पश्चिम बंगाल में भाजपा का नया पीओए (प्लान ऑफ एक्शन) क्या है?

एक नया बंगाल आकार लेता दिखाई दे रहा है। अब सवाल यह है कि क्या बंगाल के लोग स्वयं वामपंथ की लंबे समय से चली आ रही उग्र और बहुलतावादी राजनीतिक सोच से आगे बढ़कर भाजपा के "अखंड भारत" और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विचार से जुड़ने के लिए तैयार हैं। जयंत घोषाल लिखते हैं

पश्चिम बंगाल के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने घोषणा की है कि राज्य में जल्द ही समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू की जाएगी। उम्मीद है कि सोमवार को इसका विधेयक पश्चिम बंगाल विधानसभा में पेश किया जाएगा। यह केवल एक नया कानून नहीं होगा, बल्कि भाजपा की दीर्घकालिक वैचारिक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।

सबसे पहले उत्तराखंड में यूसीसी लागू की गई। इसके बाद गुजरात और असम ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाए और अब पश्चिम बंगाल इस मुद्दे पर बहस करने वाला अगला राज्य बनने जा रहा है। हालांकि, यदि सोमवार को विधेयक पेश भी हो जाता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि यह तुरंत कानून बन जाएगा। संभावना है कि इसे पहले प्रवर समिति (सेलेक्ट कमेटी) के पास भेजा जाए, जहां इसके विभिन्न प्रावधानों की विस्तार से समीक्षा की जाएगी। समिति की रिपोर्ट के बाद यह विधेयक अंतिम मंजूरी के लिए दोबारा विधानसभा में लाया जा सकता है।

हालांकि, सुवेंदु अधिकारी सरकार के पास यह विकल्प भी मौजूद है कि वह विधेयक को बिना सेलेक्ट कमेटी के सीधे पारित करा दे, क्योंकि विधानसभा में भाजपा के पास मजबूत बहुमत है। पार्टी के पास दो-तिहाई से अधिक सदस्यों का समर्थन है, जिससे ऐसे विधेयकों को पारित कराने के लिए आवश्यक संख्या उसके पास उपलब्ध है।

फिर भी भाजपा के भीतर इस विषय पर अलग-अलग राय मौजूद है। पश्चिम बंगाल में मुस्लिम और ईसाई आबादी उल्लेखनीय है। राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार, मुस्लिम आबादी लगभग 30 प्रतिशत मानी जाती है। ऐसे में पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि इतने महत्वपूर्ण निर्णय को जल्दबाजी में नहीं लिया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि यदि विधेयक को सेलेक्ट कमेटी के पास भेजा जाए तो प्रक्रिया अधिक लोकतांत्रिक होगी और व्यापक चर्चा का अवसर मिलेगा। हालांकि, चाहे जो भी प्रक्रिया अपनाई जाए, यह माना जा रहा है कि अंततः यूसीसी विधेयक पश्चिम बंगाल में पारित हो जाएगा।

आखिर इसका अर्थ क्या है?

इसका मतलब है कि देश के सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक कानून लागू हो, जिसके तहत विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और पारिवारिक मामलों जैसे विषय धर्म के आधार पर अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों से संचालित न होकर एक समान कानूनी व्यवस्था के अंतर्गत आएं। यह भाजपा की उस व्यापक वैचारिक सोच का हिस्सा है, जिसे वह “अखंड भारत” और एक समान कानूनी ढांचे के रूप में प्रस्तुत करती है।

भाजपा का तर्क है कि हिंदू, मुस्लिम और ईसाई समुदायों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून नहीं होने चाहिए। सुवेंदु अधिकारी का कहना है कि इसी कानूनी ढांचे के माध्यम से “लव जिहाद” और “लैंड जिहाद” जैसे मुद्दों से भी निपटा जाएगा। उन्होंने इसकी तुलना तीन तलाक की समाप्ति से करते हुए कहा कि जिस तरह तीन तलाक की प्रथा खत्म कर मुस्लिम समुदाय को एक समान कानूनी व्यवस्था के दायरे में लाया गया, उसी प्रकार यूसीसी सभी नागरिकों के लिए एक समान कानूनी ढांचा तैयार करेगा।

