नरेन्द्र मोदी का सेवा भाव – राजनीति के पच्चीस साल

गुजरात के मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री बनने तक नरेंद्र मोदी के राजनीतिक सफ़र को दर्शाने वाला कोलाज।
हाल के इतिहास में, लोकतांत्रिक रूप से चुने गए किसी नेता के तौर पर नरेंद्र मोदी का कार्यकारी पद पर 25 साल का कार्यकाल सबसे लंबे कार्यकालों में से एक है।

“ऊंचे शिखरों पर हवाएं हमेशा सबसे तेज चलती हैं।”

रोमन दार्शनिक सेनेका

अक्तूबर की 7 तारीख। इतिहास रच रहा है। भारतीय केवल अच्छा शासन नहीं चाहते; वे ऐसा शासन चाहते हैं जो भक्ति जैसा महसूस हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कार्यकारी पद पर 25 साल पूरे कर रहे हैं। यह महज सिल्वर जुबली नहीं है। क्यों? ‘बुलंदियों पर पहुंचना नहीं टिकना कमाल होता है’। मोदी 25 साल पहले 7 अक्टूबर को गुजरात के सीएम पद पर आसीन हुए थे फिर उन्होंने ने राजनीति को एक नया मुकाम दिया। एक पूर्व चाय विक्रेता, जिसने एक धुर दक्षिणपंथी हिंदू पुनरुत्थानवादी संगठन से अपना राजनीतिक करियर शुरू किया था, मोदी ने अपने एक भाषण में महात्मा गांधी का जिक्र करते हुए इस बात पर जोर दिया कि “हर समस्या का एकमात्र समाधान आर्थिक विकास है – जिसके बिना भारत का भविष्य नहीं बदलेगा”। नरेन्द्र मोदी अपनी कार्यशैली से कार्यकारी पद की उंचाई पर पहुंचे पहले मुख्यमंत्री बने फिर प्रधानमंत्री, अभी तक इस पर न सिर्फ टिके हुए हैं, बल्कि बुलंदियों ने उन्हे अपना लिया है।

वह फैसला जो भाग्य बदल गया: मुंबई के छोटे कमरे से BJP तक

कहते है , कुछ फैसले आपका, समाज का, राज्य का, देश का भाग्य बदल देते हैं। ऐसा ही एक फैसला महाराष्ट्र (मुम्बई) में एक 8/10 के एक छोटे कमरे में हुआ था। नरेन्द्र मोदी के महाराष्ट्र में रहने वाले मित्र रमेश भाई मेहता के घर एक दिन सुबह घर के दरवाजे की घंटी बजी। देखा तो नरेन्द्र मोदी और मधु भाई कुलकर्णी सामने खड़े थे। रमेश भाई मेहता के मुताबिक घर में प्रवेश करते ही दोनों लोग सीधे बेडरूम की तरफ बढ़े, जहाँ बालासाहेब देवरस ठहरे हुए थे। दोनों लोग वहाँ से बात करके बाहर निकले। तब रमेश भाई ने नरेन्द्र भाई मोदी से जानने की कोशिश की कि अन्दर क्या बात हुई। लेकिन नरेन्द्र मोदी पूरी तरह खामोश रहे।

अगले दिन अखबार में देखने को मिला की नरेन्द्र मोदी को बीजेपी में ले आया गया। इस बात की पुष्टि रमेश मेहता की पत्नी कीर्ती मेहता ने जब नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर सवाल किया कि आप तो हमेशा संघ के स्वयंसेवक बनकर काम करने वाले थे, फिर बीजेपी में प्रवेश का क्या मतलब निकाला जाए? इस पर नरेन्द्र मोदी की तरफ से उनका जो जवाब दिया गया, उसमें कहा गया कि निर्णय तो आपके घर में ही हुआ था। यह निर्णय तो बाला साहेब का है, इसमें मैं क्या करूँ। इस फैसले ने नरेन्द्र मोदी ,गुजरात और भारत के भाग्य का फैसला कर दिया।(THE REAL MODI ) से सम्भार

25 साल सत्ता में: वैश्विक संदर्भ और लोकतांत्रिक इतिहास

पूरी दुनिया में कुल 195 स्वतंत्र देश माने जाते हैं। 193 देश, संयुक्त राष्ट्र (United Nations – UN) के पूर्ण सदस्य हैं। दुनिया में नरेन्द्र मोदी ऐसे राजनेता है जिन्होनें लगातार पच्चीस साल तक राज्य और देश की जनता के दिलों पर राज किया।( अक्टूबर 2001 से मई 2014 मुख्यमंत्री के तौर पर फिर 2014 से लेकर अब तक देश के प्रधानमंत्री के तौर पर । पड़ताल करने पर लोकतन्त्र के इतिहास में केवल एक राजनयिक ऐसे मिले जिन्होनें नरेन्द्र मोदी से ज्यादा वर्षों तक शासन किया। ये हैं, सिंगापुर के संस्थापक और पहले प्रधानमंत्री ली कुआन यू (Lee Kuan Yew) जिन्होने 1959 से 1990 तक 31 वर्षों तक प्रधानमंत्री के रूप में देश का नेतृत्व किया। हालांकि सिंगापुर की लोकतांत्रिक प्रकृति और दलीय प्रभुत्व पर बहस होती रही है, लेकिन वहाँ नियमित रूप से चुनाव आयोजित होते थे।

