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आईपीएल में सबसे कम उम्र का खिलाड़ी बना सरफराज

सरफराज खान
सरफराज खान
सरफराज खान

दुनिया के महान बल्लेबाजों में से एक मास्टर ब्‍लास्टर सचिन तेंडुलकर के ज‌न्मदिन के ठीक पहले क्रिकेट जगत में एक नए खिलाड़ी का पदार्पण नई उम्मीद जगाता है. यह उम्मीद सरफराज खान के रूप में उभरी है. मुंबई के इस किशोर क्रिकेटर ने सबसे कम उम्र में आईपीएल खेलने का कीर्तिमान हासिल कर लिया है.

इस साल फरवरी में आईपीएल मैचों के लिए हुई क्रिकेट खिलाड़ियों की नीलामी में रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर ने इस 17 वर्षीय खिलाड़ी को 50 लाख रुपये में खरीदा था.

सरफराज से पहले दिल्ली के प्रदीप सांगवान को सबसे कम उम्र के आईपीएल खिलाड़ी होने का खिताब प्राप्त था.  दिलचस्प बात यह है कि सांगवान ने भी महज 17 साल के ही उम्र में आईपीएल खेलना शुरू किया था, लेकिन सरफराज की उम्र उनसे दो दिन कम है. इसके अलावा दिल्ली के ही बल्लेबाज उन्मुक्त चंद ने 18 साल की उम्र में ही आईपीएल खेलकर सुर्खियां बटोरी थीं.

 परिवार और मोहल्लेवाले उत्साहित

कुर्ला के तकसीमन कॉलोनी में रहने वाला सरफराज का परिवार और उसके मोहल्लेवाले आईपीएल में उन्हें खेलते देख काफी उत्साहित हैं. आईपीएल में 22 मार्च को चेन्नई सुपरकिंग्स के खिलाफ जब इस खिलाड़ी ने अपनी पहली पारी खेली तो मोहल्ले के लोग खुशी से झूम उठे. इस पारी में सरफराज ने एक छक्के की मदद से 11 रनों की पारी सात गेंदों पर खेली. उनका स्ट्राइक रेट 157.14 था.

सरफराज के पिता और उनके कोच नौशाद खान के अनुसार, ‘मै क्या कह सकता हूं, आज सरफराज को धोनी और कोहली जैसे दुनिया के महान खिलाड़ियों के साथ क्रिकेट खेलते देख मुझे अपना सपना पूरा होने जैसा लग रहा है. सरफराज को एबी डिवीलियर्स जैसे बड़े खिलाड़ियों से क्रिकेट की बारीकियां सीखने का मौका मिल रहा है.’ उन्होंने बताया कि उनका क्रिकेटर बनने का सपना पूरा नहीं हो पाया लेकिन सरफराज को विश्वस्तरीय क्रिकेट खिलाड़ी बनाने में वह कोई कसर नहीं छोड़ेंगे.

बासमती से ज्यादा बीफ निर्यात करते हैं हम

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महाराष्ट्र में बीफ पर प्रतिबंध लगने के बाद इसे लेकर देशभर में हाय-तौबा मची हुई है. इस बीच खबर आई है कि भारत दुनियाभर में बीफ का सबसे बड़ा निर्यातक देश है. हाल ये है कि हमारा कृषि प्रधान देश बासमती से ज्यादा बीफ का निर्यात करता है. एक  रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है.

यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर (यूएसडीए) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक ब्राजील को पीछे छोड़ते हुए बीफ निर्यात के मामले में भारत तीन साल से लगातार नंबर वन बना हुआ है. रिपोर्ट के मुताबिक 2015 के अंत तक तीन फीसदी की बढ़ोतरी करते हुए भारत के बीफ निर्यात का आंकड़ा एक करोड़ दो लाख टन पार कर जाएगा. रूस समेत तेल आधारित अर्थव्यवस्‍था वाले दूसरे देशों की ओर से होने वाले निर्यात में गिरावट के कारण भारत के बीफ निर्यात में बढ़ोतरी दर्ज होगी. रिपोर्ट के अनुसार, यह बढ़ोतरी ब्राजील, उरुग्वे और अमेरिका से होने वाले बीफ निर्यात की दर में कमी से आएगी. रूस ने भारत की चार कंपनियों को निर्यात की मंजूरी दी है. इसके तहत पहली खेप भेजी भी जा चुकी है।

बीफ बैन पर अगले हफ्ते फैसला

बीफ बैन मामले की सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने अगले हफ्ते तक के लिए अपना फैसला सुरक्षित कर लिया है. महाराष्ट्र में गाय, बैल और भैंस के मांस के उपभोग पर प्रतिबंध लगाने के खिलाफ दर्जनों याचिकाएं हाई कोर्ट में दाखिल की गई हैं. बीते मार्च महीने की शुरुआत में महाराष्ट्र सरकार ने बीफ पर प्रतिबंध लागू कर दिया था जिसके बाद से सरकार को विरोध का सामना करना पड़ रहा है.

रेल यात्री जल्द करा सकेंगे सामान का बीमा

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आईआरसीटीसी इन दिनों रेल यात्रियों को लुभाने की पुरजोर कोशिश में लगा हुआ है. इसके पीछे का मकसद ज्यादा से ज्‍यादा मुनाफा कमाना है. ‘कैश ऑन डिलीवरी टिकट’ सुविधा के बाद आईआरसीटीसी जल्द ही यात्रियों को अपने सामानों का बीमा कराने की भी सुविधा देने वाला है.

