जीत-हार का सार

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nitesh

25 अगस्त को दोपहर के पहले तक समाचार चैनलों पर घूमती पर्टियां यह संकेत दे रही थीं कि बिहार उपचुनाव में कांटे का मुकाबला हो रहा है. इस दौरान पटना स्थित भाजपा कार्यालय में एक पार्टी कार्यकर्ता का चेहरा देखने लायक था. आंखें बंद करके बुदबुदाते हुए वे मनौती पर मनौती मांगे जा रहे थे कि हे भगवानजी, ज्यादा नहीं, बस पांच-पांच का खेल किसी तरह कर दीजिए, हम यह करेंगे, वह करेंगे.

लेकिन मनौती और मन्नत काम न आई. थोड़ी ही देर में नतीजे साफ हो गए.10 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में भाजपा गठबंधन की पारी चौके पर सिमट गई थी और उसके मुकाबले नये-नवेले जदयू-राजद महागठबंधन ने छक्का लगा दिया था. इसके बाद पटना के वीरचंद पटेल पथ पर आधे किलोमीटर के दायरे में ही बने तीनों प्रमुख दलों, भाजपा, जदयू और राजद के दफ्तरों का माहौल मौके के हिसाब से ढल गया. जदयू कार्यालय में स्वाभाविक तौर पर जश्न का माहौल था. राजद कार्यालय में पटाखे फोड़े जाने लगे. उधर, भाजपा कार्यालय में मायूस चेहरों का जुटान होने लगा.

जदयू कार्यालय थोड़ी ही देर में शांत हो गया क्योंकि पार्टी नेता नीतीश कुमार ने मीडिया को घर पर ही बुला लिया था. अपने सरकारी आवास पर मीडिया से बात करते हुए नीतीश कुमार की हंसी देखने लायक थी. बहुत दिनों बाद वे संवाददाताओं से खुलकर बात कर रहे थे. उनका ठहाका तो कैमरे के लिए एक दुर्लभ फ्रेम जैसा था. नीतीश जानते थे कि यह जीत इतनी बड़ी नहीं है कि इसे लोकसभा चुनाव में मिले झटके की भरपाई कहा जा सके. लेकिन जब वे मीडिया से बात कर रहे थे तो ऐसा लग रहा था कि बहुत दिनों बाद बहुत खुश होना चाहते हैं. कृत्रिम या स्वाभाविक, जिस रूप में भी सही, लेकिन बहुत खुश होने के मूड में दिख रहे थे नीतीश. इसके कारण भी थे. वे अरसे बाद अपने घोर राजनीतिक दुश्मन लालू प्रसाद के साथ मिले थे. जनता इस पर मुहर लगाती है या नहीं, इसका परीक्षण इस चुनाव में होना था. इसे लेकर ही सबसे ज्यादा धुकधुकी भी हुई होगी उन्हें. चुनाव परिणाम ने जदयू को बताया कि परीक्षण पर जनता की मुहर लग गई है. लेकिन शायद उस रूप में नहीं, जिस रूप में उम्मीद थी.

साफ है कि भाजपा न तो अगड़ों के बीच ऐसा आधार बना पाई है कि निश्चिंतता में जी सके और न ही वह नीतीश-लालू के मूल वोट बैंक में सेंधमारी कर सकी है

जिन 10 सीटों पर चुनाव हुए, उनमें से छह पर पहले भाजपा काबिज थी. उसे दो सीटें गंवानी पड़ीं. पार्टी को सबसे बड़ा झटका भागलपुर और छपरा में लगा. ये शहरी क्षेत्र उसका गढ़ थे. अपने ही गढ़ में हारने की उम्मीद भाजपा को नहीं रही होगी. लेकिन भागलपुर में कांग्रेस ने भाजपा से सीट छीन ली तो छपरा में भाजपा के बागी ने खेल बिगाड़कर राजद की जीत आसान कर दी.

