विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन

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फोटोः विकास कुमार

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद एक संस्था बेहद तेजी से चर्चा में आई है. नाम है विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन (वीआईएफ). दिल्ली के चाणक्यपुरी इलाके में स्थित यह थिंक टैंक (विचार समूह) वैसे तो 2009 से ही सक्रिय था लेकिन इसके बारे में कहीं कोई खास चर्चा सुनाई नहीं देती थी. आज यह संस्थान राजनीतिक-प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का केंद्र बना हुआ है. इस चर्चा के जन्म का कारण हैं तीन नियुक्तियां. वे तीन लोग जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए चुना है.

इनमें से एक हैं आईबी के पूर्व प्रमुख अजित डोवाल जिन्हें मोदी ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) बनाया है. डोवाल अनौपचारिक रूप से सरकार बनने के पहले ही सक्रिय हो गए थे. कहा जाता है कि सार्क प्रमुखों को मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में बुलाने का आईडिया उनका ही था. दूसरी नियुक्ति है ट्राई के पूर्व चेयरमैन नृपेंद्र मिश्रा की जिन्हें मोदी ने अपना प्रमुख सचिव बनाया है. नृपेंद्र मिश्रा की नियुक्ति में कानून आड़े आ रहा था जिसके मुताबिक ट्राई का चेयरमैन रह चुका व्यक्ति किसी सरकारी पद पर नहीं बैठ सकता. आड़े आ रहे कानून को मोदी ने पहले अध्यादेश लाकर और फिर कानून में ही बदलाव करके सीधा कर दिया. तीसरा नाम है पूर्व केंद्रीय कृषि सचिव पीके मिश्रा का जिन्हें मोदी ने एडिशनल प्रिंसिपल सेक्रेटरी बनाया है. इन तीनों लोगों में एक खास समानता है. ये तीनों विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन (वीआईएफ) से जुड़े रहे हैं. एनएसए बनने से पूर्व अजित डोवाल जहां वीआईएफ के निदेशक थे वहीं नृपेंद्र मिश्रा संस्था की कार्यकारिणी परिषद के सदस्य थे. पीके मिश्रा भी संस्था से बतौर सीनियर फैलो जुड़े हुए थे.

डोवाल के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनने के बाद पूर्व सेना प्रमुख जनरल एनसी विज को संस्था का निदेशक बनाया गया है. सूत्र बताते हैं कि विवेकानंद फाउंडेशन से और भी कई लोग सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर जानेवाले हैं. खबर है कि डीआरडीओ के पूर्व महानिदेशक वीके सारस्वत जो वीआईएफ में सेंटर फॉर साइंटिफिक एंड टेक्नोलॉजिकल स्टडीज के डीन हैं, मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार आर चिदंबरम की जगह ले सकते हैं. इसके अलावा रॉ के पूर्व प्रमुख सीडी सहाय, पूर्व शहरी विकास सचिव अनिल बैजल, रूस में भारत के राजदूत रह चुके प्रभात शुक्ला, पूर्व वायु सेना प्रमुख एसजी इनामदार और बीएसएफ के पूर्व प्रमुख प्रकाश सिंह भी उस सूची में शामिल हैं जो वीआईएफ से मोदी सरकार का सफर तय कर सकते हैं. प्रधानमंत्री बनने के बाद जिस पहली किताब ‘गेटिंग इंडिया बैक ऑन ट्रैक’ का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विमोचन किया उसके संपादकों में से एक बिबेक देबोरॉय वीआईएफ स्थित सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज के डीन हैं.

दिल्ली के सत्ता गलियारों में यह कहा जाने लगा है कि सरकार के लिए वीआईएफ एक ऐसा नियुक्ति केंद्र बन गया है जहां मोदी के मनमाफिक लोगों की एक पूरी फौज है. सरकार की हर जरूरत का आइडिया और इंसान वीआईएफ में मौजूद है. ऐसे में मोदी सरकार में वीआईएफ से कैंपस प्लेसमेंट जारी रहने वाला है.

