लोकप्रिय है, लुगदी नहीं

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लोकप्रिय साहित्य को लुगदी साहित्य कहना ठीक नहीं है क्योंकि साहित्य के नाम जो कुछ परोसा जा रहा है, उसमें से बहुत कुछ ऐसा है जो लुगदी की तुलना में बहुत ही खराब और बेहद गिरा हुआ है. लोकप्रियता अगर किसी चीज के अच्छे होने का प्रमाण नहीं है तो लोकप्रिय होते ही कोई चीज खराब नहीं हो जाती है. मैं अपनी बात करूं तो मैंने छठी, सातवीं और आठवीं कक्षा की गर्मी की छुट्टियों में शरतचंद्र की ‘गृहदाह’, ‘शेष प्रश्न’, ‘चरित्रहीन’, ‘देवदास’ आदि पढ़ी. रवींद्रनाथ की ‘गोरा’, रांघेय राघव की ‘कब तक पुकारूं?’ गुलशन नंदा की ‘मैं अकेली’, ‘काली घटा’, ‘माधवी’, ‘घाट का पत्थर’, ‘पत्थर के होंठ’ आदि पढ़ डाली. कक्षा नौ में मैंने गुलशन नंदा की ‘कलंकिनी’ पढ़ी. मैं अब जब गुलशन नंदा के लेखन का मूल्यांकन करूं तो मुझे उनका लेखन ‘लाइट रीडिंग’ लगता है. लाइट रीडिंग से मेरा आशय भावनात्मक विषयों से है. ये साहित्य हल्के मनोभाव से पढ़े जाते हैं लेकिन असर लंबे समय तक पड़ता है. ये साहित्य किशोरावस्था से युवावस्था में प्रवेश करने की उम्र में पढ़े जाते हैं. इससे भावनात्मक मनोभूमि का निर्माण होता है.

शरतचंद्र की ‘गृहदाह’ और ‘चरित्रहीन’ में जो पात्र हैं, उनके उपन्यास में जो घर और पारिवारिक परिवेश दर्शाए गए हैं, वे यथार्थ जीवन से आते हैं. वहीं गुलशन नंदा ने अपने उपन्यासों में यथार्थ दिखाने की जगह आदर्श व भावनात्मक मूल्यों को दिखाने की कोशिश की. वे इन्हें मोहब्बत की दास्तान कहते हैं. मोहब्बत की दास्तान कहना भी उतना ही जरूरी है जितना यथार्थ की कहानी. जीवन के लिए दाल-रोटी कमाना और हल जोतना ही सिर्फ जरूरी नहीं है. जीवन को प्रेम की, भावना की भी बहुत जरूरत है. मेरे कहने का मतलब यह है कि जीवन का यथार्थ या जीवन से जुड़ी भावना केवल गंभीर साहित्य में है, वहां नहीं है ऐसा कहना ठीक नहीं.

मैंने लाइट रीडिंग की बात की है. मोहब्बत में पड़ गए. एक-दूसरे के लिए जीने-मरने लगे, ऐसी बातों के बगैर जीवन नहीं ठहरता लेकिन यह उदात्त है. ऐसी भावनागत बातें हमें दूसरी दुनिया में जीना सिखाता है. आज साहित्य के नाम पर बहुत अश्लील लिखा जा रहा है. 30-40 साल पहले गुलशन नंदा का उपन्यास ‘कलंकिनी’ आया था. यह इनसेस्ट (कुटुंब व्यभिचार) की कहानी है. यह चाचा द्वारा एक भतीजी को प्रताड़ित करने की कहानी है. उनकी ‘काली घटा’ में एयर होस्टेज की कहानी है. 1970-80 के दशक के जटिल मुद्दे उनके उपन्यासों के विषय बनाए गए. उन मुद्दों को वे प्रेम कहानियों के जरिए पाठकों तक पहुंचाते थे. उनके उपन्यासों के कथानकों का मूल्यांकन प्रेम कथानकों की तरह होना चाहिए. मुझे दुख है कि वे आज पूरी तरह से भुला दिए गए हैं. उनके उपन्यास बाजार में अब मिलते ही नहीं. यह भी दुखद है कि अश्लील साहित्य के बारे में बात करते हुए अक्सर गुलशन नंदा को मुहावरों की तरह इस्तेमाल में लाया जाता है. मैं जोर देकर कहना चाहूंगी कि गुलशन नंदा का साहित्य कहीं से भी अश्लील नहीं है. मैंने उन्हें छोटी उम्र में पढ़ा और मेरा मानना है कि छोटी उम्र में अश्लील बातों को लेकर ज्यादा दिक्कत महसूस होती है. मैं जब गुलशन नंदा को पढ़ रही थी तब प्रेमचंद और शरतचंद को भी पढ़ रही थी और मुझे उनकी रचनाओं में कहीं भी अश्लीलता नजर नहीं आई. गुलशन नंदा के उपन्यासों के पात्र करोड़पति नहीं थे. वे सामान्य जीवन के ही किरदार थे. उनके कथानकों में विधवा विवाह, बाल विवाह, नशाखोरी जैसे सवालों को शामिल किया गया. कोई किशोरवय जब युवावस्था में प्रवेश कर रहा होता है तब उसे इस तरह की साहित्य की दरकार होती है. ऐसा साहित्य इस उम्र में उदात्त प्रवृत्तियों की ओर प्रवृत्त करता है.

हिन्द पॉकेट बुक्स उन दिनों घरेलू लाइब्रेरी योजना चलाती थी जिसके अन्तर्गत सोलह रुपये में हर महीने छह किताबें पढ़ने को मिलती थीं. मैंने इस योजना के अन्तर्गत बहुत सारी किताबें पढ़ीं. अब इस तरह की कोई योजना नहीं चलाई जाती है. शिवानी हमारी प््रिय लेखिका हैं जिनकी हमने ‘कृष्णकली’, ‘शमशान चंपा’, ‘चौदह फेरे’, ‘भैरवी’ आदि पढ़ी हैं. वे जाति धर्म के राजनीतिक प्रश्न नहीं उठाती हैं तो क्या? मगर उन्होंने हमारा सिर्फ हिंदी भाषा से परिचय कराया उसकी तुलना बाणभट्ट की कादम्बरी से की जा सकती है. संस्कृतनिष्ठ भाषा के बावजूद आमजन उनकी किताबें बुक स्टाल से खरीदकर पढ़ता रहा. मूल प्रश्न यह है कि क्या अच्छा साहित्य है क्या लुगदी, इसका निर्णय कौन करेगा? साहित्य वही है जो पाठक के दिल में बसे. साहित्य के नाम पर ‘हंस’ या और दूसरी पत्रिकाओं में प्रेम के नाम पर कहानियां छापी गई हैं, वे मोहब्बत से दूर, पूरी तरह वीभत्सता का नमूना हैं. इस तरह की वीभत्स कहानियों को इसलिए कहानियों का दर्जा मिल जाता है क्योंकि वे हंस या ऐसी ही किसी साहित्यिक पत्रिकाओं में छप जाती हैं. यह बिल्कुल गलत धारणा है कि जो रचना साहित्यिक पत्रिका में छप गई और लोकप्रिय नहीं हुई, इसलिए अच्छी हैं. और कोई दूसरी रचना साहित्यिक पत्रिकाओं में नहीं छपी और पॉकेट बुक्स में छपकर लोकप्रिय हो गईं, इसलिए साहित्य नहीं, लुगदी है.

                                             स्वतंत्र मिश्र से बातचीत पर आधारित

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