योजना के तहत यात्री मोबाइल, लैपटॉप और दूसरे कीमती सामानों का बीमा करा सकेंगे. सामान चोरी या गुम होने की स्थिति में बीमा की रकम का दावा किया जा सकेगा. आईआरसीटीसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, ‘यह सुविधा सिर्फ ऑनलाइन टिकट लेने वाले ग्राहकों ‌को मिल सकेगी. इसके लिए हम न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी के साथ मिलकर काम कर रहे हैं. यह पूरी तरह से यात्री की मर्जी होगा कि वह अपने सामान का बीमा करवाएं या नहीं. बीमा का प्रीमियम यात्रा की दूरी और क्लास पर निर्भर करेगा.’

इस योजना के तहत आईआरसीटीसी यात्रियों को यात्रा के दौरान जरूरत पड़ने पर अस्पताल पहुंचाने जैसी दूसरी सुविधाएं देने की भी कोशिश में लगा है. आईआरसीटीसी ने हाल ही में यात्रियों के लिए कैश ऑन डिलीवरी टिकट की सुविधा उपलब्ध कराई है. यह सेवा उन लोगों को ध्यान में रखकर दी गई है जिनके पास बैंक खाते या डेबिट कार्ड की सुविधा नहीं है.

आईआरसीटीसी का फायदा

दरअसल इन लोक लुभावन योजनाओं के पीछे आईआरसीटीसी का अपना ही फायदा है. हर दिन करीब 20 लाख से ज्यादा लोग ट्रेन से सफर करते हैं. इनमें से 52 फीसदी ई-टिकट लेते हैं. इन योजनाओं को देखते हुए आईआरसीटीसी को उम्मीद है कि ज्यादा से ज्यादा लोग काउंटर टिकट के बजाय ऑनलाइन टिकट खरीदेंगे जिसका सीधा फायदा कंपनी को होगा.

मौसम विभाग फेल, बिहार में तूफान से तबाही

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बिहार के उत्तर पूर्वी इलाके में चक्रवाती तूफान से अब तक 65 लोगों के मारे जाने की सूचना है. मृतकों में से अधिकांश पूर्णिया, मधेपुरा और मधुबनी जिलों के थे. हैरानी की बात ये है कि इस तूफान की जानकारी देने में मौसम विभाग पूरी तरह से असफल साबित हुआ.

मंगलवार देर रात आए इस तूफान के समय हवा 100 से 130 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चल रही थी. बारिश के साथ गिरे ओलों ने हजारों लोगों के आशियानों को उजाड़ने के साथ ही फसलों को तबाह कर दिया. आपदा प्रबंधन विभाग के अनुसार, मधेपुरा, पूर्णिया, सहरसा, सुपौल, कटिहार, किशनगंज, दरभंगा और मधुबनी जिले के तकरीबन 25 हजार घर तूफान से उजड़ गए. तूफान से सबसे ज्यादा प्रभावित पूर्णिया जिला हुआ है. प्रभावित इलाकों मे बिजली की आपूर्ति पूरी तरह ठप पड़ गई है. इलाके में यातायात और रेलवे पर भी खासा असर पड़ा है.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अधिकारियों से नुकसान का जायजा लेकर जल्द से जल्द सर्वे रिपोर्ट तैयार करने को कहा है. वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फोन पर नीतीश कुमार से नुकसान की जानकारी ली और हरसंभव सहायता का भरोसा दिलाया. नीतीश कुमार ने गृह मंत्री राजनाथ सिंह को भी हालात से अवगत कराया.

नहीं थ्‍ाा तूफान का अलर्ट

चौंकाने वाली बात ये है कि भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के साथ ही बिहार मौसम विज्ञान विभाग भी इस तूफान की सूचना देने में नाकाम साबित हुआ. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की लापरवाही पर उठ रहे सवाल पर पटना शाखा के निदेशक एके सेन ने पल्ला झाड़ते हुए कहा कि हल्की बारिश के साथ बिजली कड़कने की संभावना थी. चक्रवाती तूफान की कोई आशंका नहीं थी. विभागीय सूत्रों के अनुसार विभाग ने अपनी वेबसाइट पर सिर्फ हल्की बारिश की सूचना को अपडेट किया था.

चार लाख का मुआवजा

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रभावित इलाका का जायजा लेने के बाद मृतकों के परिजन को चार लाख रुपये का मुवावजा देने की घोषणा की है. घायलों को तुरंत 4500-4500 रुपये की नकद सहायता देने का भी एलान किया. आपदा प्रबंधन के अधिकारी के अनुसार प्रभावितों को 2000 रुपये नकद, एक कुंतल अनाज और कपड़े के लिए 1800 रुपये मुहैया कराए गए हैं.

ऐप से कटाएं अनारक्षित टिकट

appरेल महकमे ने यात्रियों की सुविधा का ध्यान रखते हुए एक नई पहल की है. अब अनारक्षित टिकट के लिए काउंटर के सामने लंबी लाइन में लगने से यात्रियों को निजात मिल जाएगी. महकमे ने यात्रियों पेपरलेस अनारक्षित टिकट की सुविधा देने के लिए बुधवार को एक मोबाइल ऐप लॉन्च किया है.

