जेट के जमाई

एक जोड़े को हवाई जहाज के इकॉनोमी क्लास में दिल्ली से लंदन आने जाने के लिए करीब एक लाख रुपए तक खर्च करना पड़ता है. लेकिन मनोज मालवीय इतने ही खर्च में पिछले कुछ सालों के दौरान दुनिया भर की 28 खूबसूरत जगहों की सैर कर चुके हैं.

पश्चिम बंगाल कैडर के 1986 बैच के आईपीएस अधिकारी मालवीय ने ये यात्राएं उस दौरान की जब वे नागरिक उड्डयन सुरक्षा ब्यूरो (बीसीएएस) में प्रतिनियुक्ति पर थे. उन्होंने कथित रूप से अपने पद और प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए निजी विमान कंपनियों की घरेलू व अंतरराष्ट्रीय उड़ानों का जमकर लाभ उठाया और मुफ्त में दुनिया भर की सैर की. जिन उड़ानों पर मालवीय ने मात्र एक लाख रुपये खर्च किए उनका वास्तविक खर्च करीब छह करोड़ रुपये होता है.

निजी विमान कंपनी जेट एयरवेज द्वारा मुफ्त में हवाई सैर कराने के इस मामले की पड़ताल जब तहलका ने शुरू की तब एक ऐसी कहानी सामने आई जिसमें उड्डयन विभाग के तमाम अधिकारी और नेता लिप्त थे. पड़ताल से सामने आए पूरे आंकड़ों के सामने मुफ्त उड़ान का लुत्फ लेने वाले मालवीय बहुत छोटे खिलाड़ी सिद्ध हुए. पिछले कई साल से नागरिक उड्डयन मंत्रालय और नागर विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) के उच्च अधिकारी, वीआईपी और राजनेता अपनी हैसियत का दुरुपयोग कर निजी विमान कंपनियों से मुफ्त हवाई सैर का फायदा उठाते आ रहे हैं. उनकी इस शाहखर्ची की कीमत कई करोड़ रुपए में है.

जाहिर है, जब ये निजी विमान कंपनियां इन लोगों पर मुफ्त सेवाओं की बरसात कर रही हैं तो बदले में उड्डयन विभाग की नियामक संस्थाओं के ये वरिष्ठ अधिकारी भी इन विमान कंपनियों को किसी न किसी तरह का लाभ पहुंचाते होंगे. जैसे एक उदाहरण विदेशी लायसेंसधारक पायलटों की नियुक्ति को विस्तार देने से भी जुड़ा है ( बॉक्स- इस हाथ दे, उस हाथ  ले ).

jet_airwaysइस हाथ दे, उस हाथ ले

निजी एयरलाइन कंपनियां उड्डयन विभाग के कर्मचारियों को हमेशा खुश रखना चाहती हैं. इसकी एक वजह ‘फाटा (फॉरेन एयरक्रू टेंपरेरी अथॉराइजेशन)’ भी है. इस प्रावधान के तहत उड्डयन विभाग भारतीय एयरलाइन कंपनियों में विदेशी लाइसेंसधारी पायलटों को एक निश्चित समयावधि के लिए काम करने की अनुमति देता है. इसे फाटा एक्सटेंशन कहा जाता है. अगस्त में नागरिक उड्डयन मंत्री जीएम सिद्धेश्वरा ने राज्यसभा में जानकारी दी थी कि भारतीय एयरलाइनों में कुल 277 विदेशी पायलट काम कर रहे हैं और जेट एयरवेज में इनकी संख्या (121) सबसे ज्यादा है. तहलका के पास जेट एयरवेज के अध्यक्ष नरेश गोयल की चीफ एग्जिक्यूटिव असिस्टेंट जेनिफर डीसिल्वा और उनके जनसंपर्क विभाग के कर्मचारियों के बीच हुए मेल हैं. जेनिफर एक जुलाई, 2013 के एक मेल में रागिनी (चोपड़ा) और विनोद (सरीन) को लिखती हैं.

