इन बलात्कारों की सुनवाई कौन करेगा?

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किन्नरों और पुरुष यौनकर्मियों के बीच एचआईवी को लेकर जागरुकता फैलाने का काम करनेवाले मुंबई-स्थित संगठन ‘हमसफर ट्रस्ट’ की सलाहकार प्रबंधक सोनल गिनाई कहती हैं, ‘किन्नरों और पुरुष यौनकर्मियों के मामले में प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए राजनीतिक दबाव, मीडिया या वकीलों का दबाव बहुत मायने रखता है. उसके बिना ऐसा कर पाना मुश्किल है. अक्सर यह कहकर टाला जाता है कि यह मामला उनके इलाके में नहीं आता या फिर वे असंज्ञेय अपराध दर्ज कर या पीडि़त को ही दोषी ठहराकर मामले को दबाने की कोशिश करते हैं.’ वह आगे कहती हैं कि उनके संगठन के कर्मचारियों को भी साथ जाकर पुलिस में एफआईआर दर्ज कराने में मुश्किल होती है.

हाल ही में संशोधित बलात्कार विरोधी कानून में भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो इस समुदाय या पुरुष यौनकर्मियों को यौन हिंसा से बचाता हो.

बैंगलुरु में अधिवक्ता के रूप में काम करनेवाले गौतमन रंगनाथन पूछते हैं, ‘नालसा फैसले में जब हर व्यक्ति को अपनी लैंगिक पहचान का अधिकार दिया गया है, तो महिला किन्नर के मामले में आईपीसी की धारा 376 का इस्तेमाल हो सकता है. लेकिन पुरुष किन्नर क्या करेंगे जो अपनी पूरी जिंदगी इसी जद्दोजहद में निकाल देते हैं कि उनको स्त्री न समझ लिया जाए. क्या यौन हिंसा के मामलों में वे खुद को स्त्री बताकर मामला दर्ज कराएंगे?’

172वें विधि आयोग ने वर्ष 2000 में बलात्कार संबंधी कानूनों की समीक्षा करते हुए कहा था कि बलात्कार कानूनों को लिंग-निरपेक्ष बनाया जाना चाहिए ताकि न केवल महिलाओं को ही यौन हिंसा से सुरक्षा मिले बल्कि किन्नरों और पुरुषों को भी इसका लाभ मिल सके. निर्भया बलात्कार कांड के बाद गठित जस्टिस वर्मा समिति ने भी आयोग की इन बातों से सहमति जताई थी. बहरहाल इसके बावजूद मौजूदा कानून केवल महिलाओं को ही संरक्षण देता है.

मौजूदा परिदृश्य में सामाजिक कार्यकर्ता और वकीलों का कहना है कि मौजूदा बलात्कार कानूनों में ही एक धारा जोड़कर किन्नरों और पुरुष यौनकर्मियों को सुरक्षा प्रदान की जा सकती है या फिर उनके लिए एक अलग धारा बनाई जा सकती है.

आईपीसी की धारा 377 के तहत स्त्रियों के अलावा अन्य सभी तरह के यौन अपराधों को अप्राकृतिक अपराध करार दिया गया है. यह धारा भी इस समुदाय के यौन हिंसा से निपटने की राह में रोड़ा बनती है क्योंकि इसके तहत उनके यौनकृत्य अपराध की श्रेणी में आते हैं. यह वजह भी कई लोगों को पुलिस या चिकित्सक के पास जाने से रोकती है.

अक्टूबर 2013 में उड़ीसा के कोरापुट की एक किन्नर सीरत जब दुर्गापूजा पंडाल से कार्यक्रम करने के बाद लौट रही थी, तो रास्ते में एक कार में बैठकर शराब पी रहे पांच लोगों ने उसे रोका और उससे सेक्स की मांग की.

हाल ही में संशोधित बलात्कार विरोधी कानून में भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो इस समुदाय या पुरुष यौनकर्मियों को यौन हिंसा से बचाता हो

जब सीरत ने उनकी बात अनसुनी करके आगे बढ़ने का प्रयास किया, तो उन्होंने उसका पीछा कर उसे कार में खींच लिया. उसके साथ बलात्कार करने के बाद उसे फेंक दिया गया. उसे अस्थमा का अटैक आया और यौन हमले के कारण वह खून से लथपथ पड़ी रही. आखिर एक दोस्त उसकी मदद के लिए पहुंचा और उसे घर ले गया.

अगले दिन अस्पताल में वह चिकित्सकों को यह बताने की हालत में नहीं थी कि उसके साथ क्या हुआ है. जब चिकित्सक ने उसे कपड़े उतारने को कहा तो उसने इनकार कर दिया और केवल अपनी पैंट नीचे सरका दी. ऐसे में चिकित्सक ने उसके कपड़े उतारते हुए कहा कि तुम शरमा क्यों रहे हो, क्या तुम लड़की हो? नहीं न, तो फिर मर्द की तरह खड़े रहो. इसके बाद चिकित्सक ने उसकी टांगें फैलाकर उसके गुदा द्वार में अपनी तीन उंगलियां डालीं और इस तरह उसका चिकित्सकीय परीक्षण किया. उसके बाद वह तीन दिनों तक अस्पताल में भर्ती रही.