इस ऐप से बुक कराए गए टिकट का प्रिंट आउट लेने की भी जरूरत नहीं है, सिर्फ टीटीई को मोबाइल में टिकट बुकिंग की सॉफ्ट कॉपी दिखानी होगी. इस सुविधा का लाभ सिर्फ एंड्राएड मोबाइल उपभोक्ता ही ले सकेंगे. यात्री गूगल प्ले स्टोर से इस ऐप को डाउनलोड कर सकते हैं.

ऐप डाउनलोड करते ही आपको एक र‌जिस्ट्रेशन नंबर मिला जाएगा, जिससे आप आईआरसीटीसी का ई-वॉलेट (पर्स) बना सकेंगे. टिकट बुकिंग के पैसे ई-वॉलेट से कटेंगे. ई-वॉलेट में पैसे आईआरसीटीसी की वेबसाइट या रेलवे काउंटर से जमा कराए जा सकेंगे. ऐप से मासिक सीजन टिकट (एमएसटी) का भी नवीकरण कराया जा सकेगा.

केजरीवाल के सामने किसान ने की आत्महत्या, सियासत शुरू

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फोटो: विजय पांडे

भूमि अधिग्रहण बिल के विरोध में नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर आम आदमी पार्टी के प्रदर्शन के दौरान राजस्थान के एक किसान ने पेड़ से लटककर खुदकुशी कर ली.

चौका देने वाली बात ये है कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की मौजूदगी में चल रहा ये विरोध प्रदर्शन इस घटना के बाद भी कम से कम एक से डेढ़ घंटे तक जारी रहा.

इस बीच पार्टी के कार्यकर्ता उसे अस्पताल ले गए, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. किसान की पहचान गजेंद्र सिंह के रूप में हुई है.

इस घटना के बाद दिल्ली पुलिस पर सवाल उठ रहे हैं. सिर्फ दिल्ली पुलिस ही नहीं मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी सवालों के घेरे में हैं. इस विरोध प्रदर्शन के दौरान केजरीवाल किसानों की भाग्य बदलने की बात कर रहे थे और इसी दौरान देश का एक किसान खुदकुशी कर बैठा.

बहरहाल, इस घटना के बाद सियासत का खेल शुरू हो गया है. एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है. दिल्ली सरकार ने घटना से पल्ला झाड़ते हुए इसका आरोप केंद्र सरकार पर मढ़ दिया है. भाजपा ने सवाल उठाया है कि किसान की मौत के बाद भी विरोध प्रदर्शन क्यों जारी रहा? जिंदगी ज्यादा जरूरी है या प्रदर्शन? भाजपा प्रवक्ता सं‌बित पात्रा ने कहा कि किसान के तड़पकर मरने के बाद भी विरोध प्रदर्शन क्यों नहीं रोका गया. उधर, कांग्रेस ने घटना के लिए राज्य सरकार के साथ ही केंद्र सरकार को भी दोषी ठहराया है. राजस्‍थान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने घटना पर खेद जताते हुए कहा कि सरकार कि तरफ से मदद न मिलने की वजह से ‌निराश किसान रैलियां करने पर मजबूर हैं. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि अगर किसान खुदकुशी कर रहा था तो रैली रोकी क्यों नहीं गई.

‘जय जवान, जय किसान’

मृतक किसान राजस्‍थान के दौसा जिले का रहने वाला था. पुलिस ने घटनास्थल से एक सुसाइड नोट भी बरामद किया है, जिसमें उसने लिखा है, ‘हमारी सारी फसल नष्ट होने की वजह से हमारे पिता ने हमें हमारे तीन बच्चों के साथ घर से बाहर कर दिया. जय जवान जय किसान.’

जेएनयू में रंग बयार

eKLOVYa sToRyनई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) न सिर्फ अपने राजनीतिक जागरुकता के लिए देशभर में जाना जाता है बल्कि सांस्कृतिक समन्वय एवं कला के प्रति रुझान के लिए भी प्रख्यात है. इस विश्वविद्यालय में हाल ही में अपना वार्षिक नाट्य उत्सव ‘रंग बयार’ आयोजित किया गया. रंग बयार की शुरुआत 2012 में हुई थी और हर साल की तरह ही इस साल का आयोजन भी सफल रहा. जेएनयू की विभिन्न नाटक मंडलियां इस उत्सव के माध्यम से एक मंच पर इकट्ठा होती हैं. एक हफ्ते तक चले इस कार्यक्रम में कुल सात नाटकों का मंचन हो पाया.

4अप्रैल से शुरू हुए इस उत्सव में पहला नाटक खेला गया बहरूप ग्रुप की तरफ से. ‘अजंता की तरफ’ नाटक ख्वाजा अहमद अब्बास की तीन कहानियां ‘अजंता की तरफ’, ‘जाफरान के फूल’ और ‘मेरी मौत’ को एक धागे में पिरोए हुए था.  इस नाटक का निर्देशन किया था अरविंद आलोक ने.

5अप्रैल को श्रीराम सेंटर फॉर परफॉरमिंग आर्ट्स द्वारा ‘ऐसे दिन आए कैसे’ नाटक का मंचन हुआ.  इस नाटक का निर्देशन के.एस.राजेंद्रन द्वारा किया गया था. यह नाटक ब्रतोल्त ब्रेख्त की कहानी ‘द रेजिस्टिबल राइज ऑफ आर्तुरो उइ’ का हिंदुस्तानी रूपांतरण था.

