल जोश में बावले हो गए. हालांकि उनके पास दिखाने को अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की घोषणा और लादेन की कुछ फाइल फुटेज के अलावा और कुछ खास नहीं था.

उत्साह में कई चैनलों ने मृत ओसामा की (फर्जी) तसवीर भी दिखानी शुरू कर दी, यह चेतावनी देते हुए कि ‘ये तसवीरें आपको विचलित कर सकती हैं’

लेकिन इससे हमारे कल्पनाशील न्यूज चैनलों को कहां फर्क पड़ता है? एयर टाइम भरने के लिए ‘खबर’ को फैलाने और तानने की उनकी क्षमता असंदिग्ध है. जाहिर है कि लादेन के मारे जाने की खबर के मामले में भी उन्होंने सूचनाओं, तथ्यों और ताजा फुटेज की कमी की भरपाई अपनी कल्पनाशीलता, कच्ची-पक्की कहानियों, ओसामा के पुराने फाइल फुटेज और स्टूडियो में एंकर और न्यूज रूम में रिपोर्टर की सांस फुलाने वाली उत्साह और उत्तेजना से भरी कमेंट्री के साथ की. उत्साह और उत्तेजना का आलम यह था कि एंकर-रिपोर्टर ओबामा को ओसामा और ओसामा को ओबामा बनाने से नहीं चूके. कारण, चैनलों में हमेशा की तरह एक-दूसरे से आगे रहने की होड़ लगी हुई थी. इसी हड़बड़ी और उत्साह में कई चैनलों ने मृत ओसामा की (फर्जी) तसवीर भी दिखानी शुरू कर दी, यह चेतावनी देते हुए कि ‘ये तसवीरें आपको विचलित कर सकती हैं.’ कहना मुश्किल है कि चैनलों के संपादकों को इस तसवीर ने विचलित किया या नहीं. लेकिन इस ‘तसवीर’ की सच्चाई यह थी कि यह इंटरनेट पर 2009 से मौजूद थी और हुआ यह होगा कि चैनलों के उत्साही रिसर्चरों ने जैसे ही गूगल के इमेज सर्च में यह तसवीर देखी होगी, बिना जांच-पड़ताल के लपक लिया होगा.
चलिए मान लिया कि ‘बड़ी-बड़ी खबरों के साथ-साथ छोटी-छोटी गलतियां’ होती रहती हैं. लेकिन यहां तो पूरी कहानी ही फिल्मी थी. हालांकि इसमें अपने देसी चैनलों की गलती (अगर मानें तो) सिर्फ इतनी थी कि वे इस अमेरिकी फिल्मी कहानी को बिना सोचे-समझे ज्यों का त्यों रिले कर रहे थे. अमेरिका ने ओसामा के मारे जाने की जो कहानी गढ़ी उसमें शुरू से इतने झोल थे कि खुद उसे कई बार कहानी बदलनी पड़ी.

imagesCAVQZ0ACनतीजा, कमांडो ऑपरेशन के एक सप्ताह बाद भी हर दिन अमेरिकी प्रशासन से कभी ऑन द रिकॉर्ड और कभी ऑफ द रिकॉर्ड आधी सच्ची-आधी झूठी खबरें प्लांट की जा रही हैं. अमेरिकी मीडिया इसे एक धारावाहिक सीरियल की तरह से छाप और दिखा रहा है. देसी चैनल भी पूरी स्वामिभक्ति के साथ इस जूठन को परोसने में जुटे हुए हैं. इस तरह हर दिन परस्पर विरोधी खबरें एक नये एंगल, कुछ नये मिर्च-मसाले के साथ बतौर ‘एक्सक्लूसिव’ छापी और दिखाई जा रही हैं. रही-सही कसर अपने देसी न्यूज चैनलों के अत्यंत सृजनशील आउटपुट डेस्क पर पूरी हो जाती है जो तिल का ताड़ और राई का पहाड़ बनाने के उस्ताद हैं.  इस तरह चैनलों पर ऑपरेशन ओसामा के नाम पर अभी भी उल्टी-पुल्टी ‘खबरें’ जारी हैं. लगता है कि चैनल खुद भी यह नहीं देखते कि उन्होंने कल क्या दिखाया था.

कहने की जरूरत नहीं है कि एबटाबाद ऑपरेशन के बारे में ऐसा बहुत कुछ है जिसे अमेरिका और पाकिस्तान दोनों छिपा रहे हैं. संभव है कि कुछ महीनों या सालों (जैसे ओबामा के दोबारा चुनाव) के बाद विकीलिक्स की कृपा से सच्चाई सामने आए क्योंकि अभी तो अमेरिकी मीडिया ओसामा के मारे जाने की ‘राष्ट्रीय उपलब्धि’ से उछल रहा है और भारतीय चैनल भी ‘अमेरिकी बहादुरी’ से पूरी तरह से अभिभूत हैं. नतीजा, देशी चैनलों का राष्ट्रवाद भी जोर मार रहा है और हमेशा की तरह बहस शुरू हो गई है कि हम भी पाकिस्तान के अंदर घुसकर ऐसी ही कमांडो कार्रवाई क्यों नहीं करते.

चैनलों पर एंकरों के नथुने फड़क रहे हैं, सुरक्षा विशेषज्ञ, डिप्लोमैट और सेना के पूर्व जनरल ललकार रहे हैं और राजनेता चेतावनियां दे रहे हैं. लेकिन कोई नहीं बता रहा कि ऐसी कार्रवाई के क्या नतीजे हो सकते हैं. ऐसे मौकों पर अगर किसी ने तर्क और विवेकपूर्ण बात कहने की कोशिश की तो स्टार एंकरों की खिसियाहट, चिढ़ और गुस्सा देखते ही बनता है. किसी ने ठीक ही कहा है कि ‘युद्ध इतना गंभीर मामला है कि इसे जनरलों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता.’ अब इसमें यह जोड़ लेना चाहिए कि खबरें इतना गंभीर मुद्दा हैं कि उन्हें न्यूज चैनलों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता.