यही कारण है कि पश्चिम बंगाल में यूसीसी की शुरुआत को केवल एक कानूनी सुधार नहीं, बल्कि भाजपा के लंबे समय से अधूरे पड़े वैचारिक एजेंडे के रूप में देखा जा रहा है।

दरअसल, यह भाजपा के “नए पश्चिम बंगाल” और भारतीय राष्ट्रवाद की नई अवधारणा का हिस्सा है। पार्टी पश्चिम बंगाल के राजनीतिक बदलाव को अपने व्यापक राष्ट्रीय वैचारिक अभियान से जोड़ने की कोशिश कर रही है।

लेकिन यह रणनीति आगे कैसे बढ़ रही है? इसके पीछे व्यापक वैचारिक लक्ष्य क्या है?

इसे समझने के लिए इतिहास की ओर लौटना होगा।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना 1925 में हुई थी। इसके बाद 1951 में भारतीय जनसंघ का गठन हुआ। वर्षों के राजनीतिक संघर्ष के बाद यही वैचारिक धारा 1980 के दशक में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के रूप में विकसित हुई। जनसंघ, आरएसएस और भाजपा ने दशकों से लगभग एक ही वैचारिक आधार को आगे बढ़ाया है।

यह विचारधारा हिंदू सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर आधारित है, जिसे उसके समर्थक सनातन हिंदू राष्ट्रवाद के रूप में भी देखते हैं। दूसरी ओर, स्वतंत्रता के बाद जवाहरलाल नेहरू ने धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद पर आधारित शासन मॉडल विकसित किया, जिसने भारत की राजनीति को अलग दिशा दी।

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारतीय राष्ट्रवाद की कई धाराएं थीं। एक ओर कांग्रेस ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष कर रही थी, वहीं दूसरी ओर दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद की धारा भी विकसित हो रही थी। बाल गंगाधर तिलक जैसे नेताओं ने हिंदू राष्ट्रवादी सोच का प्रतिनिधित्व किया, जिसने आगे चलकर हिंदू महासभा और बाद में आरएसएस जैसी संस्थाओं को प्रभावित किया। इसी दौर में वीर सावरकर के नेतृत्व में हिंदू राष्ट्रवाद की अधिक आक्रामक विचारधारा भी सामने आई।

जब जवाहरलाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बने, तब डॉ. राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रपति थे। राजेंद्र प्रसाद की हिंदुत्व संबंधी सोच अपेक्षाकृत मजबूत मानी जाती थी। इसी प्रकार सरदार वल्लभभाई पटेल की राजनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टि में भी हिंदू दर्शन का स्पष्ट प्रभाव देखा जाता था। हालांकि, स्वतंत्रता के बाद भारतीय राजनीति में नेहरू की धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा प्रमुख धारा बन गई। इसके बावजूद भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ लगातार यह तर्क देते रहे कि भारत की राष्ट्रीय पहचान की जड़ें हिंदू सांस्कृतिक परंपराओं में निहित हैं और उसी आधार पर राष्ट्रवाद की व्याख्या की जानी चाहिए।

जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने और लालकृष्ण आडवाणी तथा आरएसएस भाजपा की वैचारिक राजनीति के सबसे प्रभावशाली स्तंभों में शामिल हुए, तब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, राम मंदिर निर्माण, अनुच्छेद 370 और समान नागरिक संहिता (यूसीसी) जैसे मुद्दे पार्टी के प्रमुख वैचारिक एजेंडे के केंद्र में बने रहे।

इन सभी मुद्दों में यूसीसी दशकों से भाजपा के सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्यों में शामिल रहा है। हालांकि, इसके आलोचकों का कहना है कि यह रणनीति धार्मिक पहचान को राजनीति के केंद्र में लाकर समाज में ध्रुवीकरण पैदा करने का प्रयास है।

