जोगी थे सो मिट गए, अब योगी का ही राज…

8
184

cover41-620x400

गोरखपुर, यानी एक ऐसा शहर, जिसे बचपन से ही जाना. गीताप्रेस के जरिए. गोरखनाथ मंदिर के जरिए. थोड़ा बड़े होने पर फिराक गोरखपुरी का अपना शहर होने की वजह से. चौरा-चौरी के क्रांतिकारियों की वजह से. क्रांतिकारी कवि और गीतकार गोरख पांडेय की वजह से भी. बलेस्सर के बिरहा के जरिए गोरखपुर को सबसे ज्यादा जाना. निक लागे टिकुलिया गोरखपुर के… जैसे गीत. हालिया वर्षों में गोरखपुर के साथियों द्वारा फिल्म फेस्टिवल की जो शुरुआत हुई है,  उस वजह से भी उस शहर से एक स्वाभाविक लगाव हुआ. गोरखपुर से ही सटे औरंगाबाद गांव के टेराकोटा आर्ट के शिल्पियों की कहानी भी सुनता रहा हूं. रहस्यमयी होकर बच्चों को कीड़े-मकोड़े की तरह मार देनेवाली बीमारी इंसेफलाइटिस की राजधानी के रूप में विकसित हुए गोरखपुर को भी जाना. वर्षों तक तिवारी और शाही के बीच चली मुठभेड़ के बहाने सवर्णों के दो गुटों के वर्चस्व की लड़ाई के जरिए भी गोरखपुर को जाना-समझा था. बाद में बाहुबली और चर्चित शूटर श्रीप्रकाश शुक्ला के कारण भी. लेकिन गोरखपुर इलाके से सबसे ज्यादा अनुराग वहां के जोगियों की वजह से था. उन्हें बचपन में अपने गांव में सारंगी लिए आते देखता और घंटो उनके गीतों को सुनते रहता था. अबकी बरस बहुरी नहीं अवना से लेकर केहू ना चिन्ही, माई ना चिन्ही, भाई ना चिन्ही… जैसे गीत. वैरागी मन से जीवन के मायने बतानेवाले जोगी गीत. उन जोगियों के गीत सुनते हुए मानस में गोरखपुर एक अलग तरीके से रचा-बसा रहा. हमेशा यही लगता रहा कि उस इलाके की आबोहवा का ही तो असर रहा होगा कि वहां से सिद्ध होकर या वहां सिद्ध होने की कतार में लगे जोगी जीवन के ऐसे गीत गाते हैं. उन जोगियों की वजह से बचपन से ही गोरखपुर की एक ऐसी तगड़ी पहचान रची-बसी मन में कि हालिया वर्षों में बार-बार वहां के एक दूसरे योगी की बात बार-बार आने पर भी लगता रहा कि यह नए योगी एक क्षणिक प्रवृत्ति की तरह हैं, गोरखपुर की प्रकृति के अनुकूल नहीं. नए योगी यानी गोरखपुर के सांसद योगी आदित्यनाथ, जो आए दिन सुर्खियों में रहते हैं. योगी का हालिया बयान, जो चर्चा में है और उसके पहले भी सुने गये बयानों के बावजूद लगता है कि यह महज एक व्यक्ति के खुराफाती मगज की उपज है.  शहर के बारे में इन बातों से धारणा बदलना ठीक नहीं. लेकिन तीन सितंबर को प्रेस क्लब एसोसिएशन के शपथ ग्रहण समारोह के बहाने पहली दफा गोरखपुर जाने पर धारणा बदली.

योगी और उनकी हिंदू वाहिनी सेना के लोग हर रोज इंतजार करते रहते हैं कि कहीं भी हिंदू-मुस्लिम विवाद के नाम पर कोई मसला आए तो वे तुरंत जाकर वहां अपनी उपस्थिति दर्ज करवा दें

गुरू गोरखनाथ की परंपरा के अनुयायी और निकट भविष्य में गोरखनाथ मंदिर के प्रमुख बन जाने को तैयार और साथ ही भाजपा के बहुचर्चित सांसद आदित्यनाथ के बारे में जानकर तो धारणा बदली ही, उनके कृत्यों और कारनामों पर शहर की चुप्पी पर भी.

