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काल के गाल में

कभी एशिया का सबसे लंबा पुल कहलाने वाला महात्मा गांधी सेतु आज जर्जर हालत में है. इसकी बदहाली बिहार के 13 जिलों के लाखों लोगों को भी बेहाल कर रही है. लेकिन इस मुद्दे पर न राज्य गंभीर दिखता है और न ही केंद्र. इर्शादुल हक की रिपोर्ट

1982 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पटना और हाजीपुर को जोड़ने वाला 5.57 किलोमीटर लंबा महात्मा गांधी सेतु राष्ट्र को सौंपा था तो बिहार के बच्चे सामान्य ज्ञान की किताबों से यह याद करते हुए खुद को गौरवान्वित महसूस करते थे कि एशिया का सबसे बड़ा पुल उनके ही प्रदेश में है. इन 29 वर्षों में दुनिया काफी बदल चुकी है. एक ओर जहां चीन में 36 किलोमीटर लंबा समुद्री पुल (हैंगजोउ खाड़ी से शंघाई के बीच) बन चुका है वहीं खुद भारत में भी 11.6 किलोमीटर लंबा (हैदराबाद शहर से हैदराबाद हवाई अड्डे को जोड़ने वाला) पीवी एक्सप्रेस वे बन चुका है.

लेकिन महात्मा गांधी सेतु के लिए असल संकट यह नहीं कि उसका पहला स्थान छिन गया है, बल्कि यह तो बेमौत मरते जाने की अपनी ही पीड़ा से परेशान है. राजधानी पटना को उत्तर बिहार से जोड़ने वाले इस पुल की खस्ताहाली का असर 13 जिलों के लाखों लोगों पर पड़ रहा है.

एक तरफ भयावह जाम, दूसरी ओर क्षमता से अधिक बोझ के कारण इस पुल के भविष्य पर  भी खतरा मंडरा रहा है

महात्मा गांधी सेतु देश के उन कुछेक पुलों में से एक है जो सिंगल ज्वाइंट कैंटिलिवर प्रिस्ट्रेस तकनीक से बना है. इसमें हिंज बेयरिंग और बॉक्स ग्रिडर का इस्तेमाल किया गया है. इसके हिंज बियरिंग वाहनों के आवगमन के दौरान कंपन करते हैं. इससे पुल का ऊपरी हिस्सा भी साधारण परिस्थितियों में डेढ़ से दो इंच तक कंपन करता है जो इस तकनीक से बने पुलों की विशेषता में शुमार है. विशेषज्ञों का कहना है कि इससे पुल या इसके पायों में दरार की गुंजाइश नहीं होती. लेकिन निर्माण के मात्र 20 साल बाद 2002 में न सिर्फ यह पुल क्षतिग्रस्त हो गया बल्कि इसके सुपर स्ट्रक्चर में भी दरार की शिकायतें आ चुकी हैं. जबकि इस पुल की अनुमानित आयु 100 वर्ष थी. भारत में इस तकनीक से गोवा की मांडोवी नदी पर बना एक अन्य पुल भी है जो अपने निर्माण के मात्र 16 वर्षों में क्षतिग्रस्त हो गया. इसी तकनीक से गोआ में ही जुआरी और बोरिम नदियों पर बने पुल भी क्षतिग्रस्त हो चुके हैं और इन पुलों पर बड़े वाहनों के आवगमन पर रोक लगाई जा चुकी है. हालांकि 1980 के दशक में सिंगल ज्वाइंट कैंटिलिवर प्रिस्ट्रेस तकनीक सबसे आधुनिक समझी जाती थीे, लेकिन इस तकनीक की विफलता ने विशेषज्ञों को भी चौंका दिया है. इस संबंध में देवनारायण प्रसाद कहते हैं, ‘इस पुल का प्रिस्ट्रेस खत्म हो गया है, जिसके कारण इसके 44 हिंज बियरिंग टूट गए हैं. उसका परिणाम यह है कि पुल के पश्चिमी ट्रैक के कुछ हिस्से धंस गए हैं.’ वे अपनी बात जारी रखते हैं, ‘हम यह कोशिश कर रहे हैं कि इसे फिर से उपयोग के लायक बनाया जा सके. इसके लिए हमने इसके छतिग्रस्त 44 में से 37 हिंज बियरिंग बदल दिए हैं.’ यह पूछने पर कि 11 साल बाद भी मरम्मत का काम पूरा क्यों नहीं हो सका है, वे कहते हैं, ‘इस पुल पर ट्रैफिक का दबाव इतना है कि एक तरफ इसकी मरम्मत होती है तो दूसरी तरफ दूसरे हिंज बियरिंग टूट जाते हैं.’

वैसे तो बिहार की जीवनरेखा माना जाने वाला यह महासेतु पिछले एक दशक से क्षतिग्रस्त है पर अब इसकी दुर्दशा इतनी बढ़ चुकी है कि तमाम कोशिशों के बावजूद इस पुल पर आए दिन हजारों गाड़ियां चींटी की तरह रेंगने को विवश हैं. चार लेन वाले इस पुल में दो ट्रैक हैं और इसके पश्चिमी ट्रैक का कुछ हिस्सा तीन फुट तक नीचे धंस चुका है जिसके कारण इस ट्रैक पर आवाजाही रोकी जा चुकी है. अब पूर्वी ट्रैक पर ही आवगमन का सारा दबाव है. एक तो यह पुल पहले से ही क्षतिग्रस्त है दूसरी तरफ मोकामा स्थित राजेंद्र पुल को बड़े वाहनों के लिए बंद कर दिए जाने के कारण सहरसा, मधेपुरा, सुपौल समेत पूर्वी बिहार के अनेक जिलों से आने वाले यातायात का बोझ भी इसी पर आ गया है. इससे दो समस्याएं खड़ी हो गई हैं. एक तरफ तो भयावह जाम की स्थिति है वहीं दूसरी ओर क्षमता से अधिक बोझ के कारण इस ट्रैक के भविष्य पर भी खतरा मंडरा रहा है. राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के मुख्य अभियंता और महात्मा गांधी सेतु के विशेषज्ञ माने जाने वाले देवनारायण प्रसाद कहते हैं, ‘फिलहाल पूर्वी ट्रैक ठीक है पर यातायात के भारी दबाव की स्थिति चिंताजनक है और इस बात से इनकार भी नहीं किया जा सकता कि दूसरा ट्रैक भी क्षतिग्रस्त न हो.’

हालांकि राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण इस पुल की मरम्मत में 2002 से ही लगा है, लेकिन इस कछुआचाल मरम्मत का कोई असर होता नहीं दिख रहा. इन नौ सालों में पुल की मरम्मत पर अब तक लगभग 75 करोड़ रु खर्च किए जा चुके हैं, जबकि गैमन इंडिया कंपनी ने जब इसका निर्माण किया था तो कुल लागत ही 79 करोड़ रु आई थी.

दरअसल गांधी सेतु राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण का हिस्सा है जिसके निर्माण से लेकर मरम्मत तक की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है. इस कारण जब भी इस क्षतिग्रस्त पुल से उपजी समस्या पर बात होती है तो राज्य सरकार अपना पल्ला झाड़ लेती है. दूसरी तरफ राष्ट्रीय राजमार्ग के अधिकारियों का कहना है कि पुल की मरम्मत के लिए केंद्र सरकार से सीमित राशि ही मिलती है जिसके कारण काम ठीक से नहीं हो पाता. इस बीच इस पुल की बिगड़ती स्थिति के मद्देनजर केंद्र सरकार ने अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ वीके रैना को इस पुल की वास्तविक स्थिति के आकलन के लिए जून, 2010 में भेजा था. रैना की रिपोर्ट के आधार पर राज्य सरकार ने पुल की व्यापक मरम्मत के लिए 167 करोड़ रुपये के खर्च की अनुमानित रिपोर्ट भेजी था. इस संबंध में पथनिर्माण विभाग के सचिव प्रत्यय अमृत कहते हैं, ‘हमने एक साल पहले केंद्र सरकार को रिपोर्ट भेजी थी और हम अब भी उसकी स्वीकृति की प्रतीक्षा कर रहे हैं.’ इधर राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के गांधी सेतु परियोजना से जुड़े मुख्य अभियंता देवनारायण प्रसाद भी स्वीकार करते हैं कि जब तक इस सेतु की मरम्मत की व्यापक परियोजना पर काम शुरू नहीं होता तब तक इसकी दशा सुधारने का प्रयास सफल नहीं हो सकता.

इधर राज्य सरकार के बार-बार आग्रह के बावजूद केंद्र की कथित चुप्पी पर पिछले दिनों मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यहां तक कह दिया था कि अगर केंद्र सरकार उस प्रस्ताव को स्वीकृति नहीं देती है तो राज्य सरकार इस पुल के समानांतर एक दूसरा पुल बनाएगी. लेकिन नीतीश के इस बयान के कुछ ही दिनों बाद राज्य सरकार ने अपने बयान में संशोधन करते हुए कहा था कि अगर केंद्र सरकार मौजूदा सेतु की मरम्मत करने में आनाकानी करती है तो वह राज्य सरकार को अनापत्ति प्रमाण पत्र दे ताकि राज्य सरकार पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के आधार पर समानांतर पुल का निर्माण करा सके. हालांकि राज्य सरकार के इस बयान को कुछ टीकाकारों ने महज राजनीतिक बयान माना था, लेकिन इस बात पर पथनिर्माण मंत्री नंदकिशोर यादव तहलका से कहते हैं, ‘आप ही बताइए इसमें राजनीति क्या है. हम एक साल से प्रस्ताव की स्वीकृति का इंतजार कर रहे हैं और केंद्र सरकार चुप बैठी है. आखिर राज्य की जनता को परेशानी होगी तो क्या ऐसी स्थिति में राज्य सरकार वैकल्पिक उपायों पर गौर नहीं करेगी.’ वे आगे कहते हैं, ‘महात्मा गांधी सेतु बिहार की लाइफलाइन है. इसलिए इस पुल पर यातायात बाधित होने का मतलब है बिहार की गति रुक जाना. इस बात को समझते हुए हमने केंद्र सरकार से कहा है कि वह जल्द से जल्द इसकी मरम्मत के प्रस्ताव की मंजूरी दे. पर आश्चर्य की बात है कि केंद्र इस पर उदासीन बना हुआ है.’

भले ही यह सेतु केंद्र और राज्य सरकार के बीच आपसी खींचतान का विषय बना हुआ हो पर सच्चाई यह है कि इस पुल को समय
रहते सुधारा नहीं गया तो बिहार की जनता को यातायात के भयावह संकट से गुजरना पड़ेगा.

ऐसा होता भी दिख रहा है. मोकामा का राजेंद्र पुल बड़े वाहनों के लिए बंद होने के बाद पिछले चार महीने से गांधी सेतु पर जाम की भयावह समस्या खड़ी हो रही है. राज्य सरकार की तमाम कोशिशों के बाद भी जाम पर काबू नहीं हो सका तो आखिर में सरकार ने इसके लिए पटना और हाजीपुर के एसपी को जिम्मेदारी सौंपते हुए कहा कि वे हर हाल में ट्रैफिक व्यवस्था को दुरुस्त करें वरना कानूनी कार्रवाई के लिए तैयार रहें. इस दौरान कम से कम दो पुलिसकर्मी लापरवाही के आरोप में निलंबित किए जा चुके हैं. इस समस्या से पार पाना ट्रैफिक पुलिस के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है. इस व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करने में लगे पटना सिटी क्षेत्र के सीडीपीओ सुशील कुमार कहते हैं, ‘हमने इस पुल पर ओवरटेक करने पर रोक लगा दी है और गतिसीमा भी नियंत्रित कर दिया है. समूचे पुल पर ट्रैफिक पुलिस की व्यवस्था की गई है और जगह-जगह क्रेन की व्यवस्था की गई है ताकि खराब वाहनों को जल्द से जल्द रास्ते से हटाया जा सके.’ ट्रैफिक पुलिस के इन प्रयासों के बावजूद कभी-कभी जाम की स्थिति इतनी भयावह हो जाती है कि 8-10 घंटे तक ट्रैफिक व्यवस्था चरमरा कर रह जाती है.

काल के गाल में

कभी एशिया का सबसे लंबा पुल कहलाने वाला महात्मा गांधी सेतु आज जर्जर हालत में है. इसकी बदहाली बिहार के 13 जिलों के लाखों लोगों को भी बेहाल कर रही है. लेकिन इस मुद्दे पर न राज्य गंभीर दिखता है और न ही केंद्र. इर्शादुल हक की रिपोर्ट

1982 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पटना और हाजीपुर को जोड़ने वाला 5.57 किलोमीटर लंबा महात्मा गांधी सेतु राष्ट्र को सौंपा था तो बिहार के बच्चे सामान्य ज्ञान की किताबों से यह याद करते हुए खुद को गौरवान्वित महसूस करते थे कि एशिया का सबसे बड़ा पुल उनके ही प्रदेश में है. इन 29 वर्षों में दुनिया काफी बदल चुकी है. एक ओर जहां चीन में 36 किलोमीटर लंबा समुद्री पुल (हैंगजोउ खाड़ी से शंघाई के बीच) बन चुका है वहीं खुद भारत में भी 11.6 किलोमीटर लंबा (हैदराबाद शहर से हैदराबाद हवाई अड्डे को जोड़ने वाला) पीवी एक्सप्रेस वे बन चुका है.

