हिमाचल प्रदेश के सेब के बागान लंबे समय से राज्य की खुशहाली और पहाड़ी अर्थव्यवस्था की पहचान रहे हैं। लेकिन अब यह क्षेत्र गंभीर अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। मौसम की अनियमितता, घटती उत्पादकता, खेती की बढ़ती लागत और विदेशों से आने वाले सेब की प्रतिस्पर्धा ने बागवानों की कमर तोड़नी शुरू कर दी है। इस सीजन में उत्पादन में आई भारी गिरावट ने वर्षों से चली आ रही इन समस्याओं को और गंभीर बना दिया है। सवाल उठने लगा है कि क्या राज्य और केंद्र सरकारें देश के सबसे महत्वपूर्ण फल उत्पादक क्षेत्रों में से एक को बचाने के लिए पर्याप्त कदम उठा रही हैं?
यह संकट केवल खराब फसल तक सीमित नहीं है। हजारों छोटे और सीमांत बागवानों के लिए सेब की खेती ही आय का प्रमुख स्रोत है। इसी से परिवारों का खर्च, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य संबंधी जरूरतें और अगले सीजन में बागानों की देखभाल का खर्च निकलता है। यदि आमदनी में लगातार गिरावट आती रही, तो इसका असर केवल बागवानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि व्यापारियों, परिवहन कर्मियों, मजदूरों, कोल्ड स्टोरेज संचालकों और फल कारोबार से जुड़े अन्य लोगों की आजीविका पर भी पड़ेगा।
इस सीजन में उत्पादन में गिरावट को लेकर अलग-अलग अनुमान सामने आए हैं। हिमाचल प्रदेश में 2025 के दौरान 6.99 लाख मीट्रिक टन सेब का उत्पादन हुआ था। राज्य के बागवानी निदेशक सतीश कुमार शर्मा के मुताबिक, पिछले वर्ष 14 सितंबर तक मंडियों में लगभग 4.20 लाख मीट्रिक टन सेब पहुंच चुका था, जबकि इस साल 14 अक्टूबर तक यह आंकड़ा केवल 1.29 लाख मीट्रिक टन रहा।
राज्य को इस वर्ष 3.50 लाख से चार लाख मीट्रिक टन सेब उत्पादन की उम्मीद थी, लेकिन मंडियों में कम आवक को देखते हुए इस लक्ष्य को हासिल करना मुश्किल दिखाई दे रहा है।
बागवानी मंत्री जगत सिंह नेगी ने उत्पादन में लगभग 40 प्रतिशत गिरावट का अनुमान जताया है। वहीं, कृषि वैज्ञानिक डॉ. सरबजीत सिंह चाहल ने इस सीजन में लगभग 1.35 लाख मीट्रिक टन उत्पादन का उल्लेख किया है, जबकि अनुमानित लक्ष्य करीब 4.56 लाख मीट्रिक टन बताया गया है। अलग-अलग अनुमानों और आंकड़ों के बावजूद इस बात पर सहमति दिखाई देती है कि सेब उत्पादकों को इस बार गंभीर नुकसान का सामना करना पड़ा है।
इस संकट के दांव पर बहुत कुछ लगा है। हिमाचल प्रदेश की सेब अर्थव्यवस्था का आकार लगभग 5,000 करोड़ से 6,000 करोड़ रुपये आंका जाता है। करीब 2.5 लाख परिवार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सेब की खेती पर निर्भर हैं। शिमला, किन्नौर और कुल्लू राज्य के प्रमुख सेब उत्पादक जिले हैं, जबकि मंडी, चंबा और लाहौल-स्पीति के कुछ हिस्सों में भी सेब का उत्पादन होता है।
जलवायु परिवर्तन ने बिगाड़ा बागानों का चक्र
इस सीजन की बदहाली के पीछे मौसम की ऐसी परिस्थितियां भी हैं, जिनका अनुमान लगाना बागवानों के लिए लगातार कठिन होता जा रहा है। असमय पाला, ओलावृष्टि, तापमान में उतार-चढ़ाव, सर्दियों में पर्याप्त ठंड न पड़ना और फूल आने तथा फल बनने के दौरान पानी की कमी ने फसल को प्रभावित किया है।
सेब की खेती एक संतुलित मौसमी चक्र पर निर्भर करती है। सर्दियों में पेड़ों को पर्याप्त ठंड मिलने के बाद ही सामान्य रूप से फूल आते हैं और फल विकसित होते हैं। यदि तापमान में असामान्य बदलाव हो या पर्याप्त ठंड न पड़े, तो फूल आने और फल बनने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इसके बाद बारिश, पाला या ओलावृष्टि जैसी घटनाएं फसल को और नुकसान पहुंचाती हैं।