वहां से बाहर निकलने के बाद उसने पुलिस से संपर्क किया, लेकिन उसका दु:स्वप्न जारी रहा. पुलिस अधिकारी ने उससे पूछा कि क्या वाकई पुरुषों ने उसका बलात्कार किया? क्या वाकई उसके बदन से खून बहा? वे उसकी शिकायत दर्ज ही नहीं करना चाहते थे. सीरत कहती है, ‘मुझे लगा कि मैं उन पर मामला दर्ज करने के लिए और दबाव बनाऊंगी तो मेरे परिवार के सामने मेरी और बेइज्जती की जाएगी.’ दरअसल उसका परिवार उसकी लैंगिक पहचान से अवगत नहीं है.

मुंबई के स्वयंसेवी संगठन ‘स्नेहा’ के नीति एवं कार्यक्रम निदेशक नयरीन दारुवाला के मुताबिक, ‘पुलिस ऐसे मामलों से निपटते वक्त लैंगिकता से जुड़े मसलों को समझ पाने में नाकाम रहती है. बतौर स्वयंसेवी संगठन हमें उनको पूरी बात समझानी पड़ती है. प्राथमिक जांच एकदम सही हो, इसके लिए जरूरी है कि पुलिस और चिकित्सक दोनों संवेदनशील हों.’

मार्च 2014 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने आपराधिक यौन हमलों को लेकर एक राष्ट्रीय दिशा-निर्देश जारी किया है. स्वास्थ्य शोध विभाग और भारतीय चिकित्सा शोध परिषद के अलावा इस दिशा-निर्देश को चिकित्सा, फॉरेंसिक और कानूनी क्षेत्र के विशेषज्ञों ने मिलकर तैयार किया है. इनको उस दिशा-निर्देश के रूप में जाना जाता है जिसमें बलात्कार के मामलों में अंगुली से किया जाने वाला परीक्षण बंद किया गया.

बहरहाल, दिशानिर्देश इससे कहीं अधिक व्यापक हैं. इनके जरिए महिलाओं, बच्चों, किन्नरों के साथ होनेवाले तथा अन्य तमाम यौन अपराधों की जांच के लिए चिकित्सकों के लिए खास दिशा-निर्देश तय किए गए हैं.

दिशा-निर्देश में किन्नरों के साथ हुई यौन हिंसा से निपटने के क्रम में स्वास्थ्य पेशेवरों के बारे में कहा गया है कि वे अक्सर जीव विज्ञान और लैंगिक पहचान को लेकर उतने जागरुक नहीं होते, जिसकी वजह से समस्या होती है. दिशा-निर्देश में यह भी कहा गया कि किन्नरों या अन्य लिंगों के मामलों में समुचित लिंग निर्धारण हो तथा अन्य यौन विविधताओं को दर्ज किया जाए. इस दौरान पूरी गोपनीयता बरती जाए.

दिशा-निर्देशों में चिकित्सकों को भी शामिल किया गया है. उदाहरण के लिए उल्लेख किया गया है कि परीक्षण के दौरान किसी व्यक्ति के किन्नर या अन्य यौन पहचानवाला होने पर अक्सर माखौल उड़ाया जाता है, आश्चर्य जताया जाता है या फिर स्तब्धता या निराशा जताई जाती है. ऐसी प्रतिक्रिया यही बताती है कि संबंधित व्यक्ति का आकलन किया जा रहा है. यह बात उसे असहज कर सकती है. इसमें यह भी कहा गया है कि हमारा कानून लैंगिकता के आधार पर घृणा जताने वाले अपराधों को मान्यता नहीं देता, लेकिन फिर भी स्वास्थ्यकर्मियों के लिए यह अहम है कि वे पीडि़त की पूरी बातों को दर्ज करें. हमले को लेकर पीडि़त जो भी संभावित वजह बताता है, उसे दर्ज करें. अगर यह हमला लिंग के आधार पर किया गया है, तो उसे भी दर्ज करें.

मार्च से अब तक चार राज्यों यानी कर्नाटक, तमिलनाडु, मेघालय और उड़ीसा ने अपने यहां स्वास्थ्य कर्मियों को इस संबंध में निर्देश दिए हैं. स्वास्थ्य एवं अन्य सेवाओं से संबंधित जांच केंद्र से ताल्लुक रखनेवाली पद्मा देवस्थली कहती हैं, ‘स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी दिशा-निर्देश बहुत अहम हैं, लेकिन उसके साथ-साथ स्वास्थ्य-सेवा पेशेवरों को पर्याप्त प्रशिक्षण भी दिया जाना चाहिए.’

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