गांधी सदन में गबन!

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम पर महाराष्ट्र के वर्धा में 1997 में शुरू हुए महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के प्रशासन पर कई आर्थिक अनियमितताओं के आरोप हैं. इन अनियमितताओं की बात भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) ने अपनी ड्राफ्ट रिपोर्ट में की है. इस रिपोर्ट के पहले यहां के छात्र भी प्रशासन और खास तौर पर कुलपति विभूति नारायण राय पर आर्थिक और प्रशासनिक अनियमितताओं के आरोप लगाते रहे हैं.

कैग की इस ड्राफ्ट रिपोर्ट में राय के कार्यकाल के शुरुआती दो साल की ऑडिट शामिल है. बाकी के तीन साल की ऑडिट अभी होनी है. ड्राफ्ट रिपोर्ट की एक प्रति तहलका के पास है. इसमें जिन दो साल के खर्चों का लेखा-जोखा है उस अवधि में विश्वविद्यालय को कुल 70.55 करोड़ रुपये मिले थे. जिन बातों को लेकर कैग ने गंभीर आपत्ति जताई है, उनमें प्रमुख है विश्वविद्यालय द्वारा दिए जाने वाले ठेकों में बरती गई अनियमितताएं. राय पर आरोप है कि उन्होंने एक केंद्रीय विश्वविद्यालय में होने वाले कार्यों को अनुचित तौर पर अपने गृह राज्य उत्तर प्रदेश की संस्थाओं को दे दिया. विभूति नारायण राय उत्तर प्रदेश कैडर के आईपीएस अधिकारी रह चुके हैं. 

भवन निर्माण के ठेके में अनियमितता के बाबत कैग टिप्पणी करता है, ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) से मिले पैसों में से करोड़ों रुपये निर्माण के मद में खर्च किए गए. निर्माण का ठेका किसी केंद्रीय एजेंसी को देने के बजाय यह काम उत्तर प्रदेश समाज कल्याण निर्माण निगम को दे दिया गया. इसके लिए भवन समिति, वित्त समिति, कार्यपरिषद, अनुदान समिति और विजिटर से कोई अनुमति नहीं ली गई. इससे साफ पता चलता है कि यह काम पक्षपातपूर्ण था और निगम को लाभ पहुंचाने के मकसद से किया गया था. ऑडिट के दौरान ऐसा कोई भी दस्तावेज पेश नहीं किया गया जिससे ऐसे कार्य के लिए निगम की पात्रता या पहले ऐसे काम करने के अनुभव का प्रमाण मिलता हो.’ 

विश्वविद्यालय सूत्रों का दावा है कि विभूति नारायण राय ने निगम को निर्माण कार्य के लिए तकरीबन 21 करोड़ रुपये का ठेका दिया है.

निर्माण कार्य का ठेका हासिल करने के लिए बीएसएनएल जैसी केंद्रीय एजेंसी ने भी आवेदन किया था. जब शुरुआत में सीपीडब्ल्यूडी से काम वापस लेकर निगम को देने की बात उठी तो राय ने यह सफाई दी थी कि खुद सीपीडब्ल्यूडी ने इस कार्य को लेकर अनिच्छा जताई थी. लेकिन जब कैग ने मामले की ऑडिट की तो उसे कोई भी ऐसा दस्तावेज विश्वविद्यालय प्रशासन ने मुहैया नहीं कराया जिससे पता चलता हो कि सीपीडब्ल्यूडी ने निर्माण कार्य को लेकर अनिच्छा जताई थी. 

महात्मा गांधी के नाम पर चल रहे इस विश्वविद्यालय में खुद गांधी की प्रतिमा का निर्माण कार्य भी अनियमितताओं के आरोपों से नहीं बच सका. इस कार्य के लिए जो निविदाएं आमंत्रित की गई थीं उनमें सबसे कम राशि में काम करने का प्रस्ताव देने वाले को ठेका न देकर दूसरी सबसे कम बोली लगाने वाले को ठेका दे दिया गया. राय पर आरोप है कि ठेका पाने की पात्रता रखने वाले को उन्होंने बेवजह दौड़ से बाहर करके धर्मेंद्र कुमार को बापू की प्रतिमा बनाने का काम दे दिया. धर्मेंद्र लखनऊ के कला एवं शिल्प महाविद्यालय से संबद्ध हैं. कुलपति पर यह आरोप भी है कि उन्होंने काम की गुणवत्ता का आखिरी प्रमाण पत्र हासिल किए बगैर धर्मेंद्र कुमार को नौ लाख रुपये भुगतान के आदेश दिए.

राय पर यह आरोप है कि उन्होंने दो विशेष कार्य अधिकारी (ओएसडी) राकेश श्रीवास्तव और नरेंद्र सिंह की नियुक्तियां बगैर कोई विज्ञापन प्रकाशित किए और सारे नियमों को ताक पर रखकर की हैं. इन दोनों नियुक्तियों की शिकायत जब मानव संसाधन विकास मंत्रालय और यूजीसी के पास पहुंची तो दोनों ने क्रमशः 29 सितंबर, 2009 और 13 अक्टूबर, 2009 को विश्वविद्यालय प्रशासन को पत्र लिखकर अपनी गलती सुधारने के लिए कहा . इसके बावजूद राकेश श्रीवास्तव अपने पद पर तीन साल तक रहे और नरेंद्र सिंह अब भी कार्यरत हैं. इन नियुक्तियों के बारे में कैग ने कहा है, ‘इन दोनों की नियुक्ति और इन्हें दिया गया वेतनमान विश्वविद्यालय के नियमों का उल्लंघन है. इन दोनों नियुक्तियों से संबंधित तथ्यों को देखने से यह लगता है कि ये नियुक्तियां कुछ खास लोगों को जगह देने और उन्हें गलत तरीके से लाभ पहुंचाने के मकसद से की गईं.’

कैग ने अपनी ड्राफ्ट रिपोर्ट में यह भी कहा है कि इन अधिकारियों समेत अन्य कई अधिकारियों को वेतन देने के लिए राजीव गांधी फेलोशिप के फंड से 11.39 लाख रुपये का इस्तेमाल किया गया. सीएजी ने यह भी बताया है कि यूजीसी के नियमों का उल्लंघन करते हुए 2009-10 में 1.82 करोड़ रुपये गैर योजना व्यय कोष में डाले गए. राय पर आरोप है कि उन्होंने इस रकम का गलत इस्तेमाल किया. कैग ने यह भी कहा है कि ऑडिट में विश्वविद्यालय प्रशासन से उसे अपेक्षित सहयोग नहीं मिला और कई जरूरी दस्तावेज नहीं दिखाए गए. कैग ने यह भी कहा है कि विश्वविद्यालय ने कई आर्थिक निर्णयों में तय प्रक्रिया का पालन नहीं किया. इन आरोपों पर विभूति नारायण राय का पक्ष जानने के लिए जब तहलका ने उनसे संपर्क साधा तो उनका जवाब था, ‘मैंने कोई गड़बड़ी नहीं की. कैग की जिस रिपोर्ट की बात आप कर रहे हैं वह अभी शुरुआती है और उनकी टीम फिर से पांच-सात दिन में विश्वविद्यालय आने वाली है. अंतिम रिपोर्ट में ये आरोप नहीं टिकेंगे.’