बेबसी, हताशा और उम्मीद

राजनीति और व्यवस्थापिका से नाउम्मीदी और न्यायपालिका की बेबसी के चलते ही आज उत्तर प्रदेश में यह स्थिति आ गई है कि लोग हजारे का हथियार आजमाने के लिए बेताब हो उठे है

उत्तर प्रदेश के राजनेता प्रायः बड़े अधिकार से यह दावा करते रहते हैं कि दिल्ली की गद्दी का रास्ता यूपी से ही होकर जाता है. इस दावे में दम भी दिखता है. लेकिन इन दिनों उत्तर प्रदेश के नौजवान, बच्चे और बुजुर्ग, किसान, मजदूर और बुद्धिजीवी, सब लोग इसी तर्ज पर एक दूसरी बात कहने लगे हैं कि उत्तर प्रदेश को भ्रष्टाचार मुक्त कराए बिना देश से भ्रष्टाचार मिटाने की कल्पना करना भी बेकार है. आम लोगों के मन में भ्रष्टाचार से नफरत और तौबा करने की जो हल्की-सी चिंगारी अब तक दबी हुई थी वह अन्ना हजारे के अभियान के प्रभाव में एकाएक भड़ककर शोला बन चुकी है. अन्ना के दिल्ली धरने के दौरान लखनऊ में जीपीओ पर बापू की प्रतिमा के सामने जिस तरह लखनऊ के समाज के हर तरह के हजारों लोग स्वतः स्फूर्त ढंग से आ जुटे थे, वह इसका एक छोटा-सा प्रमाण है. ऐसा लखनऊ ही नहीं, राज्य के हर छोटे-बड़े जिले में हुआ था.

दरअसल आज उत्तर प्रदेश को भी अपने लिए एक अन्ना की बेहद जरूरत है. हाल के दिनों मंे राष्ट्रीय स्तर पर जिस तरह बड़े-बड़े घोटालों की कहानियां सामने आ रही हैं, उसकी वजह से उत्तर प्रदेश के मामले दब-से गए हैं. जबकि यहां हो रहे घोटाले तथा भ्रष्टाचार राष्ट्रीय स्तर के घोटालों से कहीं भी उन्नीस नहीं हैं. समाज विज्ञानी राजेश कुमार कहते हैं, ‘उत्तर प्रदेश में राजकाज में इस समय अभूतपूर्व पारदर्शिता है. हर काम के रेट तय हैं. हर जगह लेने वाले तैयार बैठे हैं. संबद्ध लोगों तक उनसे हिस्से की रकम पहले पहुंच जानी चाहिए. उसके बाद कोई काम हो या न हो, इससे किसी को मतलब नहीं. इस तरह के धंधे में किसी का कोई अंकुश नहीं, किसी का कोई डर नहीं, यह एकदम खुला खेल है.’ चाहे दवाओं की खरीद के मामले हों या शिक्षा विभाग से जुड़े विषयों का, चाहे भूमि अधिग्रहण के मामले हों या खनन विभाग के, चाहे पर्यावरण-प्रदूषण नियंत्रण जैसे मामले हों या राशन खरीद आदि के, हर तरफ अंधेर है. यूपीएसआईडीसी के एक मुख्य अभियंता करोड़ों रु की हेराफेरी के मामले में सीबीआई की गिरफ्त में हैं. एक प्रमुख सचिव पद के अधिकारी को हसन अली से जुड़ाव के आरोप में कुर्सी छोड़नी पड़ी है. कई अधिकारियों पर खाद्यान्न घोटाले की गाज गिरनी तय है. आय से अधिक संपत्ति के एक दर्जन से ज्यादा मामले विचाराधीन हैं. भ्रष्टाचार के मामलों में कई अधिकारी निलंबित हैं. 50 से ज्यादा अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों में मुकदमा चलाने की अनुमति विचाराधीन है. सचिवालय के गलियारों में चर्चा आम है कि अगर विकीलीक्स ने काले धन वाले भारतीयों के नामों का खुलासा कर दिया तो उसमें यूपी के अधिकारियों की संख्या सबसे अधिक होगी.

इस चलन से जहां विकास कार्य और जनहित की योजनाएं ध्वस्त हो रही हैं, वहीं भ्रष्टाचार की बेल एकदम निचले स्तर तक फैल गई है

उत्तर प्रदेश के हालात इतने खराब पहले कभी नहीं रहे. स्थितियां तो पिछले कई वर्षों से बिगड़ रही थीं, मगर अब वे इतनी बिगड़ चुकी हैं कि वर्तमान परिस्थितियों में उनमें सुधार की कोई संभावना ही नजर नहीं आ रही. हालांकि देश में इस वक्त सत्तारूढ़ कांग्रेस ही भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी प्रतीक बनी दिख रही है, लेकिन उत्तर प्रदेश की विडंबना यह है कि यहां सत्ता से कांग्रेस की विदाई के बाद ही भ्रष्टाचार का घुन पनपा और फला-फूला है. गैरकांग्रेसी सरकारों के आने के साथ-साथ राज्य में नौकरशाही प्रभावशाली होती गई, भ्रष्टाचार बढ़ता गया और अब बसपा ने इसी प्रभावशाली नौकरशाही को पालतू बनाकर भ्रष्टाचार को संस्थागत रूप दे दिया है. आज सरकार में वही अधिकारी प्रभावशाली है जो कमाकर दे सकता है और कमाने के नये-नये रास्ते सुझा सकता है. राज्य में निर्माण कार्यों से जुडे़ सबसे बड़े विभाग लोक निर्माण विभाग के सर्वेसर्वा जो अधिकारी हैं वे सवा साल पहले रिटायर हो चुके हैं. मगर सरकार को उनकी योग्यता पर इतना भरोसा है कि उन्हें  लोक निर्माण के साथ-साथ सेतु निर्माण निगम का भी प्रबंध निदेशक बना दिया गया है. इसी तरह राजकीय निर्माण निगम में भी प्रबंध निदेशक के पद पर सेवा विस्तार वाले ही भरोसेमंद अधिकारी नियुक्त हैं. प्रायः सभी मोटी कमाई वाले विभागों में ऐसे ही ‘कर्मठ’ अधिकारी तैनात हैं. 

