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सबको दशरथ की कहानी अविश्वसनीय क्यों लग रही थी जबकि 60 के दशक में पहाड़ काटने का काम शुरू कर 22 सालों की अथक मेहनत से दशरथ मांझी पहाड़ काटकर रास्ता बना चुके थे. दशरथ को जीते-जी उनके काम के लिए वह सम्मान कहां मिला!  मृत्यु के कुछ साल पूर्व  

‘मैं खुद को क्रिएटिव बनाए रखने के लिए काम करता हूं, मुंबई के लिए नहीं’

 आप विज्ञान के विद्यार्थी रहे हैं, ऐसे में लेखन की प्रेरणा कहां से मिली? हम लोग मूल रूप से बिहार के ‘बाढ़’ कस्बे के रहने वाले हैं. वहीं पढ़ाई-लिखाई हुई. मेरे पिताजी राजकमल चौधरी (प्रसिद्ध मैथिल और हिंदी लेखक) के पिता के साथ शिक्षक थे. बिहार के एक उपन्यासकार अनूप  

कथा और पूर्वकथा

बीते 18 अगस्त को गुलज़ार ने अपनी उम्र का अस्सीवां पड़ाव पूरा कर लिया. यहां उनकी एक कहानी है जो समाज में कला की भूमिका को दिखाती है और यह जिस वैचारिक द्वंद से उपजी है वह भी है  

‘व्यापक समाज अब आदिवासियों के संघर्ष को महसूस कर रहा है’

रणेंद्र कवि हैं और कहानीकार भी. लेकिन 'ग्लोबल गांव का देवता' प्रकाशित होने के बाद पाठकों के बीच वे उपन्यासकार के रूप में ज्यादा पहचाने गए. इसकी एक वजह यह थी कि हिंदी के लगभग सभी आलोचकों-लेखकों ने इस उपन्यास को पिछले दो-तीन दशकों में आए कुछेक महत्वपूर्ण उपन्यासों में से एक माना था. जल्दी ही रणेंद्र का दूसरा उपन्यास ‘गायब होता देश’ प्रकाशित होने जा रहा है. अपने नए उपन्यास पर बात करते हुए वे स्पष्ट कर रहे...  

श्रेय उस समय को है

अपनी चर्चित कहानी ‘चिठ्ठी’ की रचना प्रक्रिया के बारे में कथाकार अखिलेश की टिप्पणी.  

बड़े शौक से सुन रहा था जमाना

विजयदान देथा न होते तो हम जान भी न पाते कि हमारी लोककथाओं का वितान कितना बड़ा है.