लेकिन महात्मा गांधी सेतु के लिए असल संकट यह नहीं कि उसका पहला स्थान छिन गया है, बल्कि यह तो बेमौत मरते जाने की अपनी ही पीड़ा से परेशान है. राजधानी पटना को उत्तर बिहार से जोड़ने वाले इस पुल की खस्ताहाली का असर 13 जिलों के लाखों लोगों पर पड़ रहा है.

एक तरफ भयावह जाम, दूसरी ओर क्षमता से अधिक बोझ के कारण इस पुल के भविष्य पर  भी खतरा मंडरा रहा है

महात्मा गांधी सेतु देश के उन कुछेक पुलों में से एक है जो सिंगल ज्वाइंट कैंटिलिवर प्रिस्ट्रेस तकनीक से बना है. इसमें हिंज बेयरिंग और बॉक्स ग्रिडर का इस्तेमाल किया गया है. इसके हिंज बियरिंग वाहनों के आवगमन के दौरान कंपन करते हैं. इससे पुल का ऊपरी हिस्सा भी साधारण परिस्थितियों में डेढ़ से दो इंच तक कंपन करता है जो इस तकनीक से बने पुलों की विशेषता में शुमार है. विशेषज्ञों का कहना है कि इससे पुल या इसके पायों में दरार की गुंजाइश नहीं होती. लेकिन निर्माण के मात्र 20 साल बाद 2002 में न सिर्फ यह पुल क्षतिग्रस्त हो गया बल्कि इसके सुपर स्ट्रक्चर में भी दरार की शिकायतें आ चुकी हैं. जबकि इस पुल की अनुमानित आयु 100 वर्ष थी. भारत में इस तकनीक से गोवा की मांडोवी नदी पर बना एक अन्य पुल भी है जो अपने निर्माण के मात्र 16 वर्षों में क्षतिग्रस्त हो गया. इसी तकनीक से गोआ में ही जुआरी और बोरिम नदियों पर बने पुल भी क्षतिग्रस्त हो चुके हैं और इन पुलों पर बड़े वाहनों के आवगमन पर रोक लगाई जा चुकी है. हालांकि 1980 के दशक में सिंगल ज्वाइंट कैंटिलिवर प्रिस्ट्रेस तकनीक सबसे आधुनिक समझी जाती थीे, लेकिन इस तकनीक की विफलता ने विशेषज्ञों को भी चौंका दिया है. इस संबंध में देवनारायण प्रसाद कहते हैं, ‘इस पुल का प्रिस्ट्रेस खत्म हो गया है, जिसके कारण इसके 44 हिंज बियरिंग टूट गए हैं. उसका परिणाम यह है कि पुल के पश्चिमी ट्रैक के कुछ हिस्से धंस गए हैं.’ वे अपनी बात जारी रखते हैं, ‘हम यह कोशिश कर रहे हैं कि इसे फिर से उपयोग के लायक बनाया जा सके. इसके लिए हमने इसके छतिग्रस्त 44 में से 37 हिंज बियरिंग बदल दिए हैं.’ यह पूछने पर कि 11 साल बाद भी मरम्मत का काम पूरा क्यों नहीं हो सका है, वे कहते हैं, ‘इस पुल पर ट्रैफिक का दबाव इतना है कि एक तरफ इसकी मरम्मत होती है तो दूसरी तरफ दूसरे हिंज बियरिंग टूट जाते हैं.’

वैसे तो बिहार की जीवनरेखा माना जाने वाला यह महासेतु पिछले एक दशक से क्षतिग्रस्त है पर अब इसकी दुर्दशा इतनी बढ़ चुकी है कि तमाम कोशिशों के बावजूद इस पुल पर आए दिन हजारों गाड़ियां चींटी की तरह रेंगने को विवश हैं. चार लेन वाले इस पुल में दो ट्रैक हैं और इसके पश्चिमी ट्रैक का कुछ ह

काल के गाल में

कभी एशिया का सबसे लंबा पुल कहलाने वाला महात्मा गांधी सेतु आज जर्जर हालत में है. इसकी बदहाली बिहार के 13 जिलों के लाखों लोगों को भी बेहाल कर रही है. लेकिन इस मुद्दे पर न राज्य गंभीर दिखता है और न ही केंद्र. इर्शादुल हक की रिपोर्ट

1982 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पटना और हाजीपुर को जोड़ने वाला 5.57 किलोमीटर लंबा महात्मा गांधी सेतु राष्ट्र को सौंपा था तो बिहार के बच्चे सामान्य ज्ञान की किताबों से यह याद करते हुए खुद को गौरवान्वित महसूस करते थे कि एशिया का सबसे बड़ा पुल उनके ही प्रदेश में है. इन 29 वर्षों में दुनिया काफी बदल चुकी है. एक ओर जहां चीन में 36 किलोमीटर लंबा समुद्री पुल (हैंगजोउ खाड़ी से शंघाई के बीच) बन चुका है वहीं खुद भारत में भी 11.6 किलोमीटर लंबा (हैदराबाद शहर से हैदराबाद हवाई अड्डे को जोड़ने वाला) पीवी एक्सप्रेस वे बन चुका है.

लेकिन महात्मा गांधी सेतु के लिए असल संकट यह नहीं कि उसका पहला स्थान छिन गया है, बल्कि यह तो बेमौत मरते जाने की अपनी ही पीड़ा से परेशान है. राजधानी पटना को उत्तर बिहार से जोड़ने वाले इस पुल की खस्ताहाली का असर 13 जिलों के लाखों लोगों पर पड़ रहा है.

एक तरफ भयावह जाम, दूसरी ओर क्षमता से अधिक बोझ के कारण इस पुल के भविष्य पर  भी खतरा मंडरा रहा है

महात्मा गांधी सेतु देश के उन कुछेक पुलों में से एक है जो सिंगल ज्वाइंट कैंटिलिवर प्रिस्ट्रेस तकनीक से बना है. इसमें हिंज बेयरिंग और बॉक्स ग्रिडर का इस्तेमाल किया गया है. इसके हिंज बियरिंग वाहनों के आवगमन के दौरान कंपन करते हैं. इससे पुल का ऊपरी हिस्सा भी साधारण परिस्थितियों में डेढ़ से दो इंच तक कंपन करता है जो इस तकनीक से बने पुलों की विशेषता में शुमार है. विशेषज्ञों का कहना है कि इससे पुल या इसके पायों में दरार की गुंजाइश नहीं होती. लेकिन निर्माण के मात्र 20 साल बाद 2002 में न सिर्फ यह पुल क्षतिग्रस्त हो गया बल्कि इसके सुपर स्ट्रक्चर में भी दरार की शिकायतें आ चुकी हैं. जबकि इस पुल की अनुमानित आयु 100 वर्ष थी. भारत में इस तकनीक से गोवा की मांडोवी नदी पर बना एक अन्य पुल भी है जो अपने निर्माण के मात्र 16 वर्षों में क्षतिग्रस्त हो गया. इसी तकनीक से गोआ में ही जुआरी और बोरिम नदियों पर बने पुल भी क्षतिग्रस्त हो चुके हैं और इन पुलों पर बड़े वाहनों के आवगमन पर रोक लगाई जा चुकी है. हालांकि 1980 के दशक में सिंगल ज्वाइंट कैंटिलिवर प्रिस्ट्रेस तकनीक सबसे आधुनिक समझी जाती थीे, लेकिन इस तकनीक की विफलता ने विशेषज्ञों को भी चौंका दिया है. इस संबंध में देवनारायण प्रसाद कहते हैं, ‘इस पुल का प्रिस्ट्रेस खत्म हो गया है, जिसके कारण इसके 44 हिंज बियरिंग टूट गए हैं. उसका परिणाम यह है कि पुल के पश्चिमी ट्रैक के कुछ हिस्से धंस गए हैं.’ वे अपनी बात जारी रखते हैं, ‘हम यह कोशिश कर रहे हैं कि इसे फिर से उपयोग के लायक बनाया जा सके. इसके लिए हमने इसके छतिग्रस्त 44 में से 37 हिंज बियरिंग बदल दिए हैं.’ यह पूछने पर कि 11 साल बाद भी मरम्मत का काम पूरा क्यों नहीं हो सका है, वे कहते हैं, ‘इस पुल पर ट्रैफिक का दबाव इतना है कि एक तरफ इसकी मरम्मत होती है तो दूसरी तरफ दूसरे हिंज बियरिंग टूट जाते हैं.’

वैसे तो बिहार की जीवनरेखा माना जाने वाला यह महासेतु पिछले एक दशक से क्षतिग्रस्त है पर अब इसकी दुर्दशा इतनी बढ़ चुकी है कि तमाम कोशिशों के बावजूद इस पुल पर आए दिन हजारों गाड़ियां चींटी की तरह रेंगने को विवश हैं. चार लेन वाले इस पुल में दो ट्रैक हैं और इसके पश्चिमी ट्रैक का कुछ ह

अतिक्रमण की बिसात पर शह और मात

लगभग दो माह तक अतिक्रमण की आंच में जलने के बाद झारखंड में अब तपिश कुछ ठंडी पड़ गई है. पहले कैबिनेट और फिर राज्यपाल एमओएच फारूख बिल्डिंग बायलॉज संबंधित अध्यादेश को मंजूरी दे चुके हैं. हालांकि अध्यादेश में पेंच-दर-पेंच फंसेंगे, यह तय है. अध्यादेश पारित होने के बाद मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने तुरंत कहा कि यह जनता के हित में है और अब विपक्ष के पास इसे लेकर कोई तर्क नहीं है तो वह अनर्गल बयानबाजी कर रहा है. उधर, प्रतिपक्ष के नेता राजेंद्र सिंह का कहना था कि सरकार के इस अध्यादेश से बिल्डरों को फायदा होगा. प्रतिपक्ष के स्वर सत्ता पक्ष की ओर से भी निकल रहे हैं. झामुमो विधायक साइमन मरांडी कहते हैं, ‘सरकार जमीन घोटालेबाजों को बचाने में लगी है और इस अध्यादेश से गरीबों-आदिवासियों को और हाशिये पर धकेलने की तैयारी हुई है.’ झामुमो के ही दूसरे विधायक नलिन सोरेन कहते हैं, ‘यह अध्यादेश अमीरों के लिए है.’ विधानसभा अध्यक्ष सीपी सिंह भी इस अध्यादेश को अधूरा बता रहे हैं.

यानी अर्जुन मुंडा लगातार घिरते हुए दिख रहे हैं. बहुत हद तक अपनों के घात-प्रतिघात ने ही उनके आसपास भंवरजाल बनाना शुरू कर दिया है. यशवंत सिन्हा, सीपी सिंह, रघुवर दास जैसे नेता पहले ही रांची में धरने से लेकर दिल्ली दरबार में दस्तक के जरिए अपना विरोध जता चुके हैं. बाद के दिनों में भाजपा और अर्जुन मुंडा के सिपहसलार रहे प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता संजय सेठ और पूर्व विधायक चंद्रेश उरांव के बहाने पार्टी में व्याप्त असंतोष और अंतर्कलह भी सामने आया.

इन सबके बीच अतिक्रमण की बिसात पर जो राजनीतिक मोहरे बिछाए गए उसमें हर किसी ने राजनीतिक फसल काटने की कोशिश की. प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड विकास मोर्चा के प्रमुख बाबूलाल मरांडी ने अनशन की राजनीति करके एक साथ कई निशाने साधने की कोशिश की. बाबूलाल राजधानी रांची के मोरहाबादी मैदान में 150 घंटे तक आमरण अनशन पर बैठे रहे और अनशन से ही भाजपा-कांग्रेस सबकी राजनीतिक चालों को साधते दिखे. उसी अनशन स्थल पर भाजपा नेता और विधानसभा अध्यक्ष सीपी सिंह पहुंचे तो पार्टी में बड़ा बवाल मचा, लेकिन सीपी सिंह अब राज्य के वरिष्ठ नेताओं की श्रेणी में आते हैं, इसलिए पार्टी कसमसाकर रह गई. सवाल-जवाब भी न किया जा सका. वहीं भाजपा प्रवक्ता संजय सेठ और पूर्व विधायक चंद्रेश उरांव का राजनीतिक कद सीपी सिंह की तरह बड़ा नहीं था, इसलिए अनशन स्थल पर पहुंचने के एवज में उन्हें बाहर का रास्ता देखना पड़ा. खार खाए संजय को अब भाजपा में तमाम बुराइयां दिखने लगी हैं. वे कहते  हैं, ‘सरकार गरीबों पर बुलडोजर चलाने वाली है, इसे कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है.’ सेठ अपनी बात में एक लाइन और जोड़ते हैं, ‘बाबूलाल गरीबों के नेता हैं.’

भाजपा के सहारे राजनीतिक पहचान बनाने वाले संजय सेठ अब उस दल के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी बाबूलाल में मसीहाई छवि तलाश रहे हैं तो इसके राजनीतिक मायने भी कोई कम नहीं हैं. पूर्व विधायक चंद्रेश उरांव तो सेठ से भी दो कदम आगे निकले. भाजपा से हटने के बाद उन्होंने बजाप्ता सिर मुंडवा लिया है और वे कहते हैं कि उन्होंने शुद्धिकरण की प्रक्रिया अपनाई है. उनके मुताबिक वे एक अध्याय खत्म कर चुके हैं और दूसरा अध्याय बाबूलाल के साथ शुरू करेंगे, जिनकी राजनीति में उन्हें गांधी की छवि नजर आती है. चंद्रेश कहते हैं, ‘भाजपा की शैली तो अंग्रेजों से भी ज्यादा बर्बर है.’