उत्तर प्रदेश में इस समय सरकारी धन की खुली लूट मची है. चाहे राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन हो या मनरेगा या फिर कोई भी अन्य योजना, हर जगह सरकारी पैसा सिर्फ लूटा जा रहा है. सामाजिक संस्था ‘सोशल वॉच’ से जुड़े डा एएन सिंह कहते हैं, ‘हर काम में 30 फीसदी तो पहले ही यह कहकर अग्रिम रखवा लिया जाता है कि यह ‘ऊपर’ का हिस्सा है. शेष 70 फीसदी में 40 से 60 फीसदी तक दलालों, अधिकारियों और ठेकेदारों तथा नेताओं की जेबों में चला जाता है. अगर इस सबकी सही जांच हो तो एक-एक जिले में कई-कई कलमाड़ी नजर आएंगे.’ भ्रष्टाचार के घुन ने एकदम निचले स्तर तक पैठ बना ली है. गांवों में ग्राम प्रधानों के चुनावों में जिस तरह लोगों ने लाखों रु फूंक डाले थे, खेत, घर और जेवर तक गिरवी रखकर चुनाव लड़ा था, वह महज इसीलिए था कि एक बार पद हाथ आ जाए तो फिर चांदी की ही फसल कटनी है. समाज विज्ञानी इसे दोहरे संकट के तौर पर देखते हैं. उनके मुताबिक इससे जहां विकास कार्य और जनहित की योजनाएं ध्वस्त हो रही हैं, वहीं इसके कारण भ्रष्टाचार की बेल एकदम निचले स्तर तक फैल गई है. ग्राम पंचायत स्तर तक भ्रष्ट नेताओं और दबंगों का ऐसा गठजोड़ बन गया है कि उसमें किसी तरह के प्रतिरोध की गुंजाइश ही नहीं बचती. इससे ग्रामीण स्तर पर तनाव और सामाजिक ताने-बाने में गड़बड़ियां भी शुरू हो गई हैं.

वैसे भी अब राजनीतिक दलों के बूते भ्रष्टाचार से लड़ाई लड़ पाना उत्तर प्रदेश के लोगों को संभव नहीं लगता. इसकी कई वजहें हैं. एक तो यह कि राज्य के अनेक प्रमुख नेताओं का चरित्र भ्रष्टाचार के सवाल पर जनता को विश्वसनीय नहीं दिखता. आय से  अधिक संपत्ति के मामले में चाहे मायावती हों या मुलायम, दोनों के लिफाफे अदालतों में मौजूद हैं

ऐसे में अन्ना का मिशन उत्तर प्रदेश को भी उम्मीदों के नये सवेरे की तरह दिखाई दे रहा है. हालत यह है कि उत्तर प्रदेश के दो बड़े राजनीतिक दल समाजवादी पार्टी और कांग्रेस तो अन्ना को उत्तर प्रदेश आकर भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन छेड़ने का निमंत्रण तक दे चुके हैं. हालांकि कांग्रेस का रवैया अन्ना प्रकरण में कुछ अजीबोगरीब रहा है. कांग्रेस एक ओर तो उत्तर प्रदेश के लिए अन्ना के अभियान की जरूरत पर जोर देती रही है मगर दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के अश्वमेध यज्ञ का बीड़ा उठाए दिग्विजय सिंह टीम अन्ना पर लगातार हमले करते रहे हैं. हालांकि इसके पीछे दिग्गी राजा का मकसद कुछ राजनीतिक लाभ उठाने और जातीय राजनीति का नया समीकरण बनाने का ही रहा होगा, लेकिन भ्रष्टाचार से त्रस्त प्रदेश के लोगों को भी यह हरकत नागवार ही गुजरी और इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में कांग्रेसी रुकावट के तौर पर देखा गया. अब राहुल गांधी लखनऊ में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) के कार्यालय पहुंचकर और सूचना के अधिकार के तहत प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी की मार्फत कई सूचनाएं मांगकर प्रदेश सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ खुली लड़ाई छेड़ते हुए दिग्गी राजा की गलती को सुधारने की कोशिश कर रहे हैं. गौरतलब है कि यह वही महकमा है जिसमें भ्रष्टाचार की आंधी के चलते चार महीने में दो-दो अधिकारियों की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई. फिलहाल इस विभाग के कुछ कर्मचारी और अधिकारी जेल में हैं और इससे जुड़े दो-दो प्रभावशाली मंत्रियों बाबू सिंह कुशवाहा और अनंत कुमार मिश्र ‘अंतू’- को अपनी-अपनी कुर्सियों से बेदखल होना पड़ा है. इस महकमे में चल रही लूट के कारण इस विभाग से जुड़े मंत्रियों से लेकर चपरासियों तक सबके सब कुंभ नहा रहे हैं और सीएमओ जैसे पद किसी नोट छापने की मशीन की तरह उत्पादक हो गए हैं. तीन हजार करोड़ की सालाना रकम में किसके हिस्से कितना जाता है, यह किसी से भी छिपा नहीं है. 
2005 से शुरू हुई जवाहरलाल नेहरू नेशनल अर्बन रिन्युअल मिशन या जेएनएनयूआरएम में दस हजार करोड़ की रकम फूंकी जा रही है. इस योजना के तहत शहरों का पुनरुद्घार तो नहीं हो पा रहा, जो कुछ पहले से मौजूद था उसका भी बंटाधार हो चुका है. राज्य के तमाम नगरों में चल रही ऐसी 222 योजनाओं के कारण हर ओर सड़कें खुदी पड़ी हैं, धूल का गुबार है, दुर्घटनाएं हो रही हैं, लोग बीमार हो रहे हैं, मगर काम है कि पूरा होता ही नहीं. कार्य की गुणवत्ता का स्तर इतना घटिया है कि बिना आंख वाले लोग भी खामियां साफ-साफ देख सकते हैं. लेकिन मामला चूंकि ‘मोटे माल’ का है इसलिए सरकार को कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा. महात्मा गांधी के नाम पर शुरू मनरेगा तो पूरी तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी है. हालात इतने खराब हैं कि अभी हाल में हुई एक समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री मायावती को भी अपने मातहतों से मनरेगा की धांधलियों पर नजर रखने के निर्देश देने पड़े हैं. कभी अपने सहयोग से मायावती को मुख्यमंत्री बनवाने वाली भारतीय जनता पार्टी को भी अब राज्य में सबसे बड़ी समस्या भ्रष्टाचार की ही दिख रही है. पार्टी ने मायावती के राज के 100 बड़े घोटालों का खुलासा करने के लिए एक खास पुस्तिका भी तैयार की है. पार्टी विधानसभा चुनावों से पहले इस मामले को मुख्य मुद्दा बनाकर लड़ाई लड़ने की योजना बना रही है. इससे भले ही उसे थोड़ा-बहुत राजनीतिक लाभ हासिल हो जाए मगर इससे राज्य में व्याप्त भ्रष्टाचार खत्म होने की संभावना कहीं नहीं दिखती.