6अप्रैल को विंग्स कल्चरल सोसाइटी ने ‘सारा का सारा आसमान’ नाटक प्रस्तुत किया. पाकिस्तानी कवयित्री सारा शगुफ्ता की जीवन गाथा दर्शानेवाले इस नाटक को दानिश इकबाल ने लिखा है और निर्देशन किया था तारीक हमीद ने. इस नाटक में दिखाया गया कि कैसे सारा ने विपरीत परिस्थितियों में शायरी लिखनी शुरू की और कैसे समाज उसे पागल समझता रहा और इस सब के चलते क्यों उसने एक दिन अपनी जान दे दी.

8अप्रैल को बोलिग्राड फाउंडेशन एवं स्पीका ढ़ोल ने प्रेमचंद के ‘गोदान’ की प्रस्तुति की. विष्णु प्रभाकर द्वारा किए गए इस नाट्य रूपांतरण का निर्देशन रामेंद्र चकवर्ती ने किया.

9अप्रैल को मंचन हुआ इप्टा के नाटक ‘जनरल, मगर सुन’ का. यह नाटक जुलियस फ्युचिक की एक कहानी पर आधारित था. इस कहानी का अनुवाद प्रभु जोशी ने किया और इस नाटक का निर्देशन किया था मनीश ने. यह नाटक 6 बच्चों के माध्यम से जंग की कड़वी सच्चाई बतलाता है. कैसे स्कूल जाते वो बच्चे जंग से पीड़ित लोगों की मदद करना चाहते हैं, और ऐसा करने के लिए वो बहुत मशक्कत से पैसे इकट्ठा करते हैं.

10अप्रैल को जुम्बिश द्वारा ’एकलव्य उवाच’ का मंचन हुआ. जातिवाद और शिक्षा प्रणाली पर व्यंग्य करता हुआ यह नाटक लिखा था कुलदीप कुणाल ने और इसका निर्देशन किया था सतीश मुख्तलिफ ने. यह नाटक एकलव्य की कथा का खंडन करते हुए शिक्षा के क्षेत्र में जाति प्रथा के प्रचलन पर प्रकाश डालता है। कहानी जब पौराणिक परिवेश से निकलकर समकालीन समय में प्रवेश करती है तो एहसास कराती है कि इस स्थिति में ज्यादा बदलाव नहीं आया है. आज भी जीवन के हर क्षेत्र में इस प्रथा का प्रचलन है.

11अप्रैल को सहर ने सुधन्वा देशपांडे द्वारा लिखित नाटक बहुत रात हो चली है का मंचन किया. दो पात्रों का यह नाटक दिखाता है कि कैसे जीवन की आपाधापी में लोग अपने उसूलों से अलग हो सकते हैं. यह कहानी बाबरी मस्जिद विध्वंस के संदर्भ में प्रदर्शित की गई. पूरे महोत्सव के दौरान जेएनयू सम्मेलन केंद्र खचाखच भरा रहा और हर नाटक के माध्यम से आज की ज्वलंत समस्याओं पर प्रकाश डाला गया.

‘विंडोज 10’ मुफ्त देने का मकसद

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दुनिया की सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर निर्माता कंपनी माइक्रोसॉफ्ट ने अपने नए ऑपरेटिंग सिस्टम ‘विंडोज 10’ को लॉन्च करने से पहले नई रणनीतियों पर भी काम कर रही है. ‘विंडोज 10’ इस साल जुलाई के आखिर में बाजार में दस्तक देने वाला है. नई रणनीति के तहत माइक्रोसॉफ्ट सभी उपभोक्ताओं को मुफ्त में यह ऑपरेटिंग सिस्टम उपलब्‍ध कराएगा. यह सुविधा उन लोगों को भी मिलेगी जो विडोज का पाइरेटेट वर्जन इस्तेमाल करते हैं. अब तक के इतिहास में यह सबसे बड़ा अपग्रेडेशन प्रोग्राम भी होगा.

मुफ्त में देने के मायने

दुनियाभर में लगभग 52 फीसदी लोग पाइरेटेड ऑपरेटिंग सिस्टम का इस्तेमाल करते हैं. इसे देखते हुए माइक्रोसॉफ्ट पाइरेटेड वर्जन इस्तेमाल करने वालों को ऑपरेटिंग सिस्टम अपग्रेड करने की सुविधा मुफ्त में देने वाला है. हालांकि ‘विंडोज’ 10 में अपग्रेड होने से वो पाइरेटेड विंडो ओरिजनल में तब्दील नहीं होगा. पाइरेसी रोकने के अलावा माइक्रोसॉफ्ट का बड़ा मकसद अपने कुछ दूसरे उत्पादों के लिए बाजार तैयार कर उन्हें बेचना भी है.

दरअसल नई दिल्ली के नेहरू प्लेस से लेकर चीन के विभिन्न कम्‍प्यूटर बाजारों में माइक्रोसॉफ्ट पाइरेसी को रोकने में लगभग नाकाम रहा है. मुफ्त में ‘विंडोज 10’ देने में माइक्रोसाफ्ट को कोई नुकसान नहीं है. ऑपरेटिंग सिस्टम मुफ्त में मिलने से दुनियाभर में ज्यादा से ज्यादा लोग इसका इस्तेमाल करना शुरू कर देंगे. इससे कंपनी को बड़ा फायदा ये होगा कि वह अपनी दूसरी सेवाओं जैसे- ऑनलाइन स्टोरेज, वन ड्राइव, स्काइप और विंडोज ऐप को आसानी से बेच सकेगी.

