Volume 7 Issue 17 Archives | Tehelka Hindi — Tehelka Hindi

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‘सरकारें चाहती हैं कि संसाधनों पर जनता का कोई नियंत्रण न रहे’

सरदार सरोवर बांध का डूब क्षेत्र 214 किलोमीटर का है. इस परियोजना से लाखों लोग प्रभावित हो रहे हैं. इससे विस्थापित होने वालों में 50 प्रतिशत आदिवासी और 20 प्रतिशत से ज्यादा लोग गरीब और वंचित समुदायों के हैं. नर्मदा बचाओ आंदोलन की शुरुआत जनशक्ति के आधार पर हुई है.  

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सरकारों का रुख अरुंधती राय नर्मदा बांध पर अपने चर्चित लेख ‘द ग्रेटर कॉमन गुड’ की शुरुआत जवाहरलाल नेहरू द्वारा  हीराकुंड बांध के शिलान्यास के मौके पर दिए गए भाषण की उन लाइनों से करती हैं जिसमें उन्होंने कहा था, ‘अगर आपको कष्ट उठाना पड़ता है तो आपको देशहित में  

संघर्ष की पगडंडी पर 30 साल

बीते 17 और 18 जुलाई को नर्मदा घाटी से आए सरदार सरोवर बांध के हजारों विस्थापित और उनके समर्थकों ने ‘आएंगे दिल्ली, बजाएंगे ढोल, जगाएंगे सरकारों को’ के नारे के बीच राजधानी के जंतर-मंतर पर धरना दिया. मांग की गई कि विस्थापितों का समुचित पुनर्वास हो जिसके तहत पैसे की  

किस हाल में ‘माई’ के लाल

30 अगस्त को पटना के गांधी मैदान में स्वाभिमान रैली का आयोजन था. नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस के मेल-मिलाप और सीटों को लेकर आपसी तालमेल के बाद पहला बड़ा साझा राजनीतिक आयोजन. नीतीश को एक बार फिर से मुख्यमंत्री बनाने के लिए मार्ग प्रशस्त करने के लिए  

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इसका जवाब बहुत साफ है. उस जवाब की बहुत हद तक झलकियां चायवाली उस चौपाल में उस बुजुर्गवार नेता ने दे दी थीं, लेकिन मामला सिर्फ उतना भर ही नहीं है. लालू प्रसाद यादव जानते हैं कि वे खुद राजनीतिक जीवन में मुश्किलों और चुनौतियों से तो घिरे हुए ही  

‘मोदी बिहार का जितना दौरा करेंगे, उतना फायदा हमें मिलेगा’

जनता दल (यूनाइटेड) नेता और राज्यसभा सांसद शरद यादव संसद में किसी विषय पर चल रही बहस को रहस्यमयी तरीके से भटकाने के लिए जाने जाते हैं. हाल ही में जब संसद में बीमा विधेयक पर बहस चल रही थी, तब अचानक शरद यादव ने लीक से हटकर गोरी त्वचा  

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सबको दशरथ की कहानी अविश्वसनीय क्यों लग रही थी जबकि 60 के दशक में पहाड़ काटने का काम शुरू कर 22 सालों की अथक मेहनत से दशरथ मांझी पहाड़ काटकर रास्ता बना चुके थे. दशरथ को जीते-जी उनके काम के लिए वह सम्मान कहां मिला!  मृत्यु के कुछ साल पूर्व  

लौटने लगे हैं लोग मेरे गांव के…

उत्तर प्रदेश के कानपुर की अनिता मिश्रा ने जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की और ‘गृहलक्ष्मी’ पत्रिका से जुड़ गईं. अचानक एक दिन घर से फोन आया कि उनके पिताजी पक्षाघात के शिकार हो गए. वे अपने पिता की सेवा-सुश्रूषा के लिए कानपुर चली गईं.  

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झाड़ू लगाकर कमाए गए दो रुपये आज भी याद हैं

बात शायद 1996-97 की है. हम अविभाजित उत्तर प्रदेश के अल्मोड़ा जिले में सराईखेत नाम के गांव में रहते थे. पिताजी फौज में थे और मां स्वास्थ्य विभाग में कर्मचारी के बतौर वहीं तैनात थीं. ये वो दौर था जब कुमाऊं-गढ़वाल के उस सुदूर इलाके में मेरे माता-पिता का सरकारी