33% का विरोधाभास: 2023 के बिल के बावजूद महिला प्रतिनिधित्व में राष्ट्रीय दल फेल

ADR: जमीनी स्तर के इस प्रतिनिधित्व और संसद के बीच के अंतर को पाटने के लिए, राजनीतिक दलों और नागरिक समाज को जेंडर-सेंसिटाइजेशन कार्यक्रमों को बढ़ावा देना होगा, ताकि सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ा जा सके और शासन में महिलाओं की समान भागीदारी सुनिश्चित हो सके।

2023 में ऐतिहासिक महिला आरक्षण विधेयक पेश किए जाने के बावजूद, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और नेशनल इलेक्शन वॉच (NEW) की एक नई संयुक्त रिपोर्ट एक कड़वी सच्चाई बयां करती है: भारत के राजनीतिक दल अभी भी महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारने में नाकाम साबित हो रहे हैं।

2024 के लोकसभा और उसके बाद के राज्य विधानसभा चुनावों में 39,789 उम्मीदवारों के विश्लेषण से पता चलता है कि राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी बेहद कम है। भारत में 662.9 मिलियन महिला मतदाता (आबादी का लगभग 49%) होने के बावजूद, वर्तमान संसद में महिलाओं की संख्या महज 14% है। इंटर-पार्लियामेंट्री यूनियन (IPU) के अनुसार, संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में भारत दुनिया के 185 देशों में 151वें स्थान पर है।

आंकड़ों की नजर से

2024 लोकसभा चुनाव

  • कुल विश्लेषित उम्मीदवार: 8,360
  • महिला उम्मीदवार: केवल 800 (9.6%)
  • शून्य” क्षेत्र (Zero Zones): 543 निर्वाचन क्षेत्रों में से 152 (28%) ऐसे थे, जहाँ एक भी महिला उम्मीदवार मैदान में नहीं थी।

राज्य और केंद्र शासित प्रदेश (UT) विधानसभा चुनाव (20 राज्य/UT)

  • कुल विश्लेषित उम्मीदवार: 31,429
  • महिला उम्मीदवार: 3,273 (10.2%)
  • सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्य:
    • ओडिशा (2024): 13.9% महिला उम्मीदवार
    • दिल्ली (2025): 13.7% महिला उम्मीदवार
    • पुडुचेरी (2026): 13.6% महिला उम्मीदवार

पार्टीवार विश्लेषण

2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान भारत के किसी भी प्रमुख राष्ट्रीय दल ने महिलाओं को एक-तिहाई (33%) टिकट देने के मानदंड को पूरा नहीं किया।

  • भाजपा (BJP) और कांग्रेस (INC): दोनों बड़े राष्ट्रीय दल इस दौड़ में पीछे रहे और उन्होंने केवल 13% से 16% के बीच ही महिलाओं को उम्मीदवार बनाया।
  • अपवाद: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने केवल एक राज्य—सिक्किम विधानसभा चुनाव—में 33% का आंकड़ा छुआ।

इसके विपरीत, कई क्षेत्रीय और राज्य स्तरीय पार्टियों ने महिला प्रतिनिधित्व को आक्रामक रूप से बढ़ावा दिया:

राजनीतिक दलविधानसभा / चुनावमहिला उम्मीदवारों का प्रतिशत
सीपीआई (एमएल)(एल)पश्चिम बंगाल विधानसभा56%
नाम तमीळार कत्छीलोकसभा / पुडुचेरी / तमिलनाडु50%
विदुथलाई चिरुथाईगल कत्छीपुडुचेरी विधानसभा50%
राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टीदिल्ली विधानसभा50%
समाजवादी पार्टीराजस्थान विधानसभा40%
बीजू जनता दललोकसभा33%

महिला मतदाताओं की बढ़ती संख्या और उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों है? रिपोर्ट में इसके गहरे संरचनात्मक और संस्थागत कारणों पर प्रकाश डाला गया है। 2024 के आम चुनाव में, 10 मिलियन (1 करोड़) रुपये से कम की संपत्ति वाली महिला उम्मीदवार के जीतने की संभावना केवल 1.49% थी। निर्दलीय महिला उम्मीदवारों को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा—चुनाव लड़ने वाली सभी 279 निर्दलीय महिलाओं में से एक भी जीत दर्ज नहीं कर सकी।

 पार्टियों में टिकट वितरण की व्यवस्था बेहद केंद्रीकृत और गैर-पारदर्शी है। इसका मतलब है कि टिकट ज्यादातर स्थापित राजनीतिक परिवारों, दबंग जातियों या आर्थिक रूप से संपन्न पृष्ठभूमि की महिलाओं को ही मिलते हैं—जिन्हें अक्सर पुरुष रिश्तेदारों द्वारा पहले से जीती गई “सुरक्षित सीटों” पर उतारा जाता है। पुरुषों के वर्चस्व वाले पार्टी संगठन, पितृसत्तात्मक मानदंड, घरेलू देखभाल की जिम्मेदारियां और समाज में यह पूर्वाग्रह कि महिलाएं “चुनाव जीतने लायक नहीं होतीं”, आज भी उनके प्रवेश को रोकते हैं।

उम्मीद की किरण

भले ही मौजूदा आंकड़े कम हों, लेकिन ऐतिहासिक डेटा दिखाता है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने की महिलाओं की इच्छा में भारी बढ़ोतरी हुई है:

  • मतदान का प्रतिशत (Voter Turnout): महिला मतदाताओं का मतदान प्रतिशत 1962 में 46.6% से बढ़कर 2024 में 65.8% हो गया।
  • उम्मीदवारों की संख्या में वृद्धि: 1957 में केवल 45 महिलाओं ने लोकसभा चुनाव लड़ा था। 2024 तक यह संख्या बढ़कर 800 हो गई।
  • संसद में भागीदारी: 1951 में लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी सिर्फ 5% थी, जो 2024 में बढ़कर 13.6% हो गई।
  • जमीनी स्तर पर सफलता: असली सफलता की कहानी स्थानीय निकायों (Local Bodies) में देखने को मिलती है। स्थानीय स्तर पर मिले आरक्षण के कारण, 2022 में स्थानीय स्वशासन की सीटों में महिलाओं की हिस्सेदारी 44% थी, जिसमें कुल 1.37 मिलियन (13.7 लाख) से अधिक महिला प्रतिनिधि शामिल थीं।