इसके अलावा स्वीडन के प्रधानमंत्री टागे एरलैंडर (Tage Erlander) ने एक मजबूत और स्थापित लोकतंत्र के भीतर लगातार 23 वर्षों (1946 से 1969 तक) तक शासन किया, जो लोकतांत्रिक देशों के इतिहास में लंबे कार्यकालों में से एक है।
वही कनाडा के प्रधानमंत्री विलियम ल्योन मैकेंजी किंग (William Lyon Mackenzie King) ने अपने अलग-अलग कार्यकालों को मिलाकर कुल 21 साल से अधिक समय तक देश की कमान संभाली।

मील का पत्थर 1987: अहमदाबाद नगर निगम चुनाव

जनता के दिलों पर राज करना पथरीले रास्ते पर चलने जैसा होता है। यह कभी भी आसान नहीं होता है। खास बात तो ये कि राजनीति के प्रारम्भिक दिनों में हर कोई आप का इम्तहान ले रहा होता है। नरेन्द्र मोदी का प्रत्यक्ष तौर पर राजनीति का प्रारम्भ अहमदाबाद में नगर निगम के चुनाव में ऐतिहासिक जीत से आरंभ होता है। कहते जिम्मेदारी आपकी हिम्मत और हौसला बढ़ाती है। वर्ष 1987 में हुआ अहमदाबाद का निगम चुनाव, नरेन्द्र मोदी के राजनैतिक जीवन के लिये मील का पत्थर साबित हुआ। नगर निगम के चुनाव में नरेन्द्र मोदी ने अपने सांगठनिक कौशल का शानदार प्रदर्शन किया । नगर निगम अहमदाबाद में बीजेपी ने मेयर के पद का चुनाव जीत लिया। यह फरवरी 1987 की बात है।

अहमदाबाद के तहिरपुर में हिंसक घटनायें आम हुआ करती थी। वर्ष 1987 के अहमदाबाद नगर निगम (AMC) चुनावों के संदर्भ में जिस विवादित चेहरे की चर्चा होती है, वो अहमदाबाद का कुख्यात अंडरवर्ल्ड डॉन अब्दुल लतीफ हुआ करता था। जो ‘ताहिरपुर’ स्थानीय वार्ड से चुनावों लड़ रहा था। वह 1987 के नगर निगम चुनाव के दौरान वह एक आपराधिक मामले में जेल में बंद था।
उस दौर में अहमदाबाद दंगे और अपराध की आग में झुलस रहा था। कांग्रेस शासनकाल में अपराधियों के राजनीतिक संरक्षण और तुष्टीकरण के आरोप आम थे। लतीफ की उम्मीदवारी और उसकी जीत ने शहर में हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण को और गहरा कर दिया था, जो उस समय की राजनीति का सबसे बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बन गया था।

वर्ष 1987 में ही नरेंद्र मोदी ने अहमदाबाद के शहरी मतदाताओं के बीच कानून-व्यवस्था की बदहाली, डर और कांग्रेस सरकार के खिलाफ सुलग रहे गुस्से (अंडरकरेंट) को बहुत बारिकी से भांप लिया था। लतीफ और अन्य आपराधिक तत्वों के खौफ के माहौल को मोदी ने चुनावी मुद्दा बनाया। बीजेपी ने अपने प्रचार में शहर के लोगों को भयमुक्त शासन और सुरक्षा का भरोसा दिलाया।
अमित शाह के साथ मिलकर मोदी ने बूथ स्तर से लेकर हर गली-मोहल्ले तक मजबूत चुनावी रणनीति तैयार की। पारंपरिक प्रचार की जगह संघ के कैडर और पार्टी कार्यकर्ताओं को घर-घर जाकर जोड़ने का काम किया। नरेन्द्र मोदी के बेहतरीन सांगठनिक कौशल और चुनावी प्रबंधन ने उस माहौल का राजनीतिक लाभ उठाते हुए बीजेपी को अहमदाबाद नगर निगम में पहली बार ऐतिहासिक और पूर्ण बहुमत की जीत दिलाई।

पार्षद रहे प्रफुल्ल रावल बताते है कि नरेन्द्र मोदी ने खूब मेहनत की और उनकी मेहनत रंग लाई। चुनाव में बीजेपी ने दो-तिहाई सीटें जीत ली। नरेन्द्र भाई ने अपने लोगों के लिये जो हिम्मत दिखाई, उसके गुण्डे भाग खड़े हुये। इससे कार्यकर्ताओं को जो उत्साह और ताकत मिली उससे बीजेपी को नगर निगम अहमदाबाद में जीत हासिल करने में बड़ी मदद मिली। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर यह नरेन्द्र मोदी का राजनीति में पहला प्रदर्शन था, जिसने दिल्ली में बैठे राजनेताओें का ध्यान उनकी ओर आकृष्ट किया। समय का चक्र चलता रहा । यह ऐसा समय था जब भाजपा की उम्र सिर्फ 7 साल थी । तीन साल पहले 1982 के लोकसभा चुनाव में पार्टी महज दो सीट जीत सकी थी।