चंद्रेश या सेठ की राजनीतिक हैसियत उतनी बड़ी नहीं कि वे पार्टी का कुछ बिगाड़ सकें लेकिन यशवंत सिन्हा, सीपी सिंह और रघुवर दास तथा दूसरे ध्रुव से मुंडा के खिलाफ आवाज उठाते रहने वाले लोकसभा उपाध्यक्ष कड़िया मुंडा, विधायक नीलकंठ सिंह मुंडा जरूर आने वाले दिनों में कुछ खेल बिगाड़ सकते हैं.

इन सभी राजनीतिक घटनाओं के बीच बाबूलाल और उनके समर्थकों की खुशी देखते ही बन रही है. झाविमो के एक संगठन मंत्री कहते हैं, ‘हमारे नेता आज नहीं, कल के लिए मजबूत राजनीतिक बुनियाद तैयार करने में लगे हुए हैं.’ जब बाबूलाल से इस बाबत बात होती है तो वे कहते हैं, ‘मेरे अनशन में जिसे राजनीतिक तत्व तलाशना हो तलाशते रहे, मैं तो जनता के पक्ष में यह सब कर रहा हूं.’ यह जरूर है कि बाबूलाल ने अनशन के बहाने एक साथ कई निशाने साधने में कामयाबी हासिल की है. पहला तो यह कि अतिक्रमण के मसले पर कांग्रेस विपक्ष की आवाज बन रही थी और केंद्रीय मंत्री और रांची से सांसद सुबोध कांत सहाय उसके चमकदार नेता के तौर पर उभर रहे थे. बाबूलाल के इस अनशन से कांग्रेस और सुबोधकांत के अभियान पर फिलहाल ब्रेक लगता दिख रहा है. उनकी दूसरी सफलता यह रही कि भाजपा का अंतर्कलह सतह पर आ गया. तीसरी बात यह कि अब जो भी अध्यादेश वगैरह पारित हुए हैं उनका श्रेय अपने खाते में दिखाने के लिए झाविमो कार्यकर्ता प्रदेश भर में लग गए हैं. अहम बात यह भी है कि आंशिक ही सही बाबूलाल को उस दाग को धोने में सफलता मिलती दिख रही है जो उन पर नौ साल पहले मुख्यमंत्री रहते हुए डोमिसाइल नीति विवाद के बाद लगा था.

आने वाले दिनों में अतिक्रमण से उफनी राजनीति का क्या फलसफा होगा, किसे कितना नफा-नुकसान होगा, यह तो अभी से बताने की स्थिति में कोई नहीं लेकिन यह तय है कि भाजपा को अपने ही दलों के घातियों-प्रतिघातियों से निपटने की चुनौती से दो-चार होना पड़ेगा.

अभी इंटरवल हुआ है. कांग्रेस अब धरना-प्रदर्शन करके राजनीति को साधने की कोशिश में लगी हुई है. उधर, भाजपा की नजर आदिवासी-मूलवासी वोटों पर है तो उसकी अोर से पिछले दरवाजे से यह संदेश फैलाया जा रहा है कि इस अतिक्रमण से आदिवासी-मूलवासी को कोई नुकसान नहीं हुआ है. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिनेशानंद गोस्वामी कहते हैं, ‘अपना अनशन प्रभावकारी बनाने के लिए बाबूलाल मरांडी ने फिल्मी कलाकारों के लटके-झटके से लेकर तमाम कोशिशें कीं, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. जनता उनके साथ नहीं जा सकी.’

अतिक्रमण की बिसात पर शह और मात

लगभग दो माह तक अतिक्रमण की आंच में जलने के बाद झारखंड में अब तपिश कुछ ठंडी पड़ गई है. पहले कैबिनेट और फिर राज्यपाल एमओएच फारूख बिल्डिंग बायलॉज संबंधित अध्यादेश को मंजूरी दे चुके हैं. हालांकि अध्यादेश में पेंच-दर-पेंच फंसेंगे, यह तय है. अध्यादेश पारित होने के बाद मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने तुरंत कहा कि यह जनता के हित में है और अब विपक्ष के पास इसे लेकर कोई तर्क नहीं है तो वह अनर्गल बयानबाजी कर रहा है. उधर, प्रतिपक्ष के नेता राजेंद्र सिंह का कहना था कि सरकार के इस अध्यादेश से बिल्डरों को फायदा होगा. प्रतिपक्ष के स्वर सत्ता पक्ष की ओर से भी निकल रहे हैं. झामुमो विधायक साइमन मरांडी कहते हैं, ‘सरकार जमीन घोटालेबाजों को बचाने में लगी है और इस अध्यादेश से गरीबों-आदिवासियों को और हाशिये पर धकेलने की तैयारी हुई है.’ झामुमो के ही दूसरे विधायक नलिन सोरेन कहते हैं, ‘यह अध्यादेश अमीरों के लिए है.’ विधानसभा अध्यक्ष सीपी सिंह भी इस अध्यादेश को अधूरा बता रहे हैं.

यानी अर्जुन मुंडा लगातार घिरते हुए दिख रहे हैं. बहुत हद तक अपनों के घात-प्रतिघात ने ही उनके आसपास भंवरजाल बनाना शुरू कर दिया है. यशवंत सिन्हा, सीपी सिंह, रघुवर दास जैसे नेता पहले ही रांची में धरने से लेकर दिल्ली दरबार में दस्तक के जरिए अपना विरोध जता चुके हैं. बाद के दिनों में भाजपा और अर्जुन मुंडा के सिपहसलार रहे प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता संजय सेठ और पूर्व विधायक चंद्रेश उरांव के बहाने पार्टी में व्याप्त असंतोष और अंतर्कलह भी सामने आया.

इन सबके बीच अतिक्रमण की बिसात पर जो राजनीतिक मोहरे बिछाए गए उसमें हर किसी ने राजनीतिक फसल काटने की कोशिश की. प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड विकास मोर्चा के प्रमुख बाबूलाल मरांडी ने अनशन की राजनीति करके एक साथ कई निशाने साधने की कोशिश की. बाबूलाल राजधानी रांची के मोरहाबादी मैदान में 150 घंटे तक आमरण अनशन पर बैठे रहे और अनशन से ही भाजपा-कांग्रेस सबकी राजनीतिक चालों को साधते दिखे. उसी अनशन स्थल पर भाजपा नेता और विधानसभा अध्यक्ष सीपी सिंह पहुंचे तो पार्टी में बड़ा बवाल मचा, लेकिन सीपी सिंह अब राज्य के वरिष्ठ नेताओं की श्रेणी में आते हैं, इसलिए पार्टी कसमसाकर रह गई. सवाल-जवाब भी न किया जा सका. वहीं भाजपा प्रवक्ता संजय सेठ और पूर्व विधायक चंद्रेश उरांव का राजनीतिक कद सीपी सिंह की तरह बड़ा नहीं था, इसलिए अनशन स्थल पर पहुंचने के एवज में उन्हें बाहर का रास्ता देखना पड़ा. खार खाए संजय को अब भाजपा में तमाम बुराइयां दिखने लगी हैं. वे कहते  हैं, ‘सरकार गरीबों पर बुलडोजर चलाने वाली है, इसे कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है.’ सेठ अपनी बात में एक लाइन और जोड़ते हैं, ‘बाबूलाल गरीबों के नेता हैं.’

भाजपा के सहारे राजनीतिक पहचान बनाने वाले संजय सेठ अब उस दल के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी बाबूलाल में मसीहाई छवि तलाश रहे हैं तो इसके राजनीतिक मायने भी कोई कम नहीं हैं. पूर्व विधायक चंद्रेश उरांव तो सेठ से भी दो कदम आगे निकले. भाजपा से हटने के बाद उन्होंने बजाप्ता सिर मुंडवा लिया है और वे कहते हैं कि उन्होंने शुद्धिक

आधे हथियार और मिट्टी से इश्क : शागिर्द

फिल्‍म शागिर्द
निर्देशक 
तिग्मांशु धूलिया     
कलाकार
नाना पाटेकर, जाकिर हुसैन, मोहित अहलावत, अनुराग कश्यप

तिग्मांशु धूलिया के पास कुछ ऐसी चीजें हैं जो उनकी शैली की फिल्में बनाने वाले समकालीन फिल्मकारों के पास उस तरह से नहीं हैं. अनुराग और विशाल के पास आपराधिक डार्क ह्यूमर हैं लेकिन अनुराग उनकी कहानियां कहते-कहते थोड़ा शहर की तरफ बढ़ जाते हैं और विशाल गांव की तरफ. अपनी पहली फिल्म ‘हासिल’ की तरह तिग्मांशु छोटे शहर या कस्बे को बेहद विश्वसनीय ढंग से दिखाते हैं. हैरत की बात यह है कि इस बार वे पुरानी दिल्ली में उसे खोजते हैं. इस तरह उनकी पूरी फिल्म मिट्टी के रंग की हो जाती है.  ‘शागिर्द’ के कई महत्वपूर्ण सीक्वेंस दिल्ली के ऐसे ही खंडहर किलों, पुरानी दिल्ली के गोदामों या टूटे दरवाजे वाले घरों के आसपास हैं. तिग्मांशु की अच्छी बात यही है कि कहानी फिल्माने का उनका एक मौलिक स्वर है. लेकिन ‘शागिर्द’ वहां बिखरती है, जहां उसके सामने सवाल आता है कि सेट तैयार है और मूड भी, लेकिन अब अपनी कहानी कहो. तब तिग्मांशु जैसे अस्सी या नब्बे के दशक की उन कहानियों की तरफ जाते हैं जिनमें एक मंत्री या नेता को राजनीति का प्रतिनिधि दिखाया जाता था, एक पुलिस अफसर को पुलिस का और उनकी यारी या दुश्मनी की कहानी कही जाती थी. इसीलिए तिग्मांशु के पास मजेदार जमीनी डायलॉग तो हैं लेकिन कहानी उनकी अपनी नहीं लगती. इसलिए न तो वह वैसी सिहरन पैदा कर पाती है जैसा नैतिकता के सवाल में न फंसी हुई किसी फिल्म को करना चाहिए और न ही अपने किरदारों से मोह जगा पाती है.  गलियों और सड़क के कुछ दृश्य आपको बेहद खूबसूरत लगते हैं और उनके और कुछ अच्छे डायलॉग्स, अच्छे अभिनेताओं के सहारे आप फिल्म देखते जाते हैं. लेकिन फिल्म में पत्रकार बनी रिमी सेन जब पुलिस पर भ्रष्ट होने का आरोप लगाकर चिल्लाती हैं तो वह बहुत बार सुनी बात लगती है. स्टिंग ऑपरेशन और फिल्में ही हमें इतना कुछ दिखा चुके हैं कि किसी नेता का अपने स्वार्थ के लिए अपने ही किसी भी आदमी को मरवा देना तक हमें चौंकाता नहीं. फिल्म जितनी गोलियां खर्च करती है, उतनी क्रूर होने की बजाय साधारण होती जाती है.

लेकिन शागिर्द के पास नाना पाटेकर हैं जो ‘अब तक छप्पन’ के अपने किरदार के एक विस्तार में ही हैं लेकिन कहीं-कहीं नयी तरह से मंत्रमुग्ध करते हैं. उनसे भी ज्यादा मुग्ध जाकिर हुसैन करते हैं जिन्हें देखा जाना अभी बाकी है और उन्हें इससे पहले शायद ही इतना महत्वपूर्ण किरदार मिला हो. मोहित अहलावत बस इतना करते हैं कि काम बिगाड़ते नहीं, लेकिन कहीं-कहीं तो वे सहजता से खड़े भी नहीं हो पाते. ‘आई एम’ में कमजोर पड़े अनुराग कश्यप अपने पहले बड़े किरदार में पास हो जाते हैं.

तिग्मांशु की एक कमी और रही. गाना तो था ही नहीं, बैकग्राउंड संगीत भी कहीं फिल्म में कुछ जोड़ता नहीं. जबकि अनुराग और विशाल की ऐसी फिल्मों में संगीत ही काफी असर पैदा करता है. इसीलिए लगता है कि तिग्मांशु आधे हथियार लेकर क्यों उतरे हैं?  

-गौरव सोलंकी

शिक्षा पर भारी ठेकेदारी

मुसलमानों को अच्छी तालीम मुहैया कराने के मकसद से सर सैय्यद अहमद खां ने अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय (एएमयू) की स्थापना की थी. लेकिन पिछले 30 वर्षों के दौरान एक नहीं बल्कि कई बार ऐसे मौके आए हैं जब शिक्षकों और छात्रों के दो गुटों द्वारा इस संस्था को राजनीति का अखाड़ा बनाने के आरोप लगे हैं. कई बार बात इससे भी आगे गई है और इल्जाम लगा है कि निर्माण कार्यों के ठेके से लेकर छात्रों के एडमिशन में पैसा वसूलने के रूप में विश्वविद्यालय काली कमाई का एक बहुत बड़ा जरिया बन गया है. अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर मदीउर्रहमान बताते हैं, ‘इस जरिये पर काबिज होने के लिए शिक्षकों और छात्रों के दो गुटों में कई साल से तलवारे खिंची हुई हैं. जिस गुट के लोगों को ठेके मिल जाते हैं वह कुलपति के पक्ष में खड़ा होता है और जिसे ठेके नहीं मिल पाते वो वीसी व उनके सहयोगी गुट के खिलाफ खड़ा हो जाता है. शिक्षकों के गुट छात्रों को अपना हथियार बनाते हैं.’ एएमयू के पूर्व छात्र माजिन बताते हैं कि साइकिल स्टैंड, कैंटीन, कैंपस में दुकानों, गार्डों की वर्दी आदि के ठेके पाने के लिए शिक्षकों में होड़-सी लगी रहती है और इस तरह के ठेके इंतजामिया के रिश्तेदार व उनसे जुडे़ लोगों को ही दिए जाते हैं.

