सियासी शराब

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Photo by - Sonu Kishan
Photo by – Sonu Kishan

इसका दूसरा मजबूत पक्ष यह है कि नीतीश अब यह जान चुके हैं कि पूरी तरह से जाति की राजनीति में फंस चुके बिहार में उन्होंने जाति से इतर अपने लिए एक वोट बैंक खुद के बूते तैयार किया है और वह वोट बैंक इतना ठोस है कि तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी उनके कद को बनाए-बचाए रख सकता है. नीतीश ने पिछड़ों से अतिपिछड़ों और दलितों से महादलितों को अलग करके अपने लिए एक अलग वोट बैंक तैयार किया था लेकिन ये वोट बैंक मजबूती से नीतीश के साथ नहीं रह पाए. महादलितों के वोट का बंटवारा हो चुका है और अतिपिछड़ा अब अपनी सत्ता के लिए अलग राह अपना रहे हैं. ऐसे में भविष्य की राजनीति के लिए यह जरूरी था कि नीतीश महिलाओं को अपने साथ रखते. अब साइकिल वितरण योजना और पंचायत में महिलाओं को आरक्षण देने के बाद शराबबंदी का फैसला पिछड़ी से लेकर उच्च जाति की महिलाओं को नीतीश से जोड़ेगा. साथ ही पढ़ी-लिखी शहरी लड़कियों से लेकर गांव-कस्बों में रहने वाली लड़कियों को भी उनके पक्ष में खड़ा करेगा. नीतीश कह भी रहे हैं कि फैसले का असर अभी से दिख रहा है. एक सप्ताह में ही बिहार में जिस तरह से महिलाओं में खुशी की लहर है उससे पता चल रहा है कि आगे बिहार का भविष्य बेहतर होने वाला है.

वरिष्ठ समाजवादी चिंतक सच्चिदानंद सिन्हा कहते हैं, ‘महिलाओं का अलग से वोट बैंक बन जाने की ऐसी घटना बिहार में पहले कभी नहीं हुई थी.’ सच्चिदानंद सिन्हा जैसे कई लोग मानते हैं कि यह एक अभूतपूर्व राजनीतिक गोलबंदी है जो नीतीश को बड़ा नेता बनाती है लेकिन नीतीश ने शराबबंदी करके भाजपा की आगे की राह मुश्किल करने के साथ ही सबसे बड़ी चुनौती लालू यादव के लिए खड़ी कर दी है. पत्रकार पुष्यमित्र कहते हैं, ‘बहुत साफ है कि नीतीश और लालू की जोड़ी के जीतने के बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि लालू खुद को बड़े कद का नेता साबित करने की कोशिश करेंगे लेकिन नीतीश ने खुद को उनसे पहले ही बड़े कद का लोकप्रिय नेता बना लिया. इस प्रक्रिया में शराबबंदी एक बड़े औजार की तरह रही.’ पुष्यमित्र की बातों का विस्तार करें तो एक और बात सामने आती है. इस फैसले से नीतीश ने लालू को चुनौती भर ही नहीं दी है बल्कि इन दिनों वे लालू को दरकिनार करके खुद को एक बड़े नेता के तौर पर स्थापित करने में जुटे हुए हैं. बिहार में चुनाव परिणाम आने के बाद लालू ने कहा था कि नीतीश बिहार संभालेंगे और वे अब देश घूमकर राजनीति करेंगे लेकिन लालू के इस मंसूबे पर भी नीतीश ने पानी फेर दिया है. नीतीश राष्ट्रीय लोकदल और झारखंड विकास मोर्चा जैसी पार्टियों का विलय जदयू में करवा रहे हैं, और अब वे खुद जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन केंद्रीय राजनीति में अपना कद बढ़ा चुके हैं.

