एक मीडिया मुगल और सत्ता का नशा

ब्रिटेन में हुए हैकिंग प्रकरण के बाद भारतीय मीडिया को भी अपना अवलोकन करना चाहिए. मगर क्या पत्रकारों और नेताओं के बीच की बनावटी सीमा इसका जवाब हो सकती है? अशोक मलिक का विश्लेषण

ब्रिटेन में हुए न्यूज ऑफ द वर्ल्ड प्रकरण के रुपर्ट मर्डोक, उनके साम्राज्य, ब्रिटेन की राजनीति और मीडिया से संचालित हमारे इस युग के लिए क्या मायने हैं? यह जानने के लिए जरूरी है कि शुरुआत में थोड़ी देर के लिए हम इस सवाल को असल गुनाह यानी हैकिंग प्रकरण से अलग रखकर देखने की कोशिश करें.

लोगों के वॉयसमेल को गैरकानूनी तरीके से ऐक्सेस करना और साथ ही अपना नाम बदल कर उनका पासवर्ड जानना आपराधिक मामलों की श्रेणी में आता है. न्यूज आॅफ द वर्ल्ड को इसी अपराध की कीमत चुकानी पड़ी है. लंदन में अधिकारी इस बात की जांच कर रहे हैं कि इस हैकिंग प्रकरण में कौन-कौन शामिल था. भले ही रूपर्ट मर्डोक ने पिछले हफ्ते ब्रिटेन की संसदीय समिति के सामने अपना पक्ष रख दिया हो मगर यह मानना मुश्किल है कि न्यूज कॉरपोरेशन कंपनी के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों को यह जानकारी नहीं थी कि पुलिसवालों को रिश्वत दी जा रही है या प्राइवेट डिटेक्टिव इस्तेमाल किए जा रहे हैं या फिर लोगों के फोन मैसेज सुने जा रहे हैं.

मर्डोक ऐसा कर सके इसकी एक वजह मारग्रेट थेचर के बाद के दौर वाले ब्रिटेन में हो रही नीरस राजनीति भी है 

अभी जो जानकारियां बाहर आई हैं उनके मुताबिक ऐसे गैरकानूनी तरीके न्यूज ऑफ द वर्ल्ड और इसकी मातृकंपनी के दूसरे अखबारों तक सीमित हैं. शायद इस तरह के तरीके ब्रिटेन के दूसरे टैबलॉइड भी इस्तेमाल करते होंगे- जैसा कि मर्डोक संसदीय समिति को समझाना चाह रहे थे. जो भी हो, यह तय है कि खबर खोजने के लिए इस तरह के तरीकों पर कोई भी वैधता की मुहर नहीं लगा सकता. कोई भी समझदार व्यक्ति इसे सही नहीं कहेगा.

आम लोगों के लिए भी हैकिंग प्रकरण चौंकाने वाला है. इससे कई सवाल पैदा होते हैं. पहला सवाल यह कि आज के दौर में राजनेता मीडिया पर कितना निर्भर रहते हैं. न्यूज काॅरपोरेशन जैसे बड़े मीडिया काॅरपोरेशन के वे कितने ऋणी होते हैं? पत्रकारिता को उद्योग बनाने के क्या परिणाम हो सकते हैं? क्या पत्रकारिता राजनेताओं और सत्ता प्रतिष्ठान के ज्यादा करीब आ गई है? ये सारे सवाल आपस में जुड़े हुए हैं. कुछ इसी तरह के सवाल दुनिया के  कई दूसरे कोनों में भी पूछे जा रहे हैं जिनमें भारत भी शामिल है. ब्रिटेन और अमेरिका से लेकर भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों तक में लोग मीडिया की कई अतियों से परेशान हैं. भारत में भी नीरा राडिया विवाद के बाद जो सवाल खड़े हुए थे उन पर फिर से बहस होने लगी है.

लंदन में हुए हाल के घटनाक्रम और भारतीय मीडिया के व्यवहार की भी आसानी से तुलना की जा सकती है. लेकिन ब्रिटेन की संसद ने जिस तरह से न्यूज आॅफ द वर्ल्ड के अधिकारियों और मर्डोक से सवाल-जवाब किए और जिस तरह से उसका सीधा प्रसारण लोगों ने देखा, वह ब्रिटेन की लोकतांत्रिक प्रणाली का सबसे बेहतर उदाहरण था.

यह अलग बात है कि मीडिया और राजनीति के इस गठजोड़ के मामले में उसी ब्रिटेन ने भारत को काफी पीछे छोड़ रखा है. वहां यह कोई नयी बात नहीं है. इस तरह के घटनाक्रमों का ब्रिटेन में इतिहास भी रहा है और परंपरा भी. मर्डोक और उनकी टीम उस परंपरा का अनुसरण भर कर रही है. एक तरह से पत्रकार और राजनेता दोनों ही ब्रिटेन में साथ काम करते आए हैं. मैक्स एटकेन, जो  बाद में लाॅर्ड बीवरब्रुक हो गए, ब्रिटेन के पहले बड़े मीडिया उद्योगपति थे. साथ ही वे विंस्टन चर्चिल के दोस्त भी थे और युद्ध के दौरान चर्चिल के मंत्रिमंडल का हिस्सा भी.

बीस साल पहले लिखी जेरेमी पैक्समैन की विस्तृत किताब ‘फेंड्स इन हाई प्लेसिस: हू रन्स ब्रिटेन?’ में बताया गया है कि किस तरह संपादक, नेता और वरिष्ठ नौकरशाहों के बीच घनिष्ठ संबंध होता है जिसका कारण प्राय: स्कूल-कॉलेज के दौर की दोस्ती या फिर एक ही सामाजिक तबके का हिस्सा होना होता है. ये तीनों – संपादक, नेता और नौकरशाह – अपने आप को उस वर्ग का हिस्सा मानते हैं जो ब्रिटेन को चलाता है.