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की तबीयत चूंकि ज्यादा खराब हो गयी थी, इसलिए पार्टी में जश्न उस तरह से नहीं मन पाया जैसा उनकी मौजूदगी में मनता. इस चुनाव परिणाम के समय लालू पटना में न होकर इलाज के लिए मुंबई में थे. वहीं से उन्होंने ट्वीट कर संदेश दिया कि यह सामाजिक न्याय की जीत है. लालू प्रसाद पटना में होते तो चुनाव परिणाम के समय बयानों का रंग कुछ और होता. संभवतः वे यह भी कहते कि वे असल भविष्यवक्ता हैं बिहार के. लोकसभा चुनाव में हारने के बाद वे लगातार तोतारटंत अंदाज में बोलते आ रहे थे कि हमारा, नीतीश कुमार का और कांग्रेस का वोट मिला देने से लोकसभा चुनाव में 45 प्रतिशत के करीब वोट होता है, तीनों साथ मिलकर लड़ते तो भाजपा कहीं की नहीं होती. विधानसभा चुनाव में तीनों साथ मिलकर लड़े तो वोट सच में 45.23 प्रतिशत पहुंच गया और भाजपा गठबंधन, जो लोकसभा में 45.24 प्रतिशत वोट पाने में सफल रहा था, 37.56 प्रतिशत पर सिमट गया.

इस चुनाव के पहले और परिणाम आने के बाद एक बड़ा सवाल चर्चा में रहा कि क्या लालू प्रसाद द्वारा बार-बार हवा में उछाला गया जुमला हकीकत में बदलेगा. यानी क्या मंडलवादी ताकतों का एका होगा. सवाल यह भी है कि वर्षों तक लालू के विरोधी रहे और इस विरोध पर ही अपनी राजनीति खड़ी करनेवाले नीतीश कुमार दो दशक बाद अपनी पूरी साख और राजनीतिक सिद्धांत दांव पर लगाकर उन्हीं लालू से मिल गए हैं तो क्या उनकी स्वीकार्यता होगी? या वे और भी पीछे चले जाएंगे? भाजपा ने हाल ही में बिहार में आश्चर्यजनक तरीके से उफान और तूफान पैदा करते हुए जीत का परचम लहराया था. लेकिन उपचुनाव में उसे हार मिली. तो क्या लोकसभा में उसे जो वोट मिला वह सिर्फ एक लहर की ताकत थी जो अब घट रही है?

ऐसे तमाम सवालों के जवाब इस उपचुनाव के जरिये छोटे दायरे में ही मिलने थे. मिले भी. मंडल की राजनीति की संभावनाएं अब कितनी बाकी हैं? कमंडल की लहर क्या जाति की राजनीति पर भारी पड़ चुकी है? क्या मंडल के जरिये कमंडल और कमंडल के जरिये मंडल की राजनीति से लड़ा जा सकता है? इन सवालों के जवाब भी इस चुनाव से एक हद तक मिले. यह अलग बात है कि बहुत साफ नहीं.

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उपचुनाव के नतीजों के बाद मीडिया से बात करते भाजपा सुशील मोदी. फोटो: सोनू किशन

मंडल बनाम कमंडल

लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार को सामाजिक न्याय की दो शक्तियां कहा जाता है. उनके अरसे बाद मिलन और उसके बाद व्यक्त की जा रही संभावनाओं के आधार पर क्या यह परिणाम वाकई मंडलवादी ताकतों के एकजुट हो जाने के फल जैसा रहा? अरसे बाद खुलकर किए गए प्रयोग के जरिये क्या राजनीति में मंडल प्रभाव अब भी असरदार साबित हुआ या नतीजे कुछ और बताते हैं? यह भी सवाल उठा कि क्या वाकई मंडल के हथियार से कमंडल से लड़ना अब भी उसी तरह संभव है, जैसा दो दशक पहले हुआ करता था.

