
तहलका डेस्क।
कोलकाता/नई दिल्ली। पानीहाटी विधानसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) की उम्मीदवार रत्ना देबनाथ (Ratna Debnath) ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की। RG Kar अस्पताल की दुष्कर्म पीड़िता की मां की यह जीत महज एक चुनावी नतीजा नहीं, बल्कि उस सिस्टम के मुंह पर तमाचा है जिसने एक मां की चीख को अनसुना कर दिया था। यह जीत इसलिए अनिवार्य थी क्योंकि जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं और सत्ता अपराध पर पर्दा डालने लगे, तब न्याय के लिए खुद ‘सिस्टम’ का हिस्सा बनना ही आखिरी रास्ता बचता है।
बंगाल की जनता ने ईवीएम का बटन दबाकर साफ कर दिया कि संवेदनहीन राजनीति और हठधर्मिता के दिन अब लद चुके हैं। जो लोग इसे ‘विक्टिम कार्ड’ कह रहे हैं, उन्हें खुद से पूछना चाहिए कि आखिर एक मां को अपनी बेटी के इंसाफ के लिए सड़क पर उतरने को मजबूर किसने किया? जिस राज्य की मुखिया खुद एक महिला हों, वहां एक बेटी के लिए न्याय की गुहार अनसुनी रह जाना पूरे राजनैतिक ढांचे की सबसे बड़ी नाकामी है।
यह वोट केवल एक उम्मीदवार के लिए नहीं, बल्कि उस ‘चुनिंदा नारीवाद’ के खिलाफ एक सामूहिक आक्रोश था जो केवल राजनीतिक लाभ के लिए जागता है। रत्ना के पक्ष में उमड़ी महिलाओं की भीड़ और उनकी आंखों के आंसू बताते हैं कि समाज में अन्याय की तपिश कितनी गहरी थी। लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि जब सत्ता अहंकारी हो जाती है, तो जनता खामोशी से बदलाव की नई इबारत लिख देती है।

यह फैसला है जनता का : आखिर उस मां को जीत मिली है जो अपनी बेटी के इंसाफ के लिए लड़ रही थी…आज उनकी बेटी भी इंद्रधनुष के ऊपर मुस्कुरा रही होगी … Pic Credit : Smriti Zubin Irani/Facebook
अब रत्ना देबनाथ के कंधों पर उस भरोसे का बोझ है, जिसके दम पर उन्हें सत्ता के उन गलियारों में भेजा गया है जहाँ से वे उन विसंगतियों को मिटा सकें जिनसे वे खुद लड़कर आई हैं। यह जीत एक उम्मीद है कि भविष्य में किसी और मां को इंसाफ के लिए इस तरह की जंग नहीं लड़नी होगी।



