तेहलका वेब डेस्क
श्रीनगर, 25 अगस्त:नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने पार्टी से बढ़ती दूरी के बीच लोकसभा सांसद आगा सैयद रूहुल्लाह मेहदी से संसद की सदस्यता से इस्तीफा देकर दोबारा जनता के बीच जाने को कहा है। इसके जवाब में रूहुल्लाह ने कहा कि वह आने वाले दिनों में पार्टी के वरिष्ठ नेता की मांग का जवाब देंगे।
मंगलवार को इस बारे में पूछे जाने पर रूहुल्लाह ने न तो इस्तीफे की चुनौती स्वीकार की और न ही उसे खारिज किया। हालांकि, उन्होंने संकेत दिया कि वह अब्दुल्ला की मांग को गंभीरता से ले रहे हैं।
रूहुल्लाह ने कहा, “यह मुमकिन ही नहीं है कि डॉक्टर साहब मुझसे कुछ मांगें और मैं उन्हें न दूं। यह मुमकिन नहीं है कि मैं उन्हें खाली हाथ वापस भेज दूं।”
उन्होंने कहा, “उन्होंने इस उम्र में मुझसे कुछ मांगा है। मैं उनका सम्मान करता हूं। मैं नहीं चाहता कि वह मुझसे कुछ मांगें और मैं उन्हें खाली हाथ वापस कर दूं। मैं कुछ दिनों में इसका जवाब दूंगा।”
अब्दुल्ला ने एक दिन पहले रूहुल्लाह को इस्तीफा देकर दोबारा चुनाव लड़ने की चुनौती दी थी। उन्होंने रूहुल्लाह के 2024 के लोकसभा चुनाव में जीत को लेकर उनके व्यक्तिगत जनाधार के दावे पर सवाल उठाया था।
अब्दुल्ला ने कहा था, “अगर आपको लगता है कि लोगों ने आपको वोट दिया है, तो इस्तीफा दीजिए और उनके पास वापस जाइए। हम देखेंगे कि आपको कितने वोट मिलते हैं।”
इस सार्वजनिक टकराव ने नेकां अध्यक्ष और रूहुल्लाह के बीच बढ़ते मतभेदों को खुलकर सामने ला दिया है। रूहुल्लाह जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक भविष्य को लेकर पार्टी नेतृत्व से अलग और अधिक मुखर रुख अपनाते रहे हैं।
इन मतभेदों का मुख्य मुद्दा यह है कि नेकां को अनुच्छेद 370 की बहाली, राज्य का दर्जा और जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक अधिकारों की बहाली के मुद्दों को कितनी मजबूती से उठाना चाहिए।
रूहुल्लाह लगातार कहते रहे हैं कि जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि पिछले वर्षों में जम्मू-कश्मीर लगातार अपने अधिकार खोता गया, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व उन्हें वापस हासिल करने में नाकाम रहा।
अब्दुल्ला ने हालांकि कहा है कि रूहुल्लाह संसद में अनुच्छेद 370 का मुद्दा उठाने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन उन्होंने इस मुद्दे को उठाने के उनके तरीके पर सवाल किया है।
अब्दुल्ला ने कहा था, “अगर उन्हें लगता है कि अनुच्छेद 370 बहाल किया जा सकता है, तो उन्हें संसद में यह मुद्दा उठाना चाहिए।”
नेकां अध्यक्ष ने पार्टी संगठन और कार्यकर्ताओं के महत्व पर भी जोर दिया है। उनका तर्क है कि नेकां के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को पार्टी संगठन और उसके कार्यकर्ताओं के समर्थन का लाभ मिलता है।
रूहुल्लाह और पार्टी नेतृत्व के बीच मतभेद पिछले कुछ समय से बढ़ रहे हैं। संवैधानिक मुद्दों पर रूहुल्लाह पार्टी नेतृत्व की तुलना में अधिक मुखर रुख अपनाते रहे हैं। उन्होंने यह संकेत भी दिया है कि संवैधानिक अधिकारों और सुरक्षा से जुड़े अपने अभियान को एक निश्चित चरण तक ले जाने के बाद वह संसद से इस्तीफा देने पर विचार कर सकते हैं।
अब्दुल्ला की चुनौती ने अब इस संभावना को सीधे उनके सामने ला दिया है।
अगर रूहुल्लाह इस्तीफा देते हैं, तो उन्हें दोबारा जनता का जनादेश लेना होगा। इससे यह भी राजनीतिक परीक्षा बन जाएगी कि उनका समर्थन मुख्य रूप से उनके व्यक्तिगत जनाधार पर आधारित है या नेशनल कॉन्फ्रेंस के संगठनात्मक समर्थन पर।
नेकां के लिए यह घटनाक्रम जम्मू-कश्मीर में पार्टी की विपक्षी राजनीति की दिशा को लेकर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है और यह कि पार्टी नेतृत्व से अलग विचार रखने वाले एक प्रभावशाली नेता को वह किस हद तक अपने भीतर समायोजित कर सकती है।
कश्मीरी पंडितों के लिए न्याय के पक्ष में रूहुल्लाह
रूहुल्लाह से कश्मीरी पंडितों से जुड़े मामलों को फिर से खोले जाने के बारे में भी सवाल किया गया। उन्होंने समुदाय के लिए न्याय की वकालत की, लेकिन आगाह किया कि न्याय की प्रक्रिया को बदले का जरिया नहीं बनाया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, “हर किसी को कश्मीरी पंडितों के बारे में जागरूक होना चाहिए। न्याय मिलना चाहिए। न्याय के नाम पर बदला नहीं होना चाहिए।”
उनकी यह टिप्पणी कश्मीरी पंडितों से जुड़े मामलों पर नए सिरे से ध्यान दिए जाने के बीच आई है। रूहुल्लाह ने गलत काम करने वालों को जवाबदेह ठहराने और बदले की कार्रवाई के बीच अंतर बनाए रखने की बात कही।
फिलहाल सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है कि क्या रूहुल्लाह अब्दुल्ला की चुनौती स्वीकार करते हुए लोकसभा से इस्तीफा देंगे।
रूहुल्लाह के मुताबिक, इसका जवाब वह “कुछ दिनों में” देंगे।