यहीं से यह प्रश्न खड़ा होता है कि ऐसा क्या है वीआईएफ में जिसने इसे मोदी का चहेता बना दिया है?  क्या काम करती है यह संस्था?  कौन लोग इससे जुड़े हैं?

वीआईएफ अजित डोवाल के दिमाग की उपज है. 2005 में आईबी प्रमुख के पद से रिटायर होने के बाद 2009 में डोवाल ने इसकी स्थापना की थी. इसका उद्घाटन उस साल दिसंबर माह में माता अमृतानंदमयी और न्यायमूर्ति एमएन वेंकटचलैया ने किया था. वीआईएफ कन्याकुमारी स्थित उस विवेकानंद केंद्र से संबद्ध है जिसकी स्थापना 1970  में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाहक एकनाथ रानाडे ने की थी. दिल्ली के चाणक्यपुरी इलाके में 1993 में तत्कालीन नरसिम्हा रॉव सरकार ने दिल्ली में भी इस संस्थान को जमीन आवंटित की थी. बाद में यहीं वीआईएफ की स्थापना हुई.

वीआईएफ की वेबसाइट पर फाउंडेशन का परिचय देते हुए लिखा है, ‘नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन (वीआईएफ) विवेकानंद केंद्र के तत्वावधान में भारत के अग्रणी सुरक्षा विशेषज्ञों, राजनयिकों, उद्योगपतियों और परोपकारियों के सामूहिक प्रयास से स्थापित किया गया है. वीआईएफ का उद्देश्य एक ऐसा उत्कृष्ट केंद्र बनना है जहां से नवीन विचारों और एक नई सोच के साथ एक मजबूत, सुरक्षित और समृद्ध भारत अपनी अंतरराष्ट्रीय भूमिका का सही से निर्वहन कर सके.’

संस्था अपने विजन और मिशन के बारे में बताते हुए लिखती हैं,  ‘वीआईएफ एक स्वतंत्र और निष्पक्ष संस्थान है जो गुणवत्तापूर्ण अनुसंधान और गहन अध्ययन को बढ़ावा देता है. इसका प्रयास है कि भारत के सभी प्रतिभाशाली लोगों को प्रमुख राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय विषयों पर गहनता से चर्चा करने के लिए एक मंच पर लाया जाए. इसका प्रयास ऐसी पहलों को बढ़ावा देना है जो शांति और वैश्विक सद्भाव को मजबूत करती हैं. संस्था का काम उन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक गतिविधियों पर नजर बनाए रखना है जो भारत की एकता और अखंडता पर असर डाल सकती है…’

वीआईएफ के सलाहकार परिषद और कार्यपरिषद में शिक्षाविदों के साथ ही सेना के पूर्व प्रमुख, पूर्व राजदूत, विदेश सचिव, रॉ और आईबी से जुड़े सेवानिवृत अधिकारी, नौकरशाह एवं तमाम अन्य विभागों में बड़े पदों पर रह चुके पूर्व अधिकारियों की भरमार है.

संस्था के सलाहकार बोर्ड में पूर्व सेना प्रमुख वीएन शर्मा, रॉ के भूतपूर्व मुखिया एके वर्मा, बीएसएफ के पूर्व प्रमुख प्रकाश सिंह, पूर्व एयरचीफ मार्शल एस कृष्णास्वामी, पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल, एस गुरुमूर्ति, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ बेंगलोर के प्रोफेसर आर वैद्यनाथन, पूर्व सेना प्रमुख शंकर रॉय चौधरी, पूर्व केंद्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान, पूर्व कैबिनेट सचिव प्रभात कुमार एवं जम्मू-कश्मीर के पूर्व गवर्नर एसके सिन्हा शामिल हैं.