अब यही वैचारिक ढांचा पश्चिम बंगाल तक विस्तारित किया जा रहा है।

बंगाल से भाजपा का ऐतिहासिक संबंध

भाजपा के लिए बंगाल का महत्व केवल वर्तमान राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका गहरा ऐतिहासिक आधार भी है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जो भारतीय जनसंघ के संस्थापकों में से एक थे, स्वयं बंगाल से थे। देश के विभाजन के समय उन्होंने पूरे बंगाल को पाकिस्तान में शामिल किए जाने के प्रस्ताव का विरोध किया और अलग पश्चिम बंगाल के गठन की वकालत की।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने शरणार्थियों के मुद्दे पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ कई बार चर्चा की और उन्हें अनेक पत्र भी लिखे। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण भाजपा अक्सर श्यामा प्रसाद मुखर्जी को बंगाली हिंदू अस्मिता और राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करती है।

पश्चिम बंगाल दिवस का आयोजन, बंगाल के इतिहास पर विशेष जोर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की विरासत को प्रमुखता देना—ये सभी भाजपा के इसी राजनीतिक आख्यान का हिस्सा हैं। पार्टी ने पश्चिम बंगाल दिवस के अवसर पर तारकेश्वर में विश्व हिंदू महासभा का आयोजन भी किया, जहां बंगाली पहचान और बंगाली भाषा को इस राजनीतिक विमर्श से जोड़ने की कोशिश की गई।

भाजपा का मानना है कि यदि श्यामा प्रसाद मुखर्जी का हस्तक्षेप न होता, तो पश्चिम बंगाल आज जिस स्वरूप में मौजूद है, वह शायद अस्तित्व में नहीं होता।

हालांकि, विपक्ष का तर्क इससे अलग है। उनका कहना है कि केवल श्यामा प्रसाद मुखर्जी ही नहीं, बल्कि कांग्रेस के कई नेताओं ने भी विभाजन के दौरान पश्चिम बंगाल के गठन और उसकी पहचान स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

बंगाल में भाजपा की वैचारिक चुनौती

भाजपा का मानना है कि लंबे समय तक वामपंथी शासन और उसके बाद तृणमूल कांग्रेस की सरकार के कारण पश्चिम बंगाल उसकी वैचारिक पहुंच से बाहर रहा। पार्टी के अनुसार, पहले वामपंथ और बाद में तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल में एक अलग राजनीतिक संस्कृति विकसित की, जबकि भाजपा राज्य को एक नई वैचारिक दिशा देना चाहती है।

भाजपा के अनुसार, बंगाल उसके लिए दो प्रमुख कारणों से विशेष महत्व रखता है। पहला, श्यामा प्रसाद मुखर्जी की ऐतिहासिक विरासत। दूसरा, दशकों तक चले वामपंथी प्रभाव और साम्यवादी राजनीति, जिसने राज्य की राजनीतिक संस्कृति को आकार दिया। भाजपा का दावा है कि बंगाल में मुस्लिम आबादी का बड़ा हिस्सा, वामपंथी राजनीति की विरासत और पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा ने एक अलग राजनीतिक वातावरण तैयार किया, जिसे अब वह बदलना चाहती है।

इसी व्यापक रणनीति के तहत अब विभिन्न मुद्दों को एक-दूसरे से जोड़ा जा रहा है। फिलहाल भाजपा राम मंदिर को बंगाल की राजनीति का केंद्रीय मुद्दा नहीं बना रही, क्योंकि पार्टी मानती है कि यह उत्तर प्रदेश केंद्रित विषय है और बंगाल में इसकी राजनीतिक उपयोगिता सीमित है।

इसके बजाय पार्टी का ध्यान घुसपैठ और “घुसपैठियों” के मुद्दे पर है। भाजपा पाकिस्तान और बांग्लादेश के जमात-ए-इस्लामी के बीच कथित संबंधों को भी अपने राजनीतिक अभियान का हिस्सा बनाने की तैयारी कर रही है।

