बृज खंडेलवाल

कुछ दिन पहले दक्षिण भारत के एक छोटे शहर में दीप कुमार जो एक स्वयंसेवी संगठन चलाते हैं, से मुलाकात हुई। मोदी की वजह से उनके द्वारा दलित उत्थान के कार्य में मुश्किलें आएंगी। उनकी चिंता है कि तीस चालीस लोगों के स्टाफ को कहां से सैलरी देंगे, कैसे वाहन चलेंगे। दीप कुमार के जैसे अनेकों सोशल एक्टिविस्ट्स को फॉरेन कंट्रीब्यूशन कानून में संशोधनों से बहुत वेदना है, आक्रोश है। प्रश्न ये है कि विदेशी पैसे के बिना समाज सेवा क्यों नहीं हो सकती? FCRA बिल का विरोध करने वालों को पहले इस सवाल का जवाब देना चाहिए। क्या भारत इतना गरीब हो गया है कि हर नेक काम के लिए बाहर से पैसा मांगना पड़े? स्थानीय चंदे, उद्योगों की मदद और देश के अपने संसाधनों से स्कूल, अस्पताल, आश्रय गृह और जनसेवा के काम क्यों नहीं हो सकते? फिर विदेशी धन को लेकर इतनी बेचैनी क्यों? सवाल तब और गंभीर हो जाता है जब पैसा संदिग्ध स्रोतों से आए और उसके इस्तेमाल पर साफ जवाब न मिले। समाज सेवा के नाम पर ऐसे प्रोजेक्ट क्यों चलें जिनका असली फायदा जरूरतमंदों से ज्यादा उन लोगों को मिले जो विदेशी फंडिंग के सहारे दिखावटी आधुनिक जीवनशैली जीते हैं? क्या विदेशी पैसे से पलने वाला एक नया परजीवी वर्ग खड़ा करना लोकतंत्र और जनहित की निशानी है?
FCRA बिल का सबसे ज्यादा विरोध विपक्षी दलों, ईसाई चर्च संगठनों और कुछ NGOs द्वारा किया जा रहा है। कांग्रेस, TMC, CPI(M) और DMK इसे असंवैधानिक और दमनकारी बता रहे हैं। चर्च संगठनों को विदेशी फंड से चलने वाले स्कूलों, अस्पतालों और चैरिटी संस्थानों पर असर का डर है। विरोधियों की मुख्य आपत्तियां संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण, अल्पसंख्यक संस्थानों को निशाना बनाने, कार्यपालिका की बढ़ती शक्ति और नागरिक समाज पर संभावित दबाव से जुड़ी हैं। इस पहल को सिर्फ राजनीतिक चश्मे से देखना गलत होगा। बिल विदेशी चंदे पर रोक नहीं लगाता। यह केवल सुनिश्चित करता है कि विदेश से आने वाला पैसा पारदर्शी हो, उसका हिसाब हो और उसका इस्तेमाल घोषित तथा वैध उद्देश्य के लिए ही हो। विदेशी पैसा कोई आसमान से गिरा प्रसाद नहीं है। उसके पीछे स्रोत, मकसद और जिम्मेदारी होती है। सबसे बड़ी समस्या पुराने कानून की खामी थी। अगर किसी संस्था का FCRA पंजीकरण रद्द हो जाए, संस्था खुद पंजीकरण छोड़ दे या उसकी अवधि खत्म हो जाए, तो विदेशी धन से बनाई गई संपत्तियों का क्या होगा? जमीन, इमारतें और दूसरी संपत्तियां किसके कब्जे में रहेंगी? पुराने कानून में इसका साफ जवाब नहीं था।
नया बिल इस खाली जगह को भरता है। इसके तहत एक Designated Authority की व्यवस्था होगी जो ऐसी संपत्तियों का प्रबंधन कर सकेगी। विदेशी पैसे से बनी संपत्ति को पंजीकरण खत्म होने के बाद लावारिस नहीं छोड़ा जा सकता। वरना करोड़ों की संपत्तियां निजी इस्तेमाल, गलत उद्देश्यों या बंद कमरे की सौदेबाजी का हिस्सा बन सकती हैं। बिल में संपत्तियों के अस्थायी हस्तांतरण यानी provisional vesting का प्रावधान है। इसका अर्थ तत्काल स्थायी जब्ती नहीं है। अगर संस्था तय समय में अपना पंजीकरण बहाल या नवीनीकृत करा लेती है, तो संपत्ति वापस पाने का रास्ता खुला रहेगा। निगरानी भी है और इंसाफ की गुंजाइश भी। पारदर्शिता पर बिल जोर देता है। विदेशी पैसा आए तो मालूम होना चाहिए कि किससे आया, कितना आया और कहां खर्च हुआ। जब रकम करोड़ों में हो तो हिसाब भी उसी गंभीरता का होना चाहिए।