सोलन, हमीरपुर, शिमला, कुल्लू और सिरमौर जिलों के निचले ऊंचाई वाले सेब उत्पादक क्षेत्रों में विशेष रूप से प्रतिकूल परिस्थितियां देखने को मिली हैं। कुछ इलाकों में पिछले वर्ष सितंबर-अक्टूबर में ही फूल आने की सूचना मिली, जबकि सामान्यतः यह प्रक्रिया मार्च-अप्रैल में होती है। दूसरी ओर, जिन क्षेत्रों में निर्धारित समय पर फूल आए, वहां बढ़ते तापमान ने फूलों और फल बनने की प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाया।
पिछले वर्ष कई इलाकों में समय से पहले पत्तियां गिरने की समस्या भी सामने आई थी। इसका एक कारण अल्टरनेरिया जैसे फफूंदजनित रोगों को माना गया। पेड़ों की स्वस्थ पत्तियां पोषक तत्वों के भंडारण और अगले सीजन की फसल के विकास के लिए जरूरी होती हैं। ऐसे में समय से पहले पत्तियां गिरने का असर अगले वर्ष के उत्पादन पर भी पड़ सकता है।
विशेषज्ञों ने पुराने बागानों, अपर्याप्त सिंचाई, रोगों के बढ़ते प्रकोप और घटिया या पुरानी पौध सामग्री के इस्तेमाल को भी समस्या का हिस्सा बताया है। हिमाचल में सेब की औसत उत्पादकता लगभग चार से पांच टन प्रति हेक्टेयर है, जो चीन और अमेरिका के कुछ अत्यधिक उत्पादक बागानों में दर्ज 40 से 50 टन प्रति हेक्टेयर की उत्पादकता से काफी कम है।
इसलिए चुनौती केवल मौसम के प्रकोप से फसल बचाने की नहीं, बल्कि बागानों को आधुनिक बनाने, उनकी उत्पादकता बढ़ाने और उन्हें बदलती जलवायु के अनुकूल बनाने की भी है।

आयातित सेब और शुल्क बढ़ाने की मांग
मौसम की मार के साथ-साथ बागवानों का आरोप है कि आयात नीति ने भी उनकी मुश्किलें बढ़ाई हैं। उनका कहना है कि घरेलू उत्पादन घटने के बावजूद उन्हें बेहतर कीमतें नहीं मिल रहीं, क्योंकि विदेशी सेब भारतीय बाजार में प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं।
शिमला जिले के रत्नाड़ी गांव के बागवान आशुतोष चौहान के मुताबिक, खेती की लागत बढ़ने और आयात शुल्क में बदलाव ने उत्पादकों पर दबाव बढ़ा दिया है। उनका कहना है कि खाद और अन्य कृषि सामग्री पर सरकारी सब्सिडी में कमी के कारण खेती महंगी हुई है। दूसरी ओर, आयातित सेबों ने बाजार में प्रतिस्पर्धा और तेज कर दी है।
बागवान विशेष रूप से अमेरिकी सेब पर आयात शुल्क 70 प्रतिशत से घटाकर 50 प्रतिशत किए जाने से नाराज हैं। उनका मानना है कि जलवायु संबंधी नुकसान और बढ़ती लागत के बीच इस फैसले ने घरेलू उत्पादकों को मिलने वाली सुरक्षा कमजोर कर दी है।
हिमाचल प्रदेश सेब उत्पादक संघ के अध्यक्ष सोहन ठाकुर ने सेब पर आयात शुल्क बढ़ाकर 100 प्रतिशत करने की मांग की है। उनका कहना है कि विदेशी सेब केवल हिमाचल के उत्पादकों के लिए ही चुनौती नहीं हैं, बल्कि जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड के बागवान भी इससे प्रभावित हो रहे हैं।
इस मुद्दे पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी तेज हो गए हैं। भाजपा नेता और केंद्रीय विदेश एवं संस्कृति राज्य मंत्री मीनाक्षी लेखी ने शिमला दौरे के दौरान सेब पर 50 प्रतिशत आयात शुल्क तय किए जाने के लिए संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार को जिम्मेदार ठहराया।
