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मुअनजोदड़ो की जगह अगर मोहेंजो दारो हो गया तो भाई किसके घाव दुख गए : नरेंद्र झा

आप छोटे परदे पर लंबे समय तक काम करने के बाद फिल्मों में आए. दोनों माध्यमों में क्या अंतर पाते हैं? टेलीविजन के लिए काम करते हुए आपको सोचने का मौका नहीं मिलता है. फिल्मों में आपको इसका मौका मिलता है. टेलीविजन का अपना एक गणित होता है जिसके तहत  

राजनीति का नया कलाम, ‘जय भीम – लाल सलाम’

जेएनयू में कथित देशविरोधी नारे को लेकर बवाल हुआ तो छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी से पहले उनके भाषण में ‘जय भीम, लाल सलाम’ का नारा शामिल था. उन्होंने अपने भाषण में कहा, ‘जब हम महिलाओं के हक की बात करते हैं तो ये (संघ-भाजपा के लोग) कहते हैं  

‘लोगों को बरगलाने के लिए कहा जा रहा है कि भगत सिंह हमारे हैं’

लोगों को बरगलाने के लिए मुखौटे डालकर हर तरफ से यह कहा जा रहा है कि भगत सिंह हमारे हैं और हम भी उन्हीं के जैसे हैं. भगत सिंह के होने का मतलब वह है जो कुछ उन्होंने असेंबली में बम फेंकने के बाद कहा था. जो भगत सिंह के  

‘आपको लगता है कि हर वो आदमी दुश्मन है जो भारत माता की जय नहीं कहता, ऐसे तो ये देश पाकिस्तान बन जाएगा’

देश में आजकल एक खास किस्म का सिलसिला चल रहा है. मैं उसका शिकार बना. वो पहले से जाल बिछाए बैठे थे, मैं फंस गया. सबसे परेशान करने वाली बात कि पाकिस्तान हो या बांग्लादेश, वहां पर बहुत दमन रहा है. हमारे यहां आपातकाल को छोड़ दें तो शायरों या  

विरोधियों को राष्ट्रविरोधी घोषित करने की मुहिम

इस पूरी बहस के सहारे कोशिश की जा रही है कि भाजपा और आरएसएस के खिलाफ जो भी लोग हैं उन्हें राष्ट्रविरोधी घोषित किया जाए. ये मुहिम चला रहे हैं. हर जगह जनता में बंटवारे की कोशिश की जा रही है. अगर यह तर्क है कि देश को बचाने के  

‘धर्म और संस्कृति के आधार पर भेदभाव करता है आरएसएस का राष्ट्रवाद’

जो कुछ हो रहा है यह भाजपा का अपना राष्ट्रवाद है, इसमें कुछ भी नया नहीं है. यह पिछले तीन-चार दशकों से चल रहा है. इनके राष्ट्रवाद की जो परिभाषा है, वह वीर सावरकर से शुरू होती है. 1925 में संघ के गठन के बाद इसने बाकायदा संस्थागत रूप ले  

एक तरह की सामूहिक आकांक्षा है राष्ट्रवाद

राष्ट्रवाद का जो मुद्दा है, संविधान में उसके सारे प्रावधान निहित हैं. क्योंकि भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में राष्ट्रवाद संविधान में आस्था और संवैधानिक प्रक्रियाओं से ही उभर सकता है. और कोई दूसरा तरीका शायद कामयाब नहीं हो. राष्ट्र के बारे में यह नहीं कहा जा सकता है  

‘लोगों की स्वतंत्रता और लोकतंत्र पर हमला हो रहा है, बहस इस पर होनी चाहिए राष्ट्रवाद पर नहीं’

किसी से आप पूछेंगे कि वह किसको मानता है राष्ट्रवाद तो वह नहीं बता पाएगा. कुछ धुंधली-सी अवधारणा है लोगों के दिमाग में कि मुल्क हमेशा खतरे में रहता है, सैनिक उसकी रक्षा करते हैं, वे मारे जाते हैं, और इधर बुद्धिजीवी हैं जो तरह-तरह से सवाल उठाते रहते हैं,  

‘नायक नहीं आंदोलन महत्वपूर्ण है’

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के बाहर और भीतर पिछले दिनों जो कुछ हुआ वह एक राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना और चैनलों से लेकर अखबारों और सोशल मीडिया के साथ-साथ इंटरनेट पर उपलब्ध ई-पत्रिकाओं में भी उसकी भरपूर धमक रही. अंतरिम जमानत पर रिहाई के बाद जेएनयू के छात्रों  

‘हर विश्वविद्यालय जेएनयू जैसा होना चाहिए’

सालों से हम इस बहस में उलझे थे कि क्या जेएनयू की दुनिया नॉर्थ गेट पर जाकर वाकई खत्म हो जाती है? इसका जवाब ‘हां’ भी था और ‘ना’ भी. तमाम बहस-मुबाहिसे जेएनयू की चौहद्दी पर पहुंचते ही दम तोड़ देते थे. हालांकि ‘राष्ट्रवाद’ और ‘राष्ट्रद्रोह’ के मुद्दे पर जेएनयू