2019 से 2022 के बीच संस्थाओं को 55,000 करोड़ रुपये से अधिक विदेशी योगदान मिला। इतनी बड़ी रकम देश में आए और सरकार उससे जुड़े कामकाज पर निगाह न रखे, यह कैसी व्यवस्था होगी? हजारों संस्थाओं के पंजीकरण रद्द या समाप्त हुए हैं। ऐसे में विदेशी धन से बनी संपत्तियों के बारे में स्पष्ट नियम जरूरी हैं। बिल जांच की प्रक्रिया में भी तालमेल लाना चाहता है। FCRA केंद्रीय कानून है और इसका संबंध विदेशी संबंधों तथा राष्ट्रीय हित से है। राज्य की एजेंसियों को जांच शुरू करने से पहले केंद्र की अनुमति की व्यवस्था दोहरी और टकराव वाली जांच को रोक सकती है। न्यायिक सुरक्षा भी रखी गई है। Designated Authority के फैसले को revision और district judge के सामने appeal के जरिए चुनौती दी जा सकती है। अफसर का फैसला आखिरी फरमान नहीं होगा। अदालत की निगरानी बनी रहेगी। सजा के मामले में भी बिल को केवल कठोर कानून कहना सही नहीं। कुछ उल्लंघनों में अधिकतम जेल की सजा पांच साल से घटाकर एक साल की जा रही है। निगरानी बढ़ाने के साथ सजा को अधिक अनुपातिक बनाने की कोशिश है। सबसे महत्वपूर्ण बात: यह बिल विदेशी मदद पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाता। ईमानदारी से काम करने वाले NGOs, चैरिटी और धार्मिक संगठन नियमों के तहत विदेशी योगदान ले सकते हैं। सीधी बात है; विदेशी पैसा लीजिए, समाज की सेवा कीजिए, मगर पूरा हिसाब दीजिए।
भारत में समाज सेवा की शानदार परंपरा रही है। मंदिरों, गुरुद्वारों, मस्जिदों, चर्चों, व्यापारिक संस्थाओं और आम नागरिकों ने सदियों से अपने संसाधनों से जरूरतमंदों की मदद की है। फिर हर सामाजिक परियोजना के लिए विदेशी खजाने की तरफ देखने की आदत क्यों? विदेशी सहयोग अपने आप में अपराध नहीं है। लेकिन विदेशी धन को सवालों से ऊपर रखना भी समझदारी नहीं। अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे बड़े लोकतंत्र भी विदेशी फंडिंग और प्रभाव पर निगरानी रखते हैं। आज विदेशी प्रभाव केवल राजनयिक बैठकों तक सीमित नहीं। पैसा, संस्थाएं, डिजिटल नेटवर्क और अभियान एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं। ऐसे दौर में पारदर्शी व्यवस्था देश की सुरक्षा और संप्रभुता के लिए जरूरी है।
FCRA बिल का असली संदेश साफ है: समाज सेवा का स्वागत है, लेकिन विदेशी पैसे की मनमानी का नहीं। जो संस्था साफ-सुथरे तरीके से काम करती है, उसे डरने की क्या जरूरत। जिसे अपने पैसों के स्रोत और खर्च का हिसाब देने में परेशानी है, सवाल उससे पूछा ही जाना चाहिए। लोकतंत्र में भरोसा जरूरी है, मगर अंधा भरोसा नहीं। विदेशी धन के मामले में पारदर्शिता कोई जुल्म नहीं, बल्कि जनहित की बुनियादी शर्त है। देश सेवा अपने संसाधनों से भी हो सकती है। और अगर विदेशी मदद ली जाए, तो उसका हिसाब देना भी देश सेवा का ही हिस्सा है।