कार्यकारिणी परिषद में पूर्व एयर मार्शल एसजी ईनामदार, अजित डोवाल, फ्रांस और जर्मनी में भारत सरकार के दूत रहे टीसीए रंगचारी, पूर्व गृह सचिव अनिल बैजल, पूर्व रॉ प्रमुख सीडी सहाय, पूर्व केंद्रीय सचिव धनेंद्र कुमार, पूर्व सेना प्रमुख एनसी विज, ट्राई के पूर्व चेयरमैन नृपेंद्र मिश्रा, विदेश मंत्रालय के पूर्व सचिव राजीव सीकरी जैसे नाम शामिल हैं.

संस्थान से जुड़े लोग बताते हैं कि फाउंडेशन प्रमुख रूप से आठ क्षेत्रों में काम करता है. इनमें राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक अध्ययन, अंतरराष्ट्रीय संबंध/कूटनीति, तकनीकी और वैज्ञानिक अध्ययन, पड़ोस अध्ययन, गवर्नेंस और राजनीतिक अध्ययन, आर्थिक अध्ययन, ऐतिहासिक और सभ्यता अध्ययन तथा मीडिया स्टडीज जैसे क्षेत्र शामिल हैं.

जानकारों के मुताबिक वीआईएफ देश और विदेशों से तमाम स्कॉलर्स और विषय विशेषज्ञों को अपने यहां कॉंफ्रेंस और लेक्चर्स के लिए आमंत्रित करता है, दिल्ली स्थित राजनयिक समुदाय के सामने भारत का दृष्टिकोण रखता है और उनकी सोच को जानने का प्रयास करता है जिससे भारत के राजनीतिक, सामरिक, आर्थिक और सांस्कृतिक हितों को मजबूत किया जा सके. संस्थान सामयिक महत्व के मुद्दों पर नीति निर्माताओं के साथ संवाद करता है. वह नीति संबंधी सुझावों को सरकार के नुमाइंदों, सांसदों, न्यायपालिका के सदस्यों तथा शीर्ष संवैधानिक और सिविल सोसायटी के सदस्यों को भेजता है. संस्थान देश-विदेश के विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों, रिसर्च सेंटरों, भारतीय और विदेशी थिंक टैंकों समेत तमाम शैक्षणिक और अकादमिक इदारों से विचारों के आदान-प्रदान हेतु संबंध स्थापित करता है.

सलाहकार बोर्ड के सदस्य और खुफिया संस्था रॉ के पूर्व प्रमुख आनंद वर्मा कहते हैं, ‘इस संस्था ने पिछले पांच-छह सालों में शानदार काम किया है. यहां विभिन्न क्षेत्रों में बहुत उच्च स्तर की रिसर्च हुई हैं. अनगिनत राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय महत्व के सेमिनार यहां आयोजित हुए हैं. और इसने विश्व भर के विभिन्न थिंक टैंक्स के साथ संवाद किया है. दुनिया के तमाम देशों के उच्च अधिकारी यहां बातचीत के उद्देश्य से आते रहते हैं. इनमें गैर-सरकारी लोगों के साथ ही विभिन्न देशों की सरकारों में महत्वपूर्ण पदों पर मौजूद लोग भी शामिल हैं. चूंकि थिक टैंक के अपने कुछ नियम होते हैं इस कारण बहुत सी चर्चाओं को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता.’

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आरएसएस समर्थक माने जाने वाले इस फाउंडेशन से नरेंद्र मोदी का संबंध काफी पुराना है. सूत्र बताते हैं कि बतौर मुख्यमंत्री, मोदी इस संस्था से आर्थिक एवं अन्य मसलों पर लगातार सलाह करते रहते थे. यही नहीं उन्होंने दिल्ली कूच करने की जब सोची तो उसकी विस्तृत रूपरेखा इसी संस्था में बनाई गई. वीआईएफ से जुड़े एक सदस्य कहते हैं, ‘मोदी जी का प्रधानमंत्री बनना तय था. इसलिए हम लोग बहुत पहले से ही विदेश नीति, रक्षा नीति से लेकर आर्थिक नीति समेत तमाम विषयों पर काम शुरू कर चुके थे. चुनाव प्रचार के दौरान भी मोदी जी को संस्था की तरफ से विभिन्न मसलों पर तमाम इनपुट्स मुहैया कराए गए थे. यही नहीं असम, अरूणाचल, जम्मू आदि में चुनाव प्रचार से लेकर चुनाव के समय बौद्धिक मैनेजमेंट का एक बड़ा हिस्सा संस्था की तरफ से ही किया गया था.’

संस्थान से जुड़े लोग बताते हैं कि नरेंद्र मोदी संस्था के काम से बहुत पहले से ही प्रभावित हैं. मोदी ही नहीं बल्कि भाजपा और संघ के तमाम नेता समय-समय पर विभिन्न विषयों पर संस्था से सलाह मशविरा करते रहे हैं.

नरेंद्र मोदी और वीआईएफ के बीच किस तरह का संबंध है उसका पता इस बात से भी चलता है कि जब कांग्रेस पार्टी के नेतृत्ववाली पिछली सरकार ने इशरत जहां मुठभेड़ मामले में नरेंद्र मोदी को घेरना शुरू किया उस वक्त मोदी के बचाव में बेहद मजबूती से फाउंडेशन के निदेशक अजित डोवाल आए थे. डोवाल ने मोदी का बचाव करते हुए कहा कि इशरत लश्कर-ए-तैय्यबा की सदस्य थी और सरकार बेवजह इस मामले का राजनीतिकरण कर रही है.

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जो सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर जा सकते हैं

पूर्व डीजी (डीआरडीओ) वीके सारस्वत बतौर मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार आर चिदंबरम की जगह ले सकते हैं. रॉ के पूर्व प्रमुख सीडी सहाय, पूर्व शहरी विकास सचिव अनिल बैजल, रूस में भारत के राजदूत रहे प्रभात शुक्ला, पूर्व वायु सेना प्रमुख एसजी ईनामदार और बीएसएफ के पूर्व प्रमुख प्रकाश सिंह भी जल्द महत्वपूर्ण पदों पर जा सकते हैं.

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लोकसभा चुनावों के पहले अरविंद केजरीवाल ने नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए उन्हें भ्रष्ट ठहराया और कहा कि गुजरात में कोई विकास ही नहीं हुआ है, वहां सिर्फ उद्योगपतियों ने अपनी जेबें भरी हैं. इसके बाद ‘कंसर्नड सिटिजन्स’ नामक एक ग्रुप अपनी अपील के साथ सामने आया. उनकी अपील को भाजपा नेता विनय सहस्रबुद्धे ने भाजपा कार्यालय से जारी किया. अपील में कहा गया था कि मोदी पर  नए राजनीतिक दल का आरोप पूरी तरह निराधार है. यह दल और उसके नेता लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से काम कर रहा है. ‘कंसर्नड सिटिजन्स’ नामक ग्रुप में जो बारह लोग शामिल थे उनमें अजित डोवाल के अलावा लेखक और टिप्पणीकार एमवी कामथ, एमजे अकबर, जम्मू-कश्मीर के पूर्व गवर्नर एसके सिन्हा, पूर्व नौकरशाह एमएन बुच तथा अर्थशास्त्री बिबेक देबोरॉय शामिल थे. जाहिर सी बात है कि मोदी के बचाव के लिए यह काम वीआईएफ की कोशिशों का ही नतीजा था.

ये तो मोदी के व्यक्तिगत स्तर पर समर्थन और बचाव करने के उदाहरण हैं. वीआईएफ ने पिछले सालों में सबसे बड़ा काम यूपीए (कांग्रेस पढ़ें) सरकार के खिलाफ माहौल बनाने का किया है. यूपीए-2 के कार्यकाल में कांग्रेस पार्टी और सरकार के खिलाफ जो आक्रामक माहौल बना उसे तैयार करने में फाउंडेशन की भी एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है.

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