आम जनता की मांग नहीं है एकीकरण

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भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के एकीकरण की मांग में कोई गंभीरता नहीं है. आपने कहा कि लोहिया भी इस तरह की मांग करते थे लेकिन उनको मरे हुए भी 50 साल हो गए हैं. मैं भी राजनीतिक वातावरण देखता हूं. मुझे नहीं लगता कि यहां या पाकिस्तान में ऐसी कोई मांग है. कुछ लोग चाहते हैं कि ऐसा हो जाए, लेकिन इसमें कोई खास वजन नहीं है. यहां भी यह मांग किसी ने उठाई तो भाजपा ने या आरएसएस के आदमी ने, लेकिन कोई ऐसी बात नहीं है कि यह मांग आम जनता की है.

हम लोग भी सियालकोट (पाकिस्तान) से आए थे तो सोचा था कि आना-जाना रहेगा लेकिन नहीं हुआ. बड़े-बड़े गेट बन गए. लेकिन मैंने यह शुरू किया कि हर 14-15 अगस्त को मोमबत्ती जलाता हूं. यह इसलिए कि रोशनी तो शांति का संदेश है. यह इच्छा है कि वे लोग इधर आएं, हम उधर जाएं. अब दोनों दो मुल्क हैं. मैं नहीं चाहता था कि ये बंटवारा हो और धर्म के नाम पर यह जो लकीर पड़ी, यह बहुत बुरा हुआ. धर्म की वजह से यहां सरकार में मुस्लिम की कोई महत्ता नहीं रही. हालांकि वे 20 करोड़ के करीब हैं. यह सब शायद पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना ने नहीं सोचा था. हालांकि जब पाकिस्तान बन गया तो उसने यह जरूर कहा था कि अब तुम हिंदू-मुस्लिम नहीं रहे. लेकिन हिंदू-मुसलमान में काफी जहर फैल गया था कि हम अलग कौमें हैं. मजहब के बिना पर कौमियत का सवाल खड़ा हो गया था. लेकिन जब भी हम पाकिस्तान जाते हैं तो बहुत खातिर करते हैं. और हिंदुस्तानी उपमहाद्वीप के बाहर पाकिस्तानी और हिंदुस्तानी सबसे बड़े दोस्त हैं. क्योंकि एक ही जबान है, एक ही लिबास है, एक ही खाना-पीना है, लेकिन यह मांग कि सब लोग फिर से इकट्ठा हो जाएं तो यह मांग नहीं है कुछ लोगों की ख्वाहिश है. ये भाजपा वाले अखंड भारत की बात करते हैं जो कि हो नहीं सकता.

इस तरह की कोशिश सफल होने के लिए पहले लोगों को बदलना पड़ेगा. आज हिंदुस्तान में देख लीजिए कोई पाकिस्तान से आया हो तो उस पर शक की निगाह है. जो यहां आए, उनको कहा जाता है कि यह पाकिस्तानी है. यहां भी जरा-सी टेंशन होने पर मुसलमानों को कह दिया जाता है कि यह पाकिस्तानी है.

पाकिस्तानियों से हम नफरत-सी करते हैं. हिंदू-मुसलमान के बीच जो नफरत पनपी थी उसके बारे में यह धारणा थी कि पाकिस्तान बनने के बाद वह खत्म हो जाएगी, लेकिन वह खत्म नहीं हुई. यह सही है कि अब उतने फसाद नहीं होते, लेकिन फिर भी होते हैं. यूरोपियन यूनियन जैसा कोई संघ बना लेना संभव है, लेकिन जब लोग चाहेंगे. मेरा ख्याल है कि अंतत: वही होगा, जब तिजारत वगैरह सही तरीके से चलने लगे. लेकिन अभी तो हिंदुस्तान में ही किसी मसले पर एक राय नहीं हो पाती. एक-एक बिल पास होने में कितनी मुश्किल आती है. जीएसटी पर हम कितने समय से कोशिश कर रहे हैं. तो अगर हिंदुस्तान में ही एक प्रांत दूसरे प्रांत से एकमत नहीं है तो पाकिस्तान और हिंदुस्तान का एक हो जाना तो बहुत बड़ी बात है. 

