नायक जिसे बिहार ने बिसरा दिया

संन्यासी के बारे में पहली जानकारी हमें चंपारण के हरसिद्धी प्रखंड के एक गांव कनछेदवा में मिली. यहां रहनेवाले प्रभात कुमार ने ही पहली बार फोन पर यह जानकारी दी कि उन्होंने कबाड़ी से एक किताब ली है जिसमें बिहार के स्वतंत्रता संग्राम का दिलचस्प इतिहास दिया हुआ है. यह भी कि किताब किसी भवानी दयाल संन्यासी ने लिखी है और इसकी भूमिका राजेंद्र प्रसाद ने लिखी थी. हमारी उत्सुकता बढ़ी तो हम प्रभात से मिलने और इस किताब को देखने पिछले दिनों कनछेदवा गांव पहुंचे. ‘ प्रवासी की आत्मकथा’ नाम से लिखी गयी किताब देखने के बाद भवानी दयाल संन्यासी के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती गई और तभी यह भी पता चला कि उस एक व्यक्तित्व का अंगरेजों के जमाने में कैसा प्रभाव रहा होगा कि जब 1939 में संन्यासी पर 1939 में प्रेमशंकर अंग्रवाल ने ‘‘ भवानी दयाल संन्यासी- ए पब्लिक सर्वेंट ऑफ साउथ अफ्रीका’’ नाम से किताब लिखी और उसे इंडिनय कोलोनियल एसोसिएशन, इटावा के द्वारा प्रकाशित करवाया गया तो यह देखते ही देखते देश-विदेश में छा गई लेकिन तब तक अंगरेजों की नजर इस पर पड़ चुकी थी और अंगरेजों ने भवानी दयाल संन्यासी पर लिखी हुई इस किताब की सारी प्रतियों को सदा-सदा के लिए जब्त कर लिया. बाद में देश की आजादी के वर्ष यानि 1947 में संन्यासी ने फिर से अपने अनुभव ओर संस्मरण को एक आकार दिया तो उसकी भूमिका डॉ राजेंद्र प्रसाद ने लिखी और उसे सस्ता साहित्य मंडल के द्वारा देश भर में बेचा गया. अब सस्ता साहित्य मंडल में उस किताब यानि ‘ एक प्रवासी की आत्मकथा’ के बारे में पूछने पर संचालक नरेंद्र सिंह बिष्ट कहते हैं, ‘ऐसी किसी किताब की जानकारी मुझे नहीं है. 25 सालों से सस्ता साहित्य मंडल से जुडा हुआ हूं, कभी इस किताब की चर्चा नहीं हुई.’

बिष्ट की तरह कई लोगों को संन्यासी के किताब के बारे में जानकारी नहीं. बिहार भर में घूम-घूमकर दुर्लभ दस्तावेज तलाशने वाले चंद्रशेखरम कहते हैं, ‘मुझे जो जानकारी है, उसके अनुसार संन्यासी ने 40 किताबें लिखी थीं, जिनके बारे में पता नहीं चल पा रहा. हमलोग उनकी किताबों की तलाश में है.’

चंद्रशेखरम जिन 40 किताबों के बारे में चर्चा कर रहे हैं उनकी जानकारी अभी तो नहीं मिल पा रही, लेकिन दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह का इतिहास, वर्ण व्यवस्था या मरण अवस्था नामक किताबों के बारे में जानकारी जरूर मिल सकी है. इस सत्याग्रही संन्यासी के बारे में जानने के लिहाज से जब हमने इंटरनेट की दुनिया में विचरण करना शुरू किया तो उस नाम से 9820 परिणाम दिखते हैं. देश और दुनिया के अलग-अलग हिस्से में उन पर हुए कामों का विस्तृत ब्यौरा मिलता है उनके नाम स ेचल रहे संस्थानों की सूची मिलती है.

लेकिन बिहार में संन्यासी का कोई नामलेवा नहीं. उनके नाम पर संस्थान या उन्हें नायक बनाने की तो बात दूर …!

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