प्रिय रागिनी/विनोद,
‘हमें यह बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि कुछ महीनों पहले डीजीसीए ने फाटा के तहत हमें एक्सटेंशन दिया है. हमें यह आश्वासन भी दिया गया था कि इस बारे में लिखित में कुछ दिया जाएगा. मैंने श्री विनोद सरीन को कई बार फोन किए और रिमाइंडर भेजे लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया. हर बार यह बताया गया कि यह 2/3 दिन या अगले हफ्ते तक हो जाएगा….हमें मौखिक रूप से अनुमति दी गई थी और हम बस यह चाहते हैं कि लिखित रूप से इसकी पुष्टि कर दी जाए. क्या यह मुमकिन है? या हमें फिर से डीजीसीए और बंबई एयरपोर्ट के संबंधित अधिकारियों से मीटिंग करने की जरूरत है?’

सरीन ने उसी दिन जवाबी मेल लिखा, ‘… मैं शुक्रवार, 28 जून को डीजीसीए में ही था. मुझे यह बताया गया कि फाइल को वापस उड्डयन मंत्रालय भेजा गया है ताकि पत्र की भाषा में कुछ जरूरी बदलाव किए जा सकें. मैं आज मंत्रालय गया था और वहां बताया गया कि जेट एयरवेज को जरूरी अनुमति के लिए नया वाला पत्र डीजीसीए को कल तक भेजा जाएगा.’

एक हफ्ते बाद सरीन ने जेनिफर को सरकारी आदेश की एक प्रति भेजी जिसमें फाटा एस्टेंशन को 31 दिसंबर, 2016 तक बढ़ाए जाने की अनुमति दी गई थी. दिलचस्प बात है कि यह सूचना डीजीसीए की वेबसाइट पर बाद में आई. अप्रैल, 2013 में जेट एयरवेज के पायलटों के संगठन नेशनल एविएटर्स गिल्ड (नैग) ने तत्कालीन उड्डयन सचिव केएन श्रीवास्तव को एक पत्र लिखकर जेट एयरवेज को मिले फाटा एक्सटेंशन से जुड़ी अपनी चिंताएं जाहिर की थीं. उस समय जेट एयरवेज 100 विदेशी पायलटों को एयरलाइन में लाने की कोशिश कर रही थी. नैग के पत्र में साफ-साफ कहा गया था कि भारत में कमर्शियल लाइसेंसधारी पायलट पर्याप्त संख्या में हैं और उनकी संख्या 5000 से ज्यादा है. जेट एयरवेज के पायलटों को तब इस बात की जरा भी भनक नहीं होगी की जिस समय वे श्रीवास्तव को पत्र लिख रहे थे उसी समय उनकी पत्नी साधना नई दिल्ली से सिंगापुर जा रहे जेट एयरवेज की प्रीमियर क्लास की टिकट पर मुफ्त में यात्रा कर रही थीं. तहलका को मिले दस्तावेज बताते हैं कि नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अधिकारियों में श्रीवास्तव ने ही जेट एयरवेज का सबसे ज्यादा फायदा उठाया है. ऐसे में यह समझना मुश्किल नहीं है कि आखिर क्यों एयरलाइन कंपनियां सरकारी अधिकारियों को खुश रखती हैं.

साल 2013 की शुरुआत में सीबीआई ने मुफ्त हवाई टिकटों के दुरुपयोग के मामले की जांच शुरू की थी. इससे पता चला कि डीजीसीए के अधिकारी कथित तौर पर नियमों में मौजूद खामी का धड़ल्ले से गलत फायदा उठा रहे हैं.