हाल ही में हुई एक हिंसक घटना से यह मुद्दा फिर सुर्खियों में आ गया. 28 अप्रैल की रात जब एक छात्र नेता मुश्ताक अपने पांच साथियों के साथ कंट्रोलर प्रो परवेज और डिप्टी कंट्रोलर रिजवानुर्रहमान के पास एक छात्र का एडमिशन खारिज होने का कारण पूछने गए तो उनके बीच विवाद इतना बढ़ गया कि रिजवानुरहमान और मुश्ताक में मारपीट  हो गई. मारपीट की सूचना मिलने पर कंट्रोलर ऑफिस पर मुश्ताक के पक्ष में छात्र इकट्ठे होने शुरू हो गए. इसके जवाब में छात्रों का एक गुट कंट्रोलर और डिप्टी कंट्रोलर के पक्ष में भी आ खड़ा हुआ. जिला प्रशासन के आला अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर मामला शांत करवाया.

बताया जाता है कि इस घटना के बाद छात्रों का एक गुट लगातार कंट्रोलर और डिप्टी कंट्रोलर को हटाने की मांग कर रहा था और अध्यापकों का एक गुट इनका समर्थन कर रहा था. वहीं दूसरी ओर कंट्रोलर व डिप्टी कंट्रोलर को भी दूसरे गुट से सहयोग मिल रहा था. यहीं से वर्चस्व की यह लड़ाई शुरू हो गई. 29 अप्रैल की शाम मेडिकल रोड स्थित जकरिया मार्केट पर छात्रों के एक गुट ने दूसरे पर हमला बोल दिया. मौके पर पहुंचे पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने मामला शांत कराया. इस घटना के बाद छात्रों का एक गुट अपनी बात रखने के लिए प्रॉक्टर कार्यालय पहुंचा. इसी दौरान छात्रों के दूसरे गुट ने प्रॉक्टर कार्यालय को घेर लिया. कुछ देर बाद दोनों ओर से फायरिंग शुरू हो गई. लगभग दो घंटे तक चले इस खूनी टकराव में नौ छात्र घायल हुए. इसके बाद एएमयू के कार्यवाहक कुलपति प्रो अबरार हसन ने एएमयू को अनिश्चितकाल के लिए बंद करने का फैसला लिया और छात्रों को कैंपस खाली करने के लिए 48 घंटे का समय दिया गया. टकराव से पहले शिकायत दर्ज कराने प्रॉक्टर कार्यालय पहुंचे छात्रों में से एक बुरहान खान कहते हैं, ‘हम मेडिकल पर हुई झड़प की शिकायत करने प्रॉक्टर प्रो. मुजाहिद बेग से करने आए थे. हम लोग यहां पर आए हैं इसकी जानकारी दूसरे गुट को कैसे हो गई? हमें पूरा विश्वास है कि इसकी जानकारी खुद मुजाहिद बेग ने दूसरे गुट को दी होगी. दूसरे गुट ने वहां पहुंचकर हमारे ऊपर फायरिंग शुरू कर दी. हम प्राक्टर से गुहार लगाते रहे कि आप पुलिस को फोन करें और हमें बचाएं पर बेग साहब ने हमारी एक न सुनी और वह खुद अपने कार्यालय के पीछे के गेट से भाग खडे़ हुए.’ बुरहान बताते हैं कि छात्रों के दो गुटों में हुई लड़ाई की वजह प्रॉक्टर बेग ही हैं जो कंट्रोलर को हटाना चाहते हैं.

इस खूनी टकराव से पहले इन सभी छात्रों ने मिलकर छात्र संघ चुनाव कराने को लेकर तकरीबन दो महीने तक ऐतिहासिक धरना चलाया था. तब कोई भी छात्र गुट हावी नहीं था. सभी एक साथ थे. छात्र संघ बनने के बाद छात्र गुटों में बंट जाएंगे इसका अंदेशा तो सभी को था लेकिन यह इतनी जल्दी हो जाएगा ऐसी उम्मीद लोगों को न थी.

बेग कुछ दिनों पहले ही प्रॉक्टर बने हैं और उन्हें लगातार विरोधों का सामना करना पड़ रहा है. बेग का विवादों से पुराना नाता है. जब वे छात्र थे तब उन्होंने पास होने के लिए अपने शिक्षक डाॅ अबु कमर के घर जाकर उनकी पत्नी पर रिवाल्वर तान दी थी. डॉ कमर ने पुलिस में लिखित शिकायत दर्ज कराई थी और बेग को निलंबित कर दिया गया था. तीन साल पहले एएमयू में जरनल बॉडी की मीटिंग के दौरान उन पर महिला शिक्षक रिहान रजा से छेड़खानी का भी आरोप लगा था. इसके बावजूद उन्हें इतना अहम ओहदा मिलना कई शिक्षकों और छात्रों को हैरान कर रहा है.

निर्माण कार्यों के ठेके से लेकर छात्रों के एडमिशन में पैसा वसूलने के रूप में विश्वविद्यालय काली कमाई का एक बहुत बड़ा जरिया बन गया है

छात्रों में हुए खूनी टकराव के बाद एएमयू में की गई साइनडाई के विरोध में एएमयू टीचर्स एसोसिएशन (अमुटा) ने स्टाफ क्लब के सामने अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया. उनकी मांग थी कि साइनडाई समाप्त हो और कुलपति व प्रॉक्टर भी अपने पद से इस्तीफा दें. अमुटा के अध्यक्ष प्रो. अब्दुल कय्यूम कहते हैं, ‘छात्र संघ के चुनाव के बाद कुछ छात्रों की खरीद-फरोख्त हुई. प्रॉक्टर ने दबंग छात्र अपने पास रखे व कुछ कंट्रोलर से जुड़ गए. यह बवाल इसी का नतीजा है.’ शिक्षकों का धरना चल ही रहा था कि छात्र संघ ने भी साइनडाई के विरोध में अपना तंबू गाड़ दिया. छात्र संघ के अध्यक्ष अबु अफ्फान फारुखी कहते हैं, ‘आखिरकार ऐसा माहौल क्यों बनता है कि इंतजामिया को हर साल एएमयू में साइनडाई करनी पड़ती है? इस साइनडाई की जांच क्यों नहीं होती? यह सब प्रॉक्टर बेग की चाल है.’ वे चाहते हैं कि एएमयू में एक ही तरह की सोच के लोग रहें जिससे उनका धंधा चल सके.

उधर, चारों तरफ से विरोध झेल रहे प्रॉक्टर मुजाहिद बेग खुद को निर्दोष बताते हैं. वे कहते हैं, ‘मैं छात्र जीवन से ही सही बात के लिए लड़ रहा हूं. हम लोगों का एक गुट है और हम गलत चीजों के विरोध में लड़ते आए हैं इसलिए हमसे कुछ लोग भय खाते हैं. मेरे खिलाफ दो रिपोर्टें हुई हैं और मैं दोनों मामलों में बरी हुआ. मेरे और मेरे साथ के लोगों पर झूठे केस लगवाए जाते हैं. एक गुट है जो पिछले 30 सालों से एएमयू को चूस रहा है. यहां सारे ठेके इस गुट को जाते थे. ये लोग करोड़ों कमाते थे. अब इनकी कमाई वीसी साहब ने बंद कर दी है. अब इस गुट के शिक्षकों ने वीसी पर भी झूठे केस लगाना शुरू कर दिया है.’ कैंपस में अफवाह यह भी है कि इंतजामिया से जुडे़ अफसरों के बच्चों को दाखिला दिलाने के लिए भी कंट्रोलर को हटाने की कोशिश की जा रही है.

शिक्षकों और छात्रसंघ का बढ़ता दबाव काम आया और वीसी पीके अब्दुल अजीज ने 16 मई को एएमयू खोलने का आदेश जारी कर दिया. उनका कहना है कि जिस समय छात्रों के बीच टकराव हुआ तब वे केरल में थे. उनके मुताबिक साइनडाई का फैसला इसलिए लिया गया कि हालात बहुत नाजुक थे और वे कैंपस में खून की एक बूंद भी देखना नहीं चाहते थे. वे कहते हैं कि किसी भी छात्र का सत्र बर्बाद नहीं. होने दिया जाएगा. कुलपति ने 29 अप्रैल की रात कैंपस में हुए बवाल के सिलसिले में 38 छात्रों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है और उनके कैंपस में प्रवेश पर भी रोक लगा दी गई है.

लेकिन सवाल उठता है कि बीमारी की वजहों की बजाय सिर्फ उसके लक्षणों का इलाज करने से क्या होगा.

ताजा हुए सवाल

‘ऐसा लग रहा था जैसे अचानक मैं किसी फिल्म की शूटिंग का हिस्सा बन गया हूं. वे मुझे जाड़ों में नंगा करके बर्फ के ठंडे पानी से भिगोते थे और रबड़ के टुकड़े से तब तक मारते थे जब तक मुझमें बोलने की ताकत बची रहती थी. वे मुझसे बुलवाना चाहते थे कि मैं मुख्तार उर्फ राजू हूं, जिसने 2007 में बनारस, फैजाबाद और लखनऊ कचहरी में हुए धमाकों की साजिश रची है. फिल्मों का शौकीन होने की वजह से मुझे ऐसे सीन वाली कई फिल्में याद हैं, लेकिन मेरे साथ जो हुआ वह उन सभी फिल्मों के सारे दृश्यों से ज्यादा भयावह था.’

कोलकाता की कलकत्ता इलेक्ट्रिक सप्लायर्स कंपनी में टेक्नीशियन 29 साल के आफताब आलम अंसारी के ये शब्द आतंकवाद से लड़ाई का दावा करने वाली उत्तर प्रदेश एसटीएफ को कटघरे में खड़ा करते हैं. गोरखपुर के रहने वाले आफताब को उत्तर प्रदेश एसटीएफ ने नवंबर, 2007 में सूबे के अलग-अलग शहरों की कचहरी में हुए ब्लास्ट का मास्टरमाइंड मुख्तार उर्फ राजू होने के आरोप में दिसंबर, 2007 में गिरफ्तार किया था. उसे बांग्लादेश निवासी और हूजी का आतंकवादी बताया गया था. अंसारी को मुख्तार उर्फ राजू साबित करने के लिए एसटीएफ ने सारे हथकंडे अपना डाले थे, लेकिन आखिर में 16 जनवरी, 2008 को कोर्ट ने एसटीएफ की सारी कहानी को फर्जी बताते हुए आफताब को बाइज्जत बरी कर दिया था.

हूजी का आतंकवादी करार दिए गए आफताब को 22 दिन बाद ही कोर्ट के आदेश पर बरी कर दिया गया था

कुछ इसी तर्ज पर पिछले महीने की 14 तारीख को कचहरी ब्लास्ट के मामले में उत्तर प्रदेश एसटीएफ को एक बार फिर कोर्ट में शर्मसार होना पड़ा. इस मामले में कश्मीर से गिरफ्तार किए गए सज्जादुर्रहमान वानी, जिस पर कचहरी में विस्फोटक रखने का आरोप था, को अदालत ने लखनऊ वाले मामले में बाइज्जत बरी कर दिया. फैजाबाद मामले में सज्जादुर्रहमान की संलिप्तता को लेकर सुनवाई जारी है.

सज्जादुर्रहमान के बरी होने के बाद कचहरी ब्लास्ट मामले में यूपीएसटीएफ की तरफ से की गई गिरफ्तारियों पर फिर सवाल उठ रहे हैं. मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल सहित कई संगठनों ने एसटीएफ की निष्पक्षता और कार्यशैली पर कड़ा ऐतराज जताया है.

गौरतलब है कि 2007 में लखनऊ, फैजाबाद और बनारस की कचहरी में हुए धमाकों के तुरंत बाद उत्तर प्रदेश एसटीएफ ने देश के अलग-अलग हिस्से से पांच मुसलिम युवकों की गिरफ्तारी की थी. ये थे तारिक कासमी, खालिद मुजाहिद, आफताब आलम, मो. अख्तर और सज्जादुर्रहमान वानी. शुरुआत से ही ये गिरफ्तारियां संदेह के घेरे में रही थीं. आफताब को हूजी का आतंकवादी मुख्तार उर्फ राजू बताते हुए कोलकाता से गिरफ्तार किया गया, लेकिन 22 दिन बाद ही कोर्ट के आदेश पर उसे बरी कर दिया गया. इसके अलावा मो. अख्तर और सज्जादुर्रहमान वानी को कश्मीर से गिरफ्तार किया गया था. सज्जादुर्रहमान दारुलउलूम देवबंद में पढ़ाई कर रहा था और जब उसे गिरफ्तार किया गया तब वह बकरीद की छुट्टियों में घर गया हुआ था. इस बात को न सिर्फ दारुलउलूम ने माना बल्कि उपस्थिति रजिस्टर के आधार पर इस बात की पुष्टि भी की कि सज्जाद 17 नवंबर से 30 नवंबर तक दारुलउलूम में ही था. दारुलउलूम की तरफ से इससे एक प्रमाण पत्र भी जारी किया गया. इसके बाद सज्जाद की गिरफ्तारी का भी चौतरफा विरोध होने लगा. सज्जाद के पिता गुलाम कादिर वानी ने लखनऊ आकर बेटे की गिरफ्तारी के विरोध में धरना शुरू किया. दो अन्य आरोपितों तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद की गिरफ्तारी पर तो इतने सवाल उठे कि सरकार को इसकी जांच के लिए जस्टिस निमेष आयोग का गठन करना पड़ा.

