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हम जिसकी पूजा करते हैं उसी को ये बूचड़खाने में काट देते हैं तो तनाव तो पैदा होगा ही : विनय कटियार

उत्तर प्रदेश में भाजपा के पराभव के क्या कारण रहे और इस बार अलग क्या है? एक बार सरकार बनने के बाद उत्तर प्रदेश में भाजपा के पराभव का कारण कल्याण सिंह का पार्टी छोड़कर जाना था. इस कारण प्रदेश की पिछड़ी खासकर लोध जातियों ने पार्टी का साथ छोड़  

राजनीति का नया कलाम, ‘जय भीम – लाल सलाम’

जेएनयू में कथित देशविरोधी नारे को लेकर बवाल हुआ तो छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी से पहले उनके भाषण में ‘जय भीम, लाल सलाम’ का नारा शामिल था. उन्होंने अपने भाषण में कहा, ‘जब हम महिलाओं के हक की बात करते हैं तो ये (संघ-भाजपा के लोग) कहते हैं  

‘23 साल का वह क्रांतिकारी इतना बड़ा हो गया है कि उस पर कोई पगड़ी फिट नहीं हो सकती’

भगत सिंह पर दावेदारी कोई नई बात नहीं है. यह काफी समय से जारी है. खास तौर पर जब से भगत सिंह की जन्म शताब्दी आई. जन्म शताब्दी वर्ष यानी 2007 में, पूरे वर्ष भगत सिंह के सिर पर पगड़ी पहनाने का प्रयास हुआ. पहले कभी-कभार हुआ करता था, फिर  

भगत सिंह, शहादत और संघ

  बीते 23 मार्च को क्रांतिकारियों भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत की 85वीं वर्षगांठ थी, जिन्हें अंग्रेज सरकार ने लाहौर जेल में फांसी पर चढ़ाया था. अंग्रेज हुक्मरानों को लगा था कि क्रांतिकारियों को मार देने से उनके, भारत को एक आजाद धर्मनिरपेक्ष और समतावादी देश बनाने के  

भगत के सियासी भगत

‘मां, मुझे कोई शंका नहीं है कि मेरा मुल्क एक दिन आजाद हो जाएगा, पर मुझे डर है कि गोरे साहब जिन कुर्सियों को छोड़कर जाएंगे, उन पर भूरे साहबों का कब्जा हो जाएगा.’ आजादी के तमाम नायकों में से एक शहीद-ए-आजम सरदार भगत सिंह ने अपनी मां को लिखी  

हम नास्तिक क्यों हैं…

‘देखिए भैया, हम बहुत मेहनत करके शाम की रोटी का जुगाड़ करते हैं. हमें ये पता है कि हम मेहनत नहीं करेंगे तो बच्चों के साथ भूखा ही सोना पड़ेगा. ऐसे में हम अपनी मेहनत का श्रेय भगवान को नहीं दे सकते. या कहिए कि हम भगवान को नहीं मानते  

‘लोगों की स्वतंत्रता और लोकतंत्र पर हमला हो रहा है, बहस इस पर होनी चाहिए राष्ट्रवाद पर नहीं’

किसी से आप पूछेंगे कि वह किसको मानता है राष्ट्रवाद तो वह नहीं बता पाएगा. कुछ धुंधली-सी अवधारणा है लोगों के दिमाग में कि मुल्क हमेशा खतरे में रहता है, सैनिक उसकी रक्षा करते हैं, वे मारे जाते हैं, और इधर बुद्धिजीवी हैं जो तरह-तरह से सवाल उठाते रहते हैं,  

अफीम की घुट्टी है राष्ट्रवाद

भाजपा सरकार एक तरफ आंबेडकर को अपना नायक बताने की कोशिश करती है और दूसरी तरफ दलित बुद्धिजीवियों समेत दलित समुदाय पर हमले भी कर रही है. बात एकदम साफ है. आंबेडकर का एक तरह से एप्रोप्रिएशन यानी अपनाने की प्रक्रिया तो बहुत पुरानी स्थिति है. यह एक ऐतिहासिक तथ्य  

अपना-अपना राष्ट्रवाद

जिस समय भारतीय संसद में राष्ट्रवाद पर बहस हो रही थी, उसी समय देश के कई हिस्सों में कथित राष्ट्रवादी समूहों की उच्छृंखल कार्रवाइयां भी जारी थीं. कई जगहों पर हिंदूवादी संगठन बुद्धिजीवियों के साथ मारपीट करने और सेमिनार आदि में व्यवधान डालने जैसे कारनामे कर रहे थे. करीब एक  

बहुत नाजुक है ये राष्ट्रवाद

राष्ट्रवाद पर मेरे जो विचार हैं, उस बारे में सबसे पहले हम भाषा से बात शुरू करते हैं. कुछ दिन पहले एक कार्यक्रम में सवाल किया गया था कि क्या एक राष्ट्र बनने के लिए एक भाषा की जरूरत नहीं है. उस सवाल का जवाब आयशा क‌िदवई ने उस वक्त दिया