एयरोनॉटिकल सूचना परिपत्र (एआईसी) – 2/1978 के मुताबिक भारत में पंजीकृत हर विमान ऑपरेटर या विमान मालिक को अपने विमान में एक सीट महानिदेशक की अनुशंसा पर नागरिक उड्डयन विभाग के अधिकारियों को आधिकारिक कामकाज के लिए मुफ्त में उपलब्ध करानी होगी. वर्ष 2012 में इस नियम को बदल दिया गया. इसके जरिए अनुशंसा करने का अधिकार अब महानिदेशक के अलावा दूसरे अधिकारियों को भी मिल गया. नियमों में यह बदलाव संभवतः केंद्रीय सतर्कता आयोग द्वारा मुफ्त टिकटों के दुरुपयोग के मामले की जांच शुरू करने के कारण किया गया था.

मनोज मालवीय वर्तमान में बंगाल में एडीजीपी (वन) के पद पर कार्यरत हैं. वे उन लोगों में शामिल हैं जिनके खिलाफ सीबीआई की जांच चल रही है.

तहलका के पास निजी विमान कंपनी जेट एयरवेज की आंतरिक सूचनाओं के आदान-प्रदान से जुड़े दस्तावेज मौजूद हैं. इन दस्तावेजों में नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अधिकारियों, नौकरशाहों, राजनेताओं और विशिष्ट लोगों के नाम और कितनी बार उन्होंने अपने परिवार और साथियों के साथ एयलाइन से मुफ्त उड़ान भरी, उसका खुलासा होता है.

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इस सूची में सबसे महत्वपूर्ण नाम रॉबर्ट वाड्रा का है. सोनिया गांधी के दामाद और करोड़पति व्यवसायी वाड्रा को के अनुरोध पर नई दिल्ली से लंदन और वहां से दिल्ली रूट पर यात्रा करने के दौरान कम से कम आठ बार उनके इकॉनमी क्लास के टिकट को प्रथम श्रेणी में अपग्रेड किया गया. अंतिम बार बीते अक्टूबर  में उनका टिकट अपग्रेड किया गया था.

नई दिल्ली-लंदन रूट पर इकॉनमी क्लास का रिटर्न टिकट 78,090 रुपये में आता है जबकि फर्स्ट क्लास का किराया 3,09,560 रुपए है. अपनी हैसियत का दुरुपयोग करते हुए वाड्रा और उसके सहयोगी मनोज अरोड़ा ने बार-बार इकॉनमी क्लास के टिकट को प्रथम श्रेणी के टिकट में अपग्रेड करवाया.

जेट एयरवेज की आंतरिक सूचनाओं से इस कंपनी में वाड्रा के रसूख और असर का पता चलता है. कंपनी में ऊपर से लेकर नीचे तक उनकी हैसियत किसी भी संशय के परे थी.

वैसे तो एक प्राइवेट एयरलाइन के पास अपने विवेक के आधार पर किसी भी व्यक्ति को उच्च श्रेणी में अपग्रेड करने का अधिकार है. लेकिन जब वह व्यक्ति रॉबर्ट वाड्रा हों तो ‘विवेक’ की बात शायद सबसे आखिर में आए. दरअसल वाड्रा के जो फायदा पहुंचाया गया उससे साफ होता है कि वह उनकी  राजनीतिक हैसियत और तंत्र को प्रभावित करने की उनकी क्षमता को देखते हुए किया गया. जिस तत्परता के साथ जेट एयरवेज का स्टाफ वाड्रा के लिए प्रथम श्रेणी का टिकट जारी कर रहा था और जिस तरीके से उनके सहयोगी जेट ऑफिस के वरिष्ठ अधिकारियों को फोन कर रहे थे उससे पता चलता है कि जितना सामने दिख रहा था उससे कहीं ज्यादा चीजें छुपी हुई थीं.

