सोनचांद बस्तरवाली उड़नपरी

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छत्तीसगढ़ का बस्तर इलाका देश-दुनिया में अक्सर सुर्खियों में रहता है. माओवादियों की मांद के कारण. पुलिसिया कार्रवाई के कारण. और इन दोनों के बीच के समीकरण साधने की राजनीति के कारण. उसी बस्तर के बकावड़ जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूरी पर बसे एक गांव की रहनेवाली सोनबारी नाम की लड़की है. आदिवासी धाविका. बीते साल वह महज 14 वर्ष की थी. सातवीं क्लास की छात्रा थी. वह दौड़ती तो लगता हवा से बात कर रही हो. कभी मीडिया की सुर्खियों में जगह नहीं मिल पाई थी लेकिन बस्तरवाले उसे बड़े प्यार और गर्व से उड़नपरी कहने लगे थे. उसी उड़नपरी का पिछले साल एक रात किसी ने धारदार हथियार से पैर काट दिया. सोनबारी के मां-पिता उस रात किसी पास के गांव में धार्मिक आयोजन में भाग लेने गए थे. वह अपनी दादी और भाई के साथ सो रही थी. अचानक वह जोर से चिल्लाई. उसकी चीख से भाई और दादी जग गए. घर में रोशनी हुई तो पास में धारदार हथियार रखा हुआ मिला. सोनबारी का पैर काटा जा चुका था और चारों ओर खून ही खून पसर चुका था. सोनबारी का पैर काटनेवाला कौन था यह तो बहुत बाद में मालूम हो सका लेकिन उसका मकसद क्या था, यह अब तक पता नहीं चल सका है. हालांकि दरिंदे का मकसद क्या रहा होगा, यह किसी को भी आसानी से समझ में आ सकता है. उनका मकसद सोनबारी यानी बस्तरवाली नन्हीं उड़नपरी के कैरियर का अंत करना था और वे इसमें कामयाब भी हो गए. सोनबारी तो अब भी जिंदा है लेकिन संभावनाओं से भरी हुई एक प्रतिभा का उसी मनहूस रात को अंत हो गया.