हमें क्या फायदा?

भारत में तकरीबन 63 फीसदी लोग पाइरेटेड विंडो का ही इस्तेमाल करते हैं. मुफ्त ‘विंडोज 10’ अपग्रेड होने से पाइरेटेड उपभोक्ताओं को डेटा चोरी और हैकिंग जैसी समस्याओं से निजात मिलेगी. विंडोज 10 में सुरक्षा को लेकर बड़े बदलाव किए गए हैं. पाइरेटेड विंडो में हैकिंग, वायरस, फि‌शिंग से लेकर डेटा चोरी होने के खतरे बने रहते हैं.

स्टार्ट मेन्यू से स्पार्टन तक

माइक्रोसॉफ्ट ‘विंडोज 10’ के साथ कई दूसरी सुविधाएं देने का दावा कर रही है. स्टार्ट मेन्यू जिसकी कमी आपको विडोज 8 में खली होगी, माइक्रोसॉफ्ट उसे नए अंदाज में कस्टमाइजेशन की सुविधा के साथ फिर से लाया है. एक साथ कई काम करने वालों के लिए बेहतरीन मल्टी डेस्कटॉप की सुविधा दी गई है. इसके साथ ही माइक्रोसॉफ्ट ने नया वेब ब्राउजर ‘स्पार्टन’ लाने का भी ऐलान किया है. स्पार्टन इंटरनेट एक्सप्लोरर के मुकाबले काफी बढ़िया बताया जा है. विशेषज्ञों की माने तो स्पार्टन गूगल क्रोम से स्मार्ट और कड़ी टक्कर देने वाला साबित हो सकता है.

बोलकर दे सकेंगे कमांड

विंडोज 10 को बोलकर भी चलाया जा सकेगा. मतलब अगर आपको कोई प्रोग्राम या एप्लीकेशन खोलना या फिर ईमेल भेजना है तो सिर्फ आपको कम्‍प्यूटर के सामने बोलना होगा और चंद सेकेंड्स में आपका काम हो जाएगा.

सुनीता तोमर…

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ये लाइनें 30 सेकेंड के उस वीडियो की हैं, जिसे केंद्र सरकार ने तंबाकू निषेध अभियान के तहत जारी किया था. अभियान की ब्रांड एंबेसडर और वीडियो का चेहरा कैंसर पीड़ित सुनीता तोमर थीं. ‘थीं’ इसलिए क्योंकि सुनीता की आवाज अब हमेशा के लिए खामोश हो गई है. इस महीने की एक तारीख को उन्होंने ग्वालियर के एक अस्पताल में दम तोड़ दिया. कैंसर पीड़ित सुनीता को जीवन के आखिरी दिनों में किसी तरह की सरकारी सहायता भी नसीब न हो सकी.

केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद से तमाम अभियान चलाए गए. अभियानों के जरिये देश का चेहरा बदलने का डंका पीटा गया. स्वच्छ भारत अभियान, मेक इन इंडिया, जनधन योजना, डिजिटल इंडिया, सांसद आदर्श ग्राम योजना… ये कुछ नाम हैं, जिन्हें वर्तमान सरकार ने शुरू कर लोगों का जीवन बदलने का दावा किया है. अभियान की सफलता या असफलता उस समय की सरकार के चाल, चरित्र और चेहरे की हकीकत को बयां करता है. तंबाकू निषेध अभियान ऐसा ही एक नाम है, जो सरकार की प्राथमिकताओं में से एक है. इसकी सफलता इस बात से जाहिर हो रही है कि अभियान का चेहरा रहीं सुनीता तोमर की दरिद्रता में असमय मौत हो गई. 28 वर्षीय सुनीता की मौत हमारे सरकारी तंत्र और कार्यप्रणाली के चेहरे पर करारा तमाचा है.

देश के हृदय प्रदेश कहे जानेवाले मध्य प्रदेश के छोटे से जिले भिंड की रहने वाली सुनीता की शादी 14 साल की कम उम्र में ट्रक ड्राइवर बृजेंद्र सिंह तोमर से हुई थी. उनके दो बच्चे ध्रुव (13) और गंधर्व (10) हैं. सुनीता बच्चों की शिक्षा को लेकर बहुत आग्रही थीं.

पान हमारे खानपान का अभिन्न हिस्सा रहा है. अब गुटका-तंबाकू हमारे खानपान का अपभ्रंश हिस्सा हो चले हैं. तंबाकू या गुटका चबाना हमारे समाज में दबंगई और रुतबे का प्रतीक समझे जाते हैं. सुनीता भी तंबाकू चबाने की लत का शिकार थीं. धीरे-धीरे यही लत उनके लिए घातक साबित हो गई. तंबाकू खाने के कुछ सालों के दौरान ही सुनीता के ओरल कैंसर से पीड़ित होने का पता चला. पति बृजेंद्र के अनुसार, ‘सुनीता की बीमारी का पता साल 2013 में चला था. भिंड के एक अस्पताल में कुछ समय इलाज के बाद डॉक्टरों ने उन्हें मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल में रेफर कर दिया.’ मुंबई में डॉक्टरों ने चेकअप के बाद ऑपरेशन करने की बात कही. ऑपरेशन के लिए पैसों की जरूरत पड़ी तो वर्ल्ड लंग फाउंडेशन नाम की संस्था आगे आई. यह विकासशील देशों में कैंसर पीड़ितों की इलाज में मदद करती है.