बात इतनी ही नहीं हैं. वे किसी स्तर पर लालू प्रसाद को यह मौका ही नहीं दे रहे कि वे खुद का उभार कर सकें. कहा जा रहा है कि इस शराबबंदी के जरिए भी नीतीश ने लंबी सियासी चाल चली है. नीतीश भी जानते हैं कि अभी नहीं तो 2019 में लोकसभा चुनाव आते-आते तक लालू और उनके बीच का रास्ता अलग हो सकता है. लालू से अलगाव के बाद नीतीश को खुद को खड़ा करने के लिए एक मजबूत आधार चाहिए होगा. उस आधार के तौर पर ही उन्होंने हर तरह के कार्ड खेलने शुरू किए हैं. उनमें से एक कार्ड तो हालिया दिनों में लगातार नीतीश कुमार द्वारा निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग वाला कार्ड है, जिससे वे एक नए किस्म का आधार वोट बैंक नौजवानों, पिछड़ों और दलितों के बीच बनाना चाह रहे हैं. इस बार के चुनाव में नीतीश और लालू अपने वोट बैंक के आधार पर ही चुनावी मैदान में थे. उस आधार से इतर नीतीश ने एक अलग ठोस वोट बैंक का निर्माण महिलाओं के रूप में किया है. यह सब जानते हैं कि लालू इस तरह शराबबंदी के पक्ष में कभी नहीं रहे. उनका जहां-जहां भी कोर वोटर है वहां शराब उसकी जीवन का अहम हिस्सा है, इसलिए लालू पहले भी कहते रहे हैं कि गरीबों का लाल पानी (देसी शराब) कभी बंद नहीं होना चाहिए. अब नीतीश ने सबका लाल पानी बंद कर दिया है और इसे लेकर लालू का अब तक कोई ठोस बयान नहीं आया है. हालांकि उनके बेटे और राज्य के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव कहते हैं कि हमने तो नया नारा ही दिया है- ‘नशा छोड़ो, समाज जोड़ो.’ तेजस्वी कहते हैं कि हमारी सरकार ने बिहार की गरीब जनता का ध्यान रखकर और महिलाओं-बच्चों की खुशी के लिए यह फैसला लिया है और ताड़ीवालों को परेशान होने की जरूरत नहीं. सरकार जल्द ही उनके लिए नया वैकल्पिक इंतजाम करने जा रही है ताकि ताड़ी के धंधे पर आश्रित लोगों का जीवनयापन होने के साथ वे कमाई भी कर सकें. तेजस्वी शराबबंदी पर अपनी बात खुलकर रखते हैं. वे इसे अपनी सरकार के श्रेय के खाते में जोड़ना चाहते हैं वहीं नीतीश इसे सरकार के बजाय अपनी उपलब्धियों के खाते में डाल चुके हैं.

शराबबंदी की सियासत तो एक बात हुई. बिहार में शराबबंदी के आदेश के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बिहार में सिर्फ सरकारी आदेश से शराबबंदी हो जाएगी. यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है कि यहां पहली बार शराबबंदी नहीं हुई है. इससे पहले 1977 में जब कर्पूरी ठाकुर की सरकार थी तब भी शराबबंदी का आदेश सरकार ने दिया था लेकिन यह ज्यादा दिनों तक चल नहीं सका था. तस्करी के कारण आदेश धरा का धरा रह गया था और अंत में कर्पूरी ठाकुर के बाद दूसरी सरकार आते ही शराबबंदी का आदेश वापस ले लिया गया. इस बार भी कहा जा रहा है कि तस्करी होगी. सूचना यह मिल रही है कि बिहार से लगे झारखंड, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती इलाके में शराब की दुकानें खोलने की तैयारी है और उससे तस्करी भी होगी. मुख्यमंत्री के पास भी यह सवाल रखा जाता है तो वे कहते हैं कि इस भ्रम में किसी को रहने की जरूरत नहीं है. हमने शराबबंदी की बात की है तो जो पड़ोसी राज्य हैं वहां भी यह आवाज उठेगी और कोई तस्करी नहीं होगी. हालांकि पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश से तो यह आवाज अब तक नहीं उठी लेकिन झारखंड में इस बात की आवाज नीतीश द्वारा बिहार में आदेश दिए जाने के बाद से ही उठने लगी है. तस्करी तो फिर भी एक मसला है, लेकिन दूसरी बड़ी चुनौती पुलिस-प्रशासन के सहयोग से स्थानीय स्तर पर ‘चुलइया’ शराब बनाने की होगी. अपराध विशेषज्ञ ज्ञानेश्वर कहते हैं, ‘नीतीश के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती होगी क्योंकि बिहार की पुलिस लगातार कमजोर और शिथिल चल रही है. ऐसे में संभव है कि पुलिस शराबबंदी की आड़ में अवैध वसूली का नया कारोबार शुरू करे.’