योगी मॉडल की ओर बढ़ते सुवेंदु अधिकारी

मुख्यमंत्री बनने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि सुवेंदु अधिकारी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की राजनीतिक शैली से प्रेरित मॉडल अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। उनका उद्देश्य बंगाल में स्वयं को एक मजबूत हिंदू राष्ट्रवादी नेता के रूप में स्थापित करना और इस नई राजनीतिक पहचान का प्रमुख चेहरा बनना है।

वे भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की राजनीतिक रणनीति के अनुरूप आगे बढ़ रहे हैं। पार्टी का मानना है कि वह बंगाल की उस राजनीतिक संस्कृति को बदलना चाहती है, जिसकी जड़ें लंबे समय तक चले वामपंथी शासन में रही हैं। भाजपा का तर्क है कि ममता बनर्जी की अपनी कोई अलग वैचारिक संरचना नहीं रही, बल्कि उनकी राजनीति कई मायनों में वामपंथी राजनीतिक संस्कृति का ही विस्तार रही है।

हालांकि, भाजपा का मानना है कि इस वैचारिक परिवर्तन को सफल बनाने के लिए सबसे पहले ममता बनर्जी के राजनीतिक प्रभाव को निर्णायक रूप से कमजोर करना होगा। पार्टी का आकलन है कि ममता बनर्जी की राजनीतिक छवि को पहले की तुलना में कुछ नुकसान पहुंचा है और उनका वह जनाधार भी पहले जैसा मजबूत नहीं रह गया है, जिसने लंबे समय तक उनका समर्थन किया था। इसी रणनीति के तहत तृणमूल कांग्रेस में ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व वाले राजनीतिक मॉडल को चुनौती देना और उसे राजनीतिक रूप से निष्प्रभावी बनाना भाजपा की प्राथमिकता है।

इसी दिशा में भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों को प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनाया है। पार्टी लगातार उन नेताओं को निशाने पर ले रही है जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं और इन विवादों के माध्यम से तृणमूल कांग्रेस की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रही है।

तृणमूल नेताओं के खिलाफ लगातार हुए सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों, जिनमें कई मौकों पर उन पर अंडे तक फेंके गए, ने भी बंगाल की राजनीति में खासा ध्यान आकर्षित किया। भाजपा और उसके समर्थकों ने इन घटनाओं को जनता के गुस्से का प्रतीक बताया। कुछ लोगों ने इस दौर को व्यंग्यात्मक रूप से “एगोक्रेसी (Eggocracy)” तक कहना शुरू कर दिया, यह संकेत देते हुए कि अंडे फेंकना जनता की नाराज़गी की एक प्रत्यक्ष राजनीतिक अभिव्यक्ति बन गया था।

मिड-डे मील और सांस्कृतिक बहस

हालांकि, भाजपा को अपनी कुछ नीतियों को लेकर आलोचना का भी सामना करना पड़ा, विशेषकर स्कूलों की मिड-डे मील योजना को लेकर। इस योजना में इस्कॉन (ISKCON) को भोजन उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी देने और भोजन के मेन्यू में किए गए बदलावों ने बंगाल में नई राजनीतिक बहस छेड़ दी।

पहले राज्य के अनेक स्कूलों में मिड-डे मील के तहत अंडा नियमित रूप से दिया जाता था। नई व्यवस्था में कई स्थानों पर सोयाबीन, पनीर और राजमा-चावल जैसे शाकाहारी विकल्प शामिल किए गए। विपक्षी दलों का आरोप है कि यह बदलाव केवल पोषण संबंधी निर्णय नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से बंगाल में शाकाहार को बढ़ावा देने की वैचारिक कोशिश की जा रही है, जबकि बंगाल की सांस्कृतिक पहचान लंबे समय से मांसाहारी भोजन परंपरा से जुड़ी रही है।