बिहार विधानसभा में कुल 243 सीटें हैं. उपचुनाव था कुल 10 सीटों पर यानी पांच फीसदी से भी कम जगह के लिए. तिस पर मतदान हुआ सिर्फ 44 फीसदी. यानी लोगों के बढ़-चढ़कर वोट देने जैसी बात नहीं रही. साफ है कि ऐसे उपचुनाव के नतीजे देखकर इन सवालों का जवाब देना इतना आसान नहीं है. फिर भी कुछ संभावित जवाब चुनाव परिणाम वाले दिन ही गढ़ लिए गए. जैसे कि, मंडल प्रभाव जैसा कुछ नहीं, दस सीटों में से पांच सीटों पर सवर्ण उम्मीदवारों की जीत हुई है. इन पांच में से चार सवर्ण महागठबंधन खेमे से ही जीते हैं, भाजपा से सिर्फ एक. महागठबंधन के जिन छह उम्मीदवारों की जीत हुई, उनमें से चार सवर्ण, एक पासवान और एक यादव थे. इसके दूसरे संकेत और संदेश भी मिले. यानी महागठबंधन में न तो महादलित कोटे से कोई जीत  सका, न अतिपिछड़ा समूह से और न ही महागठबंधन की ओर से मैदान में उतारे गए दो मुस्लिम उम्मीदवारों में से किसी भी मुस्लिम उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित हो सकी.

महागठबंधन खेमे से सवर्ण उम्मीदवारों की आसानी से जीत और मुस्लिम उम्मीदवारों का हार जाना दूसरे संकेत लेकर आया. कहा जा रहा है कि लालू प्रसाद और नीतीश कुमार के मिलन का असर सिर्फ यही नहीं रहा कि पिछड़ी जातियां मंडलवादी ताकतों से जुड़ गईं बल्कि यह भी कि इसका असर सभी जातियों पर रहा. यह नीतीश कुमार के लिए खुशी की बात हो सकती है. उन्होंने चुनाव परिणाम आते ही तुरंत कहा भी कि भाजपा यह समझती है और हवा फैला रही है कि सवर्ण उसके खेमे में चले गए हैं, लेकिन चुनाव परिणाम से यह साफ हुआ कि बिहार में लोगों ने जाति से ऊपर उठकर वोट किया, सभी जातियों की इस महागठबंधन पर मुहर लगी.

लोकसभा चुनाव की सफलता नीतीश से निराशा या लालू से पुरानी नाराजगी की वजह से नहीं बल्कि नरेंद्र मोदी के नाम पर बनी लहर की वजह से मिली थी

नीतीश कुमार यह सोचकर खुश हो सकते हैं. लेकिन बांका और नरकटियागंज सीट के नतीजों के निहितार्थ उलट दिशा में जाते दिखते हैं. इन सीटों पर महागठबंधन की ओर से मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे गए थे. वे हार गए. इस नतीजे का एक विश्लेषण यह भी किया जा रहा है कि मुस्लिम उम्मीदवार उतारने के खिलाफ मतदाता जाति से ऊपर उठकर संप्रदाय और धर्म के आधार पर गोलबंद हो गए और मुस्लिम उम्मीदवार हार गए. यानी विश्लेषण किसी एक निष्कर्ष की तरफ जाता नहीं दिखता.

चुनाव परिणामों से न तो यह पता चल पा रहा है कि मंडलवादी ताकतों की गोलबंदी हुई या नहीं और न ही इस बात की थाह कोई लगा पा रहा है कि कमंडलवादी ताकतों के दिन गुजर गए हैं या नहीं. यह उहापोह सबसे ज्यादा भाजपा के लिए पीड़ा लेकर आया है. भाजपा के विधायक दल के नेता नंदकिशोर यादव कहते हैं, ‘भले ही महागठबंधन को छह सीटें मिल गई हों और हमें आशानुरूप सफलता न मिली हो, लेकिन सुकून है कि महागठबंधन की यह जीत मंडलवादी प्रभाव की जीत के रूप में सामने नहीं आई है. यह स्थानीय कारणों से हुई जीत है.’

