‘मेट्रो के गेट बंद होते हैं तो जनता की जेब कटती है’, आम लोगों ने बयां किया दर्द, खुले गेटों से मिली राहत के गेट बंद होते हैं तो जनता की जेब कटती है, आम लोगों ने बयां किया दर्द, खुले गेटों से मिली राहत

किसी को दफ्तर पहुंचने की चिंता, तो किसी को अस्पताल में भर्ती मां के पास जाने की मजबूरी; प्रदर्शन के बीच मेट्रो खुली रहने से यात्रियों ने ली राहत की सांस

नई दिल्ली | तहलका न्यूज | स्नेहलता

दिल्ली में प्रदर्शन हो तो उसका असर सिर्फ प्रदर्शन स्थल तक सीमित नहीं रहता। मेट्रो स्टेशन के गेट बंद होते हैं, तो किसी कर्मचारी का दफ्तर पहुंचना मुश्किल हो जाता है, किसी को महंगा ऑटो लेना पड़ता है और किसी अस्पताल में भर्ती अपने परिजन तक पहुंचने के लिए परेशान होता है। 16 अक्टूबर को प्रदर्शन के बीच मेट्रो के प्रवेश और निकास पर पिछली तारीखों जैसी व्यापक पाबंदियां नहीं दिखने से आम यात्रियों ने राहत महसूस की।

यात्रियों की परेशानी और उनके अनुभव एक बड़ा सवाल उठाते हैं—सुरक्षा व्यवस्था के बीच क्या आम लोगों के सफर और जरूरी सेवाओं तक पहुंच को भी प्राथमिकता नहीं मिलनी चाहिए?

‘दोगुना-तिगुना किराया देकर भी दफ्तर देर से पहुंचते थे’

बैंक कर्मचारी रोहित सक्सेना बताते हैं कि प्रदर्शन के दौरान मेट्रो स्टेशनों पर पाबंदी लगने से उनका सफर अक्सर मुश्किल हो जाता था। उन्हें कई बार सुप्रीम कोर्ट या करोल बाग स्टेशन पर उतरना पड़ता था। वहां से दूसरी सवारी ढूंढना आसान नहीं होता था।

रोहित कहते हैं, “जब भी प्रदर्शन होता था, हमें काफी परेशानी होती थी। कई बार ऑनलाइन सवारी नहीं मिलती थी। इंटरनेट बंद होने पर मुश्किल और बढ़ जाती थी। ऑटो वाले दोगुना-तिगुना किराया मांगते थे। इतना सब करने के बाद भी दफ्तर पहुंचने में देर हो जाती थी।”

रोहित के लिए मेट्रो के गेट खुले रहने का मतलब है कम परेशानी, कम अतिरिक्त खर्च और समय पर दफ्तर पहुंचने की बेहतर संभावना।

‘मां अस्पताल में भर्ती थीं, ऑटो वाले को देने पड़े 500 रुपये’

सिमरन की कहानी में मेट्रो की सुविधा का महत्व और भी ज्यादा है। उनकी मां पिछले 15 दिनों से राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती हैं। सिमरन के मुताबिक, 12 अक्टूबर को उनकी मां की हालत काफी गंभीर थी। उस दिन अस्पताल पहुंचने के लिए उन्हें सुप्रीम कोर्ट मेट्रो स्टेशन से ऑटो लेना पड़ा, जिसके लिए उन्होंने 500 रुपये दिए।

सिमरन कहती हैं, “इस बार अच्छा हुआ कि मेट्रो के प्रवेश और निकास द्वार बंद नहीं हुए। मेरी मां अस्पताल में भर्ती हैं। ऐसे समय में उनके पास पहुंचना मेरे लिए बहुत जरूरी है। स्टेशन बंद होने पर मरीज के परिजनों की परेशानी और बढ़ जाती है।”

सिमरन

सिमरन का अनुभव बताता है कि सार्वजनिक परिवहन पर पाबंदियों का असर केवल नौकरीपेशा लोगों पर नहीं पड़ता। अस्पताल में भर्ती मरीजों के परिजनों के लिए भी रास्ते और परिवहन की उपलब्धता बेहद महत्वपूर्ण है।

‘प्रदर्शन हो, लेकिन आम जनता को परेशानी न हो’

राकेश भाटिया का कहना है कि प्रदर्शन के दौरान आम नागरिकों की सुविधा का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक, सरकार और प्रदर्शन करने वाले संगठनों—दोनों की जिम्मेदारी है कि सुरक्षा व्यवस्था के साथ-साथ आम लोगों की आवाजाही भी यथासंभव सामान्य बनी रहे।

प्रदर्शन लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन इसके कारण दफ्तर जाने वाले कर्मचारियों, मरीजों और उनके परिजनों तथा दूसरे यात्रियों को अनावश्यक परेशानी न हो, यह भी जरूरी है।

मेट्रो स्टेशनों पर पाबंदियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान सार्वजनिक परिवहन और आम लोगों की सुविधा का मुद्दा उठा था।  अक्टूबर की सुनवाई और आदेश को लेकर सामने आई रिपोर्टों में सेवाओं पर पूरी तरह रोक लगाने के बजाय परिस्थितियों के अनुसार व्यवस्था बनाए रखने का सवाल प्रमुख रहा।

इससे पहले 2, 10 और 12 अक्टूबर को प्रदर्शनों के मद्देनजर अलग-अलग मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश और निकास पर पाबंदियां लगाई गई थीं।

शाम को प्रदर्शन की स्थिति और सुरक्षा एजेंसियों के आकलन के आधार पर कोई बदलाव होता है या नहीं, यह देखना होगा।

आखिरकार, मेट्रो का एक बंद गेट किसी के लिए दफ्तर में देर से पहुंचने की परेशानी है, तो किसी के लिए अस्पताल में भर्ती मां तक पहुंचने की मजबूरी। आम लोगों की मांग यही है कि सुरक्षा भी बनी रहे और उनका सफर भी न रुके।