विनोद सरीन (वाइस प्रेसिडेंट, कॉर्पोरेट कम्यूनिकेशन, जेट एयरवेज) और जेनिफर डी सिल्वा (जेट एयरवेज के मालिक नरेश गोयल की चीज एग्जिक्यूटिव असिस्टेंट) के बीच हुए एक ई-मेल के आदान-प्रदान से पता चलता है कि वाड्रा हमेशा ही इकोनॉमी क्लास की टिकट खरीदते थे और फिर उसे प्रथम श्रेणी में अपग्रेड कर दिया जाता था. इसके साथ ही उन्हें मीट एंड असिस्ट सर्विसेज (एमएएएस) जैसी विशिष्ट सुविधा भी यात्रा के दौरान उपलब्ध करवाई जाती थी.

एक मेल में सरीन लिखते हैं, ‘अतीत में भी वाड्रा इकोनॉमी क्लास की टिकट खरीदते रहे हैं, जिन्हें बाद में प्रथम क्षेणी में अपग्रेड कर दिया जाता था.’ इसके जवाब में जेनिफर लिखती हैं ‘तुम तीनों लोगों के साथ काम करना बहुत ही मुश्किल है. राज की बातों से जो मुझे समझ आया उसके मुताबिक इस टिकट को प्रथम श्रेणी में अपग्रेड करने का निवेदन शिवनंदन की तरफ से आया था और उन्होंने इसे कर भी दिया. हमारे दफ्तर में वे (रॉबर्ट वाड्रा) हर बार किसी तीसरे व्यक्ति से बात क्यों करते हैं?’  एके शिवनंदन जेट एयरवेज में जनसंपर्क विभाग के वाइस प्रेसीडेंट हैं.

वाड्रा लंदन यात्रा का प्रथम श्रेणी का टिकट खरीदने में सक्षम हैं तो फिर उनका ऑफिस टिकट अपग्रेड के लिए जेट एयरवेज के पास बार-बार निवेदन क्यों भेजता है. उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि जेट एयरवेज उनकी मांग बार- बार पूरी क्यों करता है?

अपने बचाव में वाड्रा आसानी से दावा कर सकते हैं कि वे एक आम नागरिक हैं और इस तरह की मांग कर सकते हैं लेकिन नागरिक उड्डयन विभाग के अधिकारियों को इस तरह का कोई भी लाभ लेने की स्पष्ट मनाही है. इसके बावजूद मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी जेट एयरवेज से हर तरह की सुविधाएं लेने से खुद को रोक नहीं पाए.  ईके भारत भूषण (पूर्व प्रमुख डीजीसीए), केएन श्रीवास्तव ( पूर्व सचिव, नागरिक उड्डयन मंत्रालय), ललित गुप्ता (संयुक्त महानिदेशक, डीजीसीए) और वीपी अग्रवाल (एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष) जैसे अधिकारी इस मुफ्त की हवाई सैर में शामिल हैं.

अपनी जांच के दौरान सीबीआई ने जेट एयरवेज के नाम 10 जून, 2013 को एक मेल लिखा. इसका रेफरेंस नंबर पीई 6(A)/2012-डीएलआई है. मेल में पूछा गया था कि क्या सरकारी अधिकारियों ने 2009 से 2012 के बीच डीजीसीए के निवेदन पर मुफ्त टिकट जैसी कोई सुविधा हासिल की है? इसके जवाब में शिवनंदन ने 20 जून, 2013 को एक पत्र लिख कर सीबीआई को बताया कि उनकी कंपनी ने इस तरह का कोई मुफ्त टिकट किसी सरकारी अधिकारी को जारी नहीं किया है. जेट की तरफ से दी गई यह जानकारी पूरी तरह गलत है. तहलका को मिले ई-मेल इसके उलट कहानी बयान करते हैं. इसी तरह के एक मेल में जेनिफर, रागिनी चोपड़ा (जेट एयरवेज में कॉर्पोरेट कम्यूनिकेशन की वरिष्ठ अधिकारी) और सरीन से पूछती हैं, ‘ विनोद ने सरकारी अधिकारियों के लिए जो मांग की है उसके बारे में क्या राय है?… इस समस्या से अब तुम दोनों लोग ही निपटो.’

