बड़े भाई का ‘बिगब्रदर-पन’ | Tehelka Hindi

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बड़े भाई का ‘बिगब्रदर-पन’

जर्मनी अमेरिका का परम मित्र ही नहीं, नाटो के भीतर व बाहर उसका जाना-माना जी-हुजूर भी है. पर इसका यह मतलब नहीं कि दुनियाभर में जासूसी कर रहा अमेरिका जर्मनी में जासूसी से परहेज करने लगे
राम यादव 2014-07-31 , Issue 14 Volume 6
जबकि पूण् एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में अमेरिकी िा£‍परत बिाक ओबामा औि जमि्न चांसलि अंगेला मेकि्ल

जबकि पूण् एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में अमेरिकी िा£‍परत बिाक ओबामा औि जमि्न चांसलि अंगेला मेकि्ल

अमेरिकी स्वाधीनता दिवस हर वर्ष चार जुलाई को बर्लिन में भी प्रमुखता के साथ मनाया जाता है. इस बार भी मनाया गया. लेकिन, जर्मनी में अमेरिकी राजदूत जॉन इमर्सन इस बार जब स्वाधीनता दिवस के समारोह में पहुंचे तो कुछ घबराए हुए-से थे. अपने भाषण में इस बार वे जर्मन-अमेरिकी संबंधों की मधुरता में कुछ ज्यादा ही चाशनी घोलते लगे. हुआ यह था कि कुछ ही घंटे पहले उन्हें जर्मन विदेश मंत्रालय में बुलाया गया था. मंत्रालय के राज्यसचिव स्तेफान श्टाइनलाइन ने उन्हें सूचित किया कि जर्मनी की वैदेशिक गुप्तचर सेवा ‘बीएनडी’ के एक ऐसे कर्मचारी को गिरफ्तार किया गया है, जिस पर अमेरिका के लिए जासूसी करने का शक है. उसके साथ संपर्क अमेरिकी दूतावास के माध्यम से किया गया था. मित्र देशों के बीच यह अच्छी बात नहीं है. जर्मन सरकार चाहती है कि मामले की त्वरित जांच में अमेरिकी दूतावास पूरा सहयोग प्रदान करे.

मार्कुस आर नाम के ‘बीएनडी’ के इस 31 वर्षीय गिरफ्तार कर्मचारी पर शक है कि उसने अमेरिकी जासूसों को कम से कम 218  गोपनीय दस्तावेज दिए हैं. कुछ दस्तावेज तो उस संसदीय जांच-समिति के लिए थे जो दुनियाभर के इलेक्ट्रॉनिक दूरसंचार (इंटरनेट, ईमेल, फैक्स और टेलीफोन) की आहट ले रही अमेरिकी गुप्तचर सेवा ‘राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी’  (नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी एनएसए) की जर्मनी में चल रही गतिविधियों का आयाम जानने के लिए गठित की गई हंै.

एडवर्ड स्नोडन की भूमिका
इन गतिविधियों का पता पिछले वर्ष तब चला था, जब ‘एनएसए’ का ही एक भेदिया एडवर्ड स्नोडन ढेर सारे गोपनीय दस्तावेजों की नकल (कॉपी) उतार गायब हो गया था और हंगकांग के रास्ते से मॉस्को पहुंचा था. वहां एक साल की अस्थाई शरण मिलते ही ये दस्तावेज प्रकाशन के लिए उसने अमेरिका और यूरोप के कुछ चुने हुए अखबारों एवं पत्रिकाओं को दिए थे. संसदीय जांच समिति और जर्मनी की विपक्षी पार्टियां विस्तृत पूछताछ के लिए स्नोडन को जर्मनी बुलाना चाहती हैं, लेकिन अमेरिका के तुष्टीकरण के लिए प्रयत्नशील जर्मन सरकार इसकी अनुमति नहीं दे रही.

बड़े भाई अमेरिका के किसी राजदूत को विदेश मंत्रालय में बुलाकर राजनयिक विरोध-प्रदर्शन जर्मनी के लिए बहुत ही अनहोनी बात है. जर्मनी तो वह देश है जहां के नेता अनन्य कृतज्ञताभाव से कहते नहीं थकते कि उनका देश अमेरिका का सदा ऋणी रहेगा. अमेरिकी हथियारों और सैनिकों के बिना द्वितीय विश्वयुद्ध के मित्र-राष्ट्रों की विजय और जर्मनी में हिटलर की फासिस्ट तानाशाही का अंत संभव ही नहीं हो सका होता. अमेरिकी सहायता व संरक्षण के बिना विभाजित जर्मनी के पश्चिमी भाग में लोकतंत्र की स्थापना, युद्ध से खंडहर बन गए देश का पुनर्निर्माण,  1960-70 वाले दशक में ‘आर्थिक चत्मकार’ और बर्लिन-दीवार गिरने के बाद 1990 में पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी का शांतिपूर्ण एकीकरण भी संभव नहीं हो पाया होता. यही नेता आज कहने पर विवश हैं कि ‘बस, अब बहुत हो गया!’

जर्मन वैदेशिक गुप्तचर सेवा ‘बीएनडी’ के अध्यक्ष गेरहार्ड शिंडलर ने अमेरिकी गुप्तचरी संबंधी  संसदीय जांच समिति को बताया कि मार्कुस आर संभवतः दो वर्षों से अपने विभाग के गोपनीय दस्तावेज चोरी-छिपे घर ले जाकर उन्हें स्कैन करता और एक अमेरिकी गुप्तचर एजेंट को देता रहा है. क्योंकि ऐसे और भी विश्वासघाती हो सकते हैं, इसलिए उनका पता लगाने के लिए ‘बीएनडी’ के लगभग सभी छह हजार कर्मचारियों के कार्यकलापों की अब जांच की जा रही है. जर्मन गुप्तचर सेवाएं अब तक यही मान कर चल रही थीं कि केवल रूसी या चीनी जासूस ही इस तरह के दस्तावेज पाने को लालायित रहते हैं, अमेरिकी नहीं.