इस तरह यह विवाद केवल भोजन तक सीमित नहीं रहा। यह सांस्कृतिक पहचान, व्यक्तिगत पसंद की स्वतंत्रता और इस सवाल से जुड़ गया कि क्या राजनीतिक विचारधारा लोगों के रोजमर्रा के जीवन और खान-पान को भी प्रभावित कर रही है।

यह पूरा विवाद भाजपा के व्यापक सांस्कृतिक एजेंडे और उसके हिंदू सनातनी राष्ट्रवाद की अवधारणा से भी जुड़ता है।

भाजपा का तर्क है कि इस्कॉन जैसी संस्थाएं विश्वसनीय हैं और वे मिड-डे मील योजना में बेहतर प्रबंधन तथा अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित कर सकती हैं। पार्टी का यह भी दावा है कि तृणमूल कांग्रेस सरकार के दौरान इस योजना में भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे थे और किसी प्रतिष्ठित संस्था को जिम्मेदारी सौंपने से अनियमितताओं पर रोक लगेगी।

लेकिन आलोचक इस तर्क से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि बंगाल की ऐतिहासिक खाद्य संस्कृति मांसाहारी रही है और अंडों के स्थान पर शाकाहारी विकल्प लाना केवल पोषण का मामला नहीं, बल्कि एक प्रतीकात्मक राजनीतिक संदेश भी है। उनके अनुसार, असली सवाल भोजन नहीं, बल्कि यह है कि क्या एक विशेष सांस्कृतिक पहचान को दूसरी पहचान पर प्राथमिकता दी जा रही है।

बंगाल कैसे प्रतिक्रिया दे रहा है?

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि इन परिवर्तनों पर स्वयं बंगाल के लोग कैसी प्रतिक्रिया दे रहे हैं।

दिलचस्प बात यह है कि पश्चिम बंगाल के मुस्लिम समुदाय के भीतर भी प्रस्तावित समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के खिलाफ अब तक कोई बड़ा सार्वजनिक विरोध देखने को नहीं मिला है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या मुस्लिम समाज के कुछ वर्ग इस संभावना को स्वीकार करने लगे हैं कि भविष्य में अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों या विशेष प्रावधानों की व्यवस्था समाप्त हो सकती है?

उदाहरण के तौर पर, ईद के अवसर पर वर्षों से रेड रोड पर आयोजित होने वाली पारंपरिक नमाज़ को इस बार ब्रिगेड परेड ग्राउंड में स्थानांतरित किया गया, लेकिन इस बदलाव के खिलाफ कोई बड़ा विरोध सामने नहीं आया। इसी प्रकार, अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के कार्यक्रम भी रेड रोड पर बिना किसी उल्लेखनीय विरोध के आयोजित हुए।

ये घटनाएं कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े करती हैं। क्या इन्हें नागरिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत आज़ादी के सीमित होने के संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए, या फिर ये भाजपा के हिंदू राष्ट्रवादी ढांचे के भीतर उभर रहे एक नए लोकतांत्रिक राजनीतिक मॉडल का हिस्सा हैं?

एक नया बंगाल आकार ले रहा है

ऐसा प्रतीत होता है कि पश्चिम बंगाल एक नए राजनीतिक और वैचारिक दौर की ओर बढ़ रहा है।

अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या बंगाल के लोग स्वयं वामपंथ की दशकों पुरानी उग्र और बहुलतावादी राजनीतिक परंपरा से आगे बढ़कर भाजपा के “अखंड भारत” और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विचार से जुड़ने के लिए तैयार हैं?

क्या पश्चिम बंगाल भाजपा के शासन में एक नए वैचारिक परिवर्तन का साक्षी बन रहा है?

यह प्रश्न फिलहाल खुला हुआ है। इसका उत्तर अंततः बंगाल की जनता ही अपने राजनीतिक निर्णयों और लोकतांत्रिक जनादेश के माध्यम से देगी।