वैसे भी अब राजनीतिक दलों के बूते भ्रष्टाचार से लड़ाई लड़ पाना उत्तर प्रदेश के लोगों को संभव नहीं लगता. इसकी कई वजहें हैं. एक तो यह कि राज्य के अनेक प्रमुख नेताओं का चरित्र भ्रष्टाचार के सवाल पर जनता को विश्वसनीय नहीं दिखता. आय से  अधिक संपत्ति के मामले में चाहे मायावती हों या मुलायम, दोनों के लिफाफे अदालतों में मौजूद हैं. कांग्रेस की स्थिति भी विश्वसनीय नहीं है. फिर लोगों ने यह भी देखा है कि अनेक भ्रष्ट नेता पिछली हर सरकार से किसी न किसी रूप से जुड़े रहे हैं. सत्ता बदलते ही उनकी राजनीतिक निष्ठाएं बदल जाती हैं और उनका राजनीतिक धंधा चलता रहता है. लगातार बढ़ रहे चुनावी खर्च के कारण भी भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति की उम्मीदें कम होती जा रही हैं.

दूसरा रास्ता लोकतांत्रिक व्यवस्था और संस्थाओं की ओर जाता है. राज्य मंे भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकायुक्त और सतर्कता अधिष्ठान जैसी संस्थाएं मौजूद हैं. लेकिन भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था ने इन संस्थाओं को नपुंसक बना दिया है. उत्तर प्रदेश में लोकायुक्त न तो मुख्यमंत्री के खिलाफ सुनवाई कर सकते हैं और न ही ग्राम प्रधानों के खिलाफ. जिन लोगांे के खिलाफ लोक आयुक्त जांच कर सकते हैं उनके खिलाफ भी कार्रवाई के लिए वे सिर्फ राज्य सरकार से अनुरोध कर सकते हैं. कार्रवाई कितनी होती है इसका प्रमाण यह है कि मौजूदा सरकार के नौ मंत्रियों के खिलाफ की गई कार्रवाई की सिफारिश में से सिर्फ एक मामले में कार्रवाई हुई. ऐसा ही हाल सतर्कता अधिष्ठान का भी है जो अधिकारियों की आर्थिक अनियमितताओं, भ्रष्टाचार और धांधली के मामलों मंे गृह विभाग के निर्देश पर जांच शुरू करता है. जांच पूरी होने पर शासन यह फैसला करता है कि मुकदमा चलाने की इजाजत दी जाए या नहीं. लेकिन बड़े अधिकारियों के मामलों में प्रायः मुकदमे की इजाजत मिलती ही नहीं. कुछ ऐसी ही स्थिति राज्य मंे सूचना के अधिकार की भी है. भ्रष्ट और दबंगों के गठजोड़ के कारण आम आदमी को सूचना के अधिकार के तहत सूचनाएं प्राप्त करने के लिए भी हजारों तरह के पापड़ बेलने पड़ते है.

इसके बाद न्यायपालिका से उम्मीद बचती है. लेकिन बड़े लोगों और खास अधिकारियों को बचाने के लिए उनके मामलों में तो अदालती आदेशों की भी अनदेखी या उपेक्षा करके धांधली जारी रखी जाती है. लखनऊ मंे मायावती के निर्माण कार्यों में अनेक बार अदालती रोक के बावजूद काम बंद नहीं किया गया और आदेशों की अनदेखी करके भी मनमर्जी काम करवा लिया गया.न्यायपालिका बेबस बनकर देखती रह गई. राजनीति और व्यवस्थापिका से नाउम्मीदी और न्यायपालिका की बेबसी के चलते ही आज राज्य में यह स्थिति आ गई है कि लोग अन्ना हजारे के हथियार को आजमाने के लिए बेताब हो उठे हैं. यही वजह है कि उत्तर प्रदेश सरकार हजारे को उत्तर प्रदेश मंे घुसने ही नहीं देना चाह रही है. उनकी राह में नयी-नयी बाधाएं खड़ी की जा रही हैं. लेकिन इस तरह की बाधाओं से अब बदलाव की बयार को रोकना मुमकिन नहीं हैं. प्रदेश में भ्रष्टाचार के प्रतिकार का जो तूफान उठ रहा है वह कुछ न कुछ करके ही थमने वाला है. उसे रोकना अब किसी ‘कोतवाल’ के वश की बात नहीं.

गोविंद पंत राजू

'यह वह छत्तीसगढ़ तो नहीं जिससे मुझे इतना गहरा लगाव रहा है'

आज, एक तरफ मैं बहुत खुश हूं और राहत की सांस ले रही हूं कि इस कठिन परीक्षा का यह हिस्सा लगभग समाप्त हो गया है. वहीं दूसरी ओर मैं बहुत बेचैन भी हूं- हमने देखा है कि राज्य का व्यवहार कितना शत्रुतापूर्ण रहा है. लेकिन हमने जिस तरह का जीवन बिताया है, न तो उसके बारे में कोई अफसोस है और न ही कुछ खो देने का एहसास. अब कम घटनापूर्ण और कम भयानक जीवन की आकांक्षा है. खैर, कुल मिलाकर यह मजेदार अनुभव रहा. बढ़िया जीवन रहा है.
बिनायक और मैंने छत्तीसगढ़ को अपना बहुत कुछ दिया है- जब इस राज्य के लिए किसी ने कुछ लिखना शुरू भी नहीं किया था उससे पहले से हम यहां काम कर रहे हैं. शोधार्थी या पत्रकार जो भी यहां आते वे सबसे पहले हमसे ही मिलते थे.