इसके जवाब में हिमाचल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष और मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार नरेश चौहान ने कहा कि आयात शुल्क 75 प्रतिशत से घटाकर 50 प्रतिशत नरेंद्र मोदी सरकार ने किया था। उन्होंने दावा किया कि बागवानों को कोल्ड स्टोरेज में रखे सेब की प्रति पेटी 800 से 1,200 रुपये तक का नुकसान उठाना पड़ रहा है।
बागवानों के मुताबिक, अफगानिस्तान और ईरान जैसे देशों से आने वाले सेब भी घरेलू बाजार को प्रभावित कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि सरकार आयात के घरेलू कीमतों पर पड़ने वाले समग्र प्रभाव का आकलन करे और स्थानीय उत्पादकों को राहत देने के लिए ठोस नीति बनाए।
बड़ा सवाल यह है कि उपभोक्ताओं के हितों, अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रतिबद्धताओं और भारतीय किसानों को लाभकारी मूल्य दिलाने के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए। बागवानों की प्राथमिकता स्पष्ट है—बढ़ती लागत, अनिश्चित उत्पादन और कमजोर कीमतों के बीच उन्हें ऐसी नीतिगत सुरक्षा मिले, जिससे खेती आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनी रहे।
मार्केट इंटरवेंशन स्कीम पर भी उठे सवाल
बागवानों की चिंता का एक और बड़ा कारण मार्केट इंटरवेंशन स्कीम (एमआईएस) है। इस योजना के तहत ग्रेड-सी के सेब सरकारी निर्धारित कीमत पर खरीदे जाते हैं। इसका उद्देश्य कम गुणवत्ता वाले फल के लिए बाजार उपलब्ध कराना, बागवानों को मजबूरी में कम कीमत पर उपज बेचने से बचाना और खुले बाजार में कीमतों को स्थिर रखने में मदद करना है।
बागवानों को आशंका है कि जलवायु संबंधी नुकसान के कारण जब अधिक मात्रा में सेब की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है, तब इस योजना को कमजोर करने से उनकी मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।
बागवानों के अनुसार, केंद्र सरकार ने 2023 से इस योजना के लिए वित्तीय सहायता में कटौती शुरू की थी। अब हिमाचल में कुछ उत्पादकों को जारी किए गए नोटिसों ने नई चिंता पैदा कर दी है। ये नोटिस उन बागवानों को दिए गए हैं, जिन्होंने योजना के तहत 100 से अधिक बोरियों में सेब बेचे थे। प्रत्येक बोरी का वजन 38 किलोग्राम था।
पिछले वर्ष हिमाचल प्रदेश हॉर्टिकल्चर प्रोड्यूस मार्केटिंग एंड प्रोसेसिंग कॉरपोरेशन (एचपीएमसी) ने इस योजना के तहत लगभग एक लाख मीट्रिक टन सेब खरीदे थे, जिनका मूल्य करीब 120 करोड़ रुपये था। खरीद की बड़ी मात्रा पर सवाल उठने के बाद सरकार ने उपमंडल मजिस्ट्रेटों (एसडीएम) की अध्यक्षता में समितियां गठित कीं। इन समितियों को 100 से अधिक बोरियां बेचने वाले बागवानों की भूमि संबंधी जानकारी का सत्यापन करने का जिम्मा दिया गया।
योजना के तहत करीब 45,000 बागवानों ने सेब बेचे थे, जिनमें से लगभग 7,000 ने 100 से अधिक बोरियां बेची थीं। अधिकारियों का कहना है कि इन सभी बागवानों को नोटिस नहीं दिए गए। नोटिस केवल उन मामलों में जारी किए गए, जहां दर्ज भूमि के मुकाबले ग्रेड-सी सेब की मात्रा असामान्य रूप से अधिक दिखाई दी।
हालांकि, बागवान इस धारणा पर सवाल उठा रहे हैं कि कुल फसल में ग्रेड-सी सेब की हिस्सेदारी अधिकतम 25 प्रतिशत ही हो सकती है।
संयुक्त किसान मंच के सह-संयोजक संजय चौहान का कहना है कि हाल के वर्षों में ओलावृष्टि और बीमारियों के कारण फसल का बड़ा हिस्सा खराब हो रहा है। कुछ क्षेत्रों में ओलावृष्टि से 70 से 80 प्रतिशत तक फसल को नुकसान पहुंचने का दावा किया गया है। ऐसे में यदि केवल 25 प्रतिशत ग्रेड-सी सेब की खरीद की जाए, तो बाकी खराब उपज का क्या होगा?