नंदकिशोर यादव की बात सही है कि यह मंडलवादी ताकतों की जीत नहीं है, लेकिन महागठबंधन की इस जीत ने भाजपा को न निगल पाने और न उगल पाने वाली स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है. अगर यह मंडल प्रभाव की जीत नहीं है और महागठबंधन ने लालू-नीतीश के एक हो जाने के बाद भी चार-चार सवर्ण उम्मीदवारों को जितवा लिया है तो भाजपा के लिए भविष्य के लिहाज से यह बुरा संकेत है. माना जा रहा था कि लालू प्रसाद और नीतीश कुमार के मिलन से सवर्ण मतदाताओं का पूरा समूह उनसे खिसककर भाजपा के खाते में शिफ्ट हो चुका है. लेकिन उपचुनाव के परिणाम ने यह अवधारणा झुठला दी है. साथ ही यह संदेश भी दिया है कि महागठबंधन ने अगर भविष्य में सामाजिक न्याय के नारे और मंडलवादी ताकतों के एका के साथ सीट के हिसाब से मुफीद उम्मीदवार चुने  तो भाजपा को लेने के देने पड़ सकते हैं. कुल मिलाकर निष्कर्ष यह कि भाजपा के लिए छोटे स्तर पर ही हुआ यह उपचुनाव साफ संदेश लाया है कि बिहार, जहां की राजनीति जब-तब जाति के खोल में समाती रहती है, वहां भाजपा न तो ठीक से अगड़ों के बीच ऐसा आधार बना पाई है कि निश्चिंतता में जी सके और न ही वह नीतीश-लालू के मूल वोट बैंक में सेंधमारी कर सकी है.

खैर! इस चुनावी नतीजे का सब अपने-अपने तरीके से विश्लेषण कर रहे हैं. पटना स्थित अनुग्रह नारायण सिन्हा सामाजिक शोध संस्थान के निदेशक डॉ डीएम दिवाकर कहते हैं कि इस चुनाव परिणाम को सामाजिक न्याय की धारा की जीत के रूप में देखा जाना चाहिए और सांप्रदायिक ताकतों की हार के रूप में. इस बीच राजग के एक प्रमुख घटक और राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा का अपना मत है. वे इसे जातिवाद के साथ जोड़ते हैं. कुशवाहा कहते हैं कि केंद्र की सरकार में एक जाति को, जिसने बिहार में राजग का साथ दिया था, प्रतिनिधित्व नहीं मिला, इसलिए इस बार राजग की यह हार हुई.

अलग-अलग लोगों के अलग-अलग तर्क हैं. किसके सही हैं, किसके नहीं, यह कहना भी इतना आसान नहीं. लेकिन यह तो कहा ही जा सकता है कि कुछ महीने पहले ही बिहार में कई मान्यताओं को ध्वस्त करते हुए 40 में से 31 लोकसभा सीटों पर कब्जा जमाने वाले भाजपा गठबंधन को जमीनी हकीकत का अंदाजा नहीं था. यह भी साफ हुआ कि लोकसभा चुनाव में मिली अपार सफलता नीतीश कुमार से उभरी निराशा या लालू प्रसाद से पुरानी नाराजगी की वजह से नहीं बल्कि नरेंद्र मोदी के नाम पर बनी लहर की वजह से मिली थी जिससे फौरी तौर पर सीटें तो मिल गईं, लेकिन लहर उसी तेजी के साथ वापस भी चली गई. इसे इस तरह समझा जा सकता है कि जिन 10 सीटों पर उपचुनाव हुए, उनमें आठ विधानसभा क्षेत्र ऐसे थे, जिनमें लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा बढ़त बनाने में सफल रही थी. लेकिन उप चुनाव में उनमें से चार सीटें पार्टी के हाथ से निकल गईं. कइयों के मुताबिक यह बहुत हद तक भाजपा के अतिआत्मविश्वास और मोदी लहर के जरिये ही राज्य में भी बेड़ा पार कर लेने का मंसूबा पाल लेने की वजह से हुआ. लोकसभा चुनाव में भारी जीत की खुमारी और अगले साल होनेवाले चुनाव के लिए शीर्ष पर विराजमान हो जाने के ख्वाब के साथ आपस में ही उलझे भाजपा नेताओं के सामने यह छोटा-सा चुनाव बड़ी चुनौती की तरह सामने आ गया है.

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