तारिक और खालिद को एसटीएफ ने 22 दिसंबर, 2007 को बाराबंकी रेलवे स्टेशन से भारी मात्रा में विस्फोटक के साथ गिरफ्तार करने का दावा किया था. लेकिन इस गिरफ्तारी को लेकर भी तुरंत ही सवालिया निशान खड़े हो गए क्योंकि तारिक को 12 दिसंबर को ही कथित तौर पर एसटीएफ के लोगों ने आजमगढ़ से ही उठा लिया था. 14 तारीख को ही तारिक की गुमशुदगी की रिपोर्ट थाना रानी की सराय में भी दर्ज हो गई थी. तारिक के घरवालों ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक, प्रमुख सचिव (गृह), मानवाधिकार आयोग आदि को पत्र लिखकर इस मामले में पुलिस कार्रवाई को संदिग्ध बताते हुए तारिक का पता जल्द लगाए जाने की मांग की थी. दूसरे अभियुक्त खालिद को भी एसटीएफ ने इसी तरह 16 दिसंबर को ही उठा लिया था. इस बात की पुष्टि खालिद के चाचा मोहम्मद जहीर आलम फलाही की तरफ से सूचना के अधिकार के तहत क्षेत्राधिकारी मड़ियाहू से मांगी गई जानकारी के जवाब से हुई. इसमें उन्होंने माना है कि खालिद को 16 तारीख को उत्तर प्रदेश एसटीएफ ने गिरफ्तार किया था. ऐसे में बाराबंकी स्टेशन वाली पुलिस की कहानी खुद ही सवालों के घेरे में आ गई.

उधर, जस्टिस निमेष आयोग को गठन के छह महीने के अंदर ही अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपनी थी लेकिन तीन साल बाद भी आयोग किसी अंतिम नतीजे पर नहीं पहुंचा है. जांच आज भी पूरी नहीं हुई है.

सज्जादुर्रहमान के बरी होने के बाद मानवाधिकार संगठन एक बार फिर से उत्तर प्रदेश एसटीएफ के गिरफ्तारी के तरीके और इकबालिया बयान पर सवाल उठाने लगे हैं. सज्जादुर्रहमान वानी को बरी करने के अपने फैसले में अदालत ने साफ कहा कि पुलिस के सामने दिए गए इकबालिया बयान के अतिरिक्त दूसरा कोई भी साक्ष्य ऐसा नहीं है जिससे सज्जाद पर लगाए गए आरोप साबित होते हों.

कचहरीधमाकों के आरोपितों के लिए लंबी लड़ाई लड़ रहे पीयूसीएल से जुड़े वकील मो. शोएब कहते हैं, ‘लखनऊ के मामले में सज्जादुर्रहमान को बरी कर दिया गया है. हमें उम्मीद है कि जल्द ही फैजाबाद वाले मामले में भी उसे बरी कर दिया जाएगा. एसटीएफ के इकबालिया बयान की सच्चाई पहले आफताब आलम और अब सज्जाद के मामले से जगजाहिर हो चुकी है.’ शोएब कचहरी ब्लास्ट के आरोपितों का केस लड़ने की वजह से खासे चर्चित रहे हैं. उस दौर में जब उत्तर प्रदेश के अलग अलग बार एसोसिएशन आतंकी घटनाओं के आरोपितों का केस न लड़ने का प्रस्ताव पास कर रही थीं, शोएब अकेले ऐसे वकील थे जिन्होंने आफताब के परिजनों की गुहार पर उसका केस बिना फीस के लड़ने की हिम्मत दिखाई थी और आफताब को बाइज्जत बरी भी करवाया था. यही नहीं आतंकी घटनाओं के आरोपितों का केस लड़ने की वजह से उन पर अगस्त, 2008 में लखनऊ न्यायालय परिसर के अंदर ही वकीलों ने जानलेवा हमला भी किया था और उन पर पाकिस्तान का समर्थक होने जैसी टिप्पणियां भी की गई थीं.

इस बारे में बात करने पर शोएब कहते हैं,  ‘उस समय तक आतंकी घटनाओं के बारे में पुलिस के वर्जन को सच मान लेने का चलन था. यूपीकोका के लिए भी माहौल तैयार किया जा रहा था ताकि पुलिस के सामने दिए गए इकबालिया बयान से ही अभियुक्तों को मुजरिम साबित किया जा सके. ऐसे में अगर अभियुक्त का केस कोई न लड़े तो पुलिस की राह आसान हो जाती. इसलिए यह हमला एक सोची-समझी रणनीति के तहत हुआ था.’ शोएब आशंका जताते हैं कि कचहरी धमाकों के पीछे हिंदुत्ववादी ताकतों का हाथ भी हो सकता है क्योंकि कचहरी धमाकों के बाद की गई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में तत्कालीन एडीजी (कानून एवं व्यवस्था) बृजलाल ने खुद ही पत्रकारों से कहा था कि कचहरी धमाके हैदराबाद की मक्का मस्जिद धमाकों से मिलते-जुलते हैं. वे कहते हैं, ‘अब जब यह साबित हो चुका है कि मक्का मस्जिद धमाकों में हिंदुत्ववादी ताकतों का हाथ था तो उत्तर प्रदेश एसटीएफ इस बिंदु को केंद्र में रखकर कचहरी धमाकों की जांच क्यों नहीं करती?’

तहलका ने कचहरी धमाकों की गिरफ्तारियों के बारे में डीजी (कानून एवं व्यवस्था) बृजलाल से बात की तो उन्होंने इस तरह की संभावनाओं को सिरे से खारिज कर दिया. उनका कहना था, ‘हमारी जांच एकदम सही है और कचहरी ब्लास्ट में किसी हिंदूवादी संगठन की भूमिका नहीं है. हमारी जांच पर सवाल उठाने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी और छद्मधर्मनिरपेक्ष लोगों से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता.’

उन्हें भले ही इन सवालों से फर्क न पड़ता हो लेकिन उनकी ‘सही’ जांच से किसी आफताब आलम या सज्जाद वानी को कितना फर्क पड़ता है यह तो साफ हो ही चुका है.

तीरथ की ताड़ना

चार धाम यात्रा के लिए लाखों श्रद्घालुओं के उत्तराखंड पहुंचने की उम्मीद है. लेकिन पिछले साल की भीषण आपदा से बर्बाद सड़कों पर अब भी कई जगहें ऐसी हैं जो तीर्थयात्रियों के जीवन को संकट में डाल सकती हैं. महिपाल कुंवर की रिपोर्ट

उत्तराखंड में भले ही अब यात्रियों को चार धाम की यात्रा पहले की तरह पैदल चलकर नहीं करनी पड़ती हो लेकिन ऐसा नहीं है कि इससे उनकी मुश्किलें खत्म हो गई हैं. सड़कों और परिवहन व्यवस्था की जो हालत है उससे इन यात्रियों को तो परेशानी हो ही रही है स्थानीय लोग भी बेहाल हैं.

रास्ता चौड़ा करने के लिए डायनामाइट से किए जा रहे विस्फोटों और पिछले साल भारी बारिश से हुए भूस्खलन के कारण चार धाम यात्रा मार्ग का हाल खस्ता है. दिल्ली से माणा तक जाने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग 58 हो या रुद्रप्रयाग से गौरीकुंड जाने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग 109 या फिर गंगोत्री तक  जाने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग 94 व 108, सबकी हालत कमोबेश एक जैसी है. आपदा के नौ महीने बाद भी इन मार्गों पर सुधार कार्य ठीक से नहीं हुए हैं. इसके चलते चार धाम यात्रा मार्ग में कई स्थानों पर स्थिति खतरनाक बनी हुई है. हालत यह है कि एक भी यात्रा मार्ग के बारे में सरकारी मशीनरी यह दावा नहीं कर सकती कि उसकी व्यवस्था चाक-चौबंद है और वह पूरे यात्रा काल के लिए सुरक्षित है.

राज्य के पर्वतीय जिलों में सड़कों का 23,673 किलोमीटर लंबा जाल फैला है. इनमें से लगभग 3,000 किमी लंबे सड़क मार्गों से होकर चार धाम यात्रा गुजरती है. इन सड़कों के निर्माण व रखरखाव की जिम्मेदारी लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी)  के साथ-साथ सीमा सड़क संगठन की भी है. वर्ष 2008 में एक जनहित याचिका के जवाब में पीडब्ल्यूडी ने नैनीताल हाई कोर्ट को बताया कि यात्रा के दौरान चार धाम जाने वाले श्रद्धालुओं के वाहनों को करीब 551 खतरनाक मोड़ों से होकर गुजरना पड़ता है. उस समय पीडब्ल्यूूडी ने हाई कोर्ट को आश्वस्त किया था कि विभाग 227 खतरनाक जगहों पर सुरक्षा के कार्य स्वयं करेगा. बाकी बचे हुए 324 स्थानों पर इस काम की जिम्मेदारी सीमा सड़क संगठन की शिवालिक परियोजना की थी. सीमा सड़क संगठन के अधिशासी अभियंता जीएस राणा के अनुसार शिवालिक परियोजना ने इन मोड़ों पर सुरक्षात्मक उपाय कर लिए थे परंतु बीते साल आपदा के कहर ने इन सुरक्षात्मक कार्यों को  फिर से धराशायी कर दिया.

इनके अलावा सीमा सड़क संगठन बल द्वारा बदरीनाथ-केदारनाथ व यमुनोत्री-गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग में कई जगहों पर निमार्ण कार्य जारी हैं. राणा बताते हैं कि ऋषिकेश से बदरीनाथ तक जाने वाला 300 किमी लंबा, रुद्रप्रयाग से गौरीकुंड तक 76 किमी लंबा व ऋषिकेश से गंगोत्री तक 124 किमी मार्ग फिलहाल वाहनों के आवागमन के लिए साफ है. वे बताते हैं कि राजमार्ग को चौड़ा करके डबल लेन बनाने का काम भी तेजी से चल रहा है जिस कारण यात्रियों को फौरी परेशानी हो रही है. वे स्वीकार करते हैं कि भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों में सड़कें टूट जाने के कारण कहीं-कहीं पर मार्ग ऊबड़-खाबड़ हो रखे हैं परंतु सुधार कार्य भी
तेजी से चल रहा है.

कई किलोमीटर तक सड़कें टूटी पड़ी हैं. सरकारी मशीनरी ने इन्हें बिना डामरीकरण के कामचलाऊ बना दिया है.

सीमा सड़क संगठन की 66 आरसीसी के ओसी पीके आजाद बताते हैं, ‘पिछले साल की आपदा और भारी बरसात से जर्जर ऋषिकेश-बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग को सुधारा जा रहा है जिसमें देवप्रयाग से कीर्तिगर व गौचर से नगरासू के बीच चट्टानें तोड़कर सड़क चौड़ीकरण का काम चल रहा है. इस चौड़ीकरण के कारण जाम की स्थिति बन रही है.’ यात्रा सीजन के दौरान सड़क चौड़ीकरण के चलते तीर्थ यात्री जाम में फंसकर घंटों तक आने-जाने के लिए अपनी बारी का इंतजार करने को मजबूर हो रहे हैं. राणा बताते हैं, ‘अब इस काम को भी रात में शुरू करने की योजना बनाई जा रही है ताकि यात्रा बाधित न हो और चार धाम यात्रा के दौरान सड़क पर लगने वाले घंटों के जाम की स्थिति न बने.’   

रुद्रप्रयाग के व्यवसायी उपेंद्र बिष्ट कहते हैं कि पिछले साल आई विनाशकारी आपदा के कारण सड़कों की स्थिति बेहद खस्ताहाल है. उनके अनुसार कई किलोमीटर तक यात्रा मार्ग की सड़कें टूटी पड़ी हैं. सरकारी मशीनरी ने यात्रा मार्ग को बिना डामरीकरण के कामचलाऊ बना दिया है. ऊबड़-खाबड़ मार्गों पर धूल उड़ने से यात्रियों को ही नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों को भी खासी परेशानियां हो रही हैं.