मैं बहुत चाहता था कि बॉर्डर पर बहुत नरमी हो. लोग आए-जाएं. यह 1965 युद्ध तक रहा भी. लेकिन उस युद्ध के बाद तारबंदी और हदबंदी हो गई. दूसरे, हमारे यहां के लोगों में भी देखिए तो बहुत कम लोग हैं जो बराबरी पर विश्वास करते हैं. ज्यादातर तो यही सोचते हैं कि मैं बड़ा और वह छोटा. कश्मीर को लेकर भी सहमति नहीं बन पाई. अब कश्मीर का मसला लीजिए तो सहमति या शांति की स्थिति कहां से बनेगी. बात करनी है तो करते रहिए. कश्मीर में समस्या है कि जम्मू हिंदू बहुल है जो भारत के साथ आ जाएगा लेकिन कश्मीर के लोग अलग मुल्क चाहते हैं. वे पाकिस्तान के साथ भी नहीं जाना चाहते. अब हिंदुस्तान इस बात की इजाजत तो नहीं देगा कि उनकी सीमा पर एक और मुस्लिम देश बन जाए. हां, यह हो सकता है कि आज से 50 बरस बाद लोग सोचें और दोनों देशों के बीच आसानी से आना-जाना शुरू हो जाए. अभी तो आप आसानी से वीजा भी नहीं ले सकते. अब दोनों तरफ पढ़ाई, घरों का माहौल सब बदल गया है. अब हमारे यहां अतिवाद और कट्टरपंथ की वजह से मुसलमान को पाकिस्तान से जोड़ दिया जाता है. यहां कोई अस्थिरता की स्थिति हो तो मुसलमान आरोप झेलता है. अब यहां का मुसलमान अपने स्लम इलाके में ही खुश है. उसे डर लगता है. अब वह हिस्सा मांगने की जगह अपनी जान-माल की सुरक्षा भर चाहता है. जब तक कि हिंदू, जो इस देश में 80 फीसदी हैं, वे उसको विश्वास में लेकर मेनस्ट्रीम में लाएं, बाहर निकालें तो यह हो सकता है, लेकिन हिंदू इसके लिए तैयार नहीं है. कोई इक्का-दुक्का हो सकता है. हो सकता है कि समय बदले, यूरोप और पश्चिम के देशों की मिसाल देखकर लोगों को मन बदले, तो यह हो सकता है. लेकिन वे इकट्ठा नहीं होंगे. यह हो सकता है कि कोई कॉमन यूनियन बन जाए. 

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अभी नरेंद्र मोदी ने एक पहल की, वह अच्छी थी. पाकिस्तान में इसकी बहुत सराहना हुई. अब यह होना चाहिए कि बॉर्डर खुल जाएं, राशन कार्ड वगैरह दिखाकर लोग इधर आएं, उधर जाएं, यह हो सकता है, जैसा 65 के युद्ध तक था. लेकिन आज एकीकरण मुमकिन नहीं है क्योंकि आज भी यहां टायर फटता है तो कहते हैं पाकिस्तानियों ने बम चलाया. यही हाल उधर भी है. दूसरे, वहां किताबों में जो पढ़ाया जाता है वह नफरत से भरा है. हाल में तो हमने नहीं देखा लेकिन जब देखा था तब उनके यहां की किताबों में नफरत भरी थी. हमारे यहां शुरुआत में कुछ-कुछ ऐसा था, लेकिन बाद के वर्षों में बदल दिया गया. तो मेरे ख्याल है कि दोनों देश फिर से इकट्ठा हो जाएं, यह तो संभव नहीं है, लेकिन यह संभव जरूर है कि आपस में रिश्ते अच्छे हो जाएं, दोनों के कॉमन मार्केट हो जाएं. हालांकि इसमें भी बहुत देर लगेगी. पढ़ाई करनी पड़ेगी. आप बाहर जाएं तो देखेंगे कि दोनों आपस में बहुत अच्छे दोस्त हैं. मैं लंदन या अमेरिका गया तो जो सबसे बेहतर दोस्त हैं, हिंदू-मुसलमान दोनों ने मिलकर पार्टी दी. बाहर यहां के हिंदू-मुसलमान एक हैं.

मैं भी राजनीतिक वातावरण देखता हूं. मुझे नहीं लगता कि यहां या पाकिस्तान में ऐसी कोई मांग है. कुछ लोग चाहते हैं कि ऐसा हो, लेकिन इसमें कोई खास वजन नहीं है. हो सकता है समय बदले और कोई कॉमन यूनियन बन जाए

