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गणतंत्र का गुड़गोबर

भोलेपन के पर्याय के रूप में मशहूर बेचारी गाय को पता भी नहीं होगा कि देश की सड़कों पर उसकी सुरक्षा के बहाने उपद्रव हो रहे हैं, तो भारतीय संसद में बहस में भी हुई. गाय को यह भी नहीं पता होगा कि उसका नाम अब सियासी गलियारे में मोटे-मोटे  

मोदी जी के पीएम बनने के बाद संघ के लोगों को चर्बी चढ़ गई है : जिग्नेश मेवाणी

हमारे समाज में गाय को आधार बनाकर छुआछूत की परंपरा पुरानी है. पर अब इसके बहाने दलितों को पीटा जा रहा है. देखिए, और कोई पशु माता नहीं है तो गाय ही माता क्यों है? यह सबसे अहम सवाल है. गाय को पवित्र बनाकर लंबे अरसे से एक राजनीति चल  

‘धर्म और संस्कृति के आधार पर भेदभाव करता है आरएसएस का राष्ट्रवाद’

जो कुछ हो रहा है यह भाजपा का अपना राष्ट्रवाद है, इसमें कुछ भी नया नहीं है. यह पिछले तीन-चार दशकों से चल रहा है. इनके राष्ट्रवाद की जो परिभाषा है, वह वीर सावरकर से शुरू होती है. 1925 में संघ के गठन के बाद इसने बाकायदा संस्थागत रूप ले  

गाय और गोमांस की राजनीति

‘शाकाहार विचार और कार्य की पवित्रता के लिए अपरिहार्य है. यह साधन की पवित्रता का एक प्रकार है. आप जो बोते हैं, वही काटते हैं. बूचड़खानों में ले जाए जाने वाले बेजुबान जानवरों का दर्द हमें सुनना और समझना है.’ नरेंद्र मोदी, तत्कालीन मुख्यमंत्री, गुजरात, 2 अक्टूबर 2003 को महात्मा गांधी  

‘अब्बू कहते थे मानवता से बढ़कर कोई धर्म नहीं, ऐसे आदमी को उस रात धर्मांध भीड़ ने मार डाला’

घर से फोन आना सरताज के लिए सामान्य बात थी. उनका 22 वर्षीय छोटा भाई दानिश, जो कि हास-परिहास और जिंदादिली से भरपूर था, अक्सर उन्हें फोन करता था. दोनों भाइयों में तमाम मसलों पर चर्चा होती थी और हर बात से पहले वे थोड़ा सा हंसी मजाक भी कर  

भीड़ का इंसाफ, मानवता साफ

शाम के आठ बजने को हैं. अक्टूबर की इस शाम की हवा में ठंडक घुल चुकी हैै. जाहिर है कि आने वाले दिन और सर्द होंगे. यहां दिल्ली से महज 70 किमी. दूर गौतमबुद्ध नगर जिले के दादरी कस्बे के पास स्थित बिसाहड़ा गांव में भी एक अजीब सी ठंडक