उनका यह भी कहना है कि संग्रह केंद्रों पर कागजी कार्रवाई सरकारी कर्मचारियों द्वारा की जाती है। इसके अलावा, संयुक्त भूमि स्वामित्व और खेती की वास्तविक व्यवस्था के कारण कई बार बागवान जितनी जमीन पर खेती करते हैं, उसका पूरा विवरण व्यक्तिगत राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज नहीं होता।
बागवानों का कहना है कि यदि खरीद प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है, तो उसकी जांच और कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन जांच के नाम पर योजना को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए। उनकी मांग है कि खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाई जाए और मौसम से प्रभावित बागवानों की वास्तविक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जाए।
कृषि संकट की ओर बढ़ते कदम?
हिमाचल के सेब उत्पादकों की चिंता अब मौजूदा फसल से आगे बढ़कर भविष्य की खेती तक पहुंच गई है। प्रख्यात पादप रोग विशेषज्ञ और पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. सरबजीत सिंह चाहल ने चेतावनी दी है कि यदि हालात नहीं सुधरे, तो हिमाचल के सेब बागवानों की स्थिति पंजाब और हरियाणा के कपास किसानों जैसी हो सकती है।
एक समय कपास को ‘सफेद सोना’ कहा जाता था। लेकिन लगातार नुकसान और घटते मुनाफे से परेशान होकर अनेक किसानों ने वैकल्पिक फसलों, खासकर धान और गेहूं, की ओर रुख कर लिया। डॉ. चाहल का मानना है कि यदि सेब की खेती से भी पर्याप्त आमदनी नहीं हुई, तो हिमाचल के बागवान भी अपने पारंपरिक फल से दूरी बनाने को मजबूर हो सकते हैं।
उन्होंने घटिया पौध सामग्री, अपर्याप्त क्वारंटीन व्यवस्था, नकली कीटनाशकों और जलवायु परिवर्तन को उत्पादन में गिरावट के प्रमुख कारणों में शामिल किया है।
उनके मुताबिक, विदेशी देशों से आयात किए जाने वाले रूटस्टॉक और ग्राफ्टेड पौधों की पर्याप्त जांच नहीं होने पर बागानों में नए कीट और रोग पहुंचने का खतरा रहता है। उन्होंने आयातित पौध सामग्री के लिए सख्त पोस्ट-एंट्री क्वारंटीन व्यवस्था लागू करने की मांग की है। उनका कहना है कि पौधों को रोपण के लिए जारी करने से पहले संभावित कीटों और रोगजनकों की पहचान के लिए 40 दिनों की अनिवार्य क्वारंटीन अवधि जरूरी है।
नकली और घटिया कीटनाशकों का इस्तेमाल भी चिंता का विषय है। ऐसे रसायन रोगों और कीटों पर नियंत्रण के प्रयासों को कमजोर कर सकते हैं, जिससे फसल का नुकसान बढ़ने की आशंका रहती है। जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम के बदलते स्वरूप और फसलों में रोगों की बढ़ती समस्या ने स्थिति को और जटिल बना दिया है।
डॉ. चाहल का कहना है कि पौध सामग्री की गुणवत्ता, क्वारंटीन नियमों और कीटनाशकों के नियमन को मजबूत करने के साथ जलवायु के अनुकूल खेती की तकनीकों को अपनाना जरूरी है।
बागवानों को चाहिए जवाबदेही और दीर्घकालिक योजना