शराबबंदी से नीतीश ने लालू को चुनौती ही नहीं दी है बल्कि इन दिनों वे उन्हें दरकिनार करके खुद को एक बड़े नेता के बतौर स्थापित करने में भी जुटे हुए हैं

खैर, यह सब तो बाद की बात है. फिलहाल बिहार में शराबबंदी का आदेश होने के बाद से हर दिन शराब को लेकर प्रशासन कार्रवाइयां कर रहा है. नीतीश भी हर आयोजन में शराबबंदी के अपने फैसले की चर्चा करते नहीं अघा रहे हैं. शराबबंदी के बाद रोजाना नए किस्से-कहानियों का भंडार भी बढ़ता जा रहा है. जैसे शराबबंदी के आदेश के दूसरे दिन ही खबर आई कि झारखंड से आने वाली ट्रेनों में दूध के ड्रम में शराब छिपाकर लाने का काम शुरू हो गया है. बेतिया से खबर आई कि वहां कई शराबी शराब न मिलने से साबुन खाने लगे हैं. उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया जा रहा है. पूर्णिया से खबर आई कि वहां एंबुलेंस में मरीज को साथ रखकर उसकी आड़ में शराब लाया जा रहा था. औरंगाबाद इलाके से खबर आई कि रोजाना पीने वाले लोग 30-40 किमी तक साइकिल चलाकर झारखंड के सीमावर्ती इलाकों में जा रहे हैं. इसी तरह की खबरें राज्य के अलग-अलग हिस्सों से आ रही हैं. दूसरी ओर पुलिस भी सक्रियता दिखा रही है. राज्य के अपर पुलिस महानिदेशक सुनील कुमार कहते हैं, ‘शराबबंदी के आदेश के बाद पुलिस द्वारा अब तक 15 हजार से अधिक स्थानों पर छापेमारी हो चुकी है. शराब की भट्ठियां तोड़ी गई हैं. केस दर्ज किए जा रहे हैं.’

खैर! यह होना स्वाभाविक भी है. इतने वर्षों में बिहार की एक बड़ी आबादी को शराब पीने की आजादी मिली है. सब अचानक से बंद होने पर ये मुश्किलें आनी ही थीं लेकिन यह भी तय है कि अगर यह कुछ सालों तक लागू रहा और पुलिस ने सख्ती दिखाई तो बिहार में एक नई किस्म की मुश्किल जरूर खड़ी होगी. वजह है कि पिछले कुछ सालों से बिहार में यह कहावत बन चुकी है कि द्वारे-द्वारे शराब पहुंचाकर और शिक्षा को रसातल में पहुंचाकर सरकार ने इसे बर्बादी के मुहाने पर पहुंचा दिया है, जहां सामाजिक न्याय, समावेशी विकास और बिहारीपन जैसे नारे का कोई महत्व नहीं होता. वहीं शराबबंदी के आदेश के बाद बिहार में नई उम्मीद जगी है. नीतीश के फैसले का स्वागत विरोधी भी कर रहे हैं.