यह बहुत सामान्य बात है कि जिन अधिकारियों को मुफ्त टिकट की जरूरत होती है वे आधिकारिक तरीके से इसका आवेदन नहीं करते हैं. जेनिफर के मेल से यह बात साबित होती है कि जेट एयरवेज सरकारी अधिकारियों को इस पूरी समयावधि में मुफ्त के टिकट जारी करता रहा. जेनिफर और गोरांग शेट्टी (सीनियर वाइस प्रेसिडेंट, कमर्शियल) ही यात्रा से संबंधित आवेदन को स्वीकृत करने के लिए अधिकृत हैं.

तहलका के पास मौजूद ई-टिकट से साबित होता है कि भारत भूषण और उनके नौ करीबी लोगों ने 21 मार्च, 2012 को अमृतसर से नई दिल्ली की यात्रा जेट एयरवेज में मुफ्त के टिकट पर की. भुगतान की रसीद पर ‘एकाउंट्स 9w’ लिखा था. इसका मतलब होता है कि टिकट का मूल्य सभी कर सहित जेट एयरवेज ने वहन किया है.

भूषण और उनका परिवार अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर घूमने गया था. इस यात्रा से वापसी के दौरान नई दिल्ली की यात्रा के लिए जेट एयरवेज के सीईओ ने इन मुफ्त टिकटों की व्यवस्था की थी (टिकट पर दर्ज विवरण के मुताबिक).

भूषण वर्तमान में केरल के मुख्य सचिव के पद पर कार्यरत हैं. इनकी छवि एक ईमानदार अधिकारी की है. और कहा जाता है कि इन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान नागरिक उड्डयन मंत्रालय को साफ-सुथरा बनाने की कोशिशें की थी. बाद में जब अजित सिंह नागरिक उड्डयन मंत्री बने तब उन्हें डीजीसीए के प्रमुख पद से हटा दिया गया.

हवा हवाई सुरक्षा

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एयरलाइन कंपनियां मनोज मालवीय की नाराज करने का खतरा मोल नहीं ले सकती थीं. मालवीय उड्डयन विभाग में सुरक्षातंत्र संभालने वाले उच्चाधिकारी रहे हैं और उनके पास रूट तय करने के साथ ही इतने अधिकार हैं कि वे किसी भी एयरलाइन कंपनी की नाक में दम कर सकते थे. जाहिर है कि मालवीय को यह भी पता था कि यह ताकत कंपनियों से फायदा उठाने के लिए पर्याप्त है. सीबीआई के मुताबिक तत्कालीन नागरिक उड्डयन सुरक्षा ब्यूरो (बीसीएएस) के अतिरिक्त आयुक्त मालवीय ने 2005 से लेकर 2010 तक अपने परिवार को लेकर दुनिया भर में 28 यात्राएं की थीं. कहा जा रहा है कि इन यात्राओं के टिकट की कुल कीमत करीब छह करोड़ रुपए होती है लेकिन उन्होंने इसके बदले सिर्फ एक लाख रुपये चुकाए. आईपीएस अधिकारी रहे मालवीय प्रतियुक्ति पर नागरिक उड्डयन विभाग में सेवाएं दे रहे थे. बाद में उन्हें पश्चिम बंगाल भेज दिया गया जहां वे अब एडीजीपी (वन विभाग) हैं. फिलहाल मालवीय के खिलाफ सीबीआई जांच चल रही है.
तहलका के पास जेट एयरवेज के कॉर्पोरेट कम्यूनिकेशन विभाग के उपाध्यक्ष विनोद सरीन के मेल हैं. इनसे पता चलता है कि कैसे मालवीय और उनके परिवार को मुफ्त की हवाई सैर करवाई गई है. 22 सितंबर, 2009 को सरीन ने अपनी सहयोगी प्रेमिला कांगा को एक मेल लिखा था :