जिस दिन गोरखपुर पहुंचे, उस दिन वहां के सभी अखबारों में योगी आदित्यनाथ की बड़ी-बड़ी तसवीरें छपी थीं. बिजली को लेकर सड़क पर प्रदर्शन करते हुए. मालूम हुआ कि योगी आदित्यनाथ को बस यही और एक दूसरा काम करना आता है. बात-बेबात धरना-प्रदर्शन और जरा-सी बात पर जहरीले बयान देकर एक खौफ का माहौल बना देना. आदित्यनाथ के बारे में जानकारी लेने की कोशिश करते रहे, गोरखनाथ मंदिर के राजनीतिक वर्चस्व के बारे में पता चला. मालूम हुआ कि आजादी के बाद से चार-पांच मौके छोड़ दें तो ज्यादातर समय वहीं की संसदीय राजनीति में गोरखनाथ मंदिर का ही कब्जा रहा है. कभी हिंदू महासभा के जरिए तो बाद में भाजपा के जरिए. गोरखपुर में साथियों से पूछा कि जब आदित्यनाथ बोलते हैं तो देश भर में बवाल मचता है, गोरखपुर में क्या होता है! जवाब मिला- कुछ नहीं होता! होगा क्या? एक बड़ा खेमा है जो खुश हो लेता है कि उसका सांसद ऐसा है, जिसकी चर्चा देश भर में होती है और एक खेमा है जो आपस में ही बतकही कर के अपना दायित्व पूरा कर लेता है. गोरखपुर में हर कोई जानता है कि योगी आदित्यनाथ कभी भी, कुछ भी बोल सकते हैं. इसे ऐसे भी कह सकते हैं पिछले तीन बार से वे बोलकर ही सांसद बनते रहे हैं. सिर्फ एक बार को छोड़ दें तो उन्हें कभी तगड़ी चुनौती नहीं मिली. गोरखपुर में ही मालूम हुआ कि यहां जरा-जरा सी बात पर यदि हिंदू-मुसलमानों के बीच कुछ हो जाए तो मुसलमानों को धमकाया जाता है. घुड़की यही होती है कि हमारी बात नहीं मानोगे तो जाते हैं कल योगी जी के दरबार में. शहर के आम लोग बताते हैं कि योगी और उनकी हिंदू वाहिनी सेना के लोग, जिसका गठन योगी ने एक बार चुनाव में क़ड़ी चुनौती मिलने के बाद किया था, हर रोज इंतजार करते रहते हैं कि कहीं भी हिंदू-मुस्लिम विवाद के नाम पर कोई मसला आए तो वे तुरंत जाकर वहां अपनी उपस्थिति दर्ज करवा दें.

8 COMMENTS

  1. सारी दूरी हिन्दू युवा वाहिनी ने ही बढाई है? और तेरे अब्बू मुसलमान तो बिलकुल भेड के बच्चे की तरह मासूम हैं

  2. kia jaha ki M. P Shiri yogi ji nahi hi ya hindu youa wahni nahi hi waha par hindu samaj aasurakhchhit hi…. (nirala ji aap true likhte rahe thanx)

  3. Nepal ke border par basa gorakhpur aaj agar surakshit hai to kewal Hindu yuva vahini ke karan, nahi to kabhi ka ISI ka headquarter ban gaya hota

    • Nirala ji aaj Jo lekh likh rahe hain woh kewal Hindu rashtra mein rahne ki wajah se hi sambhav hai, pak mein me kattaron ke agst koi lekh likha hota to 160/- kg ke hisab se bik gaye hote aagle hi din

  4. abey nirala wo baki sab nausikhiy or ghag reporter sirf fame k liy jo yogi aadityanath or hindu vahini par kechad fakney wala jab tumhare ye shantidoot (tumhare abbu) tumhari hi betio ko utha le jayenge tab rote huay aaoge ……thooo tum sab fame k bhuke jalil kutto par

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here