उत्तरकाशी जिले के निवासी लोकेंद्र बिष्ट बताते हैं कि चिन्यालीसौड़ से डूंडा, भटवाड़ी-गंगनाली, गंगनाली-सूखीखाल और भैरोंघाटी से गंगोत्री के बीच कई किलोमीटर तक गंगोत्री यात्रा मार्ग की बेहद जर्जर स्थिति बनी हुई है. ऐसे ऊबड़-खाबड़ यात्रा मार्ग में यात्री जोखिम से भरी यात्रा करने के लिए मजबूर हैं. वे बताते हैं कि यमुनोत्री मार्ग पर भी धरासू बैंड से ब्रह्मखाल, बड़कोट के बीच कई  किलोमीटर की दूरी पर सड़क खस्ताहाल हो रखी है. उत्तरकाशी के पत्रकार संतोष भट्ट बताते हैं , ‘यमुनोत्री-गंगोत्री यात्रा मार्ग बेहद खराब स्थिति में है. इस मार्ग पर से केवल आपदा के समय आए हुए मलबे को हटाया गया है. बाकी सड़कों के पुस्ते व भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों में राष्ट्रीय राजमार्ग के बुरे हाल हैं. इस सड़क पर  जान का जोखिम उठाकर यात्री आजकल यात्रा कर रहे हैं.’ लोक निर्माण विभाग के अलावा परिवहन विभाग ने भी चार धाम यात्रा मार्ग पर 315 खतरनाक स्थान चिह्नित किए हैं. इसे सरकारी मशीनरी की बदइंतजामी ही कहें कि यात्रा शुरू होने के बाद भी इन स्थानों पर सावधानी प्रदर्शित करने के लिए बोर्ड भी अभी तक नहीं लग पाए हैं.

यात्रा मार्गों पर चलने के बाद यह बात आसानी से समझ में आ जाती है कि हर साल सरकारी महकमों की कई दौर की बैठकों के बाद भी यात्रा व्यवस्थाएं अभी तक चाक-चौबंद नहीं हो पाई हैं. यात्रा शुरू होने के महीनों पहले से हर साल विभिन्न विभागों की बैठकें होती हैं ताकि चार धामों के दर्शन करने आने वाले तीर्थ यात्रियों के लिए उचित व्यवस्था हो सके, लेकिन यात्रा शुरू होने के बाद सड़क मार्ग पर ही नहीं यात्रा में पड़ने वाले पैदल मार्ग पर भी कदम-कदम पर अव्यवस्थाएं ही नजर आ रही हैं. गौरीकुंड से श्री केदारनाथ मंदिर तक 14 किमी लंबे पैदल मार्ग पर अभी तक स्ट्रीट लाइटों की भी व्यवस्था नहीं हो पाई है. 14 किमी लंबे इस पैदल मार्ग पर घोड़े-खच्चर मालिकों की जमकर मनमानी चल रही है. गुजरात से आए यात्री मनसुख भाई शाह का आरोप है कि मार्ग पर यात्रियों से निर्धारित शुल्क से अधिक किराया वसूला जा रहा है. नियमों के अनुसार दो घोड़ों के साथ एक मजदूर रखने की व्यवस्था है, लेकिन वास्तव में घोड़े-खच्चरों के मालिक कई घोड़ों के साथ एक ही मजदूर को भेज रहे हैं. जिसके कारण पैदल पहाड़ी मार्ग पर भगदड़ मचने की आशंका बनी रहती है. इन अव्यवस्थाओं को लेकर जिला पंचायत, रुद्रप्रयाग को जिम्मेदार माना जा रहा है. जिला पंचायत ही यात्रा के दौरान घोड़े-खच्चर व मजदूरों का पंजीकरण करती है.  रुद्रप्रयाग जिला पंचायत के अध्यक्ष चंडी प्रसाद भट्ट भी स्वीकार करते हैं कि केदारनाथ मंदिर जाने के लिए रास्ता बेहद दुर्गम है और यात्रियों को पहले ही इस मार्ग पर कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है, ऐसे में घोड़े-खच्चरों और पालकी वालों द्वारा यात्रियों को परेशान करने की किसी भी घटना को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. वे आश्वस्त करते हुए कहते हैं, ‘तय नियमों के विरुद्ध यात्रा मार्ग पर घोड़े-खच्चर व डोली-पालकी चलाने वालों का पंजीकरण ही निरस्त कर दिया जाएगा.’

चार धाम यात्रा में केवल यात्री ही परिवहन व्यवस्था और खराब सड़कों से परेशान नहीं होते हैं बल्कि यात्रा स्थानीय लोगों के लिए भी परेशानी लेकर आती है. उत्तराखंड में यात्रा सीजन भले ही वाहन मालिकों के लिए लाखों रुपये का लाभ कमाने का जरिया हो, परंतु स्थानीय लोगों के लिए यह आवागमन की मुसीबतें लेकर आता है. पिछले साल चार धामों की यात्रा पर देश के विभिन्न हिस्सों से 15 लाख से अिधक श्रद्घालु आए थे.  हर साल यात्रा में अधिकांश बसों के लगने से उत्तराखंड के मुख्य राजमार्गों से जुड़ने वाले संपर्क मार्गों पर चलने वाली बसों की संख्या कम हो जाती है जिसके कारण स्थानीय  लोगों को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.

यात्रा के शुरू होने के समय ही गर्मियों की छुट्टियां भी पड़ती हैं. इस समय उत्तराखंड के अधिकांश प्रवासी अपने बच्चों के साथ छुट्टियांे में अपने गांव-घर आते हैं. इसलिए संपर्क मार्गों पर जाने वाले स्थानीय लोगों की भीड़ और भी बढ़ जाती है. यात्रा काल में प्रशासन की प्राथमिकता देश भर से आने वाले यात्रियों के लिए बसों को उपलब्ध कराने की होती है. यात्रियों को बसों की कमी न हो इसके लिए प्रशासन संपर्क मार्गों पर चलने वाली अधिकांश बसों को चार धाम यात्रा में झोंक देता है. शीतकाल में जिन संपर्क मार्गों पर दसियों वाहन चलते हैं उन पर यात्रा काल में  दिन भर में मुश्किल से एकाध वाहन ही चल पाते हैं. नतीजतन स्थानीय लोगों को चिलचिलाती धूप में कई घंटों तक बसों के इंतजार में पसीना बहाना पड़ता है. तिलवाड़ा के सामाजिक कार्यकर्ता बीर सिंह रावत कहते हैं, ‘प्रशासन अभी भी यात्रा व्यवस्था और स्थानीय लोगों की सुविधाओं में समन्वय नहीं बैठा पाया है जिससे हर साल लिंक रोडों पर यातायात व्यवस्था गड़बड़ा जाती है.’ उनका आरोप है कि बसों की अनुपलब्धता के कारण रोज इन सड़कों पर चलने वाली स्थानीय जनता को  अपनी रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं की खरीददारी के लिए भी कई किलोमीटर तक पैदल ही आना-जाना पड़ता है या फिर घंटों टैक्सियों का इंतजार करना पड़ता है.

यात्रा सीजन भले ही वाहन मालिकों के लिए लाखों रुपये कमाने का जरिया हो, स्थानीय लोगों के लिए यह आवागमन की मुसीबतें लेकर आता है

इस संबंध में पूछने पर संयुक्त रोटेशन यात्रा व्यवस्था समिति ऋषिकेश, के अध्यक्ष महावीर सिंह रावत बताते हैं , ‘यात्रा काल के दौरान सभी कंपनियों की 40 प्रतिशत बसें स्थानीय लोगों के लिए सेवाएं देती हैं.’ टिहरी गढ़वाल मोटर ओनर्स एसोसिएशन  के  जनरल मैनेजर जितेंद्र सिंह नेगी बताते हैं कि लिंक मार्गों पर जीएमओयू व उनकी कंपनी की ही बसें चलती हैं. वे भी दावा करते हैं कि यात्रा सीजन में इन मार्गों पर चलने वाली 40 प्रतिशत बसें स्थानीय लोगों की परिवहन व्यवस्था के लिए छोड़ दी जाती है. वे बताते हैं कि संपर्क मार्गों पर चलने वाली 1,200 बसों में से यात्रा शुरू होते ही 400 बसें स्थानीय लोगों के लिए रह जाती हैं.

उधर गढ़वाल मोटर ओनर्स यूनियन के अध्यक्ष जीत सिंह पटवाल बताते हैं कि कोटद्वार, हरिद्वार, ऋषिकेश, पौड़ी, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग व गोपेश्वर डिपो में करीब 200 बसें चलती हैं. सीजन शुरू होने पर इनमें से 150 बसों को यात्रा मार्गों पर लगा दिया जाता है. मुख्यालय कोटद्वार में जीएमओयू कंपनी के पास 550 बसें हैं. पटवाल बताते हैं कि इस बार चार धाम यात्रा के लिए 350 बसें भेजी गई हैं.

यात्रा के लिए बसों का रजिस्ट्रेशन लॉटरी के माध्यम से किया जाता है. टीजीएमओ के जीएम जितेंद्र नेगी बताते हैं कि यात्रा के शुरू होने से पहले ही उनके पास संयुक्त रोटेशन यात्रा व्यवस्था समिति से बुकिंग आ जाती है. इस साल 9 मई तक उनकी 310 बसों से लगभग 12,40 यात्री चार धाम के लिए रवाना हो चुके हैं.

स्थानीय लोगों के लिए यात्रा काल में बसों की कम संख्या के विषय में पूछने पर बताते हैं, ‘यह समय ही हमारे कमाने का होता है’. उनका आरोप है कि वर्षों से यात्रा चलने के बाद भी अभी तक यात्रा प्रशासन ने यात्रियों की संख्या को नियंत्रित करना नहीं सीखा है जिस कारण कुछ दिनों तो बसों की संख्या कम पड़ जाती है और बाकी दिनों बसें खाली खड़ी रहती हैं. उनका आरोप है कि बिना ग्रीन कार्ड या इजाजत के राज्य से बाहर की सैकड़ों बसें भी बाहरी राज्यों से आकर गैरकानूनी ढंग से यात्रियों को ढोती हैं.

सरकार ने चार धाम यात्रा की जिम्मेदारी गढ़वाल के आयुक्त अजय सिंह नबियाल को दी है. यातायात की व्यवस्थाओं के विषय में पूछने पर नबियाल बताते हैं, ‘फिलहाल पिछले साल आपदा से आए मलबे को सड़कों से हटाकर उन्हें वाहन चलने योग्य बना दिया गया है. नया मलबा सड़कों पर न आए इसके लिए सीमा सड़क संगठन और लोक निर्माण विभाग को विस्फोट न करने के लिए कहा गया है.’ स्थानीय लोगों को वाहनों की उपलब्धता के विषय में नबियाल बताते हैं, ‘अभी यात्रा का दबाव कम है. यात्रा के बढ़ने पर कुमाऊं मोटर ओनर्स यूनियन (केमू) से 50 गािड़यां संपर्क मार्गों के लिए मांगी जाएंगी ताकि संपर्क मार्गों पर चलने वाले यात्रियों को असुविधा न हो. दावे कुछ भी हों यात्रा के गति पकड़ते ही हर साल परिवहन व्यवस्था चरमरा जाती है और परेशानी यात्रियों के साथ-साथ स्थानीय लोगों को भी भुगतनी होती है.

क्या दिग्विजय सिंह को पता है कि वे क्या कह रहे हैं?

गालिब ने कहा था छूटती कहां है कमबख्त मुंह से लगी हुई,  अंग्रेजी में इसके लिए ओल्ड हैबिट्स डाइ हार्ड का जुमला है और दोनों का लब्बोलुआब यह है कि पुरानी आदतें आसानी से पीछा नहीं छोड़तीं. साठ के दशक में इंदौर के प्रतिष्ठित डेली कॉलेज का एक छात्र जो राघोगढ़ राजपरिवार से ताल्लुक रखता था, आज अपनी उसी आदत से जूझ रहा है. दिग्विजय सिंह कॉलेज के जमाने में जितने शानदार खिलाड़ी क्रिकेट के थे उससे भी जोरदार हाथ वे स्क्वैश में दिखाते थे. कहा जाता है कि छह साल तक वे सेंट्रल इंडिया के जूनियर स्क्वैश चैंपियन भी थे. लेकिन उनके व्यक्तित्व का दूसरा पहलू यह है कि कॉलेज के जमाने में जितनी बार उन्हें अनुशासनहीनता संबंधी नोटिस भेजे गए उसका भी कोई मुकाबला नहीं है. ईमानदारी के चश्मे से देखें तो आज भी उनके बयान और काम-काज का तरीका अनुशासनहीनता के दायरे में ही आता है लेकिन जैसा कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सीडब्ल्यूसी के एक सदस्य कहते हैं, ‘देखते हैं पार्टी कब तक उनके इस रवैये को बर्दाश्त करती है. पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए अलग नियम और बड़े नेताओं के लिए अलग नियम तो नहीं होने चाहिए. आजकल जितने भी कार्यकर्ताओं से मेरी बात होती है सबकी चिंता बस यही होती है कि दिग्विजय सिंह की जुबान पर लगाम क्यों नहीं लगाई जा रही है.’

दिग्विजय सिंह का मकसद 2009 में सपा से कट कर कांग्रेस के पास आए मुसलमानों को 2012 तक अपने साथ जोड़े रखना है 

वर्तमान दिग्विजय सिंह के बनने की शुरुआत मध्य प्रदेश का अध्यक्ष बनने से हुई थी. वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई एक वाकये का उल्लेख करते हैं, ‘राजीव गांधी ने दिग्विजय को फोन करके बताया कि मैं तुम्हें प्रदेश अध्यक्ष बना रहा हूं. यह सुनकर वे इतने खुश हुए कि सीधे अपने राजनीतिक गुरु अर्जुन सिंह के पास पहुंच गए और उन्हें इसकी जानकारी दी. अगले ही दिन उनके पास फिर से राजीव गांधी का फोन आया और वे गुस्से से बोले कि तुमने अर्जुन सिंह को अध्यक्ष बनने की बात क्यों बताई. जाहिर-सी बात है राजीव के निर्णय से अर्जुन खुश नहीं थे.’ यह घटना दिग्गी के अतिउत्साही स्वभाव और बेरोकटोक बोले चले जाने का एक और नमूना है जिससे उनके पहली ही ऊंची छलांग में औंधे मुंह गिरने की नौबत आ गई थी. यह घटना उनके राजनीतिक जीवन का टर्निंग प्वाइंट भी थी. इसके बाद से ही शिष्य के गुरु के प्रति प्राकृतिक प्रेम का स्थान मैनेजमेंटी प्रेम ने ले लिया.