नरेन्द्र मोदी को बीजेपी में संगठन की जिम्मेदारी के साथ ही कुछ बड़ा करने की भी प्रभार दिया गया। जिम्मेदारी मिलने के साथ ही मोदी अलग तरीके से कुछ नया करने में जुट गए। 1986 -87 में संगठन महामंत्री रहे दत्ता जी चिरनदास बताते है कि नरेन्द्र मोदी का काम करने का तरीका बाकी लोगों से एकदम अलग था। उनके संगठन में आने के बाद, अलग तरह से काम करने की शक्ति आ गई। नरेन्द्र भाई ने बीजेपी में आने के साथ ही सबसे पहले प्राथमिक मेम्बरशिप रजिस्टर तैयार करवाया। दत्ता जी ने बताया की यह बीजेपी के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ था। यह 10 साल तक चलता रहा था। इस रजिस्टर से यह पता चलता था कि कितने मेम्बर हर साल बढ़ रहे हैं। सबकी जिम्मेदारी होती थी कि ज्यादा से ज्यादा सदस्यों को पार्टी से जोड़े । उस समय कम्प्यूटर का चलन नहीं था, लिहाजा इस रजिस्टर में हर सदस्य का बाकायदा नाम, पता और टेलीफोन नं० दर्ज हुआ करता था। जिससे कि उससे किसी भी समय सम्पर्क किया जा सके।

धैर्य के 5 साल और उसके बाद: 1990 का संघर्ष और दिल्ली की जिम्मेदारी

1989 में पिता की मौत 1990 से 1994 तक नरेन्द्र मोदी राजनैतिक तौर पर सघर्ष करते रहे। वर्ष 1995 में जब नरेन्द्र मोदी को राष्ट्रीय राजनीति (दिल्ली) में जिम्मेदारी दी गई, तो उन्हें भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय सचिव बनाया गया। इसके बाद 1998 में उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) नियुक्त किया गया। दिल्ली आने के बाद सबसे पहले वर्ष 1995 में राष्ट्रीय सचिव बनने के बाद उन्हें मुख्य रूप से हरियाणा और हिमाचल प्रदेश राज्यों में पार्टी के संगठन और गतिविधियों का प्रभार (In-charge) सौंपा गया था। मोदी अक्सर हिमाचल को अपना ‘दूसरा घर’ और ‘कर्मभूमि’ बताते रहे हैं। मोदी खुद भी हिमाचल प्रदेश में बिताए अपने वर्षों और उन अनुभवों का कई बार जिक्र कर चुके हैं, जिन्होंने राज्य के साथ उनके रिश्ते को मजबूत किया।

उन्होंने एक बार अपने अनुभव साझा करते हुए कहा था, “मुझे आज भी हिमाचल में बिताए अपने दिन याद हैं। मैं एक गांव तक पहुंचने के लिए पूरे दिन पैदल पहाड़ों पर चलता था। जब आखिरकार गांव पहुंचता था तो मुझे एक कप गर्म चाय दी जाती थी। आज भी उस कप की गर्माहट महसूस होती है।”
एक अन्य अवसर पर मोदी ने हिमाचल के पहाड़ों से मिले सबक का जिक्र करते हुए कहा था, “हिमाचल के ऊंचे पहाड़ों ने मुझे हौसला ऊंचा रखने की सीख दी है। बर्फ से ढकी इसकी पहाड़ियों ने मुझे ठंडे दिमाग से काम करना सिखाया है। इन पहाड़ों ने मुझे गर्व के साथ सिर ऊंचा रखना सिखाया है और मैं मां भारती के अपमान को सहन नहीं कर सकता।”

भाजपा नेताओं के मुताबिक, मोदी ने 1990 के दशक में हिमाचल प्रदेश में काफी समय बिताया, जब वह पार्टी के राज्य प्रभारी के रूप में जिम्मेदारी संभाल रहे थे। उनका कहना है कि इस दौरान मोदी को राज्य के लोगों की समस्याओं को करीब से समझने का अवसर मिला और उन्होंने यहां पार्टी के संगठन के साथ मजबूत रिश्ता कायम किया।
भाजपा के एक नेता ने कहा, “प्रधानमंत्री ने 1990 के दशक में हिमाचल में काफी समय बिताया था, जब वह राज्य के प्रभारी थे। इसलिए वह यहां के लोगों की समस्याओं से अच्छी तरह परिचित हैं। राज्य के विकास और लोगों की प्रगति को सुनिश्चित करने में उनकी व्यक्तिगत रुचि रही है।”

