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पुलिस तंत्र में आपको पता नहीं चलता कि कब आप मनुष्य से पशु बन गए : वीएन राय

आपकी किताब  ‘हाशिमपुरा 22 मई’  को लेकर कई तरह के विवाद उठ खड़े हुए. पहली बार हाशिमपुरा हत्याकांड के संदर्भ में भारतीय सेना के आचरण पर भी उंगलियां उठाई गई हैं. आपने इस घटना को भारतीय राज्य की विफलता के रूप में देखा है. क्या इस निंदनीय घटना पर कुछ  

प्रकाशन की मंडी में जिसके पास कलम है, लेकिन पैसा नहीं, वह नहीं छपेगा : नीलोत्पल मृणाल

डार्क हॉर्स आपकी पहली किताब है. पुरस्कार की दौड़ में तमाम किताबें रही होंगी, लेकिन साहित्य अकादेमी पुरस्कार आपको मिला. इस बारे में क्या कहेंगे? निश्चित रूप से यह किसी नए लेखक के लिए बड़ी उपलब्धि होगी. पहली किताब वाले सवाल पर तो कहूंगा कि किसी भी रचनाकार को उसकी  

मुद्राराक्षस : एक योद्धा लेखक का चले जाना…

प्रख्यात नाटककार, कथाकार, जाने-माने संस्कृतिकर्मी और चिंतक मुद्राराक्षस का बीते 13 जून को लखनऊ में देहावसान आज के इस आक्रांता समय में हिंदी समाज के एक बुलंद प्रतिरोधी स्वर का मौन हो जाना है. दरअसल मुद्राराक्षस मात्र एक लेखक न होकर एक ऐसे सार्वजनिक बुद्धिजीवी थे जो हाशिये के समाज  

‘अगर लिंग परीक्षण पर सजा का प्रावधान है तो ऐसे मां-बाप को क्यों नहीं दंडित किया जाना चाहिए जो अपने किन्नर बच्चों को कहीं छोड़ आते हैं?’

आपका  ‘थर्ड जेंडर’  यानी किन्नरों की जिंदगी पर आधारित  उपन्यास  ‘नालासोपारा पो. बॉक्स नं. 203’  हाल ही में प्रकाशित हुआ है. किन्नरों की जिंदगी पर उपन्यास लिखने का विचार कहां से आया? इस उपन्यास में खास क्या है? इस उपन्यास में मैंने आजाद भारत में किन्नरों की स्थिति पर प्रकाश  

‘मित्रो’ को आज अपनी सेक्सुअल डिजायर व्यक्त करने का अधिकार है और इसे उसने अर्जित किया है…

‘मित्रो मरजानी’  के 50 साल पूरे हुए हैं, आज मित्रो को कहां पाती हैं? अब मित्रो सिर्फ एक किताब नहीं रही, समय के साथ-साथ वह एक व्यक्तित्व में बदल गई है. वह अब एक संयुक्त परिवार की स्त्री नहीं है जो हर बात में पीछे रखी जाती है. उसे अपनी  

भगत के सियासी भगत

‘मां, मुझे कोई शंका नहीं है कि मेरा मुल्क एक दिन आजाद हो जाएगा, पर मुझे डर है कि गोरे साहब जिन कुर्सियों को छोड़कर जाएंगे, उन पर भूरे साहबों का कब्जा हो जाएगा.’ आजादी के तमाम नायकों में से एक शहीद-ए-आजम सरदार भगत सिंह ने अपनी मां को लिखी  

आवारा भीड़ के खतरे : हरिशंकर परसाई

एक अंतरंग गोष्ठी सी हो रही थी युवा असंतोष पर. इलाहाबाद के लक्ष्मीकांत वर्मा ने बताया- पिछली दीपावली पर एक साड़ी की दुकान पर कांच के केस में सुंदर माॅडल खड़ी थी. एक युवक ने एकाएक पत्थर उठाकर उस पर दे मारा. कांच टूट गया. आसपास के लोगों ने पूछा  

आजादी तो मिल गई है पर हमें पता नहीं कि उसका करना क्या है?

लगभग बीस साल पहले की बात है. कलकत्ता के ‘फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन’ की ओर से ‘दो बीघा जमीन’ फिल्म के निर्देशक बिमल रॉय और हमें यानी उनके साथियों को सम्मान दिया जा रहा था. ये एक साधारण पर रुचिकर समारोह था. बहुत अच्छे भाषण हुए, पर श्रोता बड़ी उत्सुकता के  

‘डोंगी से यात्रा में बार-बार महसूस हुआ कि आगे बढ़ना मुश्किल है’

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक राकेश तिवारी की मूल प्रकृति में घुमक्कड़ी का वास बहुत छोटी उम्र में ही हो गया था. पिता भी उन्हें घूमने को उकसाते. घूमने का शौक ऐसा चढ़ा कि 21 साल की उम्र में साइकिल उठाई और लखनऊ से काठमांडू निकल गए. घुमक्कड़ी के साथ-साथ लिखने का भी शौक जारी रहा. यात्रा वृतांत के तौर पर उनकी पहली किताब ‘पहियों के इर्द-गिर्द’ प्रकाशित हुई. इस यात्रा के दो साल बाद ही उन्होंने डोंगी (नौका)...  

लुगदी, घासलेट, अश्लील, मुख्यधारा… साहित्य के स्टेशन

मिलिट्री डेयरी फार्म, सूबेदारगंज, इलाहाबाद. लौकी की लतरों से ढके एस्बेस्टस शीट की ढलानदार छतों वाले उन एक जैसे स्लेटी, काई से भूरे मकानों का शायद कोई अलग नंबर नहीं था. हर ओर ऊंची पारा और लैंटाना घास थी. कंटीले तारों से घिरे खेत थे जिनके आगे बैरहना का जंगल