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बजट, राजनीति और चुनाव

यह संयोग ही है कि जिस दिन केंद्रीय बजट आया उसी दिन राजस्थान में लोक सभा की दो सीटों और एक विधानसभा सीट पर उपचुनाव के नतीजे भी आये। भाजपा जिस युवा वर्ग की बात करती है उसका एक बड़ा वर्ग मिडल क्लास का प्रतिनिधित्व करता है। इसी मिडल क्लास  

भारत में आहार की नीति और राजनीति

भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ आजकल दिल्ली में है ज़ेर-ए-बहस ये मुद्दा - कवि दुष्यंत कुमार आहार और भूख महत्वपूर्ण मुद्दे हैं जिनकी विकसित हो रहे देश में चर्चा होती है। 70 साल से आज़ाद देश भारत की क्या स्थिति है उसे यदि ‘ग्लोबल हंगर  

बैंड, बाजा और भजन से राजनीति

अपनी राजनीतिक बयानबाजी की वजह से कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह हमेशा सुर्खियों में रहे हैं। अपने गुरु अर्जुन सिंह की तरह उनका भी प्रिय शगल है संघ परिवार पर गाहे-बगाहे निशाना साधना। आश्चर्य नहीं कि वे हमेशा भगवा ताकतों के निशाने पर रहे हैं। उनकी छवि हमेशा हिन्दू विरोधी नेता  

समय से पहले ही 2018 में होंगे आम चुनाव?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह इस हुनर में माहिर हैं कि हमेशा वे विपक्ष को नींद से जगाते रहे हैं। ऐसी संभावना है कि लोकसभा चुनाव जो 2019 मेेेें होने हैं उन्हें 2018 समाप्त होने के पहले ही कराने का संदेश ये दोनों महारथी दे दें। इसी की  

केशव के हाथ कमल

कहते हैं कि राजनीति में टोटके खूब चलते हैं. ऐसा ही एक टोटका सत्तारूढ़ भाजपा में चल रहा है. यह टोटका हिंदुत्व, पिछड़ा और चायवाला कंबिनेशन का है. लोकसभा चुनाव में ऐसे ही उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने बड़ी जीत दर्ज की तो अब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ऐसे ही  

भगत सिंह, शहादत और संघ

  बीते 23 मार्च को क्रांतिकारियों भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत की 85वीं वर्षगांठ थी, जिन्हें अंग्रेज सरकार ने लाहौर जेल में फांसी पर चढ़ाया था. अंग्रेज हुक्मरानों को लगा था कि क्रांतिकारियों को मार देने से उनके, भारत को एक आजाद धर्मनिरपेक्ष और समतावादी देश बनाने के  

भगत के सियासी भगत

‘मां, मुझे कोई शंका नहीं है कि मेरा मुल्क एक दिन आजाद हो जाएगा, पर मुझे डर है कि गोरे साहब जिन कुर्सियों को छोड़कर जाएंगे, उन पर भूरे साहबों का कब्जा हो जाएगा.’ आजादी के तमाम नायकों में से एक शहीद-ए-आजम सरदार भगत सिंह ने अपनी मां को लिखी  

पढ़ाई नहीं कमाई का जरिया बनते शिक्षण संस्थान

तमिलनाडु में शिक्षा के निजीकरण की शुरुआत 80 के दशक में तब हुई जब एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) राज्य के मुख्यमंत्री थे. यह देखते हुए कि ग्रामीण नशे के अभिशाप से व्यापक तौर पर प्रभावित हो रहे हैं, एमजीआर ने ताड़ी के उत्पादन, खरीद तथा उपभोग पर पाबंदी लगा दी जबकि