लगभग एक साल बाद अब वही सोनबारी ‘सोनचांद’ के रूप में सिनेमा के जरिए आनेवाली है. यह फिल्म बड़े परदेवाली होगी. लेकिन मुंबई के रास्ते नहीं, छत्तीसगढ़ के ही पड़ोसी आदिवासी राज्य झारखंड के रास्ते. और सिनेमा बनानेवाला भी कोई बड़ा स्टार डायरेक्टर या भारी-भरकम टीम नहीं बल्कि वे लोग हैं, जिनके पास गंभीरता, उत्साह,उल्लास, उमंग, सार्थक सोच और जिद-जुनून की पूंजी है.
‘सोनचांद’ नाम से फिल्म बनाने की सोच झारखंड की राजधानी रांची में रहनेवाले लेखक, रंगकर्मी, पत्रकार अश्विनी कुमार पंकज की है. अश्विनी ने ही सोनबारी की कहानी को विस्तार देकर सोनचांद नाम से फिल्म की पटकथा लिखी है. निर्देशन भी अश्विनी कर रहे हैं. निर्माता के तौर पर संस्कृतिकर्मी वंदना टेटे, मानवाधिकार कार्यकर्ता ग्लैडसन डंुगडुंग जैसे लोग इस मुहिम में साथ हैं. और रंजीत एकलव्य, जो फिल्म ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट, पुणे (एफटीआइ) से पढ़ाई करने के बाद मंुबई में फिल्मों से जुड़कर काम करने पहुंचे थे, वे सब छोड़-छाड़कर निर्देशन में सक्रिय भूमिका निभाने रांची आ गए हैं. रंजीत इसके पहले अपनी मातृभाषा ‘कुड़ुख’ में ‘पेनाल्टी काॅर्नर’ फिल्म बना चुके हैं. एफटीआइ से बनी वह पहली आदिवासी फिल्म है, जिसे अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में काफी सराहना भी मिली है. लेकिन रंजीत अब पूरी तरह से अपने समुदाय का सिनेमा बनाने में ही जुटे हैं. ऐसा करनेवाले रंजीत एकलव्य अकेले नहीं हैं बल्कि अश्विनी के आह्वान पर आदिवासी समुदाय ने सोनबारी की कथा को सामने लाने के लिए उत्साह दिखाया तो सत्यजीत रे फिल्म इंस्टीट्यूट, कोलकाता से मंजूल टोप्पो, मुंबई से राजकुमार यादव, पुरुलिया से कमलाकांत दास, दिल्ली से सचिन मीणा, पटना से प्रकाश सिंह जैसे दर्जनों नौजवान रांची पहुंचकर इस सिनेमा को बनाने में अपनी भूमिका निभाने में जुट गए हैं. मुंबई में मुजफ्फर अली जैसे मशहूर फिल्मकार के साथ काम कर चुके सिनेमाटोग्राफर कृष्ण देव भी रांची पहुंचेे. भोजपुरी फिल्मों में अभिनय कर चुके बीएन तिवारी ने भी अश्विनी को हर तरह से सहयोग का भरोसा दिलाया है और इस फिल्म में वे अभिनय करने को तैयार हैं. हाल के दिनों में लोकसंगीत में एक नए सितारे की तरह उभरी मशहूर लोकगायिका चंदन तिवारी ने भी इस फिल्म में अपनी आवाज में गाना गाने की सहमति दी है. दिलचस्प यह है कि इस फिल्म से जो भी जुड़ रहे हैं, उनमें से कोई भी कुछ लाभ-लोभ की इच्छा मन में नहीं रख रहा है. हर कोई जिनसे जितना संभव हो वह अपनी अंजुरी भरकर देने की इच्छा रख रहा है. वे अपना काॅस्ट्यूम तक खुद तैयार करवा रहे हैं. शूटिंग के लिए सभी अपने खर्च पर रांची पहुंच रहे हैं और हर कोई यहां की सामान्य व्यवस्था में ढलकर आनंद में डूबकर रचने का बस ख्वाब पाल रहा है. मुश्किलों के बावजूद किसी के जुनून में कमी देखने को नहीं मिल रही है. अश्विनी कहते हैं कि यह बहुत चुनौती भरा काम है और सभी के मन में एक बड़ा उद्देश्य हैै. हमलोगों ने पहले तो कोशिश की कि धाविका सोनबारी से ही अभिनय कराएंगे लेकिन यह संभव नहीं हो पाया. हमलोगों ने फिल्म के पात्रों के चयन के लिए झारखंड-उड़ीसा आदि कई जगहों पर आॅडिशन किए. फिर भी हमें अपनी फिल्म के हिसाब से नायिका नहीं मिली तब हमने झारखंड के अड़की ब्लाॅक के मुंडा समुदाय के सुदूरवर्ती गांवों में घूमना शुरू किया. अलग-अलग गांवों से पांच लड़कियों का चयन किया. फिर सोशल मीडिया के जरिए लोगों से राय मांगी. सोशलसाइट्स पर हमने कहानी और संभावित नायिकाआें का चित्र साझा किया. माकी नाम की एक लड़की को सर्वाधिक लोगों ने पसंद किया. माकी ने अभिनय तो दूर, सिनेमा भी कभी कायदे से नहीं देखा था. वह आठवीं में पढ़ती है. माकी ने तत्काल सहमति दे दी. सोनबारी के साथ सह नायिका के लिए जमशेदपुर के करीम सिटी काॅलेज से मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई करनेवाली पूजा सिंह ने खुद ही इसमें रुचि दिखाई. फिर ‘फेविकोल’ वाले जीतराई हांसदा के साथ काम करनेवाले थियेटर आर्टिस्ट मानु मुर्मू ने सहनायक की भूमिका के लिए अपनी रुचि दिखाई. अश्विनी कहते हैं, यह सबकुछ बहुत मुश्किल था लेकिन समुदाय के स्तर पर सिनेमा बनाने को लेकर लोग जुड़ते गए और कारवां बनता गया लेकिन मुश्किलें सिर्फ इतनी ही नहीं थी. समस्या फिल्म निर्माण के खर्चे को लेकर थी लेकिन 20 से 30 मार्च तक जब शूटिंग की बात तय हुई तो कई ऐसे लोग सामने आए, जिसमें से किसी ने कैंप में आनेवाले सभी लोगों के लिए चाय पहुंचाई, तो किसी ने दाल, किसी ने आटा आदि. अश्विनी कहते हैं, शूटिंग का एक शिड्यूल पूरा हो गया तो अब दूसरा चरण भी पूरा हो जाएगा. चुनौती तो शुरू करने की ही होती है, उसके बाद तो मुश्किलों में भी रास्ते निकलते ही रहते हैं.
सोनचांद नाम से इस फिल्म का निर्माण वीर बुरू ओंपाई मीडिया के बैनर तले हो रहा है. इस कंपनी का निर्माण आदिवासी सिनेमा को बढ़ाने के लिए हुआ है. फिल्म के निर्देशन में सक्रिय भूमिका निभा रहे रंजीत से हमने पूछा कि ऐसे समय में, जब खिलािड़यों पर मैरी काॅम जैसी भारी बजटवाली फिल्म आ चुकी है तो फिर कम बजटवाली सोनचांद जैसी फिल्मों का क्या भविष्य होगा? बना भी लेंगे तो प्रदर्शित कौन करेगा? रंजीत कहते हैं- जहां तक स्टारकास्ट की बात है तो हमलोगांे ने मुंबई में जाकर डैनी डेंगजोप्पा से इसके लिए संपर्क किया था और राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता उषा जादव से भी. दोनों से प्राथमिक स्तर पर ही बात हुई थी. दोनों बिना मेहनताना लिए बिना तैयार हो जाते लेकिन उनके आने-जाने और उनको ठहराने आदि पर जो खर्च आता, उसके लिए हमारे पास फंड नहीं था, इसलिए हमलोगाें ने उनसे दुबारा संपर्क नहीं किया. रंजीत उत्साह से भरकर कहते हैं कि हम इतने ही संसाधन में, सिर्फ सामुदायिक सहयोग से बढ़े मनोबल के जरिए एक बेहतरीन सिनेमा बनाएंगे. रही बात दिखाने की तो वक्त आयेगा तो तय होगा. पहले सिनेमा बनने तो दीजिए.