संगठन के व्यक्ति के रूप में मोदी के अनुभव और राजनीतिक पहुंच के लिए नए और प्रभावी तरीकों पर उनका जोर हिमाचल में भाजपा के संगठन को मजबूत करने में भी मददगार रहा। राज्य के प्रभारी के तौर पर उनका कार्यकाल हिमाचल प्रदेश में भाजपा के विस्तार का एक महत्वपूर्ण दौर था। 1998 के विधानसभा चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन को भी इसी दौर के संदर्भ में देखा जाता है।
हिमाचल प्रदेश के साथ मोदी का संगठनात्मक रिश्ता 1990 के दशक के मध्य से जुड़ा है। 1995 में उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय सचिव बनाया गया और हरियाणा तथा हिमाचल प्रदेश में पार्टी की गतिविधियों की जिम्मेदारी सौंपी गई।
इसके बाद उन्हें संगठन में व्यापक भूमिका दी गई। 1998 में भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व में बदलाव के बाद मोदी पार्टी के महासचिव (संगठन) बने। उनकी जिम्मेदारियों का दायरा बढ़कर पंजाब, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर और चंडीगढ़ तक पहुंच गया। इसके अलावा उन्हें भाजपा के युवा संगठन भारतीय जनता युवा मोर्चा की जिम्मेदारी भी मिली।

भाजपा में मोदी का उभार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की संगठनात्मक व्यवस्था में उनके अनुभव पर आधारित था। ‘प्रचारक’ आरएसएस के पूर्णकालिक कार्यकर्ता होते हैं, जो संगठन के काम के लिए अपना जीवन समर्पित करते हैं और आम तौर पर पारिवारिक जिम्मेदारियों से अलग रहकर काम करते हैं। जब उन्हें भाजपा या आरएसएस से जुड़े अन्य संगठनों में भेजा जाता है, तो वे ‘संगठन मंत्री’ या संगठन सचिव के रूप में काम करते हैं। भाजपा में इसी तरह की भूमिका को आम तौर पर महासचिव (संगठन) कहा जाता है।
हिमाचल में बिताए मोदी के वर्ष उनके शुरुआती राजनीतिक जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय रहे। राज्य के भाजपा नेताओं के लिए पहाड़ी प्रदेश के साथ उनका रिश्ता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां उन्होंने पार्टी संगठन को मजबूत करने की अहम जिम्मेदारी निभाई और साथ ही इस क्षेत्र के साथ अपने व्यक्तिगत जुड़ाव का भी लगातार जिक्र किया।

1998 में राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बनने के बाद उन पर पूरे देश में संगठन के विस्तार और चुनाव प्रबंधन की बड़ी राष्ट्रीय जिम्मेदारी आ गई। प्रभारी और संगठन के पदों पर रहने के दौरान बीजेपी ने 1996 हरीयाणा विधानसभा चुनाव नरेन्द्र मोदी के हरियाणा के प्रभारी रहने के दौरान शानदार प्रदर्शन किया और बंसीलाल की हरियाणा विकास पार्टी (HVP) के साथ गठबंधन करके राज्य में सरकार बनाई। उनके प्रभार वाले दूसरे राज्य हिमाचल प्रदेश में भी वर्ष 1998 के विधानसभा चुनावों में पार्टी को बड़ी सफलता मिली और प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व में बीजेपी ने सरकार बनाई। वर्ष 1998 में जब उन्हें राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बनाया गया, तो उनके चुनावी प्रबंधन और संगठनात्मक रणनीतियों के दम पर बीजेपी 1998 और 1999 के आम चुनावों में देश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। इन दोनों ही चुनावों के बाद अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र में एनडीए (NDA) की सरकार बनी।

श्मशान घाट का एक फोन कॉल: वाजपेयी का आदेश और गुजरात की वापसी

कुछ घटनाएं इतिहास बदल देती हैं, यह 2 अक्टूबर 2001 की बात है। नरेन्द्र मोदी दिल्ली में एक समाचार चैनल के फोटो पत्रकार गोपाल बिष्ट के अंतिम संस्कार में शामिल हो रहे थे। ठीक एक दिन पहले, माधवराव सिंधिया, कुछ पत्रकारों के साथ जिसमें एक समाचार चैनल के विशेष संवाददाता रंजन झा, ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के संजीव सिन्हा और ‘द हिंदुस्तान टाइम्स’ की अंजू शर्मा के साथ एक निजी विमान दुर्घटना हादसे में मारे गए थे। इस त्रासदी से पूरा देश स्तब्ध था। इस घटना से मोदी को गहरा दुख हुआ और उन्होंने बिष्ट को एक ऐसे सरल और सादगीपसंद व्यक्ति के रूप में याद किया जो सुर्खियों से दूर रहना पसंद करते थे।

