गोवा के मडगांव में एक ऐसा कमरा, जिसके नीचे दफन रहा 11 साल पुराना राज
सुजीत ठाकुर, नई दिल्ली।
मडगांव स्थित वास्कोदगामा रेलवे स्टेशन। पास ही स्थित है सेंट सबेस्टियन चर्च। यहां एक ऐसी कहानी है जो मशहूर फिल्म दृश्यम से एक कदम आगे बढ़ कर है। फिल्म में तो दर्शक जानते हैं कि हत्यारा कौन है। बॉडी कहां दफन है। और कंकाल मिलेगा या नहीं। मिलेगा तो फिर क्या होगा। लेकिन फिल्मी कहानी से अलग मडगांव की यह कहानी ऐसी है जो हकीकत है और शायद फिल्म दृश्यम की पटकथा से एक कदम आगे।
2008 में गोवा का यह शहर अपनी रोजमर्रा की रफ्तार में था। सड़कों पर गाड़ियां थीं। दुकानों की रोशनी जल चुकी थी। कहीं से आती आवाजें थीं और कहीं शाम को घर लौटते लोगों की जल्दबाजी। लेकिन एक पुराने बंगले के पीछे बने छोटे-से आउटहाउस में उस शाम कुछ ऐसा था, जो ग्यारह साल से जमीन के नीचे चुप पड़ा था। यहां के एक घर के आउट हाउस में एक कमरे में कुछ लोग पहुंचे। फिर जमीन की तरफ नजर गई। खुदाई शुरू हुई। मिट्टी हटती गई। और अचानक फावड़े की चोट किसी ऐसी चीज से टकराई, जो पत्थर नहीं थी।
कुछ देर बाद वहां इंसानी हड्डियां दिखाई देने लगीं। कमरे में सन्नाटा छा गया। पुलिस को बुलाया गया। कुछ ही देर में यह साफ हो गया कि यह किसी जानवर का कंकाल नहीं, बल्कि एक इंसान के शरीर के अवशेष थे। और यहीं से शुरू हुई उस आदमी की कहानी, जो करीब ग्यारह साल पहले अचानक गायब हो गया था। उसका नाम था भीमसेन गोडगनूर
साल था 2008 में मडगांव के एक किराये के कमरे में भीमसेन रहता था। उसके साथ रेनुका और उसके बच्चे भी रहते थे। पुलिस की बाद की जांच के मुताबिक भीमसेन और रेनुका के बीच संबंध थे। घर का माहौल हमेशा सामान्य नहीं रहता था।
पुलिस के अनुसार शराब के नशे में भीमसेन रेनुका के साथ मारपीट करता था। यही बात बाद में इस हत्या की कथित वजह के रूप में सामने आई। लेकिन उस समय किसी को अंदाजा नहीं था कि यह घरेलू झगड़ा एक दिन हत्या में बदल जाएगा। और उससे भी बड़ा सवाल यह था कि अगर हत्या हुई, तो शव गया कहां?
पुलिस की जांच के मुताबिक उस रात घर में विवाद हुआ।
झगड़ा बढ़ा। आरोप के मुताबिक परशुराम डोरनाहल्ली ने अपनी मां रेनुका के साथ मिलकर भीमसेन पर हमला किया।
इसके बाद उसका गला दबाया गया। कुछ ही देर में भीमसेन की सांसें थम गईं। एक इंसान मर चुका था। पुलिस के अनुसार मां-बेटे ने शव को घर के टॉयलेट-कम-बाथरूम में दफन कर दिया। ऊपर से मिट्टी डाल दी गई। जमीन को फिर समतल कर दिया गया। मानो वहां कभी कुछ हुआ ही न हो। लेकिन किसी हत्या का सबसे खतरनाक गवाह कई बार इंसान नहीं होता। कभी-कभी वह जमीन होती है। और वह जमीन ग्यारह साल तक चुप रही।
भीमसेन की हत्या के बाद रेणुका और उसके बेटे ने एक कहानी बनाई कि भीमसेन गायब हो गया है। पुलिस के मुताबिक रेनुका ने अपने परिचित इरप्पा से कहा कि भीमसेन अपने गांव, बीजापुर चला गया है। लेकिन वह वहां नहीं मिला। दिन बीतते गए। फिर महीने। फिर साल। भीमसेन लौटकर नहीं आया। उसका कोई पता नहीं चला। उधर रेनुका और उसके बच्चे भी उस जगह से चले गए और बीजापुर की ओर लौट गए। जैसे-जैसे समय गुजरता गया, भीमसेन की मौजूदगी उस कमरे से गायब होती गई। लेकिन उसकी हत्या का राज वहीं था। जमीन के नीचे।