फिल्म निर्माण के लिए फंडिंग एक चुनौतीपूर्ण कार्य था लेकिन आदिवासी समुदाय के लोगों में से किसी ने आगे बढ़कर चाय पहुंचाई तो किसी ने दाल और किसी ने आटा

सोनचांद की भूमिका निभा रही माकी से भी हमने बात की. गांव से निकलकर पहली बार रांची पहुंची और पहली बार कैमरा देख रही माकी अाहिस्ते से कहती है- हम करेंगे दादा, सिनेमा करेंगे. हम सीख जाएंगे सिनेमा. माकी मासूमियत से अपनी बात कहती है. वह आत्मविश्वास से लबरेज है तो उसकी वजहें हैं. माकी देख रही है कि कैसे सरहुल और रामनवमी में गांव-गिरांव में जाकर मामूली लोगों से, मामूली लोगों से गलियों में अभिनय करवाया जा रहा है. माकी पल-पल सिनेमा को महसूस कर रही है. माकी का आत्मविश्वास जग रहा है और उसी आत्मविश्वास के बूते वह कह रही है कि वह सीख जाएगी सिनेमा.
आप यह अनुमान लगा लें तो ऐसी फिल्में तो रोज बनती हैं और रोज दम तोड़ती हैं. रोज ही ऐसी शूटिंग चलती रहती है और डिब्बे में बंद हो जाती है. आप यह भी कह सकते हैं कि फिल्म ही एक ऐसी विधा है, जो अब शगल की तरह है. जिसे जी में आया, कैमरे का जुगाड़ किया और बना लिया सिनेमा. फिल्म की निर्माता वंदना टेटे कहती हैं, ‘हां यह सही है. इससे किसी कोे इंकार नहीं. लेकिन भारतीय सिनेमा की 100 साल की स्वर्णिम परंपरा और इतिहास में आदिवासियों का अपना सिनेमा नहीं बन सका है. हम इतिहास के उसी निर्माण के दरवाजे पर दस्तक देने की कोशिश कर रहे हैं. हमारा काम कोशिश करना है, अभी से ही परिणाम की चिंता में मर-मिट जाना नहीं. हम सफल होंगे तो नजीर बनेंगे, बहुतों के लिए संभावनाओं के द्वार खोलेंगे, विफल हुए तो पथ प्रदर्शक तो बनेंगे ही.

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