दिग्विजय सिंह की फिसलती जुबान एक-दो वाकयों की दास्तान नहीं है बल्कि सिलसिलेवार बयानों की पूरी शृंखला है और यह कहा जा सकता है कि गंगा में फिसले तो बंगाल की खाड़ी तक जा पहुंचे लेकिन रुके अभी भी नहीं हैं, फिसलते ही जा रहे हैं. उनके बयान उनकी अपनी ही पार्टी और सरकार के लिए मुंह चुराने की जमीन तैयार करते हैं. हालिया जन लोकपाल बिल को लेकर अन्ना हजारे के नेतृत्व में हुए आंदोलन को ही लें. दिग्विजय सिंह ने संतोष हेगड़े को निशाने पर लिया तो कह गए कि कर्नाटक में तो बहुत मजबूत लोकायुक्त कानून है तो भी उन्होंने क्या कर लिया. निर्विवाद छवि वाले हेगड़े पर इस आरोप के बाद भी वे रुके नहीं, अन्ना हजारे को भी चुनौती दे डाली कि यूपी में जाकर कुछ करके दिखाएं. इतना ही नहीं, सूत्रों के मुताबिक इसके बाद दिग्विजय सिंह ने जन लोकपाल की पांच सदस्यीय नागरिक समिति पर कीचड़ उछालने के लिए अमर सिंह की सेवाएं भी लीं जो पहले से ही गुमनामी के अंधेरे से बाहर आने के लिए छटपटा रहे थे. इस पर मचे हल्ले के बाद पार्टी ने जब नफे नुकसान का आकलन करना शुरू किया तो दिग्विजय सिंह ने ‘न हां न ना’ वाली मुद्रा अख्तियार कर ली और तीर-कमान पूरी तरह से अपने ‘ट्रस्टेड’ अमर सिंह को पकड़ा दिए जो आने वाले कई दिनों तक नागरिक समिति के दो महत्वपूर्ण सदस्यों के साथ हवाई लड़ाई लड़ते रहे. पर पार्टी के नफे नुकसान का अंदाजा और अंदरखाने में मची असहजता का अंदाजा उन्हीं के गृहराज्य से आने वाले वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और राज्यसभा सांसद सत्यव्रत चतुर्वेदी के साथ हुई बातचीत से लगाया जा सकता है – ‘दिग्विजय सिंह द्वारा बार-बार जन लोकपाल समिति पर टीका-टिप्पणी से जनता के बीच यह संदेश गया कि कांग्रेस खिसियाई हुई बिल्ली की तरह व्यवहार कर रही है. लोगों को लगने लगा कि कांग्रेस प्रभावशाली लोकपाल कानून की विरोधी है.’

जिस पार्टी में वे हैं उसमें ऊपर जाने की सीढ़ियां अंतहीन नहीं हैं, एक ऊंचाई पर पहुंचकर वे खत्म हो जाती हैं और वे इसे लगभग छू चुके हैं

मौके लपकने में दिग्विजय सिंह द्वारा दिखाई गई हड़बड़ी का हालिया नमूना ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद देखने को मिला जब वे ओसामा को ओसामा जी कहकर संबोधित करते दिखे. फिर उन्होंने ओसामा के लिए उचित अंतिम संस्कार की जरूरत की भी वकालत कर डाली. उनके इस बेतुके रवैये से पूरी पार्टी सकते में आ गई. और उस बयान को दिग्विजय सिंह का निजी विचार कहकर अपनी इज्जत बचाने की कोशिश में लगी रही. कांग्रेस के एक नेता कहते हैं कि क्या यह मुसलमानों का अपमान नहीं है कि उन्हें ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकी से सहानुभूति दिखाकर लुभाने की कोशिश दिग्विजय सिंह कर रहे हैं. पहली नजर में इसे मुसलिम वोटों को अपनी तरफ खींचने की होड़ की बेतुकी पर निजी पहल के तौर पर देखा जा सकता है, लेकिन राजनीति पर निगाह रखने वाले इसके पीछे कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की मूक सहमति देखते हैं. लंबे समय तक कांग्रेस से जुड़ी रही और उसकी अंदरूनी राजनीति को समझने वाली भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नजमा हेपतुल्ला कहती हैं, ‘कांग्रेस में किसी की मजाल नहीं है कि सुप्रीम लीडर की सहमति के बिना कुछ भी बोल दे. चाहे वे दिग्विजय सिंह हों या फिर प्रधानमंत्री.’ दिग्विजय सिंह ने पार्टी और सरकार की लाइन से अलग हटते हुए जो राह पकड़ी है उससे सरकार और पार्टी को भले ही परेशानी पेश आ रही हो और विपक्ष भूखे भेड़िये की तरह उनके पीछे पड़ा रहा हो लेकिन दिग्विजय सिंह ने अपने राजनीतिक सरपरस्तों को पूरी तरह से विश्वास में ले रखा है कि इसका फायदा उन्हें चुनाव में वोटों के रूप में शर्त्तिया मिलेगा.

दिग्विजय सिंह की बयानबाजी का सिलसिला काफी पुराना है. लेकिन पहली बार इन पर सबका ध्यान तब केंद्रित हुआ जब वे पिछले साल फरवरी में आजमगढ़ के दौरे पर गए थे. अपने इस दौरे में सिंह उन लोगों के घरों में गए जिन पर आतंकी घटनाओं में शामिल होने के आरोप थे. संजरपुर और सरायमीर स्थित बैतुल उलूम मदरसे में मुसलमानों की भारी भीड़ के बीच उन्होंने बटला हाउस की मुठभेड़ पर सवाल उठाते हुए बयान दिया, ‘बटला हाउस की घटना बेहद दुखद है. यहां के युवकों को न्याय मिलना चाहिए. लोग आजमगढ़ को आतंक की नर्सरी बता रहे हैं. मैं राहुल जी को यहां बुलाऊंगा.’ दिग्विजय सिंह का बयान जंगल की आग की तरह फैल गया और एक बार फिर से पूरे इलाके में तनाव का माहौल तारी हो गया. एक तरफ स्वयं पीएमओ और गृह मंत्रालय बटला हाउस एनकाउंटर को वैध ठहरा रहे थे और न्यायिक जांच कराने से इनकार कर रहे थे. यहां तक कि बटला हाउस मुठभेड़ में मारे गए पुलिस अधिकारी मोहन चंद शर्मा को केंद्र सरकार ने अशोक चक्र से भी सम्मानित किया था. मगर दिग्विजय इसका बिलकुल उलटा बयान दे रहे थे. प्रधानमंत्री कार्यालय और गृह मंत्रालय के आला अधिकारियों ने उस वक्त  दिग्विजय सिंह के प्रति साफ तौर पर नाराजगी जताई थी. लेकिन दिग्विजय सिंह ने वही किया जो वे करना चाहते थे.

‘आज वे किसानों को न्याय दिलाने के लिए धरने पर बैठे हैं लेकिन मध्य प्रदेश में अपने शासनकाल में किसानों की समस्या उठाने के कारण अपनी ही पार्टी की नेता कल्पना परुलेकर को इन्होंने बार-बार जेल में ठूंसा’

नजमा हेपतुल्ला की बात यहां तब साबित भी हो गई जब बाद में राहुल गांधी आजमगढ़ दौरे पर गए. लेकिन यह दिग्विजय सिंह के विवादित बयानों से मचने वाली हलचलों की शुरुआत थी. उन्होंने इसके कुछ ही दिनों बाद नक्सलवाद के मुद्दे पर गृहमंत्री पी चिदंबरम को बौद्धिक अहंकारी तक कह डाला जबकि प्रधानमंत्री तक ने स्पष्ट कर दिया था कि नक्सली देश के दुश्मन नंबर एक हैं. दिग्विजय सिंह का यह बयान ऐसे समय में आया जब दंतेवाड़ा में माओवादियों ने 76 सीआरपीएफ जवानों को मार दिया था. जानकारों की मानें तो एक बार फिर से दिग्विजय सिंह उसी लाइन पर चल रहे थे जिसे राजनीतिक विश्लेषक पब्लिक पॉश्चरिंग (जनता के बीच छवि निर्माण) करार देते हैं. भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार एनडी शर्मा कहते हैं, ‘आज दिग्विजय नक्सलवादी नीति और छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा मानवाधिकारों के हनन की आलोचना कर रहे हैं. लेकिन वे अपना किया भूल जाते हैं. अपने समय में दिग्विजय ने राजद्रोह संबंधी कानून का जो मसविदा तैयार किया था वह इतना खतरनाक और बर्बर था कि उसके सामने छत्तीसगढ़ सरकार का वर्तमान कानून कुछ भी नहीं है. जब इस बिल को लेकर सिविल सोसायटी के लोगों ने भोपाल से लेकर दिल्ली तक विरोध किया तब जाकर दिग्गी ने उसे रद्दी की टोकरी में डाला. खुद उनके कार्यकाल में नौकरशाही और पुलिस सर्वाधिक शक्तिशाली रही.’ शर्मा आगे कहते हैं, ‘आज वे किसानों को न्याय दिलाने के लिए धरने पर बैठे हैं लेकिन मध्य प्रदेश में अपने शासनकाल में किसानों की समस्या उठाने के कारण अपनी ही पार्टी की नेता कल्पना परुलेकर को इन्होंने बार-बार जेल में ठूंसा.’

ऐसा नहीं है कि उनके बयान से पार्टी हलकों में असहजता नहीं पनपी. पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के एक सदस्य नाम नहीं छापने के अनुरोध पर कहते हैं, ‘पार्टी के लगभग सभी शीर्ष नेता और मंत्री दिग्विजय सिंह के रवैये से नाराज हैं. कार्यकर्ताओं की तरफ से सबसे ज्यादा शिकायत दिग्विजय सिंह के खिलाफ आ रही है. लेकिन कार्रवाई तो अंतत: शीर्ष नेतृत्व को करनी है. जनार्दन द्विवेदी ने तो उन्हें सीधे-सीधे आगाह करते हुए कह ही दिया था कि पार्टी के घोषित प्रवक्ताओं के अलावा कोई अन्य नेता बयानबाजी न करे.’
कार्यकर्ताओं के असंतोष का सुर पहली दफा बनारस से खुलकर सामने आया है. प्रदेश के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और वाराणसी मंडल के प्रवक्ता राजेश खत्री ने कुछ दिनों पहले दिग्विजय सिंह को उनके बड़बोलेपन की वजह से उत्तर प्रदेश के प्रभारी पद से हटाने की मांग की थी. खत्री बताते हैं, ‘दिग्विजय सिंह, रीता जी समेत कई नेता एक शादी में हिस्सा लेने के लिए ताज होटल में इकट्ठा थे. मैं भी वहां मौजूद था. दिग्विजय सिंह ने मुझसे कहा कि कार्यकर्ताओं को जाने के लिए कहें. मैं लोगों को हटा-बढ़ा रहा था कि पीछे से उनके गनर ने आकर मुझे भी धक्का देते हुए जाने के लिए कहा. इस पर मेरे एक साथी कार्यकर्ता ने कहा कि इन्हें छोड़ दीजिए, वरिष्ठ नेता हैं और इंदिरा जी के साथ इन्होंने काम किया है. इस पर दिग्विजय सिंह मेरे पास आए और बोले- इंदिरा जी गईं और राजीव जी गए, अब आप लोग भी यहां से निकलिए. जिस अपमानजनक तरीके से उन्होंने ये बात कही थी उससे मुझे बेहद दुख हुआ. मैंने सोनिया जी से मांग की है कि ऐसे व्यक्ति को तुरंत ही पार्टी प्रभारी पद से हटाना चाहिए.’ दिग्विजय सिंह को हटाने की मांग के एक दिन बाद ही राजेश खत्री को मंडल प्रवक्ता के पद से निलंबित कर दिया गया.

हालांकि खत्री के बयान के पीछे कुछ राजनीतिक मंशाएं भी हो सकती हैं, लेकिन दिग्विजय सिंह को जानने-समझने वाले उनके इस विस्फोटक रवैये के पीछे उनके व्यक्तित्व के कई अन्य पहलुओं की भूमिका भी देखते हैं. मसलन सत्यव्रत चतुर्वेदी का बयान गौर करने लायक है, ‘ऐसा लगता है कि दिग्विजय सिंह की सामंती पृष्ठभूमि अक्सर पार्टी की रीतियों-नीतियों पर हावी हो जाती है. उनके व्यक्तित्व में शामिल सामंती तत्व उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर करता है.’ विशुद्ध राजनीतिक नजरिए से देखें तो पिछले दो साल के दौरान आए दिग्विजय सिंह के ज्यादातर विवादास्पद बयान उनकी राजनीतिक मजबूरी भी हैं. गौरतलब है कि उनके ज्यादातर विवादित बयान मुसलिम समुदाय पर केंद्रित रहे हैं – चाहे वह बटला हाउस का बयान हो, करकरे की हत्या पर बयान हो या फिर ‘ओसामा जी’ वाला बयान. इनका सीधा लक्ष्य वे दो राज्य हैं जिनके वे प्रभारी हैं- उत्तर प्रदेश और असम. ये दोनों ही राज्य मुसलिम आबादी के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हैं. उत्तर प्रदेश में देश के सबसे ज्यादा मुसलमान रहते हैं तो निचले असम का बांग्लादेश से लगने वाला पूरा इलाका मुसलिम बहुल है. ऐसे में उनके बयानों के राजनीतिक निहितार्थ समझे जा सकते हैं.