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तंबाकू सेवन से ऑपरेशन के बाद उनका चेहरा विकृत होने के बाद लोग उनसे बात करने में भी कतराने लगे थे. सुनीता को खाने में सिर्फ तरल पदार्थ ही दिया जाता था. टाटा मेमोरियल अस्पताल में उनका इलाज सर्जन डॉ. पंकज चतुर्वेदी की देखरेख में हो रहा था. पंकज कैंसर का इलाज करने के साथ ही इसके प्रति जागरुकता फैलाने के लिए अभियान भी चलाते हैं. सुनीता के बारे में पता चलने पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने उन्हें अपने अभियान का चेहरा बनाया. साल 2014 में मुंबई में इलाज के दौरान ही सुनीता पर कैंसर के प्रति जन जागरुकता अभियान के तहत 30 सेकेंड का वीडियो शूट किया गया.


मोदी के नाम खत

बृजेंद्र के अनुसार, सुनीता ने अपनी मौत से कुछ दिन पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक मार्मिक पत्र लिखा था. जिसके मुताबिक, ‘गुटका हर दुकान पर खुलेआम बिकता है. छोटे बच्चों से लेकर नौजवान, बूढ़े, महिलाएं आदि इसका सेवन कर रहे हैं. इसलिए तंबाकू की बिक्री पर रोक जरूरी है. कानून तो है लेकिन उसका पालन नहीं हो रहा है. मैं किसी को तंबाकू खाते देखती हूं तो मेरी रूह कांप जाती है. पैकेट में सचित्र चेतावनी लोगों को जागरूक करती है और  इससे वे तंबाकू सेवन छोड़ने के लिए सोचने पर मजबूर होते हैं.’

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मोदी के मन की बात

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ महीनों पहले नशे की लत छोड़ने को लेकर ‘मन की बात’ की थी. इसमें उन्होंने कहा था, ‘ड्रग्स, नशा ऐसी भयंकर बीमारी है, जो अच्छे-अच्छो को हिला देती है. परिवार तबाह हो जाता है. समाज-देश सब कुछ बर्बाद हाे जाता है. ड्रग्स तीन बातों को लाता है और मैं उसको कहूंगा, एक बुराइयों वाला 3डी है. एक डी है ‘डार्कनेस’, दूसरा है ‘डिस्ट्रक्शन’ और तीसरा है ‘डीवास्टेशन’. नशा अंधेरी गली में ले जाता है. विनाश के मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता है और बर्बादी का मंजर इसके सिवाय कुछ नहीं मिलता.


 

पिछले साल अगस्त में इस वीडियो की लॉन्चिंग के लिए तब के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने खासतौर पर सुनीता को परिवार के साथ दिल्ली आने का बुलावा भेजा था. 35 वर्षीय पति बृजेंद्र के अनुसार, ‘सरकार की ओर से हमें एक रुपया भी नहीं मिला. कार्यक्रम में सुनीता को सिर्फ ‘श्रीफल’ देकर सम्मानित किया गया. मुझे लगा था कि वीडियो में आने के बाद सरकार की ओर से आर्थिक मदद जरूर मिलेगी, मगर ऐसा कभी नहीं हुआ.’ उस समय कार्यक्रम के दौरान सुनीता ने लोगों से तंबाकू न खाने और तंबाकू रहित विश्व का आह्वान किया था. इस समय पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने देश में गुटका, खैनी, जर्दा जैसे तंबाकू उत्पादों के पैक पर ग्राफिक चेतावनी लागू करने की घोषणा भी की थी.

बृजेंद्र ने बताया, ‘ऑपरेशन के बाद सुनीता सामान्य जीवन जी रही थीं. कभी-कभी उन्हें सांस लेने में तकलीफ होती थी. 28 मार्च की रात में सुनीता की तबीयत बिगड़ी तो मैंने उन्हें भिंड के एक अस्पताल में भर्ती कराया. यहां राहत नहीं मिली तो डॉक्टरों ने ग्वालियर रेफर कर दिया.’ यहां इलाज शुरू हुए एक-दो दिन ही हुए थे कि एक अप्रैल को जिंदगी से संघर्ष करते हुए सुनीता ने दम तोड़ दिया.

वे भाजपा सांसद और अधीनस्थ विधान संबंधी लोकसभा समिति के अध्यक्ष दिलीप गांधी के बयान से भी नाराज थीं. इसे लेकर उन्होंने प्रधानमंत्री काे पत्र भी लिखा था. दिलीप गांधी ने कहा था, ‘तम्बाकू ही कैंसर की वजह नहीं है.’ इसको लेकर सुनीता काफी नाराज थी. जानकारों के मुताबिक देश में तंबाकू का सेवन ही कैंसर की बड़ी वजह है.