अंतिम संस्कार के बीच में ही, मोदी के मोबाइल पर प्रधानमंत्री कार्यालय से एक फोन आया। वह कॉल रिसीव करने के लिए एक तरफ गए। लाइन पर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे।
वाजपेयी की गंभीर आवाज ने पूछा, “तुम कहाँ हो?”
मोदी ने उन्हें बताया, “मैं श्मशान घाट पर हूँ।”
वाजपेयी ने पूछा, “वहाँ क्या कर रहे हो?”
जब मोदी ने उन्हें इसकी वजह बताई, तो वाजपेयी चुप हो गए। थोड़ी देर बाद, उन्होंने मोदी को शाम को अपने आवास पर मिलने के लिए कहा।
जब मोदी शाम को उनसे मिले, तो वाजपेयी ने कहा, “यह सारा पंजाबी खाना खा-खाकर तुम मोटे हो गए हो। यहाँ से जाओ। गुजरात जाओ। तुम्हें वहीं काम करना है।” मोदी वाजपेयी की बात का मतलब समझ नहीं पाए। उन्हें लगा कि उनसे राष्ट्रीय प्रभारी महामंत्री के रूप में गुजरात संगठन की देखरेख करने के लिए कहा जा रहा है। इसलिए उन्होंने पूछा कि क्या अन्य राज्यों के साथ-साथ गुजरात भी उनकी अतिरिक्त जिम्मेदारी होगी।
वाजपेयी ने कहा, “नहीं-नहीं। तुम्हें चुनाव लड़ना होगा। अभी तक तुमने दूसरों को चुनाव लड़वाने में मदद की है, लेकिन अब तुम चुनाव लड़ोगे।”
मोदी को अहसास हुआ कि वाजपेयी उन्हें मुख्यमंत्री बनने के लिए कह रहे हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या प्रतिक्रिया दें। उन्होंने उनसे कहा कि उनके लिए चुनाव लड़ना असंभव है।
उन्होंने कहा, “अगर आप चाहें, तो मैं महीने में 10 दिन गुजरात में रहकर संगठन की देखरेख कर सकता हूँ।”
उन्होंने वाजपेयी को बताया कि उन्होंने कभी गुजरात विधानसभा या मुख्यमंत्री कार्यालय के अंदर कदम नहीं रखा था।
“मैं वहाँ क्या करूँगा?”
घटनाओं के इस अचानक आए मोड़ पर क्या प्रतिक्रिया दें, यह समझ न पाने के कारण मोदी ने अपनी अनिच्छा जताते हुए कहा कि वह छह साल से गुजरात से बाहर थे और वहाँ के मुद्दों से वाकिफ नहीं हैं।
वाजपेयी ने उनसे कहा, “जब मैं दिल्ली आया था, तो मैं किसी को नहीं जानता था।”
मोदी ने कभी नहीं सोचा था कि उनके गुजरात लौटने का बुलावा इस तरह आएगा।
अंदर से वह काफी चिंतित थे। गुजरात से जिस तरह उन्हें निकाला गया था, वह याद अभी भी उनके जेहन में ताजा थी। हालांकि अपने ‘निष्कासन’ के बाद से वह दिल्ली में ही रहे थे, लेकिन 1998 में केशूभाई के दोबारा मुख्यमंत्री बनने को सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने अपने नेटवर्क के जरिए दिन-रात काम किया था। उस अर्थ में, उन्होंने उस वरिष्ठ नेता का कर्ज चुका दिया था।
अब उन्हें केशूभाई की जगह लेने के लिए कहा जा रहा था! इससे गुजरात की जनता को क्या संदेश जाता? वह स्पष्ट रूप से असहज महसूस कर रहे थे। उन्होंने मार्गदर्शन के लिए आडवाणी की ओर देखा, वही व्यक्ति जो उन्हें भाजपा में लेकर आए थे।
मोदी उसी रात आडवाणी से मिले। आडवाणी ने सीधे उनसे पूछा: “अटल जी ने तुमसे क्या कहा?”
मोदी ने कहा, “क्या?”
अब वह समझ सकते थे कि उन्हें गुजरात भेजने की इस योजना का समर्थन करने वाले अकेले प्रधानमंत्री नहीं थे।
आडवाणी ने उन्हें समझाया कि यह निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया था। मोदी को अहसास हुआ कि उनका गुजरात जाना एक तयशुदा बात बन चुकी है।
आडवाणी उन्हें मुख्यमंत्री बनाकर वहाँ भेजने के मामले में वाजपेयी से कहीं अधिक दृढ़ संकल्पित थे। मोदी ने अपनी दुविधा आडवाणी के साथ साझा की, जिन्होंने समझाया कि राज्य को बदलाव की सख्त जरूरत है। संगठन के व्यक्ति होने के नाते, आडवाणी जानते थे कि मोदी ने गुजरात में पार्टी को खड़ा किया था; यदि उन्हें मौका दिया जाए, तो वह वहाँ चमत्कार कर सकते हैं।
यह आडवाणी ही थे जिन्होंने केशूभाई के विकल्प के रूप में मोदी के नाम का प्रस्ताव रखा था। उन्होंने मदनदास देवी से बात की थी, जो भाजपा की देखरेख करने वाले आरएसएस के सह-सरकार्यवाह थे, साथ ही वरिष्ठ आरएसएस नेता दत्तोपंत ठेंगाड़ी और तत्कालीन आरएसएस प्रमुख के.एस. सुदर्शन से भी बात की थी। उस लिहाज से, जब वाजपेयी ने मोदी से बात की, तो वे केवल उस फैसले को बयां कर रहे थे जो पहले ही लिया जा चुका था।
भाजपा उपचुनाव में साबरमती विधानसभा सीट हार गई थी; ऐसा लग रहा था कि भाजपा का भाग्य साथ नहीं दे रहा था। यह विधानसभा क्षेत्र उस गांधीनगर सीट का हिस्सा था जिसका प्रतिनिधित्व आडवाणी करते थे।
ऐसा नहीं था कि मोदी को इस बात का आभास नहीं था कि उन्हें गुजरात जाने के लिए कहा जा सकता है, लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि यह इतनी जल्दी और इस तरह से होगा। अक्सर ऐसा होता है कि जब आपको कोई ऐसी चीज मिलती है जिसके बारे में आपको पता होता है कि वह आपके रास्ते में आने वाली है, तो आपको समझ नहीं आता कि कैसे प्रतिक्रिया दें। संभावना और वास्तविकता के बीच एक बहुत बड़ी खाई होती है। यही वजह है कि मोदी इस बात पर विश्वास करने को तैयार नहीं थे जो ज्यादातर लोग जानते थे कि होने जा रहा है। 7 अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।(Narendra Modi: The Game Changer- Early Life, Emergency & the Sangh by Sudesh Verma)