मेरा जन्म 1951 में हुआ था. मेरे पिता सेना में डॉक्टर थे, इसलिए हर तीन साल पर हमारा बसेरा बदल जाता था. हम हर जगह रहे: मैंने फरीदकोट में पंजाबी माध्यम के एक स्कूल से अपनी पढ़ाई की शुरुआत की. उसके बाद बहुत वक्त जबलपुर में गुजरा और आखिर में शिलांग में मेरी स्कूलिंग खत्म हुई. कलकत्ता के लेडी ब्रेबॉन कॉलेज में इतिहास की पढ़ाई करने के बाद अंग्रेजी में जबलपुर से एमए किया. यहीं मेरे माता-पिता बस गए. इतिहास की पढ़ाई बहुत काम की साबित हुई, इसने मेरे हर काम को एक खासनजरिया दिया. साहित्य तो मजे के लिए था. मैंने दो अमेरिकी कवियों फ़्रॉस्ट और डिकिंसन को खूब पढ़ा. फिर मैंने कुछ असल जिंदगी और सचमुच के लोगों के बारे में पढ़ना चाहा, इसलिए मैंने दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में एमफिल और पीएचडी की. मैंने 1984 में जो पीएचडी थीसिस जमा की थी वह भारत में घटते लिंगानुपात पर हुए शुरुआती शोधों में से एक था. यह 1901 से 1981 तक की भारत की जनगणना पर आधारित था.

‘ पिछले कुछ वर्षों के दौरान मेरे मन में गहरी असुरक्षा का भाव रहा है लेकिन इनके बाद भी मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी थी’

बिनायक के पिता भी सेना में डॉक्टर थे और हमारा परिवार अकसर एक-दूसरे से मिलता रहता था. हम बचपन में जरूर मिले होंगे लेकिन सही मायने में हमारी मुलाकात युवावस्था में जबलपुर में हुई. एक व्यक्ति के तौर पर बिनायक बहुत आकर्षक तो हैं ही, उनका व्यक्तित्व भी उतना ही प्रभावशाली है. वयस्क होने पर जब मैं उनसे पहली बार मिली तो वे बहुत मृदुभाषी और नम्र लगे थे. मैंने जल्दी ही यह महसूस कर लिया कि वे एक लोकतांत्रिक व्यक्ति हैं, जिनके साथ रहा जा सकता है. वे न तो जिद्दी लगे, न ही पुरुष सत्ता के पक्षधर. उनके साथ कोई भी आगे बढ़ सकता था. मुझे उनके साथ सहज होने में ज्यादा वक्त नहीं लगा. उन दिनों हम एक-दूसरे को चिट्ठियां लिखा करते थे और ट्रंक कॉल बुक करके आपस में बात करते थे. 21 वर्ष की छोटी उम्र में शादी कर लेना अजीब तो लगा, लेकिन हमने महसूस किया था कि हम अपनी जिंदगी साथ मिलकर, साथ रहकर बनाना चाहते थे.

मेरी छोटी बहन की मृत्यु क्रॉन की बीमारी की वजह से 13 वर्ष की अवस्था में ही जबलपुर में हो गई थी. ऐसी घटना एक मध्यवर्गीय परिवार को सदमे में डाल देती है. मेरे कोई और भाई-बहन भी नहीं थे और उसकी मृत्यु ने हमें बुरी तरह झकझोर दिया था. मेरी और बिनायक की दादी के कुल 8-9 बच्चे थे और दोनों ने ही उनमें से एक या दो खोया था, लेकिन हमारे माता-पिता की पीढ़ी के लिए यह वैसा नहीं था. अब सोचने पर मुझे लगता है कि शायद मेरे एक हिस्से ने सोचा होगा कि शादी करके इन सब चीजों से पार पा लिया जाए.

तमिलनाडु के वेल्लोर में बिनायक ने जब रेसिडेंसी का प्रशिक्षण शुरू किया, तब मैंने पहली बार चेन्नई में समंदर देखा था. यह हैरान कर देने वाला नजारा था. मैंने वहां के एक स्कूल में दो साल के लिए अंग्रेजी पढ़ाई जो बहुत मजेदार अनुभव था, हालांकि मैंने इसके लिए कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं लिया था. सारे उम्मीदवारों में उन्होंने मुझे बस इसलिए तरजीह दी थी कि उन्हें लगा कि तमिल नहीं जानने की वजह से मैं अधिक गंभीरता से पढ़ाऊंगी. बिनायक और मैं दोनों साथ ही 1978 में दिल्ली के जेएनयू में पीएचडी के लिए गए, लेकिन वे वहां टिक नहीं सके क्योंकि वे जमीनी काम करने के लिए व्यग्र थे. उनके पास एक तो शोध के लिए जरूरी धैर्य नहीं था और दूसरा सीनियर फैकल्टी से भी उनकी खटपट थी. आखिरकार उन्होंने साल भर के भीतर ही यूनिवर्सिटी छोड़ दी जबकि मैं वहां टिकी रही.

‘ बहुत सारे बुद्धिजीवी हमसे मिलने आते थे. हमें एहसास था कि हम एक दीर्घकालिक और समतावादी समाज बनाने की प्रक्रिया में शामिल हैं. छत्तीसगढ़ी समाज ऊर्जा से भरा हुआ था’

दिल्ली में मैं बहुत सारी चीजों से रूबरू हुई, इनमें से सबसे अहम था महिला आंदोलन का अनुभव. मानुषी और सहेली जैसे समूह थे. आपातकाल तब खत्म ही हुआ था. नोआम चोम्स्की और एबी वाजपेयी के रूप में हमें बेहतरीन वक्ता मिले. इस वक्त का मुझ पर बहुत प्रभाव पड़ा. आईसीसीआर (भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद) द्वारा वुमन स्टडीज के लिए स्कॉलरशिप हासिल करने वाली मैं पहली छात्र थी. बाद में इसी के संबंध में मैंने होशंगाबाद में फील्ड वर्क करना शुरू किया था. बिनायक छत्तीसगढ़ के दल्ली-राजहरा जहां खदान की दो परियोजनाएं शुरू होनी थीं, में अस्पताल बनाना चाहते थे. यहां वे 1981 से काम कर रहे थे. मैंने 1984 में उनके साथ फुल-टाइम काम करना शुरू कर दिया. छत्तीसगढ़ी भाषा और वहां की सभ्यता को मैं बिनायक की तुलना में ज्यादा आसानी से समझने लगी थी. भाषाओं में मैं हमेशा से अच्छी रही हूं.