बृजेंद्र ने बताया, ‘सुनीता ने प्रधानमंत्री से अपील की थी कि तंबाकू के पैकेटों पर तंबाकू निषेध से संबंधित चित्र बड़े आकार में बनाए जाएं, ताकि लोगों को पता चले कि ये कितने खतरनाक हैं. सुनीता के घरवालों का आरोप है कि सरकार की ओर से किसी भी तरह की आर्थिक मदद नहीं मिली. बृजेंद्र कहते हैं, ‘सरकार अगर जरा-सा भी संवेदनशील हो जाती तो सुनीता की जान बचाई जा सकती थी. उस प्रचार अभियान के बाद हमें लगा था कि सरकार हमारी मदद करेगी, लेकिन सरकार का कोई भी नुमाइंदा हमारे परिवार का हाल तक जानने नहीं आया. मैंने सुनीता के इलाज के लिए 3.5 लाख रुपये का कर्ज ले रखा है. कर्ज के बोझ तले बच्चों का भविष्य अंधेरे में नजर आने लगा है.’ अब सवाल यह उठता है की सुनीता भारत सरकार के तंबाकू निषेध अभियान का इतना बड़ा चेहरा थीं तो उनको सरकारी सहायता क्यों नहीं मिली? क्या सरकार जनता का ऐसे ही शोषण करेगी? अगर सुनीता के साथ ये हुआ तो आम जनता के साथ क्या होता होगा. हमारे देश के नीति निर्माताओं को इस पर सोचने की जरूरत है. सुनीता की मौत सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली में लगे लापरवाही के घुन की कहानी बयां करती है.

गुटबाजी से कांग्रेस पस्त, भाजपा मस्त

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छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों भूचाल आया हुआ है. नागरिक आपूर्ति घोटाले से घिरी राज्य की भाजपा सरकार को लेकर कांग्रेस ने जो मशाल उठाई थी, उसमें भाजपा को तो कोई विशेष नुकसान नहीं पहुंचा, उलटे कांग्रेस के घर में आग की लपटें उठने लगी हैं.

जब दिल्ली समेत पूरे देश में कांग्रेस ने सुस्त रवैया अपना रखा है, उस वक्त आश्चर्यजनक रूप से छत्तीसगढ़ में पार्टी के नेता दोगुने उत्साह से काम करते नजर आ रहे हैं. कांग्रेस के जोश पर आश्चर्य इसलिए जताया जा रहा है क्योंकि नया राज्य बनने के बाद से अब तक कांग्रेस पर असफल और कमजोर विपक्ष का ठप्पा लगता रहा है. कई बड़े और जनसरोकारी मुद्दों पर कांग्रेस का मौन न केवल कार्यकर्ताओं बल्कि मतदाताओं को भी खटकता रहा है. खुद अपने 20 प्रमुख नेताओं (झीरम घाटी नक्सल हत्याकांड) की हत्या के मामले को भी कांग्रेस सही तरीके से न उठा पाई थी, न ही विधानसभा चुनावों में भुना पाई थी.

राज्य में कांग्रेस का नेतृत्व हर मुद्दे पर अब मुख्यमंत्री रमन सिंह और उनकी कैबिनेट को आड़े हाथ ले रहे हैं. किसानों को धान का बोनस नहीं दिए जाने के मुद्दे से लेकर भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी सरकार से रोज जवाब मांगा जा रहा है. दिक्कत ये है कि कांग्रेस अपनी गुटबाजी से उबर नहीं पा रही है. यही कारण है कि भाजपा सरकार के खिलाफ शुरू हुई कांग्रेस की लड़ाई ने अपने ही घर में सिर-फुटौव्वल का रूप ले लिया है. छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल और पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी रोज एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी पर उतर आए हैं. दोनों के बीच खींचतान नई बात नहीं है, लेकिन जिस मुद्दे पर दोनों उलझ रहे हैं, वह मुद्दा भाजपा सरकार को उलझाने के लिए उपयोग किया जाना था.

दरअसल पिछले महीने प्रदेश के नागरिक आपूर्ति निगम (नान) पर राज्य के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) ने छापा मारकर करोड़ों की अनियमितता और भ्रष्टाचार के मामले को उजागर किया था. कथित तौर पर एसीबी के हाथ नान के अफसरों की एक डायरी भी लगी थी, जिसमें कई सौ करोड़ के रुपयों के लेन-देन का ब्योरा था. भूपेश बघेल इस कथित डायरी को लेकर मुख्यमंत्री रमन सिंह से हर दूसरे दिन जवाब तलब कर रहे हैं. इस बीच अजीत जोगी का बयान आया कि केवल डायरी के आधार पर किसी का दोष सिद्ध नहीं होता. जोगी ने पुराने मामलों का हवाला देते हुए यह भी कहा कि न्यायालय केवल किसी डायरी को साक्ष्य नहीं मानता. बस यहीं से कांग्रेस के दोनों बड़े नेता सरकार को परे रख एक-दूसरे के खिलाफ व्यंग्यबाण छोड़ रहे हैं.

हाल ये है कि कांग्रेस के इन दो नेताओं की लड़ाई को कभी मुख्यमंत्री रमन सिंह तो कभी अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी तड़का लगा रहे हैं. मरवाही विधानसभा सीट से विधायक अमित जोगी अपने पिता का बचाव करते हुए कहते हैं, ‘मेरे पिता ने केवल सुझाव दिया है, उसे मानना या ना मानना संगठन का काम है.’ वे पलटकर सवाल करते हैं कि जब मध्य प्रदेश के व्यावसायिक परीक्षा मंडल घोटाले को कांग्रेस कोर्ट ले जा सकती है तो छत्तीसगढ़ के नान घोटाले को क्यों नहीं ले जा सकती.’