डियर मैडम,
श्री मनोज मालवीय को आईसीसीओ मीटिंग के लिए एक आधिकारिक यात्रा पर मॉन्ट्रियल जाना है. साथ में उनका परिवार भी होगा. उन्होंने मुझे सहयोग करने के लिए फोन किया था और इसलिए हम उन्हें कुछ टिकट दे रहे हैं. टोरंटो- मॉन्ट्रियल-टोरंटो की एक टिकट की कीमत 27 हजार रुपये है और ये चार (पत्नी और तीन बच्चे) लोग हैं. मैडम मैं आपकी अनुमति चाहता हूं जिससे कि टोरंटो- मॉन्ट्रियल-टोरंटो के बीच उनकी यात्रा के लिए एयर कनाडा से टिकट लिए जा सकें या फिर आप हमारे टोरंटो ऑफिस से टिकट के लिए कह दें, वहां टिकट सस्ती मिल सकती हैं.’

25 मार्च, 2010 को जेट एयरवेज के मुख्य सुरक्षा अधिकारी लेफ्टिनेंड कर्नल जोती शंकर ने सरीन को एक मेल किया :

डियर मि. सरीन,
जैसी कि हमारी चर्चा हुई थी, नागरिक उड्डयन सुरक्षा ब्यूरो (बीसीएएस) के अतिरिक्त आयुक्त श्री मनोज मालवीय ने एम्सटर्डम में दो रातों (27 और 28 मार्च, 2010) के लिए किसी होटल में कमरा बुक करने का निवेदन किया है लेकिन ये बुकिंग किसी अलग नाम से की जानी है. उन्होंने ब्रुसेल्स से एम्सटर्डम तक के लिए एक वाहन की व्यवस्था करने का भी निवेदन किया है.’

नागरिक उड्डयन विभाग के भ्रष्ट सुरक्षा अधिकारी और उनका साथ देने वाले एयरलाइन के कर्मचारियों की मिलीभगत से एयरलाइनों का सुरक्षातंत्र खतरे में पड़ गया है. 2011 और इस साल जून के बीच 100 से ज्यादा पायलट उड़ानपूर्व परीक्षण में नशे की हालत में पाए गए. इनमें सबसे ज्यादा संख्या (28) जेट एयरवेज के पायलटों की है. इसके बाद इंडिगो और स्पाइसजेट (दोनों के 17) के पायलट दोषी पाए गए.

दो साल पहले बीसीएएस की एक ऑडिट रिपोर्ट से पता चला था कि कैसे मेट्रो शहरों के अतिरिक्त अन्य जगहों पर बने हवाई अड्डों की सुरक्षा व्यवस्था में गंभीर खामियां हैं. जांच में पाया गया था कि इन हवाई अड्डों की एक्स-रे मशीनें और मेटल डिटेक्टर काम लायक नहीं थे. बहुत से हवाई अड्डों पर विस्फोटक जांच के उपकरण भी नहीं थे.

बीसीएएस का वरिष्ठ अधिकारी होने नाते इन सुरक्षा चूकों की जिम्मेदारी मालवीय की भी बनती है. लेकिन वह अधिकारी जिसका परिवार मुफ्त में हवाई यात्रा करता हो आखिर कैसे इन गंभीर खामियों पर कड़ी कार्रवाई कर सकता है? ऐसे गठजोड़ों से कई सवाल खड़े होते हैं. जैसे निजी एयरलाइन कंपनियां मालवीय जैसे अधिकारियों को उपकृत क्यों करती रहती हैं? इसके बदले में उन्हें क्या मिलता है? मालवीय इस मामले में बस एक छोटा सा उदाहरण भर हैं. मालवीय जैसे कई अधिकारी और हो सकते हैं जो ऐसी मुफ्त यात्रा के बदले एयरलाइन कंपनियों को अपनी मनमानी करने देते होंगे. यह गठजोड़ देश की हवाई सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है.