हत्या के बाद क्या हुआ, यह कहानी का एक और अंधेरा हिस्सा है। पुलिस के अनुसार रेनुका ने कुछ समय बाद कर्नाटक में आत्महत्या कर ली। अब इस मामले में एक अहम किरदार हमेशा के लिए गायब हो चुका था। वह महिला, जो कथित तौर पर हत्या में शामिल थी, अब जिंदा नहीं थी। और जिस आदमी की हत्या हुई थी, उसका शव भी किसी को नहीं मिला था। बचा था सिर्फ एक आदमी परशुराम।
परशुराम भी गोवा छोड़ चुका था। समय गुजरता गया। 2008 बीत गया। फिर साल दर साल बीतते गए। एक हत्या, जिसके बारे में शायद ही किसी को पता था। एक शव, जिसे कोई ढूंढ नहीं रहा था। और एक आरोपी, जो कहीं दूसरी जगह अपनी जिंदगी जी रहा था।
फिर आया मार्च 2019 मडगांव के उसी इलाके में एक पुराने बंगले के पीछे बने आउटहाउस से जुड़ी गतिविधि ने कहानी बदल दी। यहा किसी कारणवश रिनोवेशन का काम शुरू हुआ था। इसी सिलसिले में जमीन खोदी गई। और वहां से कंकाल मिला। पुलिस को बुलाया गया। अब पुलिस के लिए अब सबसे पहला सवाल था कंकाल किसका है। जांच आगे बढ़ी। एक पुराने परिचित इरप्पा तक पुलिस पहुंची। उसने पुलिस को बताया कि 2008 में रेणुका ने उसे बताया था कि वह भीमसेन के गायब होने की बात उसे बता गई थी। उसने बताया कि वह परिवार उस समय उस जगह पर रह रहा था और भीमसेन अचानक गायब हो गया था। यहीं से ग्यारह साल पुरानी फाइल जैसे अचानक खुल गई।
फिर आया एक नाम परशुराम डोरनहल्ली। पुलिस को पता चला कि वह अब गोवा में नहीं था। वह कर्नाटक के कुन्नूर में रह रहा था। पुलिस टीम वहां पहुंची। ररशुराम के घर का दरबाजा खटखटाया तो सामने 35 साल का एक आदमी था। शायद उसके लिए वह एक सामान्य दिन रहा होगा। लेकिन पुलिस के लिए यह ग्यारह साल पुराने एक सवाल का जवाब था। भीमसेन कहां गया। परशुराम को हिरासत में लिया गया।
पूछताछ शुरू हुई। पुलिस के मुताबिक पूछताछ के दौरान उसने भीमसेन की हत्या की बात कबूल की। कहानी में वह हिस्सा भी सामने आया, जो हत्या की कथित वजह से जुड़ा था।
पुलिस के अनुसार परशुराम का कहना था कि भीमसेन शराब के नशे में उसकी मां रेनुका के साथ मारपीट करता था। उस दिन विवाद बढ़ गया। फिर हमला हुआ। और आखिर में गला दबाकर भीमसेन को मार दिया गया। इसके बाद शव को छिपाने के लिए उसे उसी घर के टॉयलेट-कम-बाथरूम में दफना दिया गया। एक आदमी मर गया था। एक परिवार चला गया। एक मां ने बाद में आत्महत्या कर ली। और एक बेटा दूसरे राज्य में जाकर बस गया। आरोप के मुताबिक रेणुका और परशुराम ने ही भीमसेन की हत्या की थी। लेकिन जमीन ने कहानी अपने भीतर बचाकर रखी। कल्पना कीजिए। एक खाली कमरा। दीवारों पर पुरानी पपड़ी। कमरे के एक कोने में वह जगह जहां कभी रोजमर्रा की जिंदगी चलती थी। और ठीक नीचे ग्यारह साल पुराना एक रहस्य।
जिस आदमी को उसके परिवार ने शायद वर्षों पहले मार दिया हो उसकी हड्डियां उसी जगह मिलीं जहां उसके साथ रहने वाले लोग कभी रहा करते थे। यह कहानी सिर्फ एक हत्या की कहानी नहीं है। यह उस अजीब ताकत की कहानी है जिसमें अपराधी सोचता है कि समय सबूत को मिटा देगा। लेकिन समय कभी-कभी सबूत को और मजबूत कर देता है। ग्यारह साल तक मिट्टी के नीचे दबा वह कंकाल किसी से कुछ नहीं कह सकता था। फिर एक दिन जमीन खुली। और उसने बिना एक शब्द बोले पूरी कहानी बदल दी।
2019 में पुलिस ने परशुराम डोरनाहल्ली को गिरफ्तार किया और उसके खिलाफ हत्या तथा सबूत मिटाने से जुड़े प्रावधानों में मामला दर्ज किया। पुलिस ने उसके कथित कबूलनामे को जांच का आधार बनाया था। सेंट सबेस्टियन चर्च और वास्कोदगामा रेलवे स्टेशन के आसपास के दुकानदारों से यह कहानी आज भी सुनी जा सकती है जो कहती है जमीन भी बोलती है।
—
—