नरेन्द्र मोदी ने हमेशा कुछ अलग काम के जरिए लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर ही लेते है । मुख्यमंत्री के तौर पर गुजरात में जब मोदी को अपने सरकारी आवास में प्रवेश करना था तो वह धनतेरस का दिन था , नरेंद्र मोदी ने इसमें भी कुछ अलग करने का निश्चय कर लिया था ? क्यों ना गृह-प्रवेश के समय एक दलित बाला के हाथों से कुंभ रखाया जाए। धनतेरस के पवित्र दिन अधिकृत मुख्यमंत्री निवास-स्थान पर ‘रविना नरेश कुमार जादव’ नाम की एक दलित बाला के हाथों कुंभ रखा गया। उसके पश्चात् ही हुआ श्री नरेंद्र मोदी ने गृह में प्रवेश किया। यह हकीकत बया करती है कि अलग सोच रखने के साथ उसे जमीन पर उतार देना ही किसी सफलता का पैमाना हो सकता है।

दलदल में खिला कमल: 2002 के दंगे, इस्तीफे की पेशकश और चुनावी जीत

मोदी का सीएम बनना उनका बुलंदी पर पहुंचना था। लेकिन टिकना? आसान नहीं था। सिर्फ चार महीने बाद ही फरवरी 2002 में गुजरात दंगे हुए। यह डगमगाने,लड़खड़ाने,संभलने और टिकने की वह अग्नि परीक्षा थी जिसे गुजर कर मोदी कुंदन बने।
गुजरात दंगों के बाद विरोधी दलों के साथ अपनों के बीच के विरोधियों ने सियासी रूप से उन्हे किनारे लगाने की कोशिश की। उन पर इस कदर दबाव बनाया गया कि उन्होंने 2002 के अप्रैल में गोवा में हुई भाजपा की कार्यकारिणी में सीएम पद से इस्तीफे की पेशकश कर दी। अब निर्णय कार्यकारिणी को करना था कि मोदी का इस्तीफा स्वीकार किया जाए या नहीं। यदि नहीं तो आगे उनके लिए क्या निर्देश हो? कार्यकारिणी में इसको लेकर एक राजनीतिक प्रस्ताव तैयार किया गया। राजनाथ सिंह जो उस समय पार्टी महासिचव थे उन्होंने प्रस्ताव पेश करते हुए नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की पेशकश को खारिज कर दिया। साथ ही कार्यकारिणी ने मोदी को गुजरात में जनता के बीच जाने (चुनाव कराने) का सुझाव दिया। मोदी ने ऐसा ही किया और 2002 के गुजरात विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की।

नरेन्द्र मोदी के गुजरात में मुख्यमंत्री पद सम्हालने के बाद 7 अक्टूबर 2002 की रिपोर्ट बताती है कि एक साल में उनकी प्रथमिकाताएं क्या थी –
लोक कल्याण मेलों और ग्राम सभाओं के माध्यम से समाज कल्याण की योजनाएं ग्रामीण जनता के द्वार तक लाई गईं।
समरस ग्राम योजना ने गुजरात के गांवों को विवादरहित और ऊर्जावान बनाया।
मुख्यमंत्री के प्रयासों से भूकंप पीड़ित कच्छ क्षेत्र में उद्योग लगाने पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क प्रोत्साहन योजना 2004 तक बढ़ी।
सरदार सरोवर नर्मदा निगम लि. की ओर से जारी बांड को उनकी सरकार ने करमुक्त कराया और नर्मदा परियोजना के लिए 500 करोड़ रु. दिए गए ।
छोटे कच्छ के रण के किनारे पर एक झील बनाकर जल संरक्षण की महती परियोजना शुरू करने की उनकी योजना।
सूखे की विभीषिका से निपटने के लिए जन सहयोग के जरिए एक लाख छोटे बांध बनाने की उनकी योजना।

नरेन्द्र मोदी 7 अक्टूबर 2026 को लगातार सत्ता में रहने का पच्चीस वर्ष पूरा करने जा रहे है । इन पच्चीस वर्षों में उनके कार्य का मुल्यांकन करे तो ना जाने कितनी बार उन्होंने ने अपने काम करने के तरीके से देश और दुनिया को चौकाया है। विरोधियों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। विपक्षी पार्टियों को अपने परिणाम देने की आदत से असहज कर दिया है। पार्टी के भीतर और बाहर एक ऐसी लकीर खींच दी जिसे फिलहाल मिटाने वाला कोई दिख नही रहा। क्या यह सब कुछ इतना आसान था? यह कुछ ऐसा था कि मानों सियासत की पथरीली जमीन पर चलने के दौरान आपके पैरों से खून निकल जाएं। इन पच्चीस साल में नरेन्द्र मोदी ने कई ऐसे फैसले किए है जिनकी आलोचना तो हुई पर उसे खारिज नहीं किया जा सका।