ऐसा भी नहीं है कि जर्मन वैदेशिक गुप्तचर सेवा ‘बीएनडी’ अमेरिका की ‘एनएसए’, ‘सीआईए’ या किसी अन्य गुप्तचर एजेंसी की प्रतिस्पर्धी या प्रतिद्वंद्वी है. सच तो यह है कि इन सभी सेवाओं की आपस में मिलीभगत भी है. तब भी, ‘बीएनडी’ में सेंध लगाने की इस घटना से उड़ी धूल बैठी भी नहीं थी कि सप्ताह भर के भीतर ही एक और समाचार आया–जर्मन रक्षा मंत्रालय का एक असैनिक कर्मचारी भी अमेरिका की वैदेशिक गुप्तचर सेवा ‘सीआईए’ को गोपनीय जानकारियां देता रहा है.

अमेरिका जासूसी की हर विधा को एक ऐसा सधा हुआ अस्त्र मानता है, जिसके इस्तेमाल में उसे अपनों-परायों या शत्रु-मित्र के बीच कोई भेद स्वीकार्य नहीं

एक ही सप्ताह के भीतर जर्मन भूमि पर अमेरिकी जासूसी के दो-दो सनसनीखेज़ समाचारों से खलबली मच गई. जनता व नेताओं को लगने लगा, मानो देश के कोने-कोने में अमेरिकी जासूस बैठे हुए हैं. यह दूसरा समाचार जर्मन रक्षा मंत्रालय के एक ऐसे कर्मचारी से संबंधित था जो पहले सर्बिया का एक प्रदेश रहे और अब स्वतंत्र देश बन गए कोसोवो में तैनात ‘केफोर’ शांतिसेना का राजनीतिक परामर्शदाता रह चुका है. वहां उसे अपने ही समवर्ती एक ऐसे अमेरिकी परामर्शदाता से अक्सर मिलना-जुलना होता था जो कोसोवो में गुप्तचर सेवा सहित एक नया प्रशासनिक ढांचा खड़ा करने में हाथ बंटा रहा था. 2010 से दोनों कई बार तुर्की व अन्य देशों में भी मिलते-जुलते रहे हैं. उनके बीच संपर्क बने रहने का सुराग ‘बीएनडी’ के मार्कुस आर की गिरफ्तारी से ही मिला बताया जाता है.

जर्मनी के दो सार्वजनिक रेडियो-टीवी केंद्रों ‘एनडीआर’ और ‘डब्ल्यूडीआर’ तथा म्युनिक से प्रकाशित होने वाले दैनिक ‘ज्युइडडोएचे त्साइटुंग’ की एक मिली-जुली खोज से पता चला कि ‘बीएनडी’ और रक्षा मंत्रालय वाले दोनों मामलों के बीच आपसी संबंध है. जर्मनी की आंतरिक गुप्तचर सेवा ‘संघीय संविधानरक्षा कार्यालय’ (बीएफवी) को काफी समय से संदेह था कि रक्षा मंत्रालय में कहीं कोई रूसी भेदिया बैठा हुआ है. इस आशय का एक गुमनाम पत्र उसके हाथ लगा था, पर कोई ठोस सुराग मिल नहीं रहा था.’बीएफवी’ ने अंततः देश की वैदेशिक गुप्तचर सेवा ‘बीएनडी’ से पूछा कि कहीं उस के पास तो कोई जानकारी नहीं है. इस अनुरोध वाला पत्र उसी मार्कुस आर की मेज पर पहुंचा, जिसे चार जुलाई को गिरफ्तार कर लिया गया है. उसने यह पत्र चोरी-छिपे म्युनिक स्थित रूसी वाणिज्य दूतावास के पास पहुंचा दिया था. वह शायद सोच रहा था कि पत्र पाते ही रूसी अनुमान लगा लेंगे कि वह कितने काम का आदमी है. हो सकता है कि वे भी उसे अपना भेदिया बना लें! रूसियों के साथ संवाद की सुविधा के लिए मार्कुस आर ने एक अलग ईमेल-पता भी बना लिया था. महीनों लंबी छानबीन के बाद यही ईमेल पता मार्कुस आर की गिरफ्तारी का सुराग बना.

गिरफ्तारी के बाद मार्कुस आर ने जर्मनी के संघीय अभियोजकों को उस समय आश्चर्य में डाल दिया, जब उसने बताया कि वह रूस के लिए नहीं, बल्कि 2012 से अमेरिका के लिए जासूसी कर रहा था. अमेरिकी दूतावास से भी उसने अपनी ही पहल पर ईमेल द्वारा ही संपर्क साधा था. उस समय ‘क्रेग’ नाम के जिस व्यक्ति ने उससे बात की, उसका कहना था कि अमेरिका के काम की हर तरह की सूचना में उसे दिलचस्पी है. पहली दो मुलाकातों में ‘क्रेग’ ने दस-दस हजार यूरो (लगभग आठ लाख रुपये) और तीसरी मुलाकात में केवल पांच हजार यूरो (चार लाख रुपये) दिये थे. मार्कुस ‘बीएनडी’ से मिलने वाले अपने वेतन से खुश नहीं था. रूसियों से भी उसे अच्छी कमाई की आशा थी. लेकिन, तब वह सन्न रह गया, जब एक दिन किसी रूसी के बदले उसने जर्मन ‘संविधानरक्षा कार्यालय’ से आए व्यक्तियों को अपने सामने खड़ा पाया.

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(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 6 Issue 14, Dated 31 July 2014)

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