बीसवीं सदी का इतिहास देखें तो हम पाएंगे कि लगभग पूरी सदी के दौरान ही ब्रिटेन के अखबार किसी न किसी पार्टी और कुछ मामलों में किसी राजनेता के पीछे खड़े रहे हैं. उनकी खबरों से लेकर संपादकीय तक में इसकी झलक दिखती रही है. मर्डोक ने इस पतन को इसके चरम तक पहुंचा दिया. उन्होंने अपने हितों के हिसाब से कभी एक राजनेता को तरजीह दी तो कभी दूसरे को. वे भविष्य के प्रधानमंत्रियों पर ऐसे दांव लगाते रहे जैसे जुआरी रेस जीतने की क्षमता रखने वाले घोड़ों पर लगाते हैं.

मर्डोक ऐसा कर सके उसकी एक वजह मारग्रेट थेचर के बाद के दौर वाले ब्रिटेन में हो रही नीरस राजनीति भी है. गौर से देखा जाए तो इस राजनीति में न कोई खास वैचारिक मतभेद दिखता है और न ही वे तीखी बहसें जो नीतिगत मसलों पर देखने को मिलती थीं और जिन्हें उस दौर की पीढ़ी मंत्रमुग्ध होकर देखा और सुना करती थी. थेचर के बाद के ब्रिटेन में नेताओं को ब्रांड की तरह तैयार किया जाता रहा. इन ब्रांडों को स्थापित करने और मनचाही पब्लिसिटी देने में मीडिया की अहम भूमिका रही. मर्डोक को पहले टोनी ब्लेयर ने रिझाया और बाद में डेविड कैमरून ने. बदले में मर्डोक ने अपने अखबारों और खबरिया चैनलों का इस्तेमाल अपने उस केबल और टीवी व्यवसाय को कई रियायतें दिलवाने के लिए किया जहां से उन्हें अकूत कमाई होनी थी.

भारत इस मामले में कुछ अलग है और नहीं भी. शुक्र है कि यहां चुनाव में कौन जीतेगा और कौन हारेगा, इसे प्रभावित करने की क्षमता मीडिया में नहीं है. होती तो भाजपा 2004 में चुनाव नहीं हारती, नरेंद्र मोदी 2002 और 2007 में नहीं जीत पाते, ममता बनर्जी 2006 में ही परिदृश्य से गायब हो चुकी होतीं (जब वे सिंगूर में भूख हड़ताल पर बैठी थीं और अखबारों से लेकर न्यूज चैनलों तक ने उनका खूब मजाक बनाया था) और मायावती वहां नहीं होतीं जहां वे आज हैं.

हालांकि यह जरूर है कि किसी महत्वाकांक्षी उम्मीदवार की राजनीतिक छवि गढ़ने में मीडिया की खासी भूमिका होती है. प्राइम-टाइम न्यूज चैनलों के टाॅक शो उन कई मंचों में से एक हैं जिनका इसमें योगदान होता है. मगर राजनेताओं के पास यही एक मंच हो, ऐसा नहीं है. भाजपा की तरफ से जल्द ही गुजरात से राज्यसभा एमपी बनने जा रही स्मृति ईरानी को ही ले लीजिए. पार्टी की तरफ तकरीबन एक दशक तक वफादार रहने के बाद अब उन्हें इसका फल मिल रहा है. लेकिन देखा जाए तो इस मुकाम तक पहुंचने का उनका रास्ता किसी आम नेता से अलग रहा है. वे अपने साथ न किसी जाति के वोट लाती हैं, न किसी बिजनेस कॉरपोरेशन के संसाधन और न ही किसी नौकरशाह की प्रशासनिक सूझ-बूझ. उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाने में उस मध्यवर्गीय छवि का अहम योगदान है जो उनके टीवी धारावाहिकों ने उनके लिए गढ़ी है.

इस तरह से देखा जाए तो स्मृति ईरानी अपनी संसदीय सीट के लिए बालाजी टेलीफिल्म्स की एहसानमंद होंगी. ठीक उसी तरह जैसे ब्लेयर और कैमरन न्यूज कारपोरेशन के ऋणी होंगे. रेबेका ब्रुक्स की शादी में ये दोनों हस्तियां पहुंची थीं. क्या स्मृति ईरानी भी एकता कपूर की शादी में नाचेंगी?

क्या पत्रकारों का नेताओं और नौकरशाहों के साथ दोस्ती करना और किसी काम में सहभागी होना गलत है? पत्रकारिता एक बड़ा दायरा है. इसमें वे भी शामिल हैं जो झूठ का पर्दाफाश करने को तैयार रहते हैं और वे लोग भी जो नीतियां बनाते हैं और जिनके लिए पत्रकारिता यह जानने का जरिया है कि वे नीतियां कैसे बनें.

देखा जाए तो ये दोनों ही पत्रकारिता को मजबूती देने वाले खंभे हैं. अपने सबसे अच्छे रूप में पत्रकारिता इन्हीं दो स्तंभों के बीच एक संतुलन बनाती है. और अपने सबसे घिनौने रूप में वह एक 13 साल की मृत लड़की के संदेशों को बिना किसी को बताए चुपचाप सुनती भी है.

पत्रकारिता को आखिर क्या होना चाहिए, यह आखिर में पत्रकार को ही चुनना होगा.