2002 मुख्यमंत्री के रूप में उनके शुरुआती कार्यकाल के दौरान 2002 में हुए गुजरात दंगों को रोकने में प्रशासनिक विफलता और संलिप्तता के गंभीर आरोप लगे। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें तीखी आलोचना का सामना करना पड़ा। मोदी ने इस संकट को “गुजरात गौरव” और सुरक्षा के नैरेटिव में बदल दिया। उन्होंने लगातार चुनावी जीत (2002, 2007, 2012) हासिल करके अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत की। बाद में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त विशेष जांच दल (SIT) से उन्हें क्लीन चिट मिली गई।

दिल्ली की दस्तक: 2010 का संकेत, 2013 में कैंपेन कमेटी और 2014 का बहुमत

भाजपा 2009 का लोकसभा चुनाव हार चुकी थी। उस चुनाव में पीएम उम्मीदवार लाल कृष्ण आडवाणी थे। यहीं से 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा अगला चेहरा कौन होगा यह सवाल पार्टी,संघ परिवार के साथ विपक्षी दलों के बीच भी चर्चा में आ गई थी। उत्तर तलाशना मुस्किल था। लाल कृष्ण आडवाणी उस समय पार्टी के सबसे ताकतवर नेता थे। उनके अलावा सुषमा स्वराज पीएम इन वेटिंग में गिने जा रहे थे। सुषमा तो लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष थी। चूंकि चर्चा में दिल्ली के नेता थे लेकिन इन चर्चा में उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम भी पीएम वेटिंग के लिए गिना जा रहा था।

संकेत स्पष्ट नहीं हो रहे थे। उसी वक्त गुजरात राज्य के स्थापना का 50वां वर्षगांठ अहमदाबाद में मनाया गया। 1 मई 2010 को सरदार पटेल स्टेडियम में इसके लिए कार्यक्रम रखा गया था। राष्ट्रीय मीडिया की टीम इसे कवर करने गई थी। यह संवाददाता (सुजीत ठाकुर) भी स्टेडियम में मौजूद था। मेरे बगल में वरिष्ठ पत्रकार स्वप्नदास गुप्ता (पश्चिम बंगाल सरकार के वित्त मंत्री) बैठे थे। मोदी के भाषण से पहले रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहा था। बगल के ब्लॉक में उस समय राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली भी बैठे थे। इस संवाददाता की नजर उन पर पड़ी। उन्हे मोबाइल पर संदेश भेजा। उन्होंने कॉल कर कहा,”तुम और स्वप्न दास कार्यक्रम के बाद रेस्टोरेंट में मिलो।”
गुजराती जनता के बीच मोदी ने हिंदी में भाषण दिया। कार्यक्रम खत्म होते ही पहला सवाल बगल में बैठे स्वप्नदास गुप्ता ने मुझसे किया। “कार्यक्रम की बड़ी खबर क्या है?” मैंने दो टूक कहा,’नरेंद्र भाई ने दिल्ली आने की दस्तक दी है’। स्वप्नदास गुप्ता ने हामी भरी। बाद में अरुण जेटली से भी यह चर्चा हुई। जेटली ने साफ तौर पर तो कुछ नहीं बोले बस मुस्कुरा दिए। उनकी मुस्कुराहट में बहुत कुछ छिपा था। जब 2013 में गोवा में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में मोदी को 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए कैंपेन कमेटी का चेयरमैन बनाया गया तो दो तीन पत्रकार मित्रों से अनौपचारिक बातचीत में जेटली ने 2010 के इस वाकये का जिक्र करते हुए कहा था “ठाकुर (मुझे वह इसी नाम से बुलाते थे) और स्वप्नदास को इसका अंदाजा तीन साल पहले हो गया था।”

कैंपेन कमेटी का चेयरमैन बनने के साथ ही भाजपा और विपक्ष में इस बात को लेकर कोई आशंका नहीं बची कि 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए नरेंद्र मोदी पीएम प्रत्याशी होंगे। हालांकि, लाल कृष्ण आडवाणी उन्हे कैंपेन कमेटी का चेयरमैन या पीएम प्रत्याशी घोषित करने के पक्ष में नहीं थे। उनका विरोध इतना जबरदस्त था कि वह गोवा कार्यकारिणी में शामिल नहीं हुए और विरोध करते हुए भाजपा में सभी पदों से इस्तीफा दे दिया। आडवाणी यह चाह रहे थे कि, कैंपेन कमेटी के चेयरमैन का दायित्व संभालने या कम से कम पीएम प्रत्याशी घोषित होने से पहले मोदी गुजरात के मुख्मंत्री पद छोड़ दें। यदि आडवाणी के विरोध को देखते हुए मोदी सीएम पद से इस्तीफा देते तो आज जो 25 साल लगातार कार्यकारी पद पर बने रहने का रिकार्ड उनके नाम से दर्ज होने जा रहा है वह टूट जाता। खैर, मोदी को सितंबर 2013 में भाजपा की तरफ से और बाद में एनडीए की तरफ से पीएम प्रत्याशी घोषित किया गया और 2014 में भाजपा पहली बार स्पष्ट बहुमत 283 सीटों के साथ सत्ता में आई। तीस साल में यह पहला मौका था, जब केंद्र में किसी भी दल की स्पष्ट बहुमत की सरकार बनी।

