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गणतंत्र का गुड़गोबर

भोलेपन के पर्याय के रूप में मशहूर बेचारी गाय को पता भी नहीं होगा कि देश की सड़कों पर उसकी सुरक्षा के बहाने उपद्रव हो रहे हैं, तो भारतीय संसद में बहस में भी हुई. गाय को यह भी नहीं पता होगा कि उसका नाम अब सियासी गलियारे में मोटे-मोटे  

मोदी जी के पीएम बनने के बाद संघ के लोगों को चर्बी चढ़ गई है : जिग्नेश मेवाणी

हमारे समाज में गाय को आधार बनाकर छुआछूत की परंपरा पुरानी है. पर अब इसके बहाने दलितों को पीटा जा रहा है. देखिए, और कोई पशु माता नहीं है तो गाय ही माता क्यों है? यह सबसे अहम सवाल है. गाय को पवित्र बनाकर लंबे अरसे से एक राजनीति चल  

केशव के हाथ कमल

कहते हैं कि राजनीति में टोटके खूब चलते हैं. ऐसा ही एक टोटका सत्तारूढ़ भाजपा में चल रहा है. यह टोटका हिंदुत्व, पिछड़ा और चायवाला कंबिनेशन का है. लोकसभा चुनाव में ऐसे ही उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने बड़ी जीत दर्ज की तो अब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ऐसे ही  

राजनीति का नया कलाम, ‘जय भीम – लाल सलाम’

जेएनयू में कथित देशविरोधी नारे को लेकर बवाल हुआ तो छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी से पहले उनके भाषण में ‘जय भीम, लाल सलाम’ का नारा शामिल था. उन्होंने अपने भाषण में कहा, ‘जब हम महिलाओं के हक की बात करते हैं तो ये (संघ-भाजपा के लोग) कहते हैं  

अफीम की घुट्टी है राष्ट्रवाद

भाजपा सरकार एक तरफ आंबेडकर को अपना नायक बताने की कोशिश करती है और दूसरी तरफ दलित बुद्धिजीवियों समेत दलित समुदाय पर हमले भी कर रही है. बात एकदम साफ है. आंबेडकर का एक तरह से एप्रोप्रिएशन यानी अपनाने की प्रक्रिया तो बहुत पुरानी स्थिति है. यह एक ऐतिहासिक तथ्य  

अपना-अपना राष्ट्रवाद

जिस समय भारतीय संसद में राष्ट्रवाद पर बहस हो रही थी, उसी समय देश के कई हिस्सों में कथित राष्ट्रवादी समूहों की उच्छृंखल कार्रवाइयां भी जारी थीं. कई जगहों पर हिंदूवादी संगठन बुद्धिजीवियों के साथ मारपीट करने और सेमिनार आदि में व्यवधान डालने जैसे कारनामे कर रहे थे. करीब एक  

‘मुझे बस यही समझ में आया कि मेरे जैसों की मुक्ति किताबों के माध्यम से ही संभव है’

बोकारो में पापा की पोस्ट ऑफिस में नौकरी से घर का गुजारा किसी तरह चल जाता था. उन दिनों काॅलेज की पढ़ाई के लिए दिल्ली जाने का जिक्र करने पर माली हालत की वजह से पापा ने साफ मना कर दिया था. मैंने सुना था कि दिल्ली में लोग ट्यूशन