वह जगह और दौर, दोनों बहुत लुभावने थे. मैं हमेशा नये रिश्ते और नयी जगहों को तलाशने में आगे रही हूं. जोखिम उठाना मुझे अच्छा लगता है. तब ऐसा लगता था मानो सारी दुनिया छत्तीसगढ़ की तरफ उमड़ रही हो और सारे  झोलेवाले भाई वहीं बस गए हों. यह एक सामाजिक अनुभव था. बहुत सारे बुद्धिजीवी हमसे मिलने आते थे. हमें एहसास था कि हम एक दीर्घकालिक और समतावादी समाज बनाने की प्रक्रिया में शामिल हैं. छत्तीसगढ़ी समाज ऊर्जा से भरा हुआ था. मध्य प्रदेश, जहां मैं पली बढ़ी, में तब भी घूंघट और लिंगभेद कायम थे. मुझे छत्तीसगढ़ से प्यार हो गया. यहां की औरतें प्रेरणास्रोत थीं. वे बहुत मजबूत और सुलझी हुई थीं. यहां मजदूर यूनियन में 5,000 महिला सदस्य थीं. मैंने दुर्गा बाई जैसी महिलाओं को दोस्त बनाया जो खदानों में काम करती थीं और किसी लिहाज से पुरुषों से कमतर नहीं थीं. वहां लोगों का संगठन भी जबर्दस्त था.

सही वक्त पर सही जगह होने के मामले में मैं बहुत भाग्यशाली रही हूं. ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में सभी वर्गों के लोगों से मेरे अच्छी मित्रता रही है. मैं अपने दोस्तों के पास जाकर उनके पेड़ से पके हुए सेब तोड़ सकती हूं क्योंकि मुझे उसके पकने का सही समय मालूम है. ग्रामीण भारत में रहना चुनौतियों से भरा है जैसे शौचालयों का न होना, लेकिन ये सब मामूली दिक्कतंे हैं. अब जैसे-जैसे उम्र बढ़ रही है और गठिया की शिकार हो रही हूं, नयी दिक्कतें दिख रही हैं. तब मुझे लिखने के लिए बिजली की जरूरत थी क्योंकि मुझे हमेशा बच्चों के सो जाने के बाद रात में लिखने की आदत थी.

मेरे और बिनायक के बीच एक लड़ाई थी. जब 1984 में मैं दल्ली-राजहरा में रहने आई थी, वे एक मजदूर परिवार के साथ रह रहे थे. मैं इसे रहने के स्थायी तरीके के बतौर स्वीकार नहीं कर सकती थी- मैं इस तरह नहीं रहना चाहती थी. वह परिवार हमें बहुत चाहता था, लेकिन आप किसी और के घर में अनिश्चितकाल के लिए नहीं रह सकते हैं. आखिरकार हमने एक फ्लैट में रहना शुरू किया. बिनायक बहुत जुनूनी हैं लेकिन वे कई बार आगे की चीजें नहीं सोचते. मैं उनसे अधिक सचेत रहती हूं, और आगे की सोचकर चलती हूं.

1988 में हम रायपुर चले गए जहां मैंने लोगों के विकास पर केंद्रित एनजीओ ‘रूपांतर’ शुरू किया. नगरी-सिहावा क्षेत्र के गोंड और कमर जनजातियों के साथ मिलकर हमने काम शुरू किया, जो बांध परियोजनाओं की वजह से विस्थापित होकर जंगल में रहने को विवश थे. वहां कोई स्कूल, कोई सामाजिक संस्था नहीं थी. बिनायक स्वास्थ्य से जुड़े कार्यों में रहते जबकि मैं बच्चों के लिए पढ़ाई-लिखाई की तैयारियां करती. वह समाज बहुत ही सहयोगी रुख वाला था. कमर जनजाति के बच्चे शिक्षा के बदले कुछ न कुछ बनाकर देने की पेशकश करते थे. आदिवासी समुदाय का चीजों को देखने का नजरिया बिलकुल अलग था लेकिन उनमें उत्साह देश के दूसरे हिस्सों के लोगों से कम नहीं था. और उनमें एकता थी. शोध करने, लिखने और परामर्श देने का मेरा काम जारी रहा. मैंने दो किताबें लिखीं : वुमन पार्टिसिपेशन इन पीपल्स स्ट्रगल और माइग्रेंट वुमन ऑफ छत्तीसगढ़. वर्ष 2004 से ही मैं वर्धा (महाराष्ट्र) के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में हिंदी माध्यम में वुमन स्टडीज पढ़ाने के लिए जाती रहती थी और 2006 में मैं वहीं रहने भी लगी. बिनायक छत्तीसगढ़ में ही रहे जहां माहौल गरम होता जा रहा था, लोकतांत्रिक जगह लगातार सिकुड़ रही थी. 2005 में सलवा जुडुम अस्तित्व में आ चुका था और यह सब सहज नहीं था. वक्त बदला है. हमारी बेटियों का जीवन हमसे बिलकुल अलग है. प्रणिता चेन्नई में सिनेमेटोग्राफर है जबकि अपराजिता मुंबई में बीए कर रही है. वे अपनी जिंदगी अपने हिसाब से बनाएंगी.

छत्तीसगढ़ मेरे लिए हमेशा प्यारा रहा है. यहां के लोग बहुत ही जीवंत हैं प्रेम और तलाक जैसे मुद्दों पर उनका आधुनिक नजरिया आकर्षित करता है. लेकिन यहां सार्वजनिक चर्चा मायूस करने वाली रही है. इनमें अज्ञानता और अहंकार का मिला-जुला रूप दिखता है जो बहुत घातक है. छत्तीसगढ़ी मीडिया यहां के स्थानीय लोगों की बड़ी सोच को नहीं दिखाता. इसका दृष्टिकोण बिलकुल संकुचित है. पिछले वर्ष 24 दिसंबर की सुबह जब बिनायक को उम्र कैद की सजा सुनाई गई थी तो मुझे इस पर यकीन नहीं हुआ. मुझे लगा कि यह सच नहीं हो सकता. लेकिन फिर मुझे लगा कि जब लोग 10-20 साल बाद इस केस का विश्लेषण करेंगे तो सच सामने आ जाएगा. बाद में जब मेरा नाम भी कोर्ट में घसीटा गया तो मुझे खुद का अस्तित्व भी खतरे में दिख रहा था. मुझे बुरे सपने आते थे, माइग्रेन से मैं परेशान थी. ऐसा दौर भी आया जब मैंने पांच-पांच रातें लगातार बिना सोए गुजार दीं. इस सबके बावजूद मुझे अपने बच्चों के साथ एक तथाकथित सामान्य कामकाजी जीवन जीना था.