‘दिग्विजय सिंह की रणनीति कांग्रेस की पुरानी रणनीति से अलग नहीं है. वे मुसलमानों को हिंदुओं का भय दिखाकर वोट हासिल करना चाहते हैं. अगर वे सच्चे हैं तो सच्चर कमेटी की सिफारिशें क्यों नहीं लागू कराते?’

2009 के लोकसभा चुनावों से पहले कांग्रेस पूरे देश में अपनी जीत के दावे कर रही थी, लेकिन उत्तर प्रदेश को लेकर उसकी सांस अटकी हुई थी. आखिरी वक्त तक सपा उसे गठबंधन को लेकर छकाती रही. कभी सपा सिर्फ 11 सीटें देने को राजी हुई तो कभी 18 और अंतत: 23 सीटों पर आकर मामला अटका रहा. लेकिन इसके बाद जो कुछ हुआ उसे सपा याद नहीं करना चाहती और कांग्रेस भूलना नहीं चाहती. दिग्विजय सिंह ने उत्तर प्रदेश में अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा की थी. उनकी सोच थी कि सपा से 18 या 23 सीटों का समझौता करके वे जितनी सीटें जीतेंगे कमोबेश उतनी ही वे अकेले लड़कर भी फतह कर लेंगे. यह फैसला कैसा साबित हुआ, बताने की जरूरत नहीं. जो कांग्रेस सपा से 23 सीटें ही पा रही थी उसने अकेले 22 सीटों पर परचम फहरा दिया. जिस उन्नाव, फर्रूखाबाद, बाराबंकी और महाराजगंज सीट को लेकर सपा सबसे ज्यादा खिचखिच कर रही थी वे चारों सीटें कांग्रेस के ही खाते में गईं.

हालांकि 2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के अप्रत्याशित फायदे और सपा के नुकसान की कोई सपाट व्याख्या नहीं की जा सकती. लेकिन कल्याण सिंह के पार्टी में आगमन और आजम खान के प्रस्थान ने मुसलमान वोटरों की सपा से दूरी और कांग्रेस से नजदीकी में सबसे बड़ी भूमिका निभाई थी जिसका नतीजा कांग्रेस की इतनी अप्रत्याशित जीत के रूप में सामने आया. इस जीत ने दिग्विजय सिंह समेत कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को 2012 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत के लिए एक अहम रणनीतिक बिंदु दिया- जो मुसलमान वोटर कल्याण सिंह या दूसरे मुद्दे की वजह से सपा से कट कर कांग्रेस के पास आ गया था उसे 2012 के विधानसभा तक अपने साथ जोड़े रखना.

कांग्रेस आलाकमान की इसी सोच ने दिग्विजय सिंह को लगभग फ्रीहैंड दे दिया. अल्पसंख्यकों से जुड़े हर मुद्दे को लपकने की जल्दबाजी इसी का नतीजा है फिर चाहे इसके चलते खुद उनकी और पार्टी की किरकिरी ही क्यों न होती हो. उत्तर प्रदेश में मुसलिम राजनीति का तजुर्बा रखने वाले प्रो. खान आतिफ कहते हैं, ‘दिग्विजय सिंह की रणनीति कांग्रेस की पुरानी रणनीति से अलग नहीं है. वे मुसलमानों को हिंदुओं का भय दिखाकर वोट हासिल करना चाहते हैं. अगर वे सच्चे हैं तो सच्चर कमेटी की सिफारिशें क्यों नहीं लागू कराते?’

अपने लक्ष्य को निशाने पर रखकर दिए जाने वाले ऐसे बयानों की एक पूरी शृंखला है कि जब पार्टी या सरकार खेत की बात कर रही थी तो दिग्विजय सिंह खलिहान खंगाल रहे थे. मुंबई में 26/11 को हुए आतंकवादी हमले के लगभग दो साल बाद दिग्विजय सिंह ने ऐसा बयान दे डाला जिससे उनकी पार्टी और सरकार के सामने मुंह छिपाने की नौबत आ गई. मौका सहारा समय उर्दू के संपादक अजीज बर्नी की पुस्तक के विमोचन का था जहां दिग्विजय सिंह ने यह कहकर सबको चौंका दिया कि हेमंत करकरे ने अपनी हत्या के दो घंटे पहले उनसे फोन पर बात करके हिंदूवादी संगठनों द्वारा अपनी हत्या किए जाने का भय जताया था. इस एक बयान ने घर के भीतर और बाहर दोनों जगह सत्ताधारी कांग्रेस को सुरक्षात्मक मुद्रा में डाल दिया. पाकिस्तान ने दिग्विजय सिंह के बयान की आड़ में मुंबई हमलों की जिम्मेदारी से अपना पिंड छुड़ाने में कोई समय नहीं गंवाया. इधर विपक्ष ने यह कहकर सरकार का जीना मुहाल कर दिया कि दिग्विजय सिंह मुंबई हमले जैसे मामले पर तुष्टीकरण की राजनीति और एक शहीद का अपमान कर रहे हैं. विपक्ष का यह भी कहना था कि दिग्विजय ऐसा कहकर आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में दुनिया के सामने भारत का पक्ष कमजोर कर रहे हैं. सिर्फ विपक्ष नहीं बल्कि दिग्विजय सिंह के सनातन शत्रु बनते जा रहे गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय में भी उनके इस बयान के प्रति गुस्से की भावना देखने को मिली.

दिग्विजय सिंह द्वारा विवादों को दावत देने में एक चतुराई भरा दिलचस्प ट्रेंड देखने को मिलता है. टारगेट ऑडिएंस (कभी-कभी किसान और ज्यादातर समय मुसलमान) के बीच वे वही बातंे करते हैं जिनसे विवाद पैदा होते हैं और जिनसे राजनीतिक हित पूरे होते हैं. बाद में इन पर सफाई देने के लिए वे उन माध्यमों का सहारा लेते हैं जो अपेक्षाकृत कम सुलभ और सीमित पहुंच वाले हैं- यानी अंग्रेजी चैनल और अखबार जिनकी पहुंच बमुश्किल पांच फीसदी और सिर्फ शहरी इलाकों तक सीमित है. इससे उन्हें अपने बयान में ज्यादा हेरफेर की मुसीबत भी नहीं उठानी पड़ती और उनका काम भी हो जाता है.

उनके बयान पार्टी को बार-बार शर्मनाक स्थिति में डाल देते हैं फिर भी उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती. इस बात का अहसास पार्टी मैनेजरों को भी है इसलिए उन्होंने बचाव के लिए बीच का रास्ता निकाल लिया है- फलां विचार पार्टी का है और फलांं विचार दिग्विजय सिंह का निजी है. ताजा वाकया ग्रेटर नोएडा में चल रहे किसान आंदोलन का है. खबर है कि मनोज तेवतिया ने दिग्विजय सिंह के इशारे पर सारा बवाल रचा. बाद में एक निजी टीवी चैनल ने जब उनसे सवाल किया कि टप्पल में हुए आंदोलन के नौ महीने बाद तक केंद्र सरकार ने भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक संसद में क्यों नहीं पेश किया तो दिग्विजय सिंह ने दो टूक कहा, ‘हमने तो पेश कर दिया था लेकिन ममता बनर्जी को इससे थोड़ी दिक्कत थी. अब विधानसभा चुनाव निपट गए हैं तो उम्मीद है कि अगले सत्र में हम इसे पास करवा लेंगे.’ कानून पास न हो पाने के लिए दिग्विजय सिंह ने जो बहाना बनाया शायद उसी विधानसभा चुनाव की गहमागहमी दिग्विजय सिंह की ढाल भी बन गई. न तो ममता बनर्जी का ध्यान उनके बयान पर गया न ही मीडिया का. वरना इसके निहितार्थ भी कई थे मसलन किसानों-मजदूरों के आंदोलन पर राजनीति खड़ी करने वाली ममता ने सिर्फ चुनाव तक के लिए इस विधेयक को रोका था और चुनाव जीतने के बाद उन्हें इससे कोई मतलब नहीं. या फिर एक सहयोगी के दबाव में कांग्रेस ने किसानों के लिए इतने महत्वपूर्ण कानून को महीनों तक लटकाए रखा. अगर यह बात तूल पकड़ लेती तो जनता और मीडिया को दिग्विजय सिंह के एक और अटपटे बयान के साथ कांग्रेस-तृणमूल की  धींगामुश्ती का एक और रोमांचक दौर देखने को मिल जाता. 

पार्टी के भीतर तमाम विरोधियों के बावजूद उन्हें एक कोने से समर्थन भी मिल रहा है. वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर उनके इस बर्ताव को पार्टी के भीतर स्वस्थ लोकतांत्रिक वातावरण से जोड़ते हैं जिसके बारे में स्वयं राहुल गांधी मान चुके हैं कि उनकी पार्टी में लोकतंत्र का अभाव है. अय्यर के शब्दों में, ‘मैं भी उनके जैसी ही बातें करता हूं पर मेरे साथ कभी कोई विवाद नहीं होता. जो बातें दिग्विजय सिंह कर रहे हैं, मैं उनका पूरा समर्थन करता हूं और मैं हमेशा उनके मुद्दों के साथ खड़ा रहूंगा. ये एक विविध विचारों से भरपूर लोकतांत्रिक पार्टी का सबूत है.’

दिग्विजय सिंह यह सब गांधी-नेहरू परिवार के समर्पण और वफादारी में  किए जा रहे हैं या यह सब कुछ वे पार्टी की भलाई के लिए कर रहे हैं, उनकी अपनी कोई महत्वाकांक्षा नहीं- यह नजरिया स्थितियों का एकतरफा विश्लेषण होगा. अर्जुन सिंह के मुख्यमंत्रित्वकाल में मध्य प्रदेश के मंत्रिमंडल में दिग्विजय सिंह के साथ काम कर चुके एक नेता बताते हैं, ‘मेरा अपना आकलन है कि दिग्विजय सिंह के अंदर महत्वाकांक्षा की कमी कभी नहीं रही, बल्कि इस मामले में वे अपने समकालीन नेताओं से कई कदम आगे हैं.’ नजमा हेपतुल्ला इस विषय को और तफसील से बयान करती हैं, ‘दिग्विजय सिंह बहुत चालाक और महत्वाकांक्षी हैं. उन्हें इस बात का अहसास है कि राहुल गांधी की राजनीतिक सोच की एक सीमा है जिसके पार वे जा नहीं सकते. इसी सीमा का फायदा वे उठा रहे हैं. भविष्य में राहुल गांधी को इसका नुकसान उठाना पड़ेगा.’

इस लिहाज से वे पीड़ित और अप्रासंगिक न हो जाएं, इस चिंता से दिग्विजय सिंह भरे नजर आते हैं. पीड़ित इस संदर्भ में कि अपनी तमाम योग्यताओं और क्षमताओं के बावजूद उन्हें पता है कि जिस पार्टी में वे हैं उसमें ऊपर जाने की सीढ़ियां अंतहीन नहीं हैं, एक ऊंचाई पर पहुंचकर वे खत्म हो जाती हैं और दिग्विजय सिंह उस सीमा को लगभग छू चुके हैं. दो बार मुख्यमंत्री बन जाने के बाद एक केंद्रीय मंत्री या फिर राज्यपाल जैसा प्रतीकात्मक पद ही अब उन्हें मिल सकता है. वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक एनवी सुब्रमण्यम के शब्दों में, ‘दिग्विजय सिंह कांग्रेस पार्टी की वंशवादी राजनीति के क्लासिक शिकार है.’

चिंता इस संदर्भ में कि 2013 में उनका खुद पर थोपा गया चुनावी वनवास खत्म होने जा रहा है. ऐसे में अगर वे अभी से खबरों में नहीं रहे तो मौके पर अंगूठा दिखाने वालों की राजनीति में कमी नहीं है. इस मामले में उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु अर्जुन सिंह वाली गलती न दोहराने का फैसला कर लिया है. अपने दोस्तों के बीच में दिग्विजय सिंह अक्सर कहते हैं, ‘अगर मैं विवादित बयान नहीं दूंगा तो जल्द ही मैं लोगों की निगाह से ओझल हो जाऊंगा.’

दिग्विजय सिंह जो बात कह रहे हैं वह उनकी राजनीति की सच्चाई है, लेकिन दुर्भाग्य से यह रास्ता व्यक्ति को नकारात्मक राजनीति के हाइवे पर ले जाता है जहां तूफान की तरह गुजरते लोगों के बीच अक्सर आप अकेले हो जाते हैं. दिग्विजय सिंह उसी राह पर चल पड़े हैं जिसे कभी उनके गुरु अर्जुन सिंह ने भी अपनाया था. अमर सिंह उस राजनीति के ब्रांड अंबेसडर रह चुके हैं (दुर्भाग्य या सौभाग्य से आजकल दोनों ही हमप्याला हो चले हैं). उन सबका हश्र किसी से छिपा नहीं है.

(बृजेश सिंह और हिमांशु बाजपेयी के सहयोग के साथ)