मुख्यमंत्री रमन सिंह कहते हैं, ‘कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई कभी खत्म नहीं हो सकती है. अभी भी कांग्रेस में जो नजर आ रहा है, वो उनके अंदर का मामला है, लेकिन जिस नान घोटाले की कांग्रेस बात कर रही है, उसे सौ बार कहें या हजार बार, झूठ सच में नहीं बदल जाएगा.’

कांग्रेस नेताओं को संयम बरतने की हिदायत 

फिलवक्त कांग्रेस की अंदरूनी कलह सतह पर आ गई है. यही कारण है कि कांग्रेस के तेवर से जो राज्य सरकार सहमी नजर आ रही थी, अब वही कांग्रेस पर चुटकी लेने से नहीं चूक रही है। इस आपसी खींचतान का ही नतीजा है कि इसकी आंच अब दिल्ली भी पहुंच गई है. कांग्रेस के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा ने दोनों नेताओं को संयम बरतने की हिदायत दी है, वहीं पीसीसी अध्यक्ष भूपेश बघेल केंद्रीय नेतृत्व को इससे अवगत कराने दिल्ली पहुंच चुके हैं. अजीत जोगी भी दिल्ली जाने की तैयारी कर रहे हैं. उनकी योजना है कि पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी के अलावा छुट्टी से लौट रहे राहुल गांधी से भी मुलाकात कर सकें. दूसरी तरफ जोगी के कुछ समर्थक बघेल पर पार्टी संविधान का पालन नहीं करने और पार्टी के बड़े नेता (जोगी) के खिलाफ अनुशासनहीनता का रंग देकर नया पासा फेंकने की तैयारी में है. अब सरकार की जड़ें ढीली करने के लिए बारूद जुटा रही कांग्रेस खुद ही धमाके का शिकार हो गई है. परिणाम ये हुआ कि राहत की सांस लेते हुए मुख्यमंत्री रमन सिंह अपने मंत्रिमंडल को नया रूप देने में व्यस्त हो गए हैं क्योंकि अप्रैल के अंत तक रमन कैबिनेट का विस्तार होना है.


भूपेश खिसियानी बिल्ली : जोगी

नान घोटाले पर राज्य सरकार के खिलाफ शुरू हुई कांग्रेस की जंग आपसी खींचतान के रूप में सामने आ रही है. अजीत जोगी ने भूपेश बघेल को खिसियानी बिल्ली बोलकर मामले को और संगीन कर दिया है. उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश:

आप लगातार कांग्रेस के स्थानीय नेतृत्व से नाखुश हैं, आपके बयान अपनी ही पार्टी के नेताओं को कठघरे में खड़ा करते नजर आते हैं?

देखिए, मैं पार्टी के आतंरिक मामलों को लेकर कभी कोई टीका टिप्पणी नहीं करता हूं. मैंने कभी ऐसा कोई बयान भी नहीं दिया, जिससे यह लगे कि मैं अपनी ही पार्टी के खिलाफ खड़ा हूं. लेकिन यदि कोई मेरा नाम लेकर ही बयानबाजी कर रहा है तो मैं उसके लिए उर्दू का यह शेर कहना चाहूंगा कि आईना जो उनको दिखाया तो बुरा मान गए.

लेकिन आपको लेकर भूपेश बघेल कह रहे हैं कि जब-जब वे रमन सरकार को घेरते हैं, बुरा आपको लगता है?

यह तो वही बात हुई कि खिसयानी बिल्ली खंभा नोचे। अब इन बातों से आप खुद ही निहितार्थ लगा लीजिए. मैं ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा। यह जरूर कहना चाहता हूं कि यदि मैंने नान (नागरिक आपूर्ति निगम) घोटाले को लेकर कोर्ट जाने को कहा, बेमतलब की बयानबाजी न करने की सलाह दी, तो क्या गलत कहा.


क्या संन्यास ले लूं : बघेल

पीसीसी अध्यक्ष भूपेश बघेल भी अजीत जोगी को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे. प्रदेश की भाजपा सरकार से दो-दो हाथ करने के साथ ही बघेल जोगी पर भी बयानों के तीर छोड़ने में पीछे नहीं हैं. उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश:

अजीत जोगी कह रहे हैं कि आप केवल बयानबाजी कर समय खराब कर रह हैं. नान घोटाले को लेकर वो आपको अदालत जाने की सलाह दे रहे हैं. क्या आपको उनकी बातें बुरी लग रही हैं?

मुझे क्यों बुरा लगेगा. जहां तक बयान देने का सवाल है तो वो मैं जरूर दूंगा और देता रहूंगा. कोर्ट जाने की बात तो वे अब कर रहे हैं, मैं तो पहले ही बोल चुका हूं कि नान घोटाले को लेकर हम अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे।

अजीत जोगी वरिष्ठ हैं, उनकी सलाह में कुछ तो दम होगा?

मुझे एक बात नहीं समझ आती कि कैसे राजनीतिक व्यक्ति या दल जनता की लड़ाई छोड़ दें. क्या हम संन्यास ले लें? जब भी हम सरकार के खिलाफ कोई बयान देते हैं तो जोगी जी को क्यों तकलीफ होती है, यह समझ से परे है. आप इस पर भी गौर कीजिए की नान घोटाले को लेकर राज्य सरकार के खिलाफ जोगी जी ने अब तक कोई बयान नहीं दिया है. इस पर क्या कहा जाए.