2014 में जीत के बाद मोदी ने गुजरात में एक सभा में कहा कि भाइयों, बहनों, आपको मुझ पर भरोसा है और मुझे आप पर,”उस समय 63 वर्षीय मोदी ने वडोदरा शहर में उमड़ी उत्साहित भीड़ को संबोधित करते हुए कहा था कि, “इस देश की जनता ने अपना फैसला सुना दिया है। यह फैसला कहता है कि हमें 12.5 अरब लोगों के सपनों को साकार करना है। मुझे कड़ी मेहनत करनी होगी।”
मोदी ने उसे करके दिखाया पर जिस तरह से गुजरात में सीएम बनने के बाद कभी दंगे तो कभी योजनाओं के नाम पर उनकी आलोचना और आरोप लगे उसका सिलसिला उनके पीएम बनने के बाद भी थमा नहीं। नवंबर 2016 में अचानक की गई नोटबंदी और उसके बाद जीएसटी लागू करने से उपजी नकदी की किल्लत, लघु उद्योगों को नुकसान और आर्थिक मंदी को लेकर विपक्ष ने उनकी अर्थव्यवस्था प्रबंधन पर गंभीर सवाल उठाए। नरेन्द्र मोदी ने इस कदम को काले धन, भ्रष्टाचार और आतंकवाद के खिलाफ एक बड़े ‘पवित्र यज्ञ’ के रूप में जनता के सामने रखा। डिजिटल ट्रांजेक्शन को बढ़ावा देकर और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के जरिए कल्याणकारी योजनाओं को पारदर्शी बनाकर उन्होंने जनता का विश्वास जीता और 2019 के आम चुनाव में पहले से भी बड़ा बहुमत हासिल किया।

केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं पर एक साल से अधिक समय तक चले किसान आंदोलन के दौरान उन्हें किसानों के भारी आक्रोश और तानाशाही रवैया अपनाने के आरोपों का सामना करना पड़ा।
भारतीय राजनीति में एक दुर्लभ और बड़ा कदम उठाते हुए प्रधानमंत्री ने नवंबर 2021 में तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की और राष्ट्र से माफी मांगी। इस रणनीतिक कदम से तनाव कम हुआ और उन्होंने अपनी नीतियों को ग्रामीण कल्याण और बुनियादी ढांचे के विकास की ओर केंद्रित किया, जिससे पार्टी ने बाद के विधानसभा चुनावों में अपनी स्थिति संभाली।

वर्ष 2021 की शुरुआत में कोरोना की दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन की कमी, चरमराई स्वास्थ्य सेवाओं और सार्वजनिक आयोजनों को लेकर उनकी सरकार की प्रबंधन क्षमता पर दुनिया भर में गंभीर सवाल उठे।सरकार ने युद्ध स्तर पर ऑक्सीजन नेटवर्क और स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार किया। इसके साथ ही, दुनिया के सबसे बड़े मुफ्त टीकाकरण अभियान (2 अरब से अधिक खुराक) और ‘प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना’ के तहत मुफ्त राशन वितरण ने जनता के जख्मों पर मरहम का काम किया, जिससे जनता का भरोसा फिर से बहाल हुआ।

चुनौतियों को पार कर उस पर विजय हासिल करने को मोदी ने अपनी आदत बना ली है । मोदी की वापसी का मुख्य आधार हमेशा से सीधा जन-संवाद , कल्याणकारी योजनाओं की डिजिटल और पारदर्शी डिलीवरी, राष्ट्रवाद या विकास के नैरेटिव को बनाए रखना रहा है। हाल के उदाहरण से भी इस बात को समझा जा सकता है जब जेन जी आन्दोलन ने धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफ़ा करवा लिया तो मोदी ने अपनी रणनीति में व्यापक बदलाव करते हुए सीघे जेन जी से जुड़ने को प्रथमिकता देना आरम्भ कर दिया अब वो युवाओं का उत्साह बढाने के लिए उनके साथ भजन का आनन्द लेने से नहीं चूकते इसलिए निरंतरता के पक्ष में कुछ कहा जाना चाहिए, खासकर ऐसे देश में जहां सार्वजनिक जीवन में निरंतरता बिना स्मॉग वाली दिल्ली की सर्दी से भी ज्यादा दुर्लभ है। पच्चीस साल तक किसी धूमधाम के, चुपचाप, प्रक्रियात्मक रूप से सार्वजनिक भलाई में बदलना कोई पब्लिसिटी (spin) नहीं है।मार्कस ऑरेलियस (महान स्टोइक दार्शनिक और रोमन सम्राट) बाधाएं ही कार्य को गति देती हैं। जो चीज़ रास्ते में रुकावट बनकर आती है, वही आगे चलकर मार्ग बन जाती है।”