सेब उत्पादकों की नाराजगी अब राजनीतिक महत्व भी हासिल कर रही है। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने शिमला जिले की आठ में से सात सीटें जीती थीं और कई अन्य प्रमुख सेब उत्पादक क्षेत्रों में भी सफलता हासिल की थी। इसके बावजूद बागवानों का कहना है कि उनकी पुरानी समस्याओं का समाधान नहीं हो पाया है।
हाल ही में शिमला में संयुक्त किसान मंच के बैनर तले विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों की बैठक हुई। इसमें कृषि और बागवानी क्षेत्र के संकट पर चर्चा करते हुए फैसला किया गया कि बागवानों की मांगों को राजनीतिक दलों के सामने रखा जाएगा और चुनावी घोषणापत्रों में उन्हें शामिल करने का दबाव बनाया जाएगा।
मंच के संयोजक हरीश चौहान के मुताबिक, कृषि और बागवानी संकट के कारण किसानों तथा बागवानों पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है। उन्होंने किसानों की कर्जमाफी और आर्थिक राहत से जुड़े मुद्दों पर सरकारों की उदासीनता की आलोचना की। उनका तर्क है कि कृषि परिवारों को भी ऐसी सहायता मिलनी चाहिए, जिससे वे लगातार बढ़ते आर्थिक दबाव से उबर सकें।
बागवानों की मांगें केवल आयात शुल्क बढ़ाने या सरकारी खरीद तक सीमित नहीं हैं। उन्हें बेहतर बाजार संपर्क, परिवहन सुविधाओं, भरोसेमंद कोल्ड स्टोरेज और फल प्रसंस्करण इकाइयों की भी जरूरत है। जिन सेबों को ताजा फल के रूप में अच्छी कीमत नहीं मिलती, उनसे जूस, जैम और अन्य उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। इससे बागवानों की आय के नए रास्ते खुल सकते हैं।
ऐसे डिजिटल प्लेटफॉर्म, जो उत्पादकों को सीधे खरीदारों से जोड़ें और भंडारण तथा बाजार की जानकारी उपलब्ध कराएं, बिचौलियों पर निर्भरता घटाने में मदद कर सकते हैं। हालांकि, केवल तकनीक से कमजोर बाजार व्यवस्था, अपर्याप्त बुनियादी ढांचे और लाभकारी मूल्य की समस्या का समाधान नहीं हो सकता।
हिमाचल प्रदेश की सेब अर्थव्यवस्था राज्य की पहचान और ग्रामीण आजीविका का महत्वपूर्ण आधार है। मौजूदा संकट जलवायु परिवर्तन, नीतिगत चुनौतियों, व्यापार संबंधी फैसलों और विपणन व्यवस्था की कमजोरियों का मिला-जुला परिणाम है।
तत्काल जरूरत है कि बागवानों को आर्थिक नुकसान से बचाने के लिए राहत दी जाए, सरकारी खरीद व्यवस्था को पारदर्शी बनाया जाए और मौसम की मार से प्रभावित उत्पादकों के हितों की रक्षा की जाए। दीर्घकालिक स्तर पर बागानों की उत्पादकता बढ़ाने, उन्हें रोगों और बदलती जलवायु के अनुकूल बनाने तथा बाजार में किसानों की सौदेबाजी की ताकत मजबूत करने की जरूरत है।
यदि इन चुनौतियों का समय रहते समाधान नहीं किया गया, तो इसका असर एक खराब फसल तक सीमित नहीं रहेगा। पहाड़ी किसानों की पीढ़ियों को सहारा देने वाली यह अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे अपनी व्यवहार्यता खो सकती है और परिवारों को उन बागानों से मुंह मोड़ना पड़ सकता है, जो कभी उनकी खुशहाली और सुरक्षा का प्रतीक थे। हिमाचल के लिए सेब अर्थव्यवस्था को बचाना अब केवल कृषि से जुड़ा लक्ष्य नहीं, बल्कि बदलती परिस्थितियों के अनुरूप किसानों की आजीविका सुरक्षित रखने की एक बड़ी कसौटी बन गया है।