विभाजन के बारे में बात करें तो ज्यादा कसूर मुस्लिम लीग का ही था. लेकिन कांग्रेस में गड़बड़ियां थीं. जैसे मौलाना अबुल कलाम आजाद कांग्रेस में थे लेकिन उनको वह इज्जत नहीं मिली जो नेहरू या गांधी को मिलती थी. जब आजादी मिल गई तब तो मौलाना अबुल कलाम आजाद की बात तो कोई सुनता ही नहीं था. मैंने खुद देखा, मुसलमान जाते थे उनसे अपनी बात कहने. जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर उन्होंने एक तकरीर भी दी थी. बहुत अच्छी तकरीर थी. उन्होंने कहा, ‘जब मैंने बोलना चाहा तुम लोगों ने मेरी जबान काट दी. जब मैंने लिखना चाहा, तुम लोगों ने मेरे हाथ काट दिए. मैं तुमसे कहता रहा लेकिन नहीं सुना. अब तुम कहते हो कि हमें हिंदुओं के गलबे (प्रभाव) से डर है और हम अलग मुल्क चाहते हैं. अगर एक छोटा सा मुल्क ले लोगे तो बाकी हिंदुस्तान में हिंदू और बहुमत में हो जाएगा.’ और यही हुआ. जब तक्सीम हुई तो मुसलमान इसी तरफ ज्यादा थे, उस तरफ कम थे. मौलाना आजाद ने कहा था कि तक्सीम के बाद हिंदू कहेगा कि तुमने अपना हिस्सा ले लिया, अब जाओ उधर. और मुझे याद है, तक्सीम के बाद यही शुरू हो गया था. ये तो गांधी जी ने और नेहरू ने इसको बचा लिया. सरदार पटेल तो इससे तटस्थ थे. उस वक्त अगर गांधी, नेहरू न बचाते तो माहौल तो ऐसा बन गया था कि उनका तो अलग देश बन गया, अब उनको उधर जाना चाहिए. उन्होंने बचाया इसलिए क्योंकि जो स्वतंत्रता संघर्ष था कांग्रेस था, वह यह था कि हम ऐसा देश बनाएंगे जिसमें हिंदू और मुसलमान का फर्क नहीं रहेगा. तभी तो आज हमारा प्रशासन संविधान से चलता है. हम हिंदू राष्ट्र बन सकते थे, लेकिन नहीं. हमने हिंदू-मुसलमान को बराबर की नागरिकता दी. हमारा भी एक वोट और तुम्हारा भी एक वोट.

इस बराबरी के बावजूद मुसलमानों की स्थिति खराब रह गई क्योंकि अंतत: तो मसला अर्थव्यवस्था का है. अब मान लो कि एक इंजीनियर है. सरकारी नौकरियों में तो बहुत कंप्टीशन है, दूसरे नौकरियां कम हैं, उसे छोड़ दो. जाहिर है वह प्राइवेट सेक्टर की तरफ जाएगा. वहां ज्यादा हिंदू हैं. वह नौकरी मांगने जाता है तो नौकरी देने वाला नाम-पता पूछने के बाद कोई बहाना बना देता है. मुझे याद है कि मैं स्टेट्समैन का संपादक था. एक पत्रकार थे सईद नकवी साहब, वहां रिपोर्टर होते थे. वे एक स्कॉलरशिप के तहत बाहर गए हुए थे. वापस आए तो अचानक एक दिन आकर कहने लगे, ‘जी, मुझे कोई घर नहीं देता.’ मैंने कहा, ‘ये कैसे हो सकता है?’ मैंने पता किया तो पता चला कि सीधा तो नहीं पूछते कि मुसलमान हो कि हिंदू, लेकिन बाद में नाम वगैरह पता चलने पर कहते थे कि देखिए भाई आप लोग तो मांस-मछली वगैरह खाते हैं, हम लोग तो नहीं खाते. इस तरह का बहाना करके घर देने से मना कर देते थे. हमने स्टेट्समैन में ही उनको रेंट पर घर दिया. आप हमारी कॉलोनी देखिए, यह वसंत विहार है. इसमें एक भी मुसलमान का घर नहीं होगा. एक आदमी था मिनिस्ट्री में तो उसे घर मिला था. इधर एक-दो लोग किराये पर आए हैं.

समस्या यह हो गई है कि हमारे वक्त हिंदू-मुसलमान में सामाजिक संपर्क थे. घरों में आना-जाना, ईद-होली या त्योहारों पर. आज देखो तो यह बिल्कुल नहीं है. गांव में अभी भी यह दिखता है कि लोगों में आपसी संपर्क हैं. लेकिन शहरों में यह खत्म कर दिया गया है. भाजपा की इसमें प्रमुख भूमिका रही है क्योंकि उसकी जो विचारधारा है वह आरएसएस की विचारधारा है. वह विचारधारा ही हिंदू राष्ट्र की है.

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जो सांप्रदायिक अभियान चल रहा था, वह धीरे-धीरे जड़ों तक पहुंचा क्योंकि मोहम्मद अली जिन्ना ने अभियान शुरू कर दिया कि हिंदू और मुसलमान दो कौमें हैं. वे द्विराष्ट्र सिद्धांत लेकर आए. यह ठीक है कि वे जीत गए, लेकिन वह भावना लोगों के खून में रह गई. जब पाकिस्तान बन गया तब कहने लगे कि अब तुम हिंदू या मुसलमान नहीं हो, अब तुम या तो हिंदुस्तानी हो या पाकिस्तानी. लेकिन इसका अंजाम यह हुआ कि अंग्रेज गए तो हम एक-दूसरे पर झपटे. दस लाख लोग उस वक्त मारे गए थे.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

(अमित व कृष्णकांत से बातचीत पर आधारित)