साहस या मजबूरी?

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फोटो: प्रशांत रवि

16 मई को लोकसभा चुनाव परिणाम आने के साथ-साथ देश भर में भाजपा की भारी जीत की धूम मचने लगी थी. कांग्रेस व वामपंथी दलों समेत कई क्षेत्रीय क्षत्रप अपनी करारी हार के चलते चिंता में डूबे जा रहे थे. उधर, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जद यू के नेताओं की टकटकी लोकसभा चुनाव परिणाम के समानांतर ही एक दूसरे नतीजे पर भी लगी हुई थी. दरअसल वह बिहार में पांच विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के परिणामों का भी दिन था. लोकसभा में जदयू की 20 सीटों का दो तक सिमट जाना ही नीतीश और उनकी पार्टी को निराशा की गर्त में भेजने के लिए काफी था, लेकिन विधानसभा उपचुनाव के परिणाम तो जले पर नमक छिड़कने जैसे हो गए. जदयू पांच सीटों में से सिर्फ एक पर जीत सकी. लोकसभा चुनाव में बदतर प्रदर्शन को लेकर जदयू का कोई नेता बोलने की स्थिति में नहीं था. भाजपा से अलगाव के बाद और लोकसभा चुनाव करीब आने के पहले दिल्ली में मोदी और बिहार के लिए नीतीश ही सबसे फिट हैं, का जो मिथ गढ़ा या रचा गया था वह इस आंधी में भरभराकर बिखर गया.

रही-सही कसर अपनों ने पूरी कर दी. कल तक नीतीश के करिश्मे और चमत्कार के सहारे ही मोदी से लड़कर जंग जीतने का दम भरने वाले जदयू नेताओं के बयान पलटने लगे. जदयू के एक धाकड़ विधायक ज्ञानू सिंह ने कहा, ‘नीतीश कुमार में आत्मबल की कमी है. उनका यही रवैया रहा तो अगले विधानसभा चुनाव में भी पार्टी की लुटिया डूबेगी.’ चुनाव में चुप्पी साधे रहनेवाले ज्ञानू सिंह आगे बोले, ‘पांच-पांच टिकट कुशवाहा, यादव और मुसलमानों को देने की क्या जरूरत थी? ज्यादा से ज्यादा बाहर से आये दलबदलुओं को टिकट देने की क्या जरूरत थी?’

ज्ञानू सिंह का यह कहना सिर्फ हार से उपजी पीड़ा भर नहीं थी बल्कि वे सीधे-सीधे नीतीश कुमार की राजनीतिक समझ और रणनीति को चुनौती दे रहे थे. शाम तक अंदरखाने में यह बात तैरने लगी कि ज्ञानू सिंह ने नये अध्याय की शुरुआत कर दी है, अब इस अध्याय को बढ़ाने का सिलसिला कल से जारी होगा. जदयू से हाल में निकाले गए शिवानंद तिवारी जैसे नेता नसीहत देने लगे कि नीतीश को अब इस्तीफा दे देना चाहिए. नैतिकता के आधार पर नीतीश से इस्तीफा मांगनेवाले और लोग भी सामने आए. हवा में भाजपा के वरिष्ठ नेता सुशील कुमार मोदी की वह बात भी तैरने लगी जो उन्होंने कुछ दिनों पहले कही थी. मोदी ने कहा था कि जदयू के 50 से अधिक विधायक उनके संपर्क में हैं.

16 मई को जब यह सब हो रहा था और तमाम बातें एक-दूसरे से टकरा रही थीं तो नीतीश कुमार मौन साधे हुए थे. जदयू के नेता उनसे मिलने जा रहे थे, लेकिन उनमें से कइयों को बैरंग लौटना पड़ रहा था. शाम होते-होते बातें होने लगीं कि नीतीश फिर कोई चौंकानेवाला फैसला लेंगे. अगले दिन 17 को वह समय भी आ गया जब शाम को अचानक खबर फैली कि नीतीश ने राजभवन को अपना इस्तीफा भेज दिया है. लेकिन साथ ही यह भी सामने आया कि उन्होंने विधानसभा भंग करने की सिफारिश नहीं की है. नीतीश कुमार ने संक्षिप्त प्रेस कांफ्रेंस कर कहा कि वे हार की नैतिक जिम्मेवारी लेते हुए इस्तीफा दे रहे हैं. यह भी कि यह कदम सोच समझकर और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से सलाह लेने के बाद उठाया गया है. नीतीश कुमार अपनी ओर से अगर यह नहीं भी बताते तो भी सबको यह बात समझ में आ जाती कि उन्होंने यह फैसला सोच समझकर ही लिया होगा. सोचने समझने के लिए ही वे चुनाव परिणाम वाले दिन कोई प्रतिक्रिया देने, टिप्पणी करने या बयान देने से बचे होंगे. लेकिन असल सवाल यह है कि आखिर नीतीश कुमार ने इस्तीफा देने का रास्ता क्यों चुना. क्या वाकई नैतिक आधार पर ही या मजबूरी में एक आखिरी दांव खेलकर वे एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश कर रहे हैं?

नैतिकता के आधार पर नीतीश कुमार इस्तीफा दे सकते हैं. जानकारों के मुताबिक ऐसा फैसला करनेवाले नेता के तौर पर उन्हें माना जा सकता है, क्योंकि नरेंद्र मोदी के नाम पर भाजपा से अलग होने के जदयू के फैसले में सबसे अहम भूमिका उनकी ही थी. तब भी नीतीश कुमार जानते थे कि भाजपा से अलग होने और कांग्रेस का साथ नहीं मिलने के बाद उनकी स्थिति कमजोर होगी. इसके बावजूद उन्होंने तब यह फैसला लिया था. लेकिन 17 मई को नीतीश कुमार ने जिस तरह से अचानक इस्तीफे का ऐलान किया तो इसे लेकर तमाम तरह की बातें की जाने लगीं. मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने विधानसभा भंग करने की सिफारिश नहीं की तो यह माना गया कि यह एक तीर से कई शिकार करने की चाल भी है.

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