बेमौसम बारिश बर्बाद किसान

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इस इलाके में रवि की तरह बहुत से ऐसे किसान हैं जो पहले अच्छा खाते-पीते थे. लेकिन धीरे-धीरे इनकी जिंदगी बदलती गई. खासकर आर्थिक सुधारों के बाद से तो इनकी हालत बद से बदतर होती गई. बेरंग घर, पुराने कपड़े और जूते, बेरौनक त्योहार, बिना हो-हल्ले के शादी-ब्याह, स्कूल और कॉलेज छोड़नेवाले छात्रों की बढ़ती संख्या आदि कुछ ऐसे उदाहरण हैं, जो यहां के बदतर होते हालात को बताने के लिए काफी हैं. यही नहीं लोगों के खाने पीने की आदतों में भी भारी बदलाव आया है. बाजार से खरीदे जानेवाले भोज्य पदार्थों खासकर मांस की बिक्री में तो आश्चर्यजनक कमी आई है. इस इलाके के नौजवान नोएडा, दिल्ली जैसे बड़े शहरों में पलायन कर गए हैं, जहां बेहद कम वेतन पर असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे है.

बारिश और ओलावृष्टि ने किसानों की कमर तोड़कर रख दी है. ऊपर से केंद्र और राज्य सरकार की गड़बड़ नीतियों के चलते किसानों को सही मुआवजा मिलने की उम्मीद भी कम है

इसी इलाके के विष्णुनाथ त्यागी के अनुसार, ‘कोई भी सरकार आए, उनमें बिजली कम दरों पर देने की होड़ लगी रहती है, जबकि हमारे जिले में बिजली का आना किसी चमत्कार से कम नहीं है. यहां बिजली अपनी मर्जी से आती-जाती है. अगर बिजली आती भी है तो दस से पंद्रह मिनट के ब्रेक के साथ. हमारे यहां औसतन पूरे दिन में चार घंटे ही बिजली आती है. ऐसे में हम कब सिंचाई करें और कैसे करें, इसकी किसी को परवाह  नहीं है.’

दुष्चक्र में कैसे हुआ किसानों का प्रवेश

जब किसान समस्याओं में डूब गए तब परजीवी वर्ग के तमाम लोगों ने इस दयनीय हालत में उनका शोषण किया. अजीबोगरीब ग्रामीण सत्ता संरचना और किसानों की मजबूरी ने शोषण का अच्छा माहौल तैयार कर दिया है. परजीवी वर्ग में सार्वजनिक और दूसरे गैरसूचीबद्ध बैंकों के अधिकारी, साहूकार और ऋण दिलानेवाले दलाल शामिल होते हैं, जो किसानों को लोन दिलाने में मदद करते हैं. तहलका ने खुर्जा तालुक के फरन्ना गांव का दौरा किया जहां फसलों को काफी नुकसान पहुंचा था. यह गांव साहूकारों की महत्वपूर्ण उपस्थिति के लिए भी जाना जाता है. किसानों के एक समूह ने बताया, ‘बैंक किसानों के प्रति असंवेदनशील होते हैं. जब हमें जरूरत होती है तब वे हमें कर्ज नहीं देते हैं. इसलिए हमें साहूकारों से कर्ज लेने पर मजबूर होना पड़ता है. कई मामलों में वे कर्ज के बदले बहुत ज्यादा ब्याज लगाते हैं. ऐसे में कर्ज चुकाने के लिए गिरवी के रूप में जमीन ही रखनी पड़ती है. लेकिन अगर आपकों तुरंत पैसे की जरूरत होती है तो साहूकारों से संपर्क करने के अलावा कोई चारा नहीं होता है.

तब अगला तार्किक सवाल ये उठता है कि ये किसान सरकारी कर्ज योजनाओं जैसे- किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) का लाभ क्यों नहीं उठाते? केंद्र सरकार, आरबीआई और नाबार्ड की पहल पर शुरू किया गया केसीसी सामान्य बैंक ऋण पाने में देरी होने पर मददगार साबित होता है. नरेंद्र नाम के किसान ने बताया, ‘इस क्षेत्र के बैंक तब तक केसीसी जारी नहीं करते जब तक कि हम लोन दिलानेवाले दलालों से संपर्क कर बैंक अधिकारियों को कमिशन नहीं दे देते. कमीशन की सामान्य दर मूल राशि की 25 प्रतिशत होती है. अगर किसान को कर्ज जल्दी चाहिए तो यह दर और बढ़ जाती है. इसलिए सभी प्राकृतिक आपदाओं के बाद कमिशन की दर ज्यादा ही होती है. सभी बैंकों में प्रभावी राजनीतिक दलों से संपर्क रखनेवाले दलाल मौजूद रहते हैं. ये दलाल किसानों को बैंक मैनेजर से मिलने ही नहीं देते हैं और आप किसी तरह उनसे मिलने में सफल हो जाते हैं तो वे सलाह देते हैं कि हम दलाल से संपर्क कर लें.’

गांव के सीमांत किसान सत्येंद्र का अनुभव हमें गांवों में होने वाले भ्रष्टाचार का अमानवीय चेहरा दिखाता है. कुछ महीने पहले उन्होंने केसीसी के लिए आवेदन किया था. सबसे पहले वह पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) के अधिकारियों से मिलने गए. गांव में केसीसी की सुविधा यही बैंक देता है. वह बताते हैं, ‘मुझे मना करते हुए अधिकारियों ने दलालों से मिलने को कहा. मैं उनसे मिला तो उन्होंने कहा कि अगर मैं 50 प्रतिशत कमिशन देता हूं तो वे केसीसी का जुगाड़ कर देंगे. खेती के लिए मुझे तुरंत पैसों की जरूरत थी इसलिए मैंने उनकी शर्तों पर हामी भी दी और मुझे दो लाख रुपये का केसीसी मिल गया. मुझे कमिशन के रूप में एक लाख रुपये देने होंगे.’ अब मामले का क्रूर तथ्य ये है कि जब तक वह अपना कर्ज नहीं चुका देता तब तक उसे मूल राशि दो लाख पर बैंक को ब्याज देना होगा. इसके अलावा कर्ज की राशि का आधा कमीशन के रूप में अलग से चुकाना होगा. हाल ही में बेमौसम हुई बारिश की वजह से सत्येंद्र की आधी फसल बर्बाद हो गई है. इसलिए अब उसे केसीसी का कर्ज चुकाने के लिए साहूकारों से पैसा उधार लेना पड़ेगा. वास्तविकता ये है कि अब निकट भविष्य में वह इस दुष्चक्र से निकल नहीं पाएगा.

अजीबोगरीब ग्रामीण संरचना और किसानों की मजबूरी ने शोषण का अच्छा माहौल तैयार कर दिया है. गैरसूचीबद्ध बैंकों के अधिकारी, साहूकार और दलाल कमीशन लेकर किसानों को लोन दिलाते हैं फिर शोषण करते हैं

कोई भी इस क्षेत्र में ऐसे तमाम किसानों से आसानी से मिल सकता है, जिन्होंने दलालों को भारी-भरकम कमीशन देकर केसीसी लिया हुआ है. ऐसे में जिस किसान की फसल बर्बाद हो चुकी है या जो कीमतों में उतार-चढ़ाव के बाद कंगाल हो चुका है, उससे कमीशन लेने के लिए बैंक अधिकारी इतनी ‘उत्सुकता’ दिखाते हैं कि उसका शोषण करने से भी नहीं चूकते. इसी ‘उत्सुकता’ के चलते कुछ का हाल आम उपजानेवाले किसान सुधीर शर्मा की तरह हो जाता है. पड़ोस के गांव फतेखरोली के किसान सुधीर ने अपने खेत के आम के पेड़ से लटककर खुदकुशी कर ली थी. उनकी फसल बर्बाद हो चुकी थी और वह बैंक को कर्ज नहीं चुका सके थे. उनकी बेटी रश्मि ने बताया, ‘कर्ज के कारण मेरे पिता के साथ राजस्व अधिकारियों ने खुलेआम अमानवीयता की. आधिकारिक तौर पर सरकार ने भी इसे कृषि से संबंधित खुदकुशी नहीं माना.’ अब सुधीर की पत्नी को कर्ज चुकाने के लिए अपने मवेशियों और गहनों को बेचना पड़ेगा. उन्होंने साहूकारों से भी कर्ज लिया हुआ है. उन्होंने बताया, ‘साहूकार हमें विशेष परिस्थितियों में तीन साल के लिए कर्ज देते हैं. ब्याज के हिस्से के रूप में वे हमारे खेत की फसल ले लेंगे. इसलिए वर्तमान में हमारे पास कर्ज चुकाने के लिए कोई दूसरा जरिया नहीं है.’

उत्तर प्रदेश में इस तरह की समस्याओं से घिरे किसानों की आत्महत्याओं की कई घटनाएं हो चुकी हैं, जो अखबारों की सुर्खियां नहीं बटोर सकीं. गन्ना किसानों की समस्या और भी गंभीर है. भारत कृषक समाज के नेता अजय वीर झाकर कहते हैं, ‘केंद्र और राज्य सरकार की खराब नीतियों की वजह से गन्ना किसान ज्यादा परेशान हो रहे हैं. सरकारें अल्पकालिक लाभ पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं. गन्ना मिल मालिकों की एक शक्तिशाली लॉबी किसानों की ओर से पैदा किए गए राजस्व को बेईमानी से लेने पर तुली हुई है.’ हाल ही में आई आपदा में 97.29 लाख हेक्टेयर की फसल चौपट हो गई है.

उत्तर प्रदेश में बेमौसम बारिश की मार से जूझ रहे किसानों की आत्महत्या की कई घटनाएं देखने को मिली हैं. प्रदेश का बुंदेलखंड इलाका आत्महत्या की घटनाओं से सबसे ज्यादा प्रभावित है

अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय संयुक्त सचिव वीजू कृष्णन बताते हैं, ‘उत्तर प्रदेश में कृषि संबंधी समस्या को नवउदारवादी सुधारों और जलवायु परिवर्तन के बड़े राजनीतिक-आर्थिक परिदृश्य में देखा जाना चाहिए. उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों में बारिश के रूप में बरसी आपदा के बाद हमें देश में कृषि बीमा की हालत का आलोचनात्मक मूल्यांकन करना चाहिए. हम संपूर्ण जोखिम उठानेवाले कृषि बीमा की मांग कर रहे हैं, जो फसल बर्बाद होने और किसानों की कम आमदनी होने पर पूरी सुरक्षा दे. अभी नुकसान का आकलन तालुक या मंडल स्तर पर किया जाता है, जिसके कारण नुकसान से प्रभावित हुए वास्तविक किसान के नुकसान की प्रतिपूर्ति से इंकार कर दिया जाता है. बीमा सुरक्षा में सभी किसानों को, जिसमें पट्टेदार किसान और बंटाईदार भी हैं, शामिल किया जाना चाहिए. उत्तर प्रदेश, जो कृषि संबंधी गंभीर समस्या से गुजर रहा है, को एक व्यापक बीमा पैकेज देने की जरूरत है.

उत्तर प्रदेश के किसानों के बारे में कहा जा सकता है कि वे उन्नत सीमांतता (हाशिए की ओर) की दशा में हैं. समाज विज्ञानी इस दशा को एक समूह का व्यापक समाज से अलग-थलग पड़ना बताते हैं. वे इसे राज्य की ओर से उनके अधिकारों और जरूरतों की अनदेखी भी बताते हैं. मोदी सरकार की ओर से पास किए गए भूमि अधिग्रहण अध्यादेश ने उनसे सरकार की विरक्ति को और बढ़ा दिया है.

2 COMMENTS

  1. मौसम बारिश की मार से जूझ रहे किसानों की आत्महत्या की कई घटनाएं देखने को मिली हैं किसानों को केसीसी का कर्ज चुकाने के लिए साहूकारों से पैसा उधार लेना पड़ेगा

  2. कर्ज लेकर की थी खेती
    आत्मदाह की कोशिश करने वाले किसानों ने बताया कि उन्होंने बैंक से कर्ज लेकर खेती की थी। फसल के बर्बाद होने के बाद प्रशासन के कोई पदाधिकारी हाल पूछने भी नहीं पहुंचे। अभी तक नुकसान का सर्वे तक नहीं किया गया है। बारिश व ओला से गेहूं, चना, मक्का, आम, लीची और सब्जी की फसल बर्बाद हो गयी है। किसानों का बैंक से लिया गया कर्ज माफ हो। साथ ही मुआवजा भी मिले।

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