पिछले कुछ वर्षों के दौरान मेरे मन में गहरी असुरक्षा का भाव रहा है, लेकिन इनके बाद भी मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी थी. मुझे हमारे सही होने का दृढ़ विश्वास था. सच हमारे पक्ष में था. और वकील, मीडिया का एक खास हिस्सा, पुराने दोस्त और हमारा परिवार, ये सब हमारे साथ रहे. लोगांे का समर्थन तो था ही. मैं फ़्रॉस्ट और डिकिंसन को पढ़ती रही और दोस्तों को भी इसमें भागीदार बनाती रही. मैं कभी हार मानने जैसा महसूस नहीं करती थी. मैं अभी भी अमन की तलाश में हूं लेकिन इसमें वक्त लगेगा. 2007 से पहले मेरा ध्यान छत्तीसगढ़ और वहां के महत्वपूर्ण मुद्दों जैसे विस्थापन आदि पर हुआ करता था. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मैंने संवैधानिक मूल्यों वाले व्यापक फलक केे मुद्दों को भी देखा-समझा है. संविधान कई वादे करता है, लेकिन इसके द्वारा दिए गए ज्यादातर अधिकारों की जड़ें जमीन पर नहीं दिखतीं.

बौद्धिक और स्थानिक दोनों ही दृष्टिकोण से चीजों को देखने का मेरा नज़रिया अब बड़ा हुआ है. मैंने भारत की इस विषमता को भी अच्छे से समझा है कि यह ‘एक भारत’ नहीं है. चाहे मीडिया हो, अदालतें हों या फिर सरकार हो, सब बंटे हुए हैं. हमारे जीवन में राज्य की भूमिका पर दोबारा बहस होनी चाहिए. हम जितने लोकतांत्रिक तरीके से यह बहस करेंगे, हमारा भविष्य उतना ही अच्छा होगा. उदाहरण के लिए अगर अन्ना हजारे की राजनीति को किनारे भी रखकर देखिए तो लोकपाल बिल को कितना भारी समर्थन मिला.

इन कठिन वर्षों ने मुझे विश्वास भी दिया और अनिश्चितता भी. बहुतों पर से मेरा भरोसा उठा. अब जब भी मैं किसी से मिलती हूं तो उसे परखती हूं और उसी हिसाब से उससे बात करती हूं. मेरे लिए यह भी बहुत तकलीफदेह है कि मुझे यह नहीं पता कि मेरा घर अब कहां है. इस सदमे से अब तक मैं नहीं उबर पाई हूं कि मैं विस्थापित हूं, अब खुद को किसी स्थान विशेष का नहीं बता सकती.

समझना मुश्किल है कि उस छत्तीसगढ़ का क्या हुआ जिससे मैं प्यार करती थी. इस जगह के लिए मेरे मन में बहुत ममता थी. मुझे अब भी यहां के लोगों से प्यार है, लेकिन अब यह राज्य पहले से अलग है. हमारे साथ जो भी हो रहा था उसे अखबार वाले चटखारे ले-लेकर हेडलाइनों में छाप रहे थे. दुर्भावनाओं के ऐसे कई उदाहरण मुझे दिखे. मैंने रायपुर में बिनायक को फांसी पर चढ़ाने की मांग करने वाले पोस्टर देखे. ये वह छत्तीसगढ़ नहीं है, जिसे मैं प्यार करती थी. मैं उम्मीद करती हूं कि मैं उस छत्तीसगढ़ को दुबारा ढूंढ़ सकूं.

आज भी बिनायक के अंदर मौजूद लोकतांत्रिक व्यक्ति के लिए मेरे मन में सम्मान है. पिछले वर्ष 24 दिसंबर को जब मैंने सुना कि उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई है तो मैंने महसूस किया कि अभी बहुत कुछ था जो हम आपस में बांट सकते थे, बहुत कुछ था जो मैं उन्हें कहना चाहती थी पर नहीं कह पाई. हमारे पास एक-दूसरे के साथ मिलकर अभी देखने-जानने के लिए बहुत सारी चीजें हैं और मैं इसकी राह देख रही हूं.

(इलिना सेन चर्चित मानवाधिकार कार्यकर्ता बिनायक सेन की पत्नी हैं. यह लेख गौरव जैन से उनकी बातचीत पर आधारित है)

डाकू गब्बरा सिंह : पं नेहरू के जन्मदिन का तोहफा

फिल्म शोले में गब्बर सिंह का किरदार और यह डायलॉग कि जब पचास-पचास कोस दूर कोई बच्चा रोता है तो उसकी मां कहती है… वास्तव में उस असली गब्बर या गब्बरा सिंह से प्रेरित था जिसका चंबल में पचास के दशक में आतंक था. गब्बरा (गब्बर सिंह के साथी अपने सरदार को इसी नाम से पुकारते थे) का जन्म मध्य प्रदेश के भिंड में एक गरीब गुज्जर परिवार में हुआ था और बीस साल की उम्र में वह कुख्यात डाकू कल्याण सिंह के गुट में शामिल हुआ. लेकिन जल्दी ही उसने खुद अपना गुट बना लिया. चंबल में अपनी धाक जमाने के लिए गब्बरा ने कई गांवों में बेवजह हत्याएं की, अपहरण किए और ताबड़तोड़ डकैतियां कीं. गब्बरा ने अपना आतंक कायम करने के लिए एक और रणनीति अपनाई. कहा जाता है कि वह ग्रामीणों को पकड़कर उनकी नाक काट देता था और उसने अपने जीवनकाल में दर्जनों लोगों की नाक काटी थी. इन घटनाओं का असर यह हुआ कि इस डाकू का नाम चंबल के साथ-साथ दिल्ली में केंद्र सरकार के लिए भी क्रूरता का पर्याय बन गया और तब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने खुद मध्य प्रदेश पुलिस प्रमुख केएफ रुस्तम को इस डकैत का सफाया करने की योजना पर काम करने को कहा था.

कहा जाता है कि 1957 में गब्बरा ने एक गांव के 22 बच्चों को लाइन में खड़ा करके सिर्फ इसलिए गोली मार दी थी कि उसे शक था कि गांव के लोग उसकी मुखबिरी करते हैं. इस डकैत पर राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की तत्कालीन सरकारों ने कुल पचास हजार का इनाम घोषित किया था.

इस डकैत के आतंक का अंत 1959 में हुआ जब मध्य प्रदेश पुलिस के एक विशेष दस्ते ने एक मुठभेड़ में उसे मार दिया. यह मुठभेड़ 13 नवंबर को हुई थी और इसकी सूचना देते हुए रुस्तम ने नेहरू को संदेश दिया था कि यह उनके जन्मदिन का तोहफा है.                              

पवन वर्मा

पहले हमाम, अब सरेआम

धृतराष्ट्र की आज्ञा पाकर संजय ने आंखों देखा हाल बताना शुरू किया-

‘महाराज, कदाचित देश के गौरव की रक्षा हेतु एक लाडो ने निर्वस्त्र होने की घोषणा कर दी है. बस शर्त यह है कि भारत विश्वकप जीत जाए. ‘फिर!’ धृतराष्ट्र ने उत्सुकता से पूछा. ‘महाराज, उस लाडो के त्याग-समर्पण के प्रताप से भारत विश्वकप जीत भी गया.’
धृतराष्ट्र बोले, ‘उस लाडो के विषय में बताओ.’ ‘उसके बारे में क्या बताऊं? कल तक तो उसे कोई जानता भी न था.’ धृतराष्ट्र गुस्से से बोले, ‘अरे मूर्ख, क्या वह निर्वस्त्र हुई?’ ‘नहीं महाराज.’ संजय के बोल में उदासी के स्वर थे. ‘फिर उसने ऐसा क्यों कहा?’ ‘क्योंकि महाराज, भारतवर्ष इस समय में नंगई जोरो पर है. नंगई को देशभक्ति का पर्याय बना दिया जा रहा है. इस समय दृश्य यह है कि चमकने के लिए अच्छे से अच्छे नंगे होने को तैयार बैठे हैं. और मजे की बात यह कि नंगे होने की वे भी घोषणा कर रहे है जिनका वस्त्र पहनना न पहनना एक बराबर ही है.’ इतना कह कर संजय हंसने लगे. घृतराष्ट्र को बात पूरी तरह से समझ में नहीं आई. बोले, ‘संजय वह सब तो ठीक है, परंतु कोई इस प्रकार से ऐसे खुल्लमखुल्ला निर्वस्त्र होने की घोषणा क्यों करेगा?’ ‘महाराज, इसके दो प्रमुख कारण हैं. पहला, नंगई इतनी बढ़ गई है कि अब कइयों को लगता है कि यह फैशन नहीं अपनी संस्कृति है. दूसरा, मीडिया को अपने हाथों का खिलौना बनाकर खेलने के लिए.’ ‘तुम्हारा दूसरा कारण मैं समझा नहीं! सविस्तार बताओ संजय’, घृतराष्ट्र ने अपनी दाढ़ी खुजलाते हुए कहा.

‘महाराज, आज भारत में टीआरपी नाम का एक जीव पैदा हो गया है. यह जो न करवाए कम है.’ धृतराष्ट्र को संजय की बात रोचक लगी, बोले, ‘संजय, उदाहरण सहित व्याख्या करो.’ संजय चहकते हुए बोले, ‘महाराज, जैसे आप कहिए कि अर्जुन ने तो मछली की आंख की पुतली पर निशाना लगया था, जबकि आप चींटी या मक्खी के आंख की पुतली का निशाना लगा सकते हंै.’ ‘संजय वाणी पर संयम रखो. तुम जानते हो कि मैं देख नहीं सकता हूं.’ धृतराष्ट्र  ने संजय को डांट लगाई. संजय अपनी सफाई में बोले, ‘महाराज, मैं तो एक दृष्टांत दे रहा था बस. महाराज, यही मीडिया फिर आपकी बात को यह कहते हुए चौबीसों घंटा दिखाएगा कि महाराज सुर्खियों में आने के लिए ऐसा कह रहे है.’ ‘कमाल है, मालूम है तब भी दिखाएगा!’ धृतराष्ट्र ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा. ‘जी महाराज, यह है कमाल टीआरपी के कीड़े का.’

धृतराष्ट्र ने जम्हाई लेते हुए बोले, ‘इस प्रकरण को यहीं छोड़ो. कुछ और बताओ!’ संजय थोड़ी देर सोचने के बाद बोले, ‘महाराज, जिस लाडो ने सरेआम स्वयं को निर्वस्त्र करने को कहा था, अब उसका करियर सफलता की राह पर कुलांचें भर रहा है.’ धृतराष्ट्र चौंक कर बोले, ‘संजय, ऐसे कैसे सिर्फ नंगे होने की बात करके कोई रातो-रात ही पूनम की चांद की तरह इस देश के आसमान पर चमक सकता है?’ संजय मुस्कुराते हुए बोले, ‘नेत्र पा जाने भर से क्या दृष्टि भी मिल जाती है महाराज?’ धृतराष्ट्र ने संजय की पीठ थपथपाई और शयनकक्ष की ओर चल पडे़. जाते-जाते बोले, ‘तुम्हारा आंखों देखा हाल सुनकर, सच कहूं तो आज जीवन में पहली बार मुझे अपने न देख पाने पर अफसोस नहीं हो रहा है. प्रतीत होता है कि देश में दिनों-दिन आंखवाले तो बढ़ते जा रहे है, पंरतु दृष्टिवालों का लोप होता जा